फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
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मूल्यांकन
दैहिक शुचिता के प्रश्न
जय कौशल

महुआचरित
काशीनाथ सिंह
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : १५० रुपए, पृष्ठ : १००

वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह की 'लंबी कहानी' 'महुआचरित' स्त्राी और उसकी देह के संदर्भ में युवा से प्रौढ़ होती आकांक्षाओं की कथा है। जिसकी नायिका महुआ नाम की एक युवती है। लेखक ने इस कहानी को देह के प्रश्नों से शुरू किया है और उनके पार जाने की भरसक कोशिश भी की है। वैसे यह कथा देह से शुरू होती है और देह पर ही खत्म होती है, लेकिन पूरी जागरूकता के साथ। एक पुरुष वर्चस्ववादी मध्यवर्गीय समाज को देखते हुए कहानी का अंत अस्वाभाविक भी नहीं लगता। महुआ उन युवतियों में से एक है जिन्हें पढ़ाई के दौरान प्रेम आदि में पड़ना पफालतू लगता है, क्योंकि कॅरियर बनाने का मौजूदा दबाव प्राथमिक है। प्रेम और शादी जैसे मामले इसके बाद के हैं। लेकिन पढ़ाई की यही उम्र युवा आकांक्षाओं की उम्र भी है और दैहिक आकर्षण की भी। पिफर अपनी प्रशंसा कौन नहीं चाहता, चाहे वह बु(ि और हुनर की हो अथवा सौंदर्य की। गौरतलब है कि एक पुरुष वर्चस्ववादी समाज में किसी स्त्राी के आकर्षण का मुख्य केंद्र उसकी देह होती है, जिसे लेकर उसे 'कमेंट' और 'कॉम्प्लीमेंट' दोनों ही मिलते हैं। महुआ यह बात जानती है। लेकिन वह औरों से अलग इसलिए है, क्योंकि स्त्राी के खिलापफ बनी इस पुरुषवादी दृष्टि का इस्तेमाल अपने ;स्त्राी केद्ध पक्ष में करती है। एक समय, जब उसकी देहयष्टि से आकर्षित होकर पुरुष स्वतः उसके पास आ रहे थे, तब उसे उनकी जरूरत नहीं थी। 'द्घर की माली हालत और कॅरियर की चिंता' उसके स्त्राी एहसास को दबा देते हैं। लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद जब उसे इसकी चाह होती है, तो वह अपनी देह की सुंदरता को पुरुषवादी आकर्षण की कसौटी पर ही जांचना चाहती है। उसे लगने लगा है कि उसकी देह ढल चुकी है, अब उसमें पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा, 'जब बाजार से गुजरती तो कनखियों से इधर-उधर देखने लगती कि लोग मुझे देख क्यों नहीं रहे हैं? कि कोई मेरी चाल पर कमेंट क्यों नहीं कर रहा है? कि उस बच्चे ने मुझे दीदी क्यों नहीं कहा? आंटी क्यों कहा?' दैहिक सौंदर्य जांचने का यही प्रतिमान उसे अपने पड़ोसी साजिद के साथ संबंध को प्रेरित करता है। उसके अनुसार, 'कोई लड़की चाहे जितनी सुंदर हो, अपने सौंदर्य को लेकर हमेशा संदेह में रहती है। वह चाहती है कि कोई हो जो सिपर्फ इतना भर कह दे कि नहीं, तुम्हारी जैसी खूबसूरत लड़की मैंने नहीं देखी। मेरे लिए यह 'कोई' साजिद था।' जिसने महुआ को उसकी औरत देह का एहसास कराया। जाहिर है, महुआ को इस 'कोई' की जरूरत किसी पुरुष के लिए नहीं, अपने लिए है। यहां काशीनाथ सिंह ने इस प्रसंग द्वारा पुरुष वर्चस्व का नया प्रत्याख्यान गढ़ा है। हालांकि अपनी क्रांतिकारिता में यह 'आइडिया' स्वाभाविक रूप से विवाह संस्था के बाहर ही तार्किक है।
