फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
अश्वथामा
विजय

जन्म : ६ सितंबर १९३६

वरिष्ठ और चर्चित कथाकार। पंद्रह कहानी संग्रह, चार उपन्यास, एक किशोर उपन्यास, दो बाल साहित्य की पुस्तकें व उर्दू से कुछ अनुवाद प्रकाशित।
बी-१०६ एटीएस ग्रींस-१, सेक्टर-५०, नोएडा-२०१३०३
मो. ०९३१३३०१४३५

महसूस करता हूं कि कांच की दीवार पर बैठा हुआ हूं जबकि मैं कुर्सी पर बैठा हुआ था। खराड़ी, पुणे के जिस फ्रलैट में रह रहा हूं उसके ऊपर भी कई फ्रलैट हैं। जलजला दिल्ली, उत्तराखंड, लद्दाख या जापान में आता, मैं टीवी पर उस जलजले की यात्राा पढ़ता, बर्बादी के दृश्य देखता और अचानक ही मुझे महसूस होने लगता कि ऊपर के फ्रलैट गिर चुके हैं। मेरा अपना फ्रलैट क्षत-विक्षत हो चुका है और मैं मलबे में दबा पड़ा हूं। जब एहसास लौटता तो पाता कि फ्रलैट सही सलामत है, मैं स्वतंत्रा हूं और जीवित हूं तो अजीब सा महसूस होता। लेकिन ऐसे हादसों से मैं अक्सर गुजरता रहता। अक्सर मेरे अनुभव मुझे बेतुके हादसों में पीड़ा देकर मुझे आजाद कर देते। मैंने एक न्यूरो डॉक्टर को जब ये बातें बताई थीं तो कापफी देर सोचने के बाद उसने कहा था, 'आपको अपने अतीत से खुद को मुक्त करना होगा। आप खूब यात्रााएं करिए। नये लोगों से मेल-मिलाप करिए जिससे आप खुद को मुक्त कर सकें।' मगर न तो मैं यात्राा कर सका और न नए रिश्ते बना सका क्योंकि मेरी सेहत ही कुछ ऐसी थी। बैठता तो उठने में तकलीपफ होती और चलते हुए लगता कि कभी भी मैं बेहोश होकर गिर सकता हूं। देह के कृत्य देह को ही सताते हैं पिफर मेरी आत्मा क्यों बेजार रहती है?
कभी-कभी सोचता हूं कि अब तक मैं जिंदा कैसे हूं? मुझे तो बहुत पहले मर जाना चाहिए था। आत्महत्या की मगर मैंने कभी कोशिश भी नहीं की। हमेशा ईश्वरीय न्याय पर विश्वास कर जीता रहा। जब जन्म अपने हाथ नहीं तो मरण क्यों अपने हाथ लिया जाए?
शायद मेरी सोच में अवसाद द्घिर गया है कि दुर्द्घटनाएं सताती रहती हैं। उस अवसाद से मैं बचना भी नहीं चाहता हूं इसलिए दोबारा न्यूरो चिकित्सक के पास भी नहीं गया। बस अपनी कमजोरी, दिल व आर्थराइटस का इलाज कराता रहा। उसके लिए खराड़ी से मैं दाशान तक का करीब २२ या २५ किलोमीटर का सपफर टैक्सी से करता। वैसे पास में कई अस्पताल और डॉक्टर थे मगर इस खास अस्पताल में जाने से मेरा एक खास मकसद भी पूरा हो जाता था। उस मकसद के पीछे गहरी वजह थी। डॉ. कांत से मेरा खास रिश्ता था जिसके बारे में वह जानता ही नहीं था।
तीन बैडरूम के फ्रलैट में रहना मेरी मजबूरी थी। मेरा सामान एक कमरे के फ्रलैट में भी आ सकता था और मुझसे मिलने भी कभी-कभार कोई भूला भटका ही आता था। झाड़ू-पोंछा करने एक बाई आती थी और सुबह का नाश्ता, दोपहर व रात का खाना बनाने दूसरी बाई आती थी। उनके आने पर गहरी राहत मैं महसूस करता था। एक आश्वस्तता उनकी मौजूदगी देती जो उनके जाने के बाद गहरे अवसाद में बदल जाती। मेरे खयाल कल्पना से अतीत की तरपफ मुड़ जाते और अनवरत पीड़ा मुझे द्घेर लेती।
असल में मेरा पूरा जीवन आशंकाओं से भरा रहा है। जो मैंने पाना चाहा और जिसके लिए मेहनत की वह मुझे कभी प्राप्त नहीं हो पाया। मेरे पिता वामन शिवाजी मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे जिससे मैं धन भी कमाऊं और सेवा कार्य भी कर सकूं। मैं भी कल्पना करता था कि मेरा अपना अस्पताल होगा जिस पर बड़ा-सा चंद्राकार बोर्ड होगा जिस पर लिखा होगा... तुकाराम वामन हस्पताल!
