फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
खबरनामा
प्रवासी साहित्य सम्मेलन' का आयोजन
 
१८-१९ जनवरी को कथा यू.के. और डी.ए.वी. गर्ल्स कॉलेज यमुना नगर के संयुक्त तत्वधान में अंतरराष्ट्रीय प्रवासी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस दो दिवसीय सम्मेलन में कुल छह सत्रा आयोजित किए गए और इसका समापन एक काव्य गोष्ठी से हुआ।
कार्यक्रम के उद्द्घाटन सत्रा की अध्यक्षता
प्रो. राम बख्श सिंह ने की और मुख्य आतिथि वरिष्ठ आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह रहे। कार्यक्रम कथा यू.के. की संरक्षक जकिया जुबैरी के स्वागत भाषण से शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों कथा यू.के. के आयोजनों को भारत के बाहर ही नहीं बल्कि भारत में भी सभी का बहुत प्रेम और समर्थन मिला है। इसके बाद उद्द्घाटन सत्रा के चर्चा के विषय-प्रवासी साहित्य और मुख्यधारा की अवधारणा का प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ कथाकार और कथा यू.के. के महासचिव तेजेंद्र शर्मा ने अपने विचार रखे।
सत्रा के मुख्य अतिथि गोपेश्वर सिंह ने कहा कि आज दरअसल साहित्य की कोई मुख्यधारा नहीं है और यदि है भी तो उस पर पाठकों की कमी का संकट है। इसलिए यदि प्रवासी साहित्यकार चाहते हैं कि उन्हें भारत में पाठक और आलोचक स्वीकार करें तो उन्हें भी वही जोखिम उठाने होंगे, उन्हीं चुनौतियों का सामना करना होगा जिनका कि यहां के साहित्यकार कर रहे हैं।
 
'खामोशी की गूंज'
 
'अभिव्यक्ति' संस्था की दिसंबर गोष्ठी के लेखक-पाठक संवाद के अंतर्गत इस बार कुसुम अंसल जी को आमंत्रिात किया गया और उनकी पुस्तक 'खामोशी की गूंज' पर विचार- विमर्श हुआ।
'चंद्रकांता ने उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह दक्षिण अीका में रहते हुए उन भारतीयों की यातना और संद्घर्ष का एक साहित्यिक दस्तावेज है जो १८६० के आस-पास भारत से अंग्रेजों द्वारा गन्ने के खेतों में काम करने के लिए भेजे गए थे। वहां जाकर उन्हें जाति भेद के नाम पर जो अत्याचार और शोषण सहना पड़ा था उसके दंश आज भी कहीं न कहीं उनके मन पर मौजूद है।
सदस्याओं ने लेखिका से उपन्यास संबंधित प्रश्न पूछे जिनका उन्होंने विधिवत समाधान किया। इस गोष्ठी में कई बु(जिीवी और लेखकों ने भागीदारी की। अध्यक्षा मधु
जाजोदिया ने पुष्प गुच्छ से लेखिका का स्वागत किया और सचिव वीना जैन ने धन्यवाद किया।
 
