फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
प्रश्नचिथ पर संवाद

ताकि पिफर कोई लेखिका 'कटद्घरे में' न आए

 
महुआ माजी
 

'पाखी' पत्रिाका के जनवरी २०१३ अंक में पूरे प्रमाण के साथ अपना पक्ष रखते समय सोचा था कि अब और कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, लेकिन उस अंक में मेरे खिलापफ इतनी शिकायतें थीं कि कलम उठाए बिना रहा नहीं गया।
सबसे पहले वरिष्ठ लेखक संजीव जी द्वारा 'मैं बोरिशाइल्ला' के बारे में लिखी गई कुछ पंक्तियों पर गौर करें-

१- 'उनके इस उपन्यास में मेरा भी छोटा ही सही लेकिन अवदान है।'
२- 'यह बात बिल्कुल ठीक है कि कम से कम बीस से पच्चीस लोगों ने इस उपन्यास को ठीक किया है।'
३- 'यदि वह उपन्यास संपादित नहीं हुआ होता तो आज उपन्यास भी नहीं होता।'
४- 'यह उपन्यास तैयार होकर आखिरी बार पढ़ने के लिए मेरे ही पास आया था। दरअसल आप अगर उस पांडुलिपि को देख लेंगे तो मेरे कहने को कुछ नहीं बचेगा, आप खुद ही सब कुछ समझ जाएंगे।'
आदरणीय संजीव जी! जरा स्पष्ट करेंगे कि पाठकों को आप क्या समझाना चाहते हैं?
- क्या 'मैं बोरिशाइल्ला' की पांडुलिपि पर बीस-पच्चीस लोगों की हस्तलिपि में किया गया संशोधन था?
- क्या पांडुलिपि लेखिका की हस्तलिपि में नहीं थीं?
या
-बीस-पच्चीस विद्वानों द्वारा संशोधित-संपादित कर दिए जाने के बावजूद जब वह पांडुलिपि अखिरी बार आपके पास पहुंची तो उपन्यास कहलाने योग्य नहीं थी, इसलिए आपको उसमें कापफी मेहनत करनी पड़ी?
या पिफर
-पहले से बीस-पच्चीस लोगों द्वारा संपादित हो जाने के कारण आपको बहुत कम मेहनत करनी पड़ी?
वैसे, 'हंस' २०१३ जनवरी के संपादकीय में राजेंद्र यादव जी ने तो कहा ही है कि आपने छह महीने लगकर इस उपन्यास का संशोधन, परिवर्(न किया था। तो क्या उन बीस-पच्चीस विद्वानों की हिंदी इतनी खराब थी या साहित्य के बारे में उनकी समझ इतनी दयनीय थी कि वे सब मिलकर भी 'मैं बोरिशाइल्ला' को उपन्यास कहलाने योग्य भी नहीं बना पाए थे?
वैसे आपको तो पता ही होगा कि 'मैं बोरिशाइल्ला' का प्रकाशन पफरवरी २००६ में हुआ था और आपने २००७ से 'हंस' में काम करना आरंभ किया था। इसलिए यह तो तय है कि 'हंस' के दफ्रतर में राजेंद्र यादव जी के सामने बैठकर आपने उस पांडुलिपि का संशोधन नहीं किया। याद कीजिए, शायद आपने यह काम कुलटी में बैठकर किया होगा। यदि ऐसा है, तो पिफर राजेंद्र यादव जी को किसने बताया कि आपने छह महीने तक उस पांडुलिपि पर काम किया है? कहीं आपने तो नहीं? वैसे दिल्ली के कई बड़े लेखकों ने मुझसे भी कहा था कि संजीव जी तो कहते हैं कि 'मैं बोरिशाइल्ला' को उन्होंने ही लिखा है।
अब सवाल यह है कि जब आप जैसे 'वरिष्ठ, गंभीर, सत्यवादी और साहित्य के सत्ता-केंद्रों, मठों से दूर रहने वाले साहित्यकार' यह दावा करे, तो मुझ टुटपुंजिया लेखिका की बात पर कौन यकीन करता कि 'मैं बोरिशाइल्ला' को मैंने लिखा है। इसलिए मैंने चुप रहना ही मुनासिब समझा। दूसरा उपन्यास लिखा। बवाल मचा। इसी बीच गोस्वामी जी ने दावा कर डाला कि 'मैं बोरिशाइल्ला' के सुधारक तो वे हैं। साथ ही यह भी कि 'इसका मूल लेखक कौन?'
