फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मेरी बात/अपूर्व जोशी
सचमुच लेखक कायर निकला!
 

 

 

सार्त्रा लेखक के दायित्यों पर कहते हैं कि 'लेखक चुप नहीं रह सकता। यदि लेखक बोलने से इंकार करता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह गूंगा है। उससे प्रश्न होगा कि आप चुप क्यों हैं? बोलना या न बोलना, दोनों ही अपने-आप में लेखक की पक्षधरता लिए हुए होते हैं। अतः प्रतिब(ता लेखन की पहली शर्त है। उसके लिए पलायन का रास्ता नहीं हैं। हम चाहते हैं कि वह अपने समय से जुड़कर रहे, यह उसके लिए एक अचूक अवसर है। इसका निर्माण उसी के लिए हुआ है और वह इसी के लिए बना है।'
जाहिर है जन आंदोलनों के इस गुजरे एक बरस में हमारा लेखक इस कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया है। उसने अपने कर्तव्यों का सही निर्वहन नहीं किया और इस 'गैर मामूली समय' में उसने संजीव के कथन-'लेखक कायर होता है' को चरितार्थ ही किया है।

 
अन्ना हजारे का जन लोकपाल आंदोलन हो या पिफर उनके सहयोगियों ;तत्कालीनद्ध द्वारा भ्रष्टाचार के खिलापफ जंतर मंतर में धरना प्रदर्शन, पूरा देश २०१२ के पूर्वार्( में सड़क में उतर आया था। हालांकि मेरे इस कथन से कई असहमत हो सकते हैं, लेकिन इतना तो ऐसे असहमत भी स्वीकारेंगे कि अन्ना और इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने एक आस को जन्म अवश्य दिया। सत्ता का शिखर यानी दिल्ली का सबसे बड़ा दरबार भी मात्रा कुछ हजार के सड़क पर उतरने से सहम गया। उसे यह एहसास हो गया कि भले ही सड़क पर कुछ हजार हैं लेकिन जो द्घरों में बैठे अपने टी.वी. सेट्स पर इन कुछ हजारों को देख कसमसा रहे हैं, कल वे भी सड़क पर आ उतरे तो संभाले नहीं संभलेंगे। सत्ता ने वही किया जो वह करती आई है। अन्ना आंदोलन को भटकाकर, दिशाहीन कर, अन्ना और उनके साथियों के बीच दरार पैदा कर, इस आंदोलन ने जिस आस को जन्मने का काम किया था, उस आस पर उसने बपर्फ रख डाली। अन्ना आंदोलन कितना सपफल, कितना विपफल रहा यह एक अलग मुद्दा है, लेकिन उसने जिस आस को जन्मा था और जिस आस पर सत्ता ने बपर्फ लगाने में सपफलता पाई, उस आस से बपर्फ ऐसी पिद्घली कि दिल्ली दरबार के होश पफाख्ता हो गए। इस बार न तो अन्ना थे, न अरविंद, न रामदेव थे और न ही कोई राजनैतिक दल, पिफर भी जनता द्घरों से निकली, स्वतः बगैर किसी नेता के आह्वान के और दिल्ली का बादशाह सहम गया। सर्दी के मौसम में हुक्मरानों के माथे पसीने से लथपथ हो गए। एक नवयुवती के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्कार के खिलापफ जो प्रतिकार के स्वर उठने शरू हुए, उसे पूरे देश से समर्थन मिला। भले ही डरकर, भले ही जन दबाव से सहमकर, लेकिन सरकार चेती, बलात्कार के मुकदमों की सुनवाई के लिए पफास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया जा चुका है। अकेले दिल्ली में ही लगभग पांच सौ ऐसे मामले इन पफास्ट ट्रैक अदालतों में ट्रांसपफर किए गए हैं। केंद्र सरकार ने बलात्कार जैसे अपराध से जुड़े मामलों के लिए कानून में बदलाव की मांग का सम्मान करते हुए उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस वर्मा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया और इस समिति ने तय समय पर अपनी सिपफारिशें केंद्र सरकार को सौंप भी दी हैं। राज्य सरकारें भी इस स्वतःस्पफूर्त जन आंदोलन से सहमी और अपने स्तर पर कुछ न कुछ सकारात्मक कदम उठाते दिखी हैं। इस सबके बावजूद क्या प्रतिकार के स्वर जितने उठने चाहिए थे उतने उठे? खासकर हमारे बु(जिीवी समाज के स्वर क्या इस आंदोलन या इससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान सुनने को मिले थे? कहां दुबके बैठे रहे हमारे बु(जिीवी, हमारे कवि, हमारे लेखक और उनके संगठन इस बदलाव के दौर में?
६ जनवरी के 'जनसत्ता' में ओम थानवी ने इस पर सवाल उठाने का 'दुस्साहस' किया। उन्होंने लिखा '...नृशंस बलात्कार के विरोध में जब राजधानी जनपथ पर थी, बेशुमार विद्यार्थी, शिक्षक और समाज के विभिन्न वर्ग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, उस वक्त दिल्ली के साहित्यकार कहां थे?... हैरत की बात है कि संद्घर्ष की प्रेरणा देने वाले लेखक संगठन उस वक्त सोए हुए थे, जब स्वतःस्पफूर्त आंदोलनकारी राजपथ और इंडिया गेट के गिर्द पुलिस की लाठी खा रहे थे...। कोई जुलूस, सभा, आह्वान, यहां तक कि प्रेस विज्ञाप्ति भी नहीं।'