अब बात विवाह संस्था के भीतरी चौखटे की। किसी साक्षात्कार में इस कहानी पर बात करते हुए लेखक ने एक जगह जोर देकर कहा है कि 'पति और पत्नी के रिश्ते में बीते कल की बात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हर किसी का अतीत होता है और इससे दोनों के मन में मैल आ जाता है।' चलिए मान लेते हैं, पर क्या इसे पति-पत्नी के स्वस्थ रिश्ते की निशानी माना जा सकता है? शायद नहीं। 'प्रेम-विवाह' से बनने वाले रिश्तों की कसौटी तो कतई नहीं! मेरे विचार में, सारी वैचारिक आधुनिकता और विमर्श के बावजूद लेखक का उक्त कथन देह की जीत का एक पारंपरिक प्रतिमान बनकर उभरता है, जो आज भी हमारे पुरुषवादी मनो-मस्तिष्क पर कायम है। आज भी रिश्तों का यह 'मैल' जितना पुरुष की ओर से अपने विध्वंसक और 'पजेसिव' रूप में प्रकट होता है, उतना स्त्राी की ओर से अभिव्यक्त नहीं होता। पति के विवाहेतर संबंधों पर औरतें आज भी प्रायः स्वयं को आत्मपीड़ा में डुबो लेती हैं। कहानी को ही लें। इसके पात्रा महुआ और हर्षुल, दोनों के संबंधों का भी एक अतीत रहा है, पर हर्षुल से शादी के बाद महुआ उसे अपने वर्तमान तक नहीं लाती, हालांकि विवाह के बाद भी अपने प्रेमी साजिद द्वारा दिलवाई मालाएं संजोए रखना ;एक माला तो वह प्रायः पहने रहती थीद्ध उसके
अवचेतन में कहीं न कहीं 'पुराने संबंध' की मौजूदगी का पता देता है, पर उसके वर्तमान गृहस्थ जीवन पर उसका कोई प्रकट अर्थ नहीं दिखता बल्कि वह तो हर्षुल से इस बात को छिपाए रखने की भरसक कोशिश करती है। यही कारण है कि वह हर्षुल के विवाहेतर संबंधों के बारे में जानकर भी अनजान बनी रहती है। बावजूद इसके, यही अतीत महुआ के वर्तमान पर इस कदर हावी हो जाता है कि उसकी बनी-बनाई गृहस्थी खत्म हो जाती है। हर्षुल का अतीत जो भी रहा हो, उसके वर्तमान दो जरूर हैं, महुआ के साथ शादीशुदा होने के बावजूद वह बिना किसी मलाल और उलझन के अपनी सहकर्मी वर्तिका बनर्जी के साथ 'संबंध' रखे हुए है और महुआ इसे जानती है, पर न तो कभी पत्नी की हैसियत से पूछती है और न ही बाधा बनती है, बल्कि स्वयं को इससे अलग रखती है। शायद खुद भी संबंधों में रह चुकने के कारण उसे पूछना नैतिक नहीं लगता। उसे हर्षुल के इस संबंध के बारे में जानकर गहरा धक्का जरूर लगता है। लेकिन हर्षुल के आगे ज्यों ही महुआ के अतीत का पर्दा खुलता है, उसका पुरुष अहं बुरी तरह आहत होता है, कुछ समय भीतर-भीतर शांत रहने के बाद अंततः वह बिपफर ही पड़ता है और महुआ के पेट में पल रहे ढाई माह के अपने बच्चे तक को निकलवाने को कह देता है। यद्यपि महुआ का इससे इंकार कर देना और होने वाले बच्चे की पूरी जिम्मेदारी खुद ले लेना, आज की स्त्राी की स्वायत्तता और स्वाभिमान को रेखांकित करता है। कहानी का अंतिम वाक्य इसे पूरी तरह पुष्ट करता है। महुआ हमेशा के लिए हर्षुल का द्घर छोड़ते समय ड्राइवर से कहती है, 'हां, अब चलो भैया... लेकिन आराम से। कोई जल्दी नहीं है।' लेकिन यह स्पष्ट है कि सारे बौ(कि विमर्श और अधिकारों की जागरूकता होने पर भी देह और उसकी मांसलता विवेक पर बाजी मार ही लेती है। 