फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
सुखचैन

जन्म : १३ अक्टूबर १९५३

दो काव्य संग्रह 'मिट्टी का मोर' और 'द्घर'
प्रकाशित। हिंदी, पंजाबी के अलावा अंग्रेजी और तेलुगू में भी कविताएं प्रकाशित।
७५, आशापुरी ;अग्गर नगरद्ध,
लुधियाना-१४१०१२, पंजाब
मो. ०९५०१०१६४०७

जिंदगी

 
तुम मुझे इस तरह भर देती हो जिंदगी
आसमान को जिस तरह भर देती है रात
खाली आंगनों को जिस तरह भर देती है बच्चों की हंसी
तप रही खुश्क मिट्टी को जिस तरह भर देती है
बरसात की पहली बारिश
पेड़ को जिस तरह भर देती है हरियाली
आदमी को जिस तरह भर देती है औरत
औरत की गोद को जिस तरह भर देता है बच्चा
परेशान अकुलाहट से भरे आदमी को
जिस तरह भर देती है नींद
मेले को जिस तरह भर देती है रौनक


अकेलेपन को जिस तरह भर देते हैं दोस्त खाली जाम को जिस तरह भर देती है शराबअल्हड़ लड़के को जिस तरह भर देती है लड़की
खाली द्घर को जिस तरह भर देती है महपिफल
शून्य को जिस तरह भर देता है ब्रह्मांड
मनुष्य के अज्ञान को जिस तरह भर देता शब्द
अंधेरे को जिस तरह भर देता है चिराग
मनुष्य की तड़प को जिस तरह भर देती है शाइरी
यूं ही तुम भी मुझे भर देती हो जिंदगी

 
हल्ला
 

;एकद्ध
जब हल्ला पड़ता है
तो चूल्हे में बलती रह जाती है आग
तवे पर जलती रह जाती है रोटी
खुली की खुली रह जाती है बच्चों की किताब
मां ममता समेत दौड़ जाती है बच्चों को रोता छोड़कर
बच्चे की आंख से आंसू पोंछने का
किसके पास वक्त होता है
मेज पर अधपढ़ी रह जाती है किताब
और तुम पीछे छोड़ आते हो
गलियों में बिखरने के लिए
छाती के साथ लगाकर रखे हुए खत

;दोद्ध
जब हल्ला पड़ता है तो कितना कुछ खो जाता है
तुम्हारा प्यारा छोटा सा द्घर, तुम्हारी बीवी,
पफर्नीचर, किताबें, तुतलाता बच्चा,
वह सब कुछ जिसे तुम प्यार करते हो
कमरे में लट-लट जलती चिता सिसकती है
और जाने वाली की रूह चलती रहती है
कभी तुम्हारे अंदर, कभी तुम्हारे बाहर
तुम्हारे बच्चे की जुराबें, खिलौने, बांसुरी,
जाने वाली की सुर्खी, सूट और साज-ओ-सामान,
सूने द्घर में खाली डिब्बे, बिलखतीं हवाएं,
तूपफानों में खटखटाते दरवाजे
तुम्हें उन रिश्तों तक ले जाते हैं
जो है नहीं, पर होते थे
वह सब कुछ याद दिलाते हैं
जिसे तुम भूलना चाहते हो
तुम्हारा समूचा आपा प्रेतात्मा की तरह भटकता है
उस सब कुछ के दरमियान
जिसे तुम साथ ले आते हो
उस सब कुछ के दरमियान
जिसे तुम पीछे छोड़ आते हो

;तीनद्ध
तुम उन्हें चुपचाप पीछे छोड़ आते हो
कच्चे रास्ते, दोस्त, द्घोंसले, पक्षी, मदरसा
कच्चे रास्ते की मिट्टी में गहरे दब जाते हैं
तुम्हारे कदमों के निशान
तुम्हारी दादी के कान नहीं रहे
जिनमें रचमिच गए थे तुम्हारे बोल
उड़ जाते हैं जाड़े के गुनगुने दिन और पतंग
और तुम उन्हें चुपचाप छोड़ आते हो
कच्चे द्घरों के दालान और पोखर में डोलता चांद,
वट वृक्ष के नीचे धूनी सेंकते लंगोटिए यार,
ठंडी जाड़े की रातों में टक-टक करते रहटों के कुत्ते,
दादी की गुनगुनी गोद