थानवी जी के इस लिखे पर 'जनसत्ता' के ही १३ जनवरी के अंक में निर्मला जैन जी का प्रतिरोध भी पढ़ा। साथ ही थानवी जी का प्रतिउत्तर भी जिसमें उन्होंने अन्य प्रतिक्रियाओं की बाबत लिखा। निर्मला जी ने डिपफेंसिव हो जो लिखा उससे उनका अपराध बोध सा झलकता लगा। 'पाखी' के शुरुआती अंकों में एक अंक कथाकार संजीव पर केंद्रित विशेषांक था जिसमें दिए अपने साक्षात्कार में संजीव ने लेखक को कायर कहा था। संजीव के इस कथन का तब खासा विरोध हुआ था और खुद संजीव ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए उनके कथन को गलत तरीके से प्रस्तुत करने की बात मुझसे कही थी। मुझे लेकिन तब भी उनकी बात से पूरा
इत्तपफाक था और आज भी है। अल्बेयर कामू पर नाना प्रकार के आरोप उनकी लेखकीय प्रतिब(ता को लेकर उनके समय के मार्क्सवादी लेखकों ने लगाए। उन्हें 'पेटी बुजुर्वा बु(विादी' कह पुकारा जाता था। यानी ऐसा लेखक जो अस्थिरचित्त, संकुचित दृष्टिकोण और अपनी थोड़ी सी आलोचना से नाराज हो जाने वाला और अपने तक सीमित, अपने आस-पास के जन के दुःखों से पीठ पफेरने वाला है। क्या अन्ना आंदोलन और सामूहिक बलात्कार कांड के खिलापफ स्वतःस्पफूर्त जन प्रतिरोध के दौरान हमारे लेखकों-कवियों की भूमिका भी 'पेटी बुजुर्वा बु(विादियों' समान नहीं रही?
निर्मला जैन ने इस समय को गैर मामूली समय करार दिया है लेकिन यह कहकर कि 'आपको याद होगा अन्ना हजारे के आंदोलन में मैंने, मन्नू भंडारी और राजी सेठ ने शिरकत की थी। भ्रष्टाचार भी इस देश का बहुत बड़ा मुद्दा है। बाद में बकौल नामवर सिंह भी वे अन्ना के साथ कुछ देर बैठ अपना समर्थन दे आए थे। युवा पीढ़ी के लेखक भी उसमें जरूर रहे होंगे। किसी ने भी नाम गिनाने की जरूरत नहीं समझी। लेकिन कुल मिलाकर हुआ क्या? इस पर टिप्पणी करना गैर जरूरी है' अपना और अपने संगी-साथियों का कमजोर डिपफेंस लेने का असपफल प्रयास किया है। प्रश्न यह नहीं है कि इन आंदोलनों की सार्थकता क्या है? प्रश्न यह है कि जब पूरे समाज में उथल-पुथल हो रही थी और वह करवट बदलने के लिए तैयार हो रहा था तब क्योंकर हमारा बु(जिीवी, हमारा लेखक खामोश था, तमाशबीन बना हुआ था। निर्मला जी, मन्नू जी याद करें, और बताएं कि वे अन्ना आंदोलन के शुरुआती समय में अपना समर्थन देने पहुंचे थे या पिफर तब जब चारों तरपफ इस आंदोलन और अन्ना के नाम का डंका बजने लगा था?
सार्त्रा लेखक के दायित्यों पर कहते हैं कि 'लेखक चुप नहीं रह सकता। यदि लेखक बोलने से इंकार करता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह गूंगा है। उससे प्रश्न होगा कि आप चुप क्यों हैं? बोलना या न बोलना, दोनों ही अपने-आप में लेखक की पक्षधरता लिए हुए होते हैं। अतः प्रतिब(ता लेखन की पहली शर्त है। उसके लिए पलायन का रास्ता नहीं हैं। हम चाहते हैं कि वह अपने समय से जुड़कर रहे, यह उसके लिए एक अचूक अवसर है। इसका निर्माण उसी के लिए हुआ है और वह इसी के लिए बना है।'
हमारे यहां और हमारे यहां ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अधिकांशतः यह देखा गया है कि बु(जिीवी समाज ने सही वक्त पर सही कारण के लिए उठे जनज्वार को खुला समर्थन नहीं दिया। आपातकाल के दौरान जिस प्रकार का आचरण भारत की न्यायपालिका, कार्यपालिका और बड़े अखबार द्घरानों ने किया, उसी का अनुसरण बु(जिीवियों, विशेषकर साहित्यकारों, कवियों, लेखकों ने किया। इसके पीछे एक बड़ा कारण उनका सुविधाभोगी सत्तालोलुप होना रहा। मैं मानता हूं कि पिछले एक वर्ष के दौरान उठे जन आंदोलनों को खुला समर्थन न देना, उनकी ढंकी-छुपी आलोचना करना भी एक प्रकार से 'दरबार' के समक्ष शीश नवाना ही रहा है। आज हमारे कितने ही लेखक और कवि केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिष्ठानों में अध्यक्ष/सचिव बने बैठे हैं। इनकी कहानी-कविता में आम जन का दर्द सुनामी समान उमड़ता नजर आता है, लेकिन हकीकत में ऐसे सभी न तो जंतर-मंतर पर दिखते हैं, न रामलीला मैदान में। टी.वी. चैनल्स की बहस में भी ये सरकार के खिलापफ एक शब्द बोलते नजर नहीं आते।
जाहिर है जन आंदोलनों के इस गुजरे एक बरस में हमारा लेखक इस कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया है। उसने अपने कर्तव्यों का सही निर्वहन नहीं किया और इस 'गैर मामूली समय' में उसने संजीव के कथन-'लेखक कायर होता है' को चरितार्थ ही किया है।
रामधारी सिंह दिनकर के इन शब्दों के साथ विदा लेता हूं-
 
 
 
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