फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
लद्घु कथा
 
स्वाभिमान
सनत कुमार जैन
 

'देमां' कहते हुए एक हृष्ट-पुष्ट ४० साल की महिला दरवाजे पर आ खड़ी हुई।
रमा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा पिफर कहा-'हाथ पैर तो सलामत हैं कुछ काम क्यों नहीं करती?'
'काम ही नहीं मिलता है मां, क्या करूं इसलिए भीख मांगती हूं' दयनीय स्वर में उसने कहा। भावुक रमा कह उठी-'अच्छा ठीक है आज से हमारे द्घर के कपड़े और जूठे बर्तन धोना, पचास रुपए हफ्रता दूंगी।' मानो
भूचाल आ गया। 'ए बाई कुछ देना है तो दे, नहीं देना है तो मत दे, मैं ऊंची जाति की तेरा जूठा बर्तन मांजूगी, क्या समझ रखा है?' रमा का चेहरा दयनीय और स्वर भयानक और कर्कश हो गया, जाने कहां गलती हुई।

 
 
गरीब द्घरों की बेटियां
 
विश्वंभर प्रसाद चंद्र
 
रद्दी पेपर में उलझ गई थी पुनिया। मां सूखी रोटी को लपेटकर लाई थी, रद्दी पेपर में। उस द्घर से जहां वह काम करने जाती थी। 'मां, ऐश्वर्या राय को बेटी हुई है। इस अखबार के पूरे पेज में खबर छपी है। कल अनोखे भी बता रहा था कि टी.वी. में रूप-रंग कर इसे दिखाया जा रहा था। पूरे देश में इसकी चर्चा है। मां जब मैं पैदा हुई थी, तो तुम तो खुश थी न? क्या तुम्हें किसी ने बधाई दी थी?' पूछ बैठी थी मां से पुनिया उस रद्दी पेपर को पढ़कर। 'हां मिली थी न मुझे बधाइयां। मुहल्ले की औरतों की ओर से। कहा था उन्होंने। झाडू़-पोछा और बर्तन मांजकर जी लेगी सुकारो। चिंता की बात नहीं है। लड़का होता तो चिंता करने की बात थी।' और दूसरे दिन पुनिया सुबह से शाम तक द्घर-द्घर जाने लगी। झाडू़-पोछा और बर्तन मांजने के लिए।
 
हिसाब-किताब
 
'मां लड़की हुई है।' खुशी से उछल पड़ा वह।
'नालायक, उछल मत। पालने-पोसने, पढ़ाई-लिखाई, शादी-वादी, दान-दहेज में कितने लगेंगे कुछ अंदाजा भी है?' मां ने झिड़कते हुए अपने लड़के से कहा। और अगले ही पल लड़के के चेहरे पर मातम छा गया।
लड़के ने अपने को संयत कर रहा, 'मां, जब तुम पैदा हुई थीं तो क्या नानी-नाना ने भी आपको कोई चीज समझकर इसी तरह का हिसाब-किताब किया था?'
अबकी बार मां का चेहरा लाल हो गया। थप्पड़ खाकर।
 
 
 
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