पिता की अकस्मात मृत्यु ने सपने पर गहरा आद्घात किया मगर आई ;मांद्ध ने मुझे संभाला, 'तुझे उनका सपना पूरा करना है तुकाराम!' मैं जानता था कि मेरा अन्ना ;पिताद्ध मुझे डॉक्टर देखना चाहता था और आई जो उसके प्रति बेहद समर्पित थी उनके सपने को साकार करने में कोई कसर नहीं रखेगी। वह चुपचाप अपना कोई जेवर बेच आती। रात में मेरे सिर की
मालिश करती कि पढ़-पढ़कर कहीं मेरे दिमाग में गर्मी न चढ़ जाए। जाते वक्त कहती, 'वे तारा बन चुके होंगे। टकटकी लगाए धरती को द्घूरते होंगे। कितने खुश होंगे जब तू डॉक्टर बन जाएगा।'
मगर अपफसोस कि तीन बार परीक्षा में बैठकर भी डॉक्टर बनने के माता-पिता के सपनों को पूरा नहीं कर सका, चाहे मैं अच्छे नंबरों से बीएससी पास हो गया था। हताश था मगर आई ने संभाला, 'न हुआ डॉक्टर तो कोई बात नहीं है। तू
लेक्चरर बनना। अच्छी पगार अब उनको मिलती है। गरीब-गुरबा लड़कों को मुफ्रत पढ़ाना, तो सेवा भी हो जाएगी। तेरा अन्ना यही तो चाहता था कि धन प्राप्ति और सेवा साथ-साथ चले। तू अपने बेटों को डॉक्टर बनाना। उनके नाम की एक पटिया लगवा देना कि उनकी पुण्य स्मृति में अस्पताल खोला गया है। तेरा अन्ना अक्सर तुकाराम के अभंग गाता रहता था। कहता था कि ज्ञानेश्वर की बात तुकाराम ने महाराष्ट्र में पफैलाई तो नामदेव ने पंजाब तक पफैला दी। इसीलिए तो तेरा नाम तुकाराम रखा था। सेवा को बहुत महत्व देते थे वे। कहते थे कि मैं जो गृहस्थी की गाड़ी खींच रहा हूं वह इसलिए कि मेरी औलाद गृहस्थी के साथ सेवा भी कर सके। संपन्न बने और दूसरों को बना सके।'
क्योंकि गणित मेरा प्रिय विषय था इसलिए उसी में दाखिला लेकर मैं पढ़ने लगा। शुक्रवार पेठ का मकान छोड़ शनिवार बाड़े के पास की बैरकनुमा खोली में हम आ गए थे। पफकत दो कमरे थे जिनमें रसोई भी पकानी पड़ती थी। हमारी खोली के दाहिनी ओर रहती थीं रंजना ताई। उनका आई और मुझसे बहुत अपनापन था। अकेली रहती थीं। अक्सर कुछ न कुछ बनाकर दे जाती थीं। उम्र में मुझसे नौ वर्ष बड़ी थीं। एमएससी पफाइनल का आखिरी पर्चा देकर लौट रहा था। सोच रहा था कि अस्वस्थ आई को कुछ दिन पूर्ण आराम कराऊंगा। बस से उतर नाले जैसी बहती नदियों पर बना पुल पार कर शनिवार बाड़े पास बनी बैरकों में द्घुसा। भग्न देवलों में
विराजमान देवताओं को प्रणाम करते हुए जैसे ही अपनी खोली के पास पहुंचा तो स्तब्ध रह गया। अंदर कई औरतें थीं। रंजना ताई ने मुझे देखते ही कहा, 'ताबड़तोड़ टैक्सी ला तुका। तेरी आई को अस्पताल ले जाना होगा। डॉक्टर देखकर कह गया है कि वह कुछ भी कर पाने में असपफल है।'
टैक्सी में मैं मां को ले जाता हूं।
आधी रात को जब रंजना ताई मेरा हाथ थामे बैठी थीं
डॉक्टर कह गया, 'अंतिम दर्शन कर लो उनका', और चला गया।
वार्ड में जाकर हम दोनों ने देखा आई चिरनिंद्रा में सो रही थीं। सुबह आई की पार्थिव देह लेकर लौट आए हम लोग। रोते हुए भी मैं कर्तव्य नहीं भूला। हर संदूक खोलकर देखा। आई का मंगलसूत्रा भी गायब था। हां, अलंकरण बेचने के पर्चे जरूर पड़े थे। तभी रंजना ताई के कंधों पर रुके हाथों को देख मुड़ा। रंजना ताई कह रही थीं, 'क्यों तपसता है अलंकरण? वही बेच-बेचकर तो तुझे पढ़ाया तुका। अस्वस्थता के साथ कुछ न बचना भी उनकी मौत का कारण बना! पर तू पिफक्र न कर, मैं हूं न!'
