फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
मोहन कुमार डहेरिया

जन्म : १ जुलाई १९५८

'कहां होगी हमारी जगह', 'उनका बोलना', 'न लौटे कोई इस तरह' शीर्षक तीन कविता संग्रह प्रकाशित। कुछ कविताएं अन्य भाषाओं में भी अनूदित।
केंद्रीय विद्यालय, रुद्री, पुराना कलेक्ट्रेट भवन,
धमतरी-४९३७७६, छत्तीसगढ़
मो. ०७३५४३९३८६८

ठहाका
 

;वरिष्ठ कवि मलय जी के ठहाके को सुनकरद्ध

यह कैसा ठहाका है
सुनते ही जिसे आशंकाओं और भय से
पफटी की पफटी रह जाती है आंखें
और मुंह आश्चर्य से खुला का खुला

क्षमा करें मलय जी
न समझें इसे अगर आप अपने सपफेद बालों का अपमान
या अपने व्यक्तित्व पर कोई अभद्र टिप्पणी
तो समझाएं मुझे
आखिर यह कैसा ठहाका लगाते हैं आप
जो निकलता तो है तनी हुई मांसपेशियों वाले
आपके मुंह की कमान से
किसी बाण की तरह सनसनाता अनंत ऊर्जा से भरा
रचते हुए ध्वनियों का नया सौंदर्यशास्त्रा
लेकिन इससे पहले कि वह पूरा कर पाए अपना सपफर
बीच में ही हवा में टंग जाता है
निकालते हुए अपने अंदर से छटपटाकर
एक अजीब सी लयब( करुण पुकार
ठोंक दी हो जैसे किसी ने
खूब उन्मुक्त होकर उड़ते हुए किसी परिंदे के
हौसले के बीच कोई कील

मैं जानता हूं बड़े भाई
आपका यह ठहाका दुनिया के सबसे पवित्रा
और सुंदर ठहाकों में से एक है
लेकिन सचसच बतलाइए
यह ठहाका ही है
या आपके कंठ की द्घाटी में अधखिले उल्लास का
कोई अभिशप्त पफूल
नहीं नहीं मलय जी नहीं
नहीं लगाना पिफर कभी ऐसा ठहाका
सुनते ही इसे भर आता है मेरी आंखों में पानी
बुदबुदा उठते है होंठ
मानों कर रहे हो जहरीले सांपों से द्घिरे
सुगंध की अनोखी दुनिया रचते
चंदन के पेड़ के लिए कोई प्रार्थना
किसी बूढ़ी नाव के लिए कोई प्रार्थना...

 
तय हो गया है जैसे
 

तय हो गया है जैसे
संभव नहीं दोनों के बीच एक ही द्घर में अब
मनुष्यों की तरह जीवन गुजारना
इसलिए पत्नी किसी वैम्पायर की
एक बोतल ताजे खून की इच्छा सी करती है पति से
साड़ी लाने की पफर्माइश
पति रख देता है पत्नी की हथेली पर जवाब में
डंक उठाए बिच्छू की शक्ल में नोटों की एक गड्डी

रह रहे हैं दोनों वर्षों से साथ-साथ
बच्चे भी उनके बड़े-बड़े इसलिए चाहते हैं
दोनों के बीच हो एक अच्छे पति-पत्नी की तरह
जीवन के किसी भी मुद्दे पर सहज और संप्रेषणीय संवाद
समझ नहीं पाते लेकिन एक दूसरे के सामने आते ही
कैसे अनियंत्रिात हो जाती है उनकी भाषा
कैसे हिंसक हो जाता है उनका मंतव्य

बहुत किए इस समस्याओं से
निजात पाने के लिए उन्होंने उपाय
मिले मनोवैज्ञानिकों से
मित्राों ने बीच में पड़कर की समझाने की कोशिश
गए अपने-अपने बीते हुए समय में भी वे मीलों पीछे
कि शायद हों उनके अतीत की मिट्टी में दबे
इस उन्मादी व्यवहार के बीज
राख ही राख थी वहां तो बीते हुए समय की
संभव नहीं थी जिससे कोई
जीवंत और ठोस उत्तर की उम्मीद
किया पिफर भी दोनों ने हर बार संकल्प
चाहे जो भी हो बच्चों की खातिर ही सही
भंग नहीं होने देनी है अब पति-पत्नी के संबंधों की गरिमा
लेकिन तय हो गया था जैसे
पड़ी जब अगले दिन उनकी शादी की वर्षगांठ
तो दिन में एक भव्य समारोह के बाद
रात में प्रेम के अंतरंग क्षणों में
पति ने एक तलवार की नोक से खोले
पत्नी के ब्लाउज के हुक
हटाए उसके शरीर के सारे वस्त्रा
कर रहा हो मानों एक-एक करके
दुश्मन देश के सैनिकों के सिर धड़ से अलग
पत्नी ने भी कूटनीतिज्ञ की तरह डाली
पति के गले में बांहें
किया पिफर किसी विषकन्या की तरह
उसके होंठों का चुंबन
जाहिर है उठे जब सुबह दोनों
सुनाई देती रही उन्हें देर तक
अपनी-अपनी आत्मा के सूखे कुंड में
एक जैसे हरे कच्चे जहर की बूंदों के टपकने की आवाज

 
 
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