'इज्जतपुरम' पर गोष्ठी
 
म मिश्र की काव्य पुस्तक 'इज्जतपुरम' के लोकार्पण समारोह के अवसर पर महावीर इंटर कॉलेज, अलीगंज लखनऊ के परिसर में दिग्गज साहित्यकारों का जमावड़ा देखने को मिला। पुस्तक का लोकार्पण किया प्रख्यात कथाकार शिवमूर्ति ने। साथ में कृति-केंद्रित गोष्ठी का आयोजन भी किया गया जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने की। 'समकालीन सरोकार' पत्रिाका के
संपादक हरे प्रकाशउपाध्याय ने आधार वक्तव्य देते हुए कहा कि इस कृति को कवि ने दो भागों में बांट रखा है। पूर्व कालखंड में वह लड़की है जो ट्रेनों में झाड़ू लगाती है और अपने परिवार का पेट पालती है। दूसरे कालखंड में स्त्राी को दी गई यातना के वे दृश्य हैं जो रोंगटे खड़े कर देते हैं।
रजनी गुप्त ने कहा कि स्त्राी की निजता और स्त्राी की
आजादी पर बहुत बातें हुई हैं, लेकिन इस संग्रह में स्त्राी को मादा की नजर से देखने की विडंबनाओं के बारे में लिखा गया है। 'निष्कर्ष' पत्रिाका के संपादक गिरीश चंद्र श्रीवास्तव ने इस कृति की रचना प्रक्रिया से जुड़ी यादें ताजा करते हुए कहा कि मुझे इस बात की खुशी है कि 'इज्जतपुरम' एक अच्छी कविता बन गई।
सुभाष राय ने कहा कि एक अच्छा कवि बनने के लिए एक अच्छा आदमी होना जरूरी है। 'इज्जतपुरम' का मूल स्वर एक स्त्राी की बेइज्जती का प्रतिकार है। सुशील सि(ार्थ ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कविता को लेकर,
विचारधारा को लेकर, स्त्राी को लेकर जिधर देखिए बहस छिड़ी हुईघ्है। यह महाकाव्यों और खंडकाव्यों का युग नहीं है।घ्
'इज्जतपुरम' को जब आप एक लंबी कविता के रूप में पढ़ेंगे तो यह कृति आपको संवेदित करने वाली, स्त्राी चेतना को जगाने वाली दिखेगी।
कथाकार शिवमूर्ति ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैंने इस पुस्तक की सारी कविताएं पढ़ी हैं और इसकी भूमिका भी लिखी है। यहां ठंडा चूल्हा है। भूखी आंत है। चलनी जितनी छेदों वाली कमलिया की चूती मंडई है। खाली देहरी है। गुलाबो की बढ़ती उम्र और पुरुषों की बदलती दृष्टि है। खराब नीयत के अश्लील बांटो से उसके वजन का नाप-जोख करते मनचले हैं। शोहदों के झुंड में पफंसी गुलाबो है। इस कृति में बिंबों का इस्तेमाल ठीक ढंग से हुआ है। नरेश सक्सेना ने कहा कि मिश्र जी से मुझे बहुत उम्मीदें हैं। इस पुस्तक की कई कविताएं वास्तव में बहुत स्तरीय हैं।
 
साहित्य श्री सम्मान संदीप अवस्थी को
 
अखिल भारतीय साहित्य कला मंच मुरादाबाद का २६वां वार्षिक समारोह सितंबर में दीनानाथ सिंह, आरा के मुख्य अतिथि और रामऔतार शर्मा ;आगराद्ध की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। संयोजक महेश 'दिवाकर' ने इस संस्था और पुरस्कारों की पृष्ठभूमि बताई। यह पुरस्कार बीस साहित्यकारों को देश भर से दिए गए। इसमें बु(निाथ यादव, सूर्यदीप्त ;म.प्र.द्ध मनोज कुमार ;मेरठद्ध, त. अम्मा ;तमिलनाड़ूद्ध के साथ राजस्थान के युवा आलोचक संदीप अवस्थी को 'साहित्य श्री' स्मृति सम्मान दिया गया। इसमें अंग वस्त्रा, पांच हजार एक की राशि, प्रशस्ति पत्रा तथा पांच हजार रुपए की पुस्तकें संदीप अवस्थी को दी गईं। संदीप अवस्थी ने अपने उद्बोधन में बाजारवाद के खतरे और द्घटते जीवन मूल्यों पर उपस्थितजन का ध्यानाकर्षण किया। उन्होंने कहा कि भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था ने सारे संबंध गौण कर दिए हैं। बाजारवाद की गति धीमी हैं। इसके लिए हमें परिवार संस्कृति, भाषा को एकजुट रखना होगा। अंत में महेश दिवाकर ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया।
 
'प्रिंट लाइन' का विमोचन
 
पिछले दिनों रायपुर में कथाकार परितोष चक्रवर्ती का
नवीनतम उपन्यास 'प्रिंट लाइन' ;प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्लीद्ध के विमोचन समारोह में बोलते हुए वरिष्ठ आलोचक अजय तिवारी एवं कवि-समीक्षक जितेंद्र श्रीवास्तव ने इसे जीवंत इतिहास बोध की सार्थक रचना कहा, उपन्यास की भाषा में मुहावरों के सटीक प्रयोग और शिल्प को लेकर भी संतोष जताया गया। वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्राी रमन सिंह ने इसकी प्रवाहमयी भाषा और चरित्राों की विशेषताओं के लिए उपन्यास को एक पठनीय कृति बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पत्राकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने 'प्रिंट लाइन' उपन्यास को जीवन की गहरी संवेदना को उकेरने में सपफल बताया।
 
चंडीगढ़ में 'महास्वप्न का अवसान'
 