श्मशान द्घाट से लौटकर रंजना ताई की गोदी में सिर रख मैं कितनी देर सिसकता रहा।
रंजना ताई कह रही थीं, 'जीवन, संद्घर्ष है तुका। जब मैं बीएड में थी तभी किसी से प्यार हो गया। नार्थ इंडियन था वह! मैंने द्घर बताया तो पिता ने सापफ कह दिया... हम मराठी हैं! मराठी मानुष से ही होगी शादी। मैंने कहा कि तब मैं कुंवारी ही रहूंगी। नाथ कोल्हापुर छोड़ कहां गया पता नहीं चला। मेरी नौकरी पुणे में लग गई। द्घर से संबंध तोड़ लिया मैंने। तू ही अकेला नहीं है तुका। मैं भी नितांत अकेली हूं। जब तक नौकरी नहीं लगेगी तेरा भरण-पोषण मेरी जिम्मेदारी है। तू पिफक्र न कर। हो सके तो पीएचडी कर। मैं सपोर्ट दूंगी। कुछ तू भी करेगा।'
एमएससी गणित का नतीजा आ गया। मगर लेक्चरर बनने की कोशिश मैंने छोड़ दी। रंजना ताई पर लंबे समय के लिए मैं बोझ नहीं डालना चाहता था। रंजना ताई ने बहुत कहा पर मैं माना ही नहीं। महसूस किया कि सपने टूटने के लिए ही होते हैं। अर्जियां भेजता और पफॉर्म भरता रहा। सुबह चाय-नाश्ता रंजना ताई देकर जातीं और दोपहर का खाना रख के कहतीं, 'गर्म कर खा लेना।' रात का खाना मैं उन्हीं की खोली में जाकर खाता। उनकी स्नेह दृष्टि का आदी हो गया था मैं। कभी हंसकर कहतीं, 'अपनी आई का लाडला था तू! मेरा पूर्व जन्म का सखा।' निर्निमेष भाव से मैं उन्हें देखता रहता।
तब मेरी आयु इक्कीस वर्ष की थी और वे उनतीस-तीस की होंगी। मरी-मरी उनकी गोरी देह मुझे खूब आकर्षित करती। एक दिन जब मैं कुर्सी पर बैठा उन्हें निरंतर देख रहा तो बोली-'क्या देख रहा है?'
मैं शर्मा गया था। सोचता रहा कि कहीं से भी मेरे से बड़ी नहीं लगती हैं। काया में कुंवारा अछूतापन भरा है। अनायास वह मेरे करीब आ गईं। इसके बाद एक अजीब सी मादक गंध मुझे द्घेरने लगती है। वे मेरे सिर को सहला कहती हैं, 'कल जो पब्लिक सर्विस का पफॉर्म लाकर दिया था वह भर लिया?'
'उसे कल ही भेजना है!' वे मुझसे कह रही थीं।
'पर', मैं आगे बोल नहीं सका।
'पर कुछ नहीं', कहते हुए नोट मेरी जेब में डाल दिए और सिर सहलाने लगीं, 'पागल है तू जो मुझे अपने से अलग
सोचता है। मेरा पैसा क्या तेरा नहीं है?'
देह-गंध ने मुझे बांध लिया था। अवश हो, खड़े होकर मैं उन्हें पाश में बांध लेता हूं और उनके अधर चूमने लगता हूं। भूल गया कि रंजना ताई नाराज भी हो सकती हैं। सिहर उठा यह सोचकर। मगर प्रतिकार न होने से हौसला बढ़ता गया।
वे कह रही थीं, 'मुझे भी तुम्हें देख उत्ताप चढ़ जाता था। मगर थमी रहती थी, क्योंकि नारी हूं मैं। तुमसे बहुत बड़ी हूं मैं। मुझे रोकना चाहिए तुम्हें पर नहीं रोक पा रही हूं।'
मैं उन्हें बाहों में बांधकर बेडरूम में ले आता हूं। एक नाजुक कबूतरी की तरह वे मेरी बाहों में थीं। बिस्तर पर डालकर अंग-अंग जोर से मसलने लगता हूं, वे कराहते हुए बोलती हैं, 'और जोर से दबा मुझे! मैं खुलना चाहती हूं दबके।' जब उद्वेग शांत हुआ तो बगल में लेट गया। वे कह रही थीं, 'मैंने लगन नहीं बनाई। आजीवन कुंवारी रहने का व्रत लिया। पर देह, शायद आदमी औरत की देह ही उसकी कमजोरी बन जाती है। मगर छुपकर हुआ पाप पुण्य तो नहीं कहलाएगा तुका? मैं भंवर बनके तुम्हें भी निगल गई।'
'मैं पाप पुण्य नहीं जानता हूं', मैंने उन्हें अपने और निकट खींचते हुए कहा।