'ऐसा क्या है देह में कि उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन मन का सारा रिश्ता-नाता तहस-नहस हो जाता है।' दैहिक शुचिता का यह प्रश्न पूरी कथा में गूंजता है। एक ही 'अपराध' के बावजूद स्त्राी और पुरुष की नैतिकताओं का अंतर 'महुआचरित' से बखूबी समझा जा सकता है।
इस रचना में और भी कई संभावनाएं मौजूद थीं, अगर उन्हें उभारा जाता तो रचना की व्यंजना और गहरी हो सकती थी। यथा, अपनी विवाह पूर्व जिंदगी में साजिद से संबंध रखने के कारण महुआ को गर्भ रह जाता है। जब इस तरपफ उसका ध्यान जाता है तो वह चिंतित हो उठती है। 'दो शब्द' उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बजते हैं- 'कुंआरी मां' और 'मुसलमान बाप'। लेकिन महुआ इस मुद्दे पर चिंतित भर होकर नहीं रह जाती, न ही अचानक बदहवासी भरा कोई कदम उठा लेती है। वह साजिद से अपने संबंध की विभिन्न संभावनाओं पर मजबूती से विचार करती है, जैसे-क्या वह साजिद से शादी कर ले? दो बच्चों का बाप साजिद क्या इस प्रस्ताव को मानेगा? क्या वह धर्म, जाति और ऊंच-नीच के पचड़े में डूबे समाज के सामने एक नए कबीर को जन्म देकर मिसाल पेश करे, जिसका कोई मजहब या जाति न हो, मनुष्यता के अलावा?' लेकिन लेखक ने 'आशा गुप्ता जच्चा-बच्चा केंद्र' में महुआ को गर्भपात के लिए भेजकर उक्त सारी संभावनाओं पर पानी पफेर दिया। सबसे बड़ी बात यह कि महुआ के पति हर्षुल को सिपर्फ इतना पता चल पाया कि उससे विवाह के पहले उसकी पत्नी किसी साजिद के साथ संबंधों में रही थी। बस इसके बाद महुआ की नई बसी गृहस्थी टूट जाती है। अगर महुआ के पूर्व गर्भपात का खुलासा हुआ होता तो! जाहिर है, संबध तो पिफर भी टूटते, लेकिन रचना का 'क्लाईमेक्स' शायद भिन्न होता!
इन कुछ बातों के अलावा निजी तौर पर मुझे यह रचना उतनी मजबूत नहीं लगी, जितनी आजकल चर्चा ;विवादोंद्ध में है अथवा जितनी काशीनाथ जी की अन्य रचनाएं हैं। खासकर सरोकार और वृत्तांत के स्तर पर। हालांकि लेखक का मानना है कि उन्होंने 'इस कहानी के जरिए उस ढांचे को तोड़ने की कोशिश की है, जिस पर पिछले करीब सौ साल से हिंदी कहानियां चल रही थीं।' हो सकता है, लेकिन मेरे विचार से यह रचना अपने 'नए' शिल्प के स्तर भी उतना हॉन्ट नहीं करती, जितना काशीनाथ जी कह रहे हैं, न ही कथ्य वैसा है। बस एक लंबी कहानी को 'लद्घु' उपन्यास के रूप में प्रोजेक्ट करने ;राजकमल प्रकाशन ने कम से कम यही लिखा हैद्ध और कहानी पर कविता का आवरण ओढ़ाने की कोशिश भर लगती है। देह का चित्राण भी आजकल प्रकाशित रचनाओं से अलग नहीं है, जितना विवादों में है। स्वयं काशीनाथ जी की दूसरी रचनाओं में दैहिक चित्राण की कमी नहीं।

 
 
 
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