वीरेंद्र मेंहदीरत्ता की अध्यक्षता में संपन्न 'अभिव्यक्ति' की मासिक गोष्ठी में राजकुमार राकेश ने अपनी नई पुस्तक
'महास्वप्न का अवसान' में से एक निबंध 'लोटे में चाय' का पाठ किया। उपस्थित साहित्यकारों और श्रोताओं ने इसे रोचक पाठ बताया। मेंहदीरत्ता ने कहा कि राकेश ने इस निबंध में जीवन के वीभत्स रस को हास्य में रूपांतरित करने में बड़ी सपफलता अर्जित की है जो रचना में एक दुलर्भ काम है। बीस साल का एक युवक लेखक बनने के लिए अकुला रहा है मगर जिंदगी उसके सामने ऐसी मुश्किलें खड़ी कर देती है जिनसे पार पाने में उसकी पूरी उर्जा नष्ट हो रही है। इससे पहले पुस्तक का परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि इस पुस्तक के आत्मकथात्मक अंश नेहरू जी के समाजवादी महास्वप्न की असलियत और आगे आने वाली भूमंडलीकरण की पूरी स्थिति को विश्वसनीय ढंग से उद्घाड़ते हैं।
इससे पहले चंडीगढ़ प्रेस क्लब में इस पुस्तक के विमोचन अवसर पर प्रो. भूपिंदर बराड़ ने कहा कि ऐसी पुस्तक का हिंदी में लिखा जाना एक दुलर्भ काम है। इसमें साहित्य, इतिहास, आत्मकथा और देशकाल के ऐसे हिस्से दर्ज हैं जो असल में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया की अमानवीयता की तरपफ इशारा कर रहे हैं। यह कापफी मुश्किल काम था और देशकाल की सीमाओं के पार जाकर इसे अंजाम देना कठिन था जो राकेश ने बड़ी हद तक कर दिखाया है। विनोद शाही ने कहा कि मैंने इस पुस्तक के तीन आलेखों को अपने संपादन में प्रकाशित किया है। यह एक नई विधा और संहिता की खोज का सपफल प्रयास है। इससे पहले हिंदी में ऐसा काम नहीं हुआ है। उन्होंने
'भूमंडलीकृत स्मार्ट बम' नामक आलेख का संदर्भ लेते हुए कहा कि यह बेहद खोजपरक आलेख है और तथ्यों के साथ मजलूम देशों पर १९५० से लेकर २००२ तक के पचास वर्षों के अमेरिकी आक्रमणों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। यह अद्भुत शोध का विषय है। देवेंद्र चौबे ने कहा कि राकेश जी ने एक ऐसे साहित्यिक काम को हाथ में लिया है जिस पर हिंदी के रचनाकार अक्सर चुप रहना पसंद करते हैं। उन्होंने आधार प्रकाशन के निर्देशक देश निर्मोही को अपनी तरह की इस पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए बधाई दी।
 
देवेंद्र खरे स्मृति समारोह
 
'अब गलत को गलत कहने का चलन नहीं रहा इसलिए साहित्य में दुराचार जारी है। आज कथ्य को ही कविता कहा जा रहा है यह कविता की गलत परिभाषा है। कविता के पास हम आनंद के लिए जाते है। अगर कविता से हमें कभी दुःख की अनुभूति भी होती है तो वह भी आनंदकर ही होती है। कविता का यही काम भी है।' सीध्ी-सपाट भाषा में अपनी बात कहने वाले वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने अपने यह उद्गार बुंदेलखंड के बांदा जिले में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए। अवसर था बांदा जनपद के लोकप्रिय जनसेवक देवेंद्र खरे की जन्मतिथि का। बांदा में देवेंद्र खरे जितना अपने समाजिक कार्यों के लिए जाने जाते है उससे कहीं अध्कि वे अपनी साहित्यिक अभिरुचि के लिए भी चर्चित हैं। बांदा में उनके नाम से यह सलाना उत्सव उनकी पत्नी शांति खरे अपनी संस्था दयानंद पुस्तकालय, बांदा के सौजन्य से करती आ रही हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत कई तरह की प्रतियोगिताओं में विजयी प्रतिभागियों को पुरस्कार वितरण करके उनके उत्साह और हौसले में बढ़ोतरी करने का महती प्रयास किया जाता है।
यह वार्षिक कार्यक्रम बांदा, उत्तर प्रदेश में १५ जनवरी दिन मंगलवार को कंपिर्फटंग होटल में पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। जिसमें जनपद के गणमान्य और सामान्यजन दोनों ने अपनी उपस्थिति से इसे विशिष्टता और संपूर्णता प्रदान की।
 
प्रस्तुति : अंकित ांसिस
 
 
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