'आज जो हुआ वह गलत हुआ। तुम भी और मैं भी मजबूर थे, मगर इस संबंध को छुपाके रखना ही होगा। मैं जिससे प्रेम करती हूं, वह मुझसे दूर हो गया। मगर यह देह जो उत्ताप झेल रही थी तुम पर कभी बोझ नहीं बने यह भी चाहती हूं।'
'तुम कभी मुझे बोझ नहीं लगोगी रंजना। हम लगन बनाएंगे। इस रिश्ते को स्वरूप देंगे। तुम उम्र में बड़ी हो तो क्या। तुम्हारा कुंवारापन तो मुझे ही प्राप्त हुआ है। गांधी से बड़ी कस्तूरबा थीं, नेपोलियन से बड़ी थी जोसेपफीन और भी बहुत हैं।'
'उनकी बात छोड़ तुका। मेरी बात दूसरी है क्योंकि मैं नाथ से प्यार करती थी। उसे छोड़ किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती। हां, देह की जरूरत लांद्घ नहीं सकी। तेरी भी शायद वही जरूरत थी। आड़े आता है शब्द-'चरित्रा!' मगर कौन है जो चरित्रा के स्केल पर पूरा उतरता है।'
'चाहे जो भी हो। पर तुम मेरी रहोगी', मैं आतुर भाव से कहता हूं।
तेरी संपदा नहीं बन सकूंगी तुका, लेकिन देह पर तुम अधिकार जमा चुके हो। परोक्ष मैं तुम्हारी अभिभाविका ही
रहूंगी। हां, बिस्तर पर एक औरत। पफकत एक औरत! अपने से लाचार औरत को पाओगे।'
चलते वक्त मैंने रंजना ताई का दीर्द्घ चुंबन लिया जिसमें जिसें उनका असहयोग शामिल नहीं था। मैं एक विजयी की तरह अपनी खोली की तरपफ बढ़ गया। उस रात हम दोनों ने ही खाना नहीं खाया। भूखे ही सो गए क्योंकि एक भूख पूरी जो हो गई थी।
एक रात जब हम दोनों बिस्तर पर थे तो रंजना ताई बोलीं, 'यह ठीक नहीं है कि तुम मेरी देह से मिली आपूर्ति की वजह से शादी न करो। अब तुम्हारी पुणे
कार्पोरेशन में एकाउंट्स ऑपिफसर के पद पर नौकरी लग गई है। पड़ोस वाले चर्चा करते हैं कि तुका क्यों नहीं अब लगन बनाता है। कोई हंसकर मेरी खोली की तरपफ इशारा भी कर देता है।'
'मैं तुम्हारा ही बना रहना चाहता हूं', मैंने संतुष्ट मन से कहा।
'तुम्हारे जाने के बाद नाथ की तस्वीर के सामने मैं कई बार रो चुकी हूं जिसकी अनुपस्थिति तुमसे पूरी करती हूं।'
मैं उनके श्वेत स्तनों से खेलता रहता हूं। वह कह रही थीं, 'मेरे स्कूल में नई टीचर आई है उर्मिल वाणुजकर! उसके पिता सुबह छोड़ने आते हैं उसे। कह रहे थे कि इसकी लगन हो जाए तो अगले साल रिटायर होकर मैं और पत्नी शोलापुर लौट आएंगे। उर्मिल देखने में भी अच्छी है। अगर तुमने लगन नहीं बनाई तो एक दिन हम दोनों को यह शनिवार बाड़े के पास की बैरक छोड़नी ही होगी। पुणे के आसपास शायद ही किराए के मकान मिलें।'
मैं खामोश स्तब्ध सा रह गया तो बोलीं, 'महसूस करती हूं कि जीवन एक जगह आकर दो धाराओं में बंट जाता है। दो विपरीत दिशाएं होती हैं उसकी। यात्राी बन वह भटकता रहता है दो धाराओं में। जैसे मेरा मन प्रतिक्षण नाथ के साथ रहता है। तन धधकता है तुम्हारा और मेरा तो हम साथ होते हैं तुका। कैसा अजीब खेल है कि मन में कोई और, तन किसी और के साथ। गलत है न सब।'
'तुम्हारा तन आज मेरा है तो कल मन भी मेरा हो जाएगा', कहकर उसकी नग्न देह को अपनी बाहों में भर लेता हूं। प्यास और बढ़ जाती है।
'तन तो तुम्हारा ही है। उसे तुम देखते, अक्सर देखते हो। मगर मन जो अदृश्य है उसमें कोई और बसा है। बसा रहेगा वही। इसकी मुक्ति असंभव है। इस असंभव को साध सकूं इसके लिए जरूरी है तुम्हारी लगन।'
