फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
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मूल्यांकन
अंतस से समर्पित पुरुष मन की तलाश
अरुण अभिषेक

औरत जो नदी है
जयश्री राय
शिल्पायन, नई दिल्ली
मूल्य : २२५ रुपये, पृष्ठ : १४४

स्त्राी-पुरुष प्रेम-प्रसंगों को लेकर जयश्री राय ने कई कहानियां लिखी हैं। इनका पहला उपन्यास 'औरत जो नदी है' इनकी कहानियों की तरह ही प्रेम संवेदनाओं का विस्तार है। लेखिका उपन्यास में स्त्राी-पुरुष प्रेम-प्रसंगों के रचनात्मक प्रयोग और उनसे जुड़े जीवनानुभव को बड़ी ही मुस्तैदी और तीव्रता के साथ पफोकस करती हैं। उपन्यास के मुख्य किरदार एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पदस्थ अधिकारी अशेष त्यागी की मनोदशा संवेदनात्मक तरलता लिए हुए हैं-'अब तक का जीवन क्या था-एक बंधन ही तो! हर चीज का बंधन-समाज, परिवार, रिश्तों का
बंधन... अनुशासन की जंजीरों में जकड़ा हुआ। मर्यादा, सीमाओं के दायरे में संकुचित, आब(... कब मन का किया, अपनी तरह से जिया...!' ;पृ.सं. ३१द्ध इस मनोविज्ञान की दूसरी वजह यह भी है कि प्रौद्योगिक समाज, मानसिक व्याधि का उत्पादक है। प्रौद्योगिक सभ्यता और संस्कृति में व्यक्तित्व समन्वित न होकर, बहुखंडित होता है।
उपन्यास का कथानक सिपर्फ प्रेम किए जाने वाली चाहत पर नहीं है, बल्कि जीवन से जुड़े आनंद, उष्मा और चेतना की तलाश पर भी है, जो ठंडे और क्रूर होते समाज में दरक रही है। हम रिश्तों के प्रति मिठासपूर्ण संबंध रखना चाहते हैं, यह हमारी पहली शर्त होती है। यह विश्वास ही हमें रिश्तों के प्रति अंतरंग होने को प्रेरित करता है। नायिका दामिनी की आंखों की दमक इसी आशय से है कि-'यकीन हर अच्छी चीज होने का और सुकून उस कभी न खत्म होने वाले
खूबसूरत एहसास का अटूट हिस्सा होने का।' ;पृ.सं. ८द्ध उपन्यास के मुख्य किरदार अशेष और दामिनी हैं। दोनों
शादीशुदा हैं। अशेष की खूबसूरत पत्नी उमा है। दामिनी का पति असीम है, जो उससे अलग है। अशेष की पोस्टिंग गोवा में है। परिवार से दूर इय खूबसूरत शहर में नायक अपने भीतर अकेलापन महसूस करता है। इन एकांत क्षणों में आत्म सजगता सामने आती है। शहर में उसकी नजर दामिनी पर पड़ती है, और एक ही नजर में उसके दिल को छू जाती है। दामिनी के जीवन में कई पुरुष आए, लेकिन पुरुष के प्रति जो 'यकीन' वह करना चाहती है, महसूस नहीं कर पाती। यकीन की बुनियाद पर वह सुकून चाहती है। एक ऐसा कंधा वह चाहती है जहां यकीन से अपना सिर रखकर, वह चैन से जी सके। यहां परंपरागत रिश्ते छूट जाते हैं। रह जाते हैं, मन के नए रिश्ते। यहां इतर हो जाने का बोध नहीं सालता है। मन और तन के मध्य यकीन के साथ रिश्तों का आध्यात्मिक स्वर खोजा जाता है। इन रिश्तों में देह और मन के संबंध पर सांस्कृतिक विमर्श होता है। अपने होने और जीने की इन प्रेमानुभूतियों में, उपन्यास के मुख्य किरदारों के मध्य, स्त्राी और पुरुष के आंतरिक तत्वों और उनकी संवेदनाओं पर पारदर्शी जिरह भी होती है। उपन्यास में स्त्राी की मुखरता प्रभावकारी है। वह