फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
वंदना खन्ना

जन्म : १३ अगस्त १९८५

युवा कवयित्राी। पत्रा-पत्रिाकाओं में सिनेमा, संगीत, कला पर केंद्रित लेख पर टिप्पणियां प्रकाशित। लेकिन किसी साहित्यिक पत्रिाका में कविता प्रकाशन का यह पहला अवसर। 'दैनिक भास्कर' में कार्यरत।
हाऊस नं. १२/१, शहीद संगत सिंह नगर, नजदीक गुलाब देवी हॉस्पिटल, जालंधर, पंजाब
मो. ०९६४६५००५५४

बुंदा
 
रात सपने में... मेरे कान का एक बुंदा गुम गया था सुबह ट्रेन में खिड़की के पास एक बुंदा पड़ा मिला एक रात सपने में तुम भी खो गए थे किसी और को मिले हो शायद वह बुंदा मैंने वहीं छोड़ दिया क्या तुम्हें भी कोई वहीं छोड़ गया होगा जहां मैंने खोया था वैसे का वैसा...
 
उम्मीदें नहीं, सबक

 

किताबों में पढ़े मुरझाए प्रेम
उम्मीदें नहीं, सबक देते हैं
हर सबक बड़ी उम्मीद से देखता है मुझे
और तुम्हारे नंगे पांव भी
मैं मुक्ति की डोर ढूंढ़ती हूं
जिससे उड़ाए जा सके अपने पदचिथ
तुम्हारे हिस्से के जूतों में छिपे हुए

काश खराब द्घड़ियों के साथ-साथ ठीक हो पाता वक्त भी
और जूतों की जगह सिले जा सकते कच्चे और टूटे रास्ते

उड़ती पतंगे और परिंदे कहीं नहीं पहुंचते
खालीपन और भटकन के सिवाए

आसमान सिपर्फ ऊंचाई नहीं देता
कट के गिरने का भय भी देता है

पिफर भी गिरता हुआ कांच का गिलास
प्रेम की तरह होता है
न टूटने की उम्मीद से भरा

 
रंग
 

भूल चुके सपनों का रंग हरा था
तुम्हारी बातें हलकी नीली
एक पीली चीख में आज भी कुछ हरा दपफन है
पर मेरी आंखें बस नीला सुनती हैं अब

आवाजें बहरी होती हैं...

 

लिखना

 
तुम्हारी उंगलियों के पोर पे टपका मेरा आंसू, तुम्हारा आईना था, तुमने उसमें अपना चेहरा देखा और अपने लौटते कदम भी।
सूखे रंगों और टूटे ब्रश से पिफर तुमने मेरे जाते हुए कदमों के निशां बनाए। तुम मुझे मुझसे बचाना चाहते थे और खुद को खुद से।
...कि प्रेम में सबसे ज्यादा खतरा हमें अपने आप से ही होता है।
तुम कहते थे प्रेम हमारे भीतर रहती एक अंध्ी गुपफा है, जहां आदमी अपना चेहरा भी नहीं समझ पाता ठीक-ठाक।
तुम्हारा चेहरा पिफर मैं कैसे समझ पाती मैं बांध देना चाहती थी तुमको एक कविता की पंक्ति में या कहती थी कि तुम बन जाओ मेरी किसी कहानी के पात्रा।
...क्योंकि प्रेम की अंतिम शरण स्थली यही है।
प्रेम जब देह छोड़ता है, तब आत्मा में द्घर कर लेता है और जब आत्मा छोड़ रहा होता है तो ध्वनियों में बदल जाता है।
वह द्घर बदलता रहता है और हर जगह कुछ न कुछ भूल जाता है।
उस बचे-खुचे को स्याही बना कर लिखती हूं मैं तुम्हारा नाम।
...लिखना दरअसल तुमसे बातें करना है।
 
 
 
 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
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