और शीद्घ्र ही सुदामा लगन मंडप में मेरी और उर्मिल की लगन हो गई। अब रोज रंजना ताई के पास नहीं पहुंच पाता। बहाना बनाना पड़ता उनके पास पहुंचने का। गदरा गया था उनका बदन जिससे वे और भी सुंदर नजर आने लगी थीं। जब भी मैं पहुंच पाता बेचैनी से अपने अंक में वे मुझे लपेट लेतीं। कहतीं, 'पास होकर भी कितनी दूर हो तुम! जाने क्यों बार-बार तुम्हारी और नाथ की आकृति गड्डमड्ड हो जाती है। विवश हो जाती हूं तुम्हें पास पाकर।'
मैं ३५ वर्ष की काया को उर्मिल की २३ वर्षीय काया से कहीं ज्यादा उष्म महसूस करता हूं क्योंकि यहां कोई संकोच नहीं था। सब कुछ निस्संकोच था। और पिफर हमने एक लॉज में हर पंद्रह दिन बाद मिलना शुरू कर दिया। मुंबई और पुणे में ऐसी लॉजों की कमी नहीं है जो दो द्घंटे के व्यापार के लिए पूरे दिन का किराया वसूल करती हैं। ऐसी ही एक लॉज में हमने ठिकाना खोज लिया। वहां हमारी स्थायी मिलनगाह बन गई। तृप्त होकर भी अतृप्ति में डूबे हम जुदा होते मिलकर।
इस बीच मैं एक लड़के का बाप भी बन गया था। उर्मिल का ज्यादा समय इसमें लग जाता था। मुझे उसकी उपेक्षा ज्यादा ही पसंद आई। शायद मां बेटे से ज्यादा पति से लगाव रखने लगती है। इससे हमारा मिलन और भी सहज हो गया था। नामदेव, मेरा दिया नाम था लड़के का। वह धीरे-धीरे सात वर्ष का हो रहा था। रंजना और मैं अब एक माह में मिलते थे। उस दिन एक अजीब सी बेचैनी महसूस करता था। रंजना छियालीस वर्ष की हो रही थी और कृत्रिाम वस्तुएं हम दोनों के बीच से हट चुकी थीं। संबंध आदत बन चुके थे।
एक दिन उर्मिल पूछ बैठी, 'माह में दो-चार दिन तुम देर से खोली आते हो। बाकी दिन तो पफोन पर पूछ लेती हूं पर एक दिन तुम दफ्रतर में भी नहीं होते हो। मोबाइल पर सूचना मिलती है मुझे।'
'तुम्हें बता तो रखा है कि अब मैं बड़ा ऑपिफसर हूं। लोग पकड़ ले जाते हैं।'
'उस रात मुझे तुम अपने पास बुलाते भी नहीं हो', उर्मिल कह रही थी।
'उस शाम दो-चार द्घूंट मार लेता हूं और तुम मदिरा से द्घृणा करती हो। तुम्हें उबकाई आती है इसीलिए नहीं बुलाता हूं तुम्हें। तुम बेकार शक करती हो।'
'पुणे कोई सेपफ जगह तो रही नहीं। प्राण अटके रहते हैं जब तक तुम खोली नहीं आ जाते हो। हर पल ऐसे में आशंका के साथ कटता है।'
'मैं कोई पैदल आता हूं पगली। हमारा तुम्हारा साथ एक जन्म का तो है नहीं, जन्म-जन्म का है पिफर क्यों अविश्वास से भर जाती हो उर्मिल', मैं उसे बहकाकर अंदर ही अंदर गहरी ग्लानि महसूस करता हूं।
उर्मिल सहज ही मुस्कुरा उठी। उसकी मुस्कुराहट में आमंत्राण का संदेश था। नामदेव था नहीं। मैं उसे चूम लेता हूं। वह तुनकती है-'हटो कोई देख लेगा।' मैं हंसने लगता हूं।
'नामदेव होगा न दूसरे कमरे में। उसे क्या मालूम है कि वह प्यार और देह मिलन का उत्पाद है। वह तो अभी यही समझता है कि उसे ऊपर वाले ने मेरी गोद में डाल दिया था।'
'एक दिन वह समझ जाएगा तुम्हारा झूठ पर उससे पहले हम खराडी के नए फ्रलैट में होंगे जहां इसका अलग कमरा होगा', कहते हुए मैं उसे कागज दिखाता हूं बिल्डर कह रहा है कि दो-तीन साल में मकान तैयार हो जाएगा।
कागज देखकर वह खुश हो जाती है मगर कहती हैं, 'तुम्हारा ऑपिफस दूर हो जाएगा खराडी से!'