अब जिन गोस्वामी जी के बारे में आपने खुद ही इस लेख में लिखा है कि 'श्रवण कुमार गोस्वामी के बारह से ज्यादा उपन्यास आ चुके हैं...।' उन गोस्वामी जी द्वारा संशोधित कर दिए जाने के बाद भी उपन्यास की पांडुलिपि में संशोधन करने लायक कुछ बचता है क्या? और तो और, गोस्वामी जी ने उपन्यास के मूल लेखक पर भी तो सवाल उठा दिया है कि शायद कोई 'डायरी वाला' है... आदि-आदि। अब आपसे तो मेरी इस बारे में कभी बात हुई नहीं, इसलिए चौंकी। दिल्ली के लोग कहते हैं कि आपने लिखा है, संशोधित-संपादित भी किया है..., गोस्वामी जी कहते हैं-संपादन तो उन्होंने किया है और मूल लेखक कोई 'डायरी वाला' है। ऊपर से आपका यह लेख कि बीस-पच्चीस लोगों ने मिलकर इस उपन्यास पर काम किया है...! कुछ तो गोलमाल है भाई! सब गोलमाल है!
यदि गोलमाल नहीं होता तो पृ. ४८ पर आप ;संजीव जीद्ध मेरे दूसरे उपन्यास 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' के बारे में यह कैसे लिखते कि 'जब कृष्णा सोबती जी से मैंने ;संजीव जी नेद्ध पूछा कि आपने ;कृष्णा जी नेद्ध पढ़ा है तो उन्होंने कहा कि अरे इतना बड़ा उपन्यास कौन पढ़ता है। इसके बाद सोबती जी को आधा करके दिया गया। लेकिन कृष्णा सोबती ने तब भी नहीं पढ़ा। बाद में मात्रा तीन पन्नों का दिया गया जिसे उन्होंने पढ़ा है...।'
जबकि 'पाखी' के इसी अंक में पृ. ३७ पर स्वयं कृष्णा सोबती जी ने लिखा है-
'अब ध्यान से सुनिए-मैंने महुआ माजी के उपन्यास को एक गंभीर पाठक की हैसियत से सतर्कता और सजगता से पढ़ा और इसे अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन श्रृंखला से जोड़ा। और हिंदी के इस उपन्यास को न्यूक्लियर रिसर्च और रिएक्टरों के संदर्भ में महत्वपूर्ण पाया। आपकी ओर से बड़बोलेपन की शिकायत न हो तो एटम-रिसर्च पर पढ़ा मेरा पहला उपन्यास श्ठतपहीजमत जींद जीवनेंदक ेनदेश् था जो मैंने पिछली सदी के छठे दशक में पढ़ा था। इसका जिक्र सिपर्फ इसलिए कि 'चालाकी' करने में अपने को बचाने की हरकत के कुछ अर्थ होते हैं।...'