पुरुष की सामंती प्रवृत्तियों पर भरपूर प्रहार करती है। दामिनी कोई साधारण विचार की स्त्राी नहीं है। वह दृष्टि संपन्न चरित्रा है और मानवीय मूल्यों और नियति के प्रति गहरी संवेदना रखती है। वह बदलते जीवन मूल्यों की प्रत्येक गतिविधि की पड़ताल और उसके नएपन के सामाजिक कारणों की पहचान एक खास नजरिए से करती है। उसके इन आत्मविश्लेषणों या पहचान की प्रक्रियाओं में अंततः एक नए मनुष्य की तलाश शामिल है, जो बार-बार प्रकृति ;स्त्राीद्ध से जुड़ती है। दामिनी के भीतर उसके मन की अनसुलझी ग्रंथि, जो उसके बचपन की कोमल भावनाओं पर गहरे उतरी हुई है, एक ऐसा द्घाव है जो नासूर बन उसके मानस में कई पर्तों में जमी हुई है। यही वजह है कि वह पुरुष के भीतर इंसानियत को महसूसना चाहती है। इंसानियत को अपने अस्तित्व से जोड़कर वह जीवन के मूल में जीना चाहती है।
उपन्यास में कथानक का बेहतरीन शिल्प है और सुसंस्कृत और सौंदर्यपरक अंदाज में सेक्स को जीवन से जोड़कर देखा गया है। यहां जीवन के उद्देश्यों के साथ प्रेमानुभूतियों में देह के पूर्ण आध्यात्मिक अध्ययन की तलाश भी है। मानना है कि जब स्त्राी और पुरुष, परिपूर्ण प्रेम और आनंद में मिलते हैं तो उनका मिलन एक स्प्रिचुअल एक्ट अर्थात्‌ एक आध्यात्मिक कृत्य हो जाता है पिफर उसका सेक्स से कोई संबंध नहीं होता। वह मिलन कामुक नहीं है। वह मिलन शारीरिक नहीं है, यह मिलन इतना अनूठा और इतना उत्सर्गपूर्ण है जितना कि किसी योगी की समाधि। दो आत्माएं देह से गुजरते हुए समर्पित प्रेम की महासमाधि में होती है। सेक्स, आदिम और भावनात्मक होने के साथ, सौंदर्यपरक और शिष्ट भी है। यहां यह भी गौरतलब है कि भारतीय महाकाव्यों में कामुकता को, स्त्राी और पुरुषों के संग को हमेशा ही खूबसूरत और सांस्कृतिक अंदाज में व्यक्त किया गया है। महान दार्शनिक और आँषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा का उत्कृष्ट संवाद आँग्वेद में उल्लेखनीय है।
जयश्री राय चेतना संपन्न लेखिका हैं। वह अपने इस उपन्यास में चरित्राों के माध्यम से प्रेम के उन क्षणों में दिमागी और दैहिक गतिशीलता को तय करने वाले खास कारकों पर संवेदनाशीलता और गंभीरता से विमर्श करती हैं। साथ ही
अंतर्विरोधों से भरे जटिल समाज के खोखलेपन को दिखाने में संकोच भी नहीं करतीं। खासकर, पुरुष की उन मनोवृत्तियों के खिलापफ जो हमेशा स्त्राी को अपनी हदों में देखना चाहते हैं।
लेकिन दामिनी वर्जनाएं तोड़ती नजर आती है। वह प्रेम को सर्वोपरि मानती है। देह से होते हुए भी देह से मुक्त। प्रेम के माध्यम से वह पुरुष के भीतर एक ऐसा भाव तलाशती है, जो देह से होते हुए भी, देह से मुक्त हो। यह सदी की नई स्त्राी है, जो साहसी है, अपनी दृष्टिसंपन्नता के कारण। विगत कई पुरुषों के साथ अपने संबंधों को लेकर दामिनी विचलित नजर नहीं आती है, और न ही कोई अपराध भाव है उसमें। वह तो पुरुष का आखिरी प्रेम होना चाहती है। वह पुरुष के उस मानक को तोड़ती नजर आती है, जो देह के स्तर तक ही अपने आपको पहला प्रेमी समझते हैं। यानी मन से रिक्त देह का सिपर्फ भोग। पुरुष स्त्राी के इस अतल प्रेम की गहराई को कहां समझ पा रहे हैं? जयश्री राय स्त्राी-पुरुष के इस महीन रिश्ते को गंभीरता से लेती हैं। वे दामिनी के माध्यम से स्त्राी के पक्ष में यह रहस्य खोलती नजर आती हैं, जब वह कहती हैं कि-'जब तक स्त्राी अपनी इच्छा से किसी का वरण नहीं कर लेती, कुंवारी ही रहती है।' ;पृ.