फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
वंदना शर्मा

युवा कवयित्राी। कई पत्रा-पत्रिाकाओं और ब्लॉग्स में कविताएं प्रकाशित और चर्चित।
हाऊस नं. २, प्रोपफेसर्स लॉज, नियर सीएमडी, मोदीनगर, गाजियाबाद, उ.प्र.
मो. ०९७६०४११२५१

पेंटिंग

 

जंगल, झरने, पहाड़
आप कहेंगे-हिल स्टेशन
क्या यह सुविधा है अनेक के लिए एक शब्द की?
संक्षेपण कहता है कि यह आत्मद्घात है

मेरे द्घर की नखरीली दीवार
भरना चाहती है पूर्णता का गर्व
उसे चाहिए एक छोटे नाप वाली पेंटिंग
पेंटिंग तर्पण है हरियाली का
रंग प्रायश्चित हैं मनुष्यता का
हर दीवार किसी हरियाली की समाधि है

कैनवस और ब्रश के बीच
मै खड़ी हूं शादी के मध्यस्थ की तरह
शादियों के टूटने की खबरें बढती जा रही हैं अखबारों में
कब्र पूजने की संस्कृति में
कला वीथिकाएं हमारी सहनशीलता की सीमाएं हैं
पांवों तले की जमीन भी
इंकार कर देगी हमें सहने से
वह दिन दूर नहीं!

 
चुप
 

समय संकेतक जिंदा बम सी होती है
एक खुद्दार चुप...
चुप है तो पिफर चुप ही रहे
कलेजे पर सिल सी तो न बैठी रहे
यह भी क्या कि द्घुन सी लग जाए
आत्मा पर जोंक सी चिपक जाए

वे भी तो आखिर चुप ही थीं
जो पसर गईं बहुत चुपचाप
गगनचुंबी चोटियों और विस्तृत समुद्रों पर
कि जिनसे लजा गईं गहराइयां तमाम

थमी रहीं बदबूदार नालियों सी
धर्मग्रंथों और शरीयतों की निर्मम सुरंगों में
पीती रहीं बेआवाज
इतिहास की द्घायल पीठ का गाढ़ा लहू
विकृत कर गईं चेहरा इंसानियत का
सौंप गईं बंटी-बंजर जमीनें दिलों की
लील गईं जड़, जंगल, जमीन, बोलियां, कलाएं

दीमकें वे खा गईं स्वप्न कितने...
मिटा गईं इंद्रधनुषी आंगन की अल्पनाएं
ऐलानियां जकातों के बाद भी
गटक गईं हक, हवा, रोटियां...

एक तू है गजब की जिद्दी
अंधेरों में भी तकती
मरकर भी नहीं मरती
कुछ सीख चुप रह
अंदर बक-बककर
बाहर मत कह...

 
सुख बहुत कम
 

एक दूसरे से पीठ किए
दो स्वप्निल सरोवर उड़ रहे हैं...
इस तरपफ कमल जितने खूबसूरत हैं
उतनी ही आत्मिक है इनकी गंध
रास्तों पर बहुत द्घनी है कीचड़
इधर खतरा अधिक है
सुख बहुत कम...

बहुत संभव है...
एक दिन तुम खाली हाथ लौटो
तब यह नरमाई नहीं रहेगी
पिफर से कुतरे जाएंगे पर
डस लेगी जिद्दी अमरबेल
कल्पवृक्ष की हरीतिमा

चख चुके हैं उड़ानों के उत्ताप
इसलिए अब यह तय है
कि मैं अपने पैरों को और नहीं बंधने दूंगी
यदि मेरे हिस्से भी आया है अनंत सुख
और महा वट-वृक्ष
तब कई मौत मरने से पहले
वह मुझे जीना है...

 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
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