आपकी और कृष्णा जी की परस्पर विरोधी बातों को पढ़कर मैंने खुद कृष्णा सोबती जी से पफोन पर पूछा तो उन्होंने कहा, 'संजीव से मेरी इस बारे में कोई बात ही नहीं हुई है। और मैंने पूरा उपन्यास पढ़ा है।'
वैसे मुझे तो पता ही था कि कृष्णा जी ने मेरा पूरा उपन्यास अत्यंत मनोयोग से पढ़ा है क्योंकि उपन्यास छपने से पहले ही उन्होंने पफोन पर मुझे अत्यंत उदारता से बधाई दी थी और बारीकी से उपन्यास के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करते हुए उसकी तारीपफ की थी। उन्होंने मेरे उपन्यास पर एक या दो पंक्तियां नहीं बल्कि एक लंबी-चौड़ी राय लिखकर
राजकमल प्रकाशन को भेजी थी। पुस्तक लोकार्पण के बाद आशीर्वाद-स्वरूप उन्होंने मुझे एक कलम और माइकल एंजेलो की खूबसूरत-सी किताब भी भिजवाई थी। कृष्णा जी की दी हुई किताब और कलम को पूरे हिंदी साहित्य-जगत का आशीर्वाद समझकर मैंने यत्नपूर्वक अपनी मेज पर सजाकर रखा है। लिखते समय ये दोनों चीजें मुझे ताकत देती हैं, मेरा उत्साहवर्(न करती हैं।
ऐसी स्थिति में कृष्णा जी के बारे में आपका ;संजीव जी काद्ध मंतव्य पढ़कर मुझे बड़ा धक्का लगा। अब तक मैं आपका सम्मान धर्मराज युधिष्ठिर की तरह करती आई थी। आखिर यह ऐसी कौन-सी जंग है, जिसे जीतने के लिए आप जैसे सत्यवादी को बोलना पड़ा-अश्वत्थामा हतः? हालांकि ऐसा भी नहीं है कि यु(भूमि ने आपको हत्यारा बना दिया हो क्योंकि 'पाखी' के पृ. ४७ पर आपने यह भी लिखा है कि 'मैं पिफलहाल चुप इसलिए ही हूं क्योंकि इससे एक संभावनाशील लेखिका की हत्या हो सकती है और मैं इससे बचना चाहता हूं।'
आदरणीय संजीव जी! रणभूमि में उतरने के बाद किसी की हत्या से बचने की कोशिश खुद की जान आपफत में डाल सकती है। इसलिए बेहतर होगा आप पूरा मुंह खोल ही दें। उन बीस-पच्चीस लोंगों का नाम अविलंब सार्वजनिक कर दें
जिन्होंने मिलकर 'मैं बोरिशाइल्ला' को लिखा है, सुधारा है या संपादित किया है क्योंकि अब मैं चाहती हूं कि इस मामले से धुंध पूरी तरह से छंट जाए।
यह मेरा दुर्भाग्य ही है कि जब मैंने अपने उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' का पफाइनल ड्राफ्रट ;हस्तलिखितद्ध राजकमल प्रकाशन को भेजा तब राजकमल ने प्रकाशन-पूर्व का संपादन-कार्य अपने दफ्रतर के किसी संपादक से न कराकर आपसे कराया था। पारिश्रमिक देकर। चूंकि प्रकाशन-पूर्व किसी भी पुस्तक को संपादित करने का या प्रूपफ रीडिंग करने का अधिकार प्रकाशक को होता है इसलिए इसमें मेरी इच्छा-अनिच्छा की कोई गुंजाइश नहीं थी। लेकिन हां, इस बात की जानकारी मुझे तब मिली जब मेरे पास आपकी देखी हुई पांडुलिपि भेजी गई। आपने उसमें कुछ इस प्रकार के संशोधन किए थे-
मेरे द्वारा लिखित-'उ(ार' को आपने 'उद्धार' कर दिया था और 'झोला' को 'थैला'। 'जीसस' को 'जेसस' तथा 'सबों ने' को 'सब ने'।
मैंने लिखा था-'पोखर में छलांग लगा दी।'
आपने उसे काटकर लिखा था-'पोखर में उतर गया।'
मेरी एक पंक्ति थी-'जॉगाई दा के पास पहुंचे और उनके पांव छुए। जॉगाई दा की आंखें छलछला आईं।'
आपने उसे संपादित करके लिखा-'जॉगाई दा के पास पहुंचे। पांव छूकर उठे तो देखा, जॉगाई दा की आंखें छलछला आयी थीं।'
मैंने एक जगह लिखा था-'मैं मन ही मन हिसाब करता रहता कि उसने कितने का खाया।'