जब शाम को परछाइयां लंबी होकर
दूर तक पफैल जाती हैं
तुम्हें याद आता है
तुम्हारा तुतलाता बच्चा
वह प्यारी जान पता नहीं कैसी हो
और वह औरत जो तुम्हारी जिंदगी में से
चले जाने के बावजूद
हमेशा हाजिर रहती है
आसमान पर बनती-बिगड़ती शक्लों में
लंबी ढल रही परछाइयों में
और तुम उन्हें चुपचाप छोड़ आते हो!

 
तानाशाह के खिलापफ
 

तानाशाह के खिलापफ लड़ने के लिए जरूरत होती है
एक और तानाशाह की
एक दिन जब हम तानाशाहों से निजात पा लेंगे
इतिहास तानाशाहों को रद्द कर देगा
उनके खिलापफ लड़ने वालों को भी

यह सब जानते हुए भी मैं
तानाशाहों के खिलापफ लड़ता हूं
मैं हिटलर के खिलापफ लड़ता हुआ स्तालिन हूं

जब मैं जम्हूरियत की अभिलाषा करता हूं
और उसके लिए लड़ता हूं
तब मेरे अंदर बैठा होता है एक और तानाशाह

मेरे हमजोलियो! मेरे वारिसो!
मैं मनुष्य की खुशियों के लिए लड़ा हूं बार-बार
बु( और गांधी की अहिंसा मेरे मन में
पफूल बनकर खिलती रही बार-बार
शांति और मोहब्बत की कामना करते हुए भी
तलवार के खिलापफ सोचते हुए भी
मुझे उठानी पड़ती है तलवार।

अपने अंदर द्घटित मौत को
मात देने के लिए
मैं हर दिल पर दस्तखत करता हूं
अपने हौसले और जांबाजी से
मैं अपने दिनों को महकाता हूं
अपनी अद्भुत बहादुरी से
मैं डराता हूं तानाशाहों को, व्यभिचारियों को
नाचकर तांडव नाच
मेरे दोस्तो! मेरे बेलियो!
मैंने अपना सारा बचपन और अल्हड़ उम्र
अपने पिता से नपफरत करते हुए गुजारी
पिता जो शराबी-कबाबी था
उजाड़ देता था अपनी सारी कमाई
शराब की एक बोतल की खातिर

मेरे हमजोलियो! मेरे वारिसो!
मैं भयानक तनहाई में से गुजरा हूं
आजकल मुझे सुनाई देती है
अपनी आवाज में से ही अपने पिता की आवाज
जिससे मैं तहेदिल से नपफरत करता था
इस सब कुछ को भूलने के लिए
मैं बहुत भटका हूं
अहिंसा और हिंसा की भूल-भुलैया में
मगर पिफर भी
मैं आदमी जितना कुटिल होना पसंद नहीं करता
मैं नहीं चाहता डर के तह-दर-तह तहखानों में जीना

मैं जो भी हूं हिंसक या अहिंसक
एक मासूम खरगोश
या पिफर मनुष्यपन की दहलीज पर
अपना अस्तित्व हिलाता कूकर
मैं जो भी हूं या नहीं हूं
मैं अमर मनुष्य जितना आधुनिक और बेहूदा नहीं हूं

मेरे हमजोलियो! मेरे वारिसो!
मैं बु( हूं, गांधी हूं और गोविंद भी
मैं हिंसा और अहिंसा का शक्तिशाली संगम हूं

मगर पिफर भी
मैं बुरे वक्तों में विचरता एक बुरा सपना हूं
मुझ पर और मेरी होनी पर रहम करना

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)