फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
निदा पफाजली

जन्म : १२ अक्टूबर १९३८

मशहूर और मकबूल शाइर। गजलों व नज्मों की आधा दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित। 'दीवारों के बीच' शीर्षक से एक आत्मकथात्मक पुस्तक भी। साहित्य अकादमी और हाल ही में पदमश्री सम्मान।
२०१, सनराइज, आरम नगर, वर्सोवा, मुंबई-४०००६१

थोड़ी सी कमी


हर कविता मुकम्मल होती है
लेकिन वह कलम से कागज पर जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है
हर प्रीत मुकम्मल होती है
लेकिन वह गगन से धरती पर जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है

हर जीत मुकम्मल होती है
सरहद से वह लेकिन आंगन में जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है

पिफर कविता नई
पिफर प्रीत नई
पिफर जीत नई बहलाती है
हर बार मगर लगता है यूं ही
थोड़ी सी कमी रह जाती है

 
नया दिन
 

सूरज एक नटखट बालक सा
दिन भर शोर मचाए
इधर-उधर चिड़ियों को बिखेरे
किरनों को छितराए
कलम, दरांती, ब्रश, हथौड़ा
जगह-जगह पफैलाए

 

शाम!
थकी-हारी मां जैसी
एक दिया जिलाए
धीमे-धीमे
सारी बिखरी चीजें चुनती जाए
 
जंग
 
सरहदों पर पफतह का
ऐलान हो जाने के बाद
जंग!
बेद्घर बेसहारा
सर्द खामोशी की आंखों में बिखरकर
जर्रा-जर्रा पफैलती है
तेल या आटा
खनकती चूड़ियों का रूप भरकर
बस्ती-बस्ती डोलती है
दिन-दहाड़े हर गली कूचे में द्घुसकर
बंद दरवाजों की सांकल खोलती है
मुद्दतों तक जंग!
द्घर-द्घर बोलती है
सरहदों पर पफतह का ऐलान हो जाने के बाद
 
बस इसी एक जुर्म पर
 

हमको कब जुड़ने दिया जब भी जुड़े बांटा गया
रास्ते से मिलने वाला हर रास्ता काटा गया
कौन बतलाए सभी अल्लाह के धंधों में हैं
किस तरपफ दालें हुईं रुखसत किधर आटा गया
लड़ रहे हैं उसके द्घर की चहारदीवारी पर सब
बोलिए रैदास जी जूता कहां गांठा गया
मछलियां नादान हैं मुमकिन हैं खा जाएं पफरेब
पिफर मछेरे का भरे तालाब में कांटा गया
वह लुटेरा था मगर उसका मुसलमां नाम था
बस इसी एक जुर्म पर सदियों उसे डांटा गया

 
 
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