'कार ले लूंगा। तुम मुझे छोड़ आना और ले जाना। कापफी दफ्रतर वालों ने भी वही मकान के लिए पैसे भरे हैं। किसी के साथ पूल भी कर सकता हूं। पुणे बहुत पफैल गया है। पहले तो लोग अपनी जगह से हटने को तैयार नहीं थे।'
'बाहर के लोग कापफी आ गए हैं पुणे में। मराठी मानुष वाला पुणे नहीं रहा है।'
मराठी मानुष शब्द सुनकर मुझे रंजना की याद आ जाती है जिसके पिता मराठी मानुष को ही मनुष्य मानते थे और जिसकी वजह से रंजना शादी न कर पाई। इसी के साथ मुझे रंजना की देह गुदगुदा गई यद्यपि सबके सामने मैं उन्हें रंजना ताई कहकर ही संबोधित करता था। एक कुंड की भाप की तरह वे मुझमें उलझ जाती थीं। देने के लिए आतुर और पाने में भी एतराज नहीं।
नामदेव बाहर से आकर मेरी गोद में बैठ जाता जिसे मैं कभी अश्वथामा का किस्सा सुनाता जो बेचैन सा आज भी सदेह चक्कर लगता रहता है और पिफर गणेश उत्सव के बारे में बताता जो मुंबई, पुणे और महाराष्ट्र के गांव-शहर में पफैल चुका है।
एक दिन नामदेव बोला-'बहुत पुरानी कहानियां सुनाते हैं आप। कोई नई कहानी सुनाएं।'
उर्मिल ने बचा लिया-'अरे देव! तुम्हारे अन्ना पुराने हैं इसलिए पुरानी बातें ही बताएंगे। नई दुनिया बड़े होकर तुम देखोगे, बरतोगे और नई राहों पर चलोगे। तुम उन्हीं का किस्सा अपने बच्चों को सुनाना। वैसे तुम्हारे अन्ना तुम्हें डायना का किस्सा सुनाते तो अच्छा था मगर इससे कुछ आदर्श नहीं निकलता है। हां, चापफरकर ब्रदर्स, सावरकर, भगत सिंह और गांधी के बारे में तो तुम्हें बता ही चुके हैं। हमारा भविष्य वर्तमान बनके अच्छा नहीं है। तुम्हारा भविष्य जरूर वर्तमान होकर अच्छा रहे, हम दोनों तो यही कामना करेंगे।'
'आपका वर्तमान क्यों अच्छा नहीं है', नामदेव पूछ बैठता है।
'खुलापन अब नंगापन होकर आ गया है। पफरेबों की कमी नहीं। तुम बाजार की कमियों को दूर कर इसका उपयोग कर सकोगे।' कुछ न समझ के भी नामदेव ने मुंडी हिला दी।
नामदेव उठ गया तो बोली उर्मिल, 'स्त्राी और पुरुष का संबंध पुराना होते हुए भी क्यों बदला नहीं है।'
मैं चौंका। कैसे कहता कि देह-दर्शन और जुड़ गया है उससे। उर्मिल कह रही थी, 'झूठ, कपट और देह की झपट जरूर बढ़ गई है आज। प्यार नाबूद सा हो रहा है।'
तीसरे दिन की शाम मैं रंजना के साथ लॉज में था। तभी चीत्कारों से भर उठा वातावरण। नीचे जाकर पता लगाया तो मालूम हुआ कि एक दुकानदार का बेटा अभी जौहरी बाजार में हुए बॉम्ब ब्लास्ट में मारा गया है। दुकान पर ही उसका परिवार आकर रो रहा है। मैं लौटकर जोर से दरवाजा बंद करता हूं क्योंकि मैं चीत्कारें नहीं सुनना चाहता था और न रंजना को सुनना चाहता था। मैं सिपर्फ देह की पुकार सुनना चाहता था। मगर मैंने पाया कि रंजना की देह में वह उष्मा नहीं थी जिसका मैं आदी था। रंजना कह रही थीं, 'हर चीज का अंत है तुका। सिपर्फ प्यार अनंत है। उस प्यार की खातिर मैंने देह तुम्हें सौंपी। पर देह से भी बढ़कर कुछ है।'
'क्या है?' उन्हें अपने और निकट खींचते हुए और सीने से खेलते हुए मैंने पूछा!
एक निःश्वास खींच रंजना बोलीं, 'औरत की देह मात्रा सुख लेने और देने के लिए नहीं होती है तुका। इसका प्यार अनंत है तो देह का उत्सर्ग भी निश्चित है। उसकी देह का उत्सर्ग है उसका मां बनना। मैं तो यशोदा मां भी नहीं बन सकी। काश यह सच मेरी समझ में पहले आ जाता। अब तो संभावना भी नहीं रही है क्योंकि मेरी माहवारी बंद हो चुकी है।'
'मातृत्व की इच्छा! मैंने तो शुरू में ही लगन बनाने के लिए कहा था।'
'तब देह और प्रेम के प्रवचनों में गर्क थी। यह तीसरा पहलू दिखाई ही नहीं दिया। मगर यह भी सच है कि आज भी मैं तुम्हारे नहीं अपितु नाथ के बच्चे की मां बनना पसंद करती।'
एक गहरा मौन हमारे बीच पसर उठा। उसके अंगों से खेलते मेरे हाथ रुक गए।
अनायास खुद को वह बिस्तर से उतार कपड़े पहनती है। मैं देखता रहता हूं। पिफर वह द्वार खोल चली जाती है। इसका जाना मैं देखता रहता हूं। कुछ देर इंतजार करता हूं क्योंकि मुझे लगा था कि वह लौट आएगी। मगर वह लौटी नहीं। बिस्तर से उठकर मैं कपड़े पहनता हूं।
भटकता रहता हूं बाजार में पिफर धीरे-धीरे चलता हुआ एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय के गेट पर पहुंच ऑटो पकड़ता हूं। एक बार भी गवर्नर हाउस, विश्वविद्यालय या पहाड़ी पर बने चतु श्रृंगी देवालय की और नहीं देखता हूं। ऑटो ठीक शनिवार वाड़े की दीवार के पास रुकता है।
एक बार शनिवार बाड़े के पार्श्व में बने भग्न देवालयों को देखता हूं जिनमें अंधकार पफैला हुआ था पिफर अपनी बैरक की तरपफ मुड़ जाता हूं। बैरक के द्वार पर ताला लगा हुआ था।
पास की बैरक की द्घंटी बजाता हूं तो सुनंदा जोशी बाहर निकल चाबी पकड़ा देती हैं। मैं पूछता हूं तो कहती हैं, 'किधर गया पता नहीं। तुम्हारे वास्ते बिस्तर पर चिट्ठी छोड़ गई है।'
ताला खोल अंदर आता हूं। लाइट जला बिस्तर पर रखे पत्रा को पढ़ने लगता हूं। संबोधनहीन पत्रा था।
मुझे शक था। अब सब जान गई हूं। मैं बेटे को लेकर जा रही हूं। उसका नाम भी बदल दूंगी। मैंने एक बासी पुरुष को भोगा है। अपने पर शर्म आती है मुझे। तलाशना नहीं। तलाशा तो नौकरी भी छोड़ दूंगी और तुम्हारे बेटे का भविष्य भी खराब कर दूंगी। सुलह की कोई गुंजाइश नहीं है यही
सोचकर द्घर छोड़ रही हूं। मगर अपने से इतनी बड़ी औरत का संग तुम्हें कैसे पसंद आया, अंदाजा नहीं लगा पा रही हूं... उर्मिल!