सं. १०१द्ध स्त्राी यहां देह की भौतिकता से ऊपर उठती नजर आती है। वह मन के वरण को प्रधानता देती है। लेकिन मन का यह एकत्व भाव उसे अशेष से भी तो नहीं मिला। वह अंतरंग क्षणों में कहती है-'मेरा सब कुछ जस का तस रह गया है अशेष! तुम मुझे लेते क्यों नहीं? मैं तुम पर पूरी तरह खत्म हो जाना चाहती हूं। ...जानते हो टैगोर क्या कहते हैं-दूंगा उसे जिसे बिना मूल्य दे सकूंगा, हर औरत बस यही चाहती है।' ;पृ.सं. १०१द्ध
दामिनी की सोच देह-संस्कृति के वर्षों से रटे-रटाए मानकों से ऊपर है। तभी तो वह मर्दों की टिपिकल प्रवृत्ति जो स्त्राी विरोधी है, से द्घृणा करती है। नई सदी की ये स्त्रिायां, उन तमाम पुरुषों की अराजकता के खिलापफ होने का आगाज करती हैं। पुरुषों की यौन अराजकता के खिलापफ यह एक साहसी स्त्राी का प्रतिनिधित्व है। उपन्यास में वह दृश्य भी पाठकों को सोचने को मजबूर करता है, जब अशेष रेचल की देह में बंधता है। दामिनी इस सच को जानकर टूट-सी गई। वह यकीन को अशेष में देखना चाहती थी। वह अशेष को धिक्कारती है-'दैहिक भूख से वशीभूत हो पशु के स्तर पर जीते चले जाना तो तुम्हारी नियति है ही, मगर श्र(ा में अब इड़ा का भी समावेश हो गया है, वह अब हृदय भी है और बु(ि भी... अपराजेय हो गई!' ;पृ.सं. १४२द्ध यह एक युगीन सत्य है कि स्त्रिायों के पास एक तरह का समर्पण-भाव होता है। और होती है उनके पास एक तरह की निष्ठा, आस्था और श्र(ा। यह भी गौरतलब है कि पुरुष की जिंदगी में प्रेम ही सब कुछ नहीं होता जबकि स्त्राी के जीवन में बस सब कुछ प्रेम ही होता है। दामिनी की पूरी सोच तब स्पष्ट होती है, जब वह कहती है कि 'संभोग किसी के लिए शरीर से की गई प्रार्थना है तो किसी के लिए द्घर्षण की एक ग्लानि मात्रा या लंपट होने का आजीवन आक्षेप...।' ;पृ.सं. १४४द्ध दामिनी की एक दृष्टि है। वह हर पल एक अच्छे इंसान की कल्पना करती है, जिस पर यकीन किया जा सके और सुकून से जीया जा सके। यह स्त्राी की अंतस से समर्पित पुरुष मन की तलाश है।
उपन्यास में स्त्राी-पुरुष के इन रिश्तों को लेकर सवाल यह उठ खड़ा होता है कि पुरुष ;अशेषद्ध की दोहरी मानसिकता से दामिनी आहत होती है, लेकिन वह खुद भी तो अपनी देह को कई पुरुषों के सुपुर्द कर चुकी है। दामिनी का यह कैसा उच्चतम भाव है? क्या यह स्त्राी की अपनी देह पर पूर्ण अधिकार की उद्द्घोषणा है? क्या यह ऐसी स्त्राी की कहानी है जो खुद को और जीवन को देह से मुक्त साक्षी भाव से देखना चाहती है? मन के धरातल पर प्रेम से जीने का यह अद्भुत अन्वेषण है। एक नए स्त्राी युग की स्थापना है। जो अंतस से समर्पित पुरुष मन की तलाश में है।

 
 
 
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