निश्वास खींच पत्रा चिंदी-चिंदी कर देता हूं और बिना खाए-पीए मैं बिस्तर पर लेट जाता हूं। उर्मिल के चले जाने से ज्यादा रंजना के व्यवहार परिवर्तन पर सोचता रहता हूं। आंखें कब बंद हो जाती हैं पता ही नहीं चलता है।
सुबह चाय की उत्कंठा में रंजना ताई की द्घंटी बजाता हूं। बहुत बातें करनी थीं उनसे उर्मिल को वापस लाने के लिए। द्वार खुलता नहीं है। उनका पड़ोसी सावरकर बाहर आकर द्घंटी बजाता है और द्वार पीटता है मगर द्वार खुलता नहीं है। हारकर पुलिस बुलानी पड़ती है जो द्वार तोड़ देती है।
अंदर बिस्तर पर अचेत लेटी थी रंजना ताई। मुंह से निकला जहरीला भाग ठोड़ी पर जम गया था। पास ही पड़ा था सुसाइड नोट... मेरा जीवन असपफलताओं की कहानी है। जहर एक माह पहले जुटा लिया था मैंने मगर आत्महत्या अब कर रही हूं। किसी को दोषी न ठहराया जाए मेरी आत्महत्या के लिए। मेरा सामान और बैंक बैलेंस तुकाराम को मिले जिसके मुझ पर बहुत एहसान हैं।
लाश और सुसाइड नोट लेकर पुलिस चली गई। दूसरे दिन मोर्चरी से हम लोग लाश प्राप्त कर सके। दाह मैंने ही किया। उर्मिल के स्कूल खबर भेजी। उर्मिल को छोड़ बाकी के अध्यापक और अध्यापिकाएं श्मशान भूमि पहुंच गए थे। एक खटका सा जागा था कि क्या उर्मिल मुझे बिलकुल छोड़ गई है मगर तब मन रंजना में उलझा था। अंतिम शाम जब मैं उसकी देह से खेल रहा था। तो क्यों कहा था रंजना ने कि हर चीज का अंत है। अपने अंत की उद्द्घोषणा तो नहीं थी वह। शायद ब्लास्ट में जो चीत्कारें उभरी थीं उनका प्रभाव तो नहीं पड़ा था? अथवा मातृत्व प्राप्त न कर सकने का दुःख बर्दाश्त नहीं कर पाईं!
एक दिन थानेदार मिला था। कह रहा था बच गए मिस्टर। उनके मोबाइल पर अंतिम कॉल तुम्हारा था। हमने वह लॉज भी तलाश ली थी जहां वह तुमसे मिलती थी। पर हम झंझट में नहीं पड़ना चाहते थे क्योंकि सुसाइड नोट मिल चुका था। अगर सुसाइड नोट नहीं होता तो तुम्हें जरूर पकड़ते। सिर झुकाए मैं थानेदार की बात सुनता रहा। कैसे कहता कि परिणाम सुसाइड नोट के होते हुए भी मैं ही भुगत रहा हूं। आजाद रहकर भी मैं अपने अंदर की जेल में हूं।
अड़ोसी-पड़ोसी पूछते कि क्यों रंजना ने आत्महत्या की और क्यों उर्मिल मुझे छोड़ गई है? मैं क्या कहता! लोगों से दूरी बनाए रहना ही मुझे ठीक लगा और इस तरह मैं एकाकी होता चला गया।
बहुत कोशिश करने पर भी उर्मिल नहीं लौटी। कह दिया, मैं अभावपूर्ति नहीं बनूंगी। तुम बासी थे बासी रहोगे।
शर्मिंदगी से छुपा चेहरा लिए रात अंधेरे में आकर चुपचाप पलंग पर लेट जाता। उर्मिल की हठधर्मिता सालती तो अपने अवैध संबंध सालने लगते। जागने पर भय लगता कि कोई यह न कह दे कि अब उर्मिल को क्यों नहीं ले आते जब रंजना नहीं रही है।
महसूस करता कि दोनों औरतें मेरे लिए अनिवार्य थीं। एक निःश्वास पफूट उठती... दोनों ही तो अप्राप्य हैं मेरे लिए। किस्मत से तीन सालों में मिलने वाला द्घर डेढ़ वर्ष बाद ही मिल गया। मैंने पफौरन शिफ्रट कर लिया वहां मगर मेरी खामोशी यहां भी लोगों को अखर गई और पीठ पीछे मुझे बोर कहा जाने लगा। कभी-कभी लगता कि देह को लेकर देह के साथ जिया हूं मैं। शायद देह प्राप्त कर यह मेरी देह भी शांत हो जाए। अलग-अलग औरतों और लड़कियों के साथ सोकर भी मन की अशांति को अंदर ही अंदर और गहरा पाता हूं।
दफ्रतर बंद होने पर कभी पढेरपुर, कभी शिरडी हो आता हूं मगर मन को आराम नहीं मिलता। रिटायर हुआ तो खूब तारीपफ हुई मेरी। मगर मन अशांत ही रहा। सोचता रहता कि रंजना ने मुझे तन दिया था पर प्यार नहीं दिया। उर्मिल से जो प्यार मिला वह अंत में धुल गया आक्षेप से।
धीरे-धीरे दिल का मरीज, दिमाग और आर्थराइटस का मरीज हूं। जिस डॉक्टर के पास जाता हूं वह एमडी है और कांत नाम है इसका। एक दिन बाहर निकल रहा था तो बड़ा सा बोर्ड टांगा जा रहा था वहां... डॉ. कांत तुकाराम, एमडी।
तो क्या कांत मेरा बेटा है? जल्दी से अंदर जाकर पूछता हूं एक नर्स से तो वह हंसती है, 'बेटे के साथ बाप का ही नाम तो इस प्रदेश में जोड़ा जाता है। वैसे डॉक्टर की मां उर्मिल देवी ने कहा था, क्या डॉक्टर कांत कापफी नहीं है मगर हम सबने विरोध किया तो मान गई थीं। मान क्या गईं, खामोश हो गई थीं।'
निःश्वास खींच बाहर आ जाता हूं, 'क्या डॉक्टर मानेगा कि वह मेरा पुत्रा है और मैंने इसका नाम नामदेव रखा था! शायद पता चलने पर मेरा इलाज भी बंद कर दे! मेरे प्रति मां ने नपफरत पैदा कर दी होगी।
अश्वथामा बन के अपनी पहचान छुपाते हुए बाहर आ जाता हूं। फ्रलैट में पहुंच सोचता हूं... मैं नहीं डॉक्टर बन पाया तो क्या! मेरा बेटा तो डॉक्टर है। पिफर मर्माहत सा होकर निःश्वास खींचता हूं... वह पटिया कभी नहीं लगेगी जिस पर स्वर्गीय वामन और तुकाराम का नाम लिखा होता! पर सेवा? क्या कांत सेवा करेगा?
अनायास खुद को कांच की दीवार पर बैठा हुआ पाता हूं। नीचे, बहुत नीचे रंजना और उर्मिला मुझे अंगूठा दिखा रही थीं। मैं कूदना चाहता हूं पर तभी चेतना लौट आती है। खुद को कुर्सी पर बैठा पाता हूं।
सोचता हूं कि क्या मैं उर्मिला से प्यार नहीं करता था? क्या मैं रंजना से प्यार नहीं करता था? क्या एक से ज्यादा
औरतों को प्यार करना गलत होता है? मन गलत नहीं स्वीकारता है। तो पिफर क्या था वह प्यार! क्या उसे प्रवाह का नाम दिया जा सकता है। नहीं जानता कि गलत हुआ या सही पर जो भी हुआ प्रवाह में हुआ।
लड़खड़ाता हुआ उठता हूं। अश्वथामा की तरह द्वार खोलने जाना पड़ता क्योंकि खाना बनाने वाली आकर द्घंटी बजा रही थी। हां, मैं अश्वथामा ही तो हूं जो बेचैन सा धरती पर द्घूमता रहता है।

मैं शरमा गया था। सोचता रहा कि कहीं से भी मेरे से बड़ी नहीं लगती हैं। काया में कुंवारा अछूतापन भरा है। अनायास वह मेरे करीब आ गईं। इसके बाद एक अजीब सी मादक गंध मुझे द्घेरने लगती है। वे मेरे सिर को सहला कहती हैं, 'कल जो पब्लिक सर्विस का पफॉर्म लाकर दिया था वह भर लिया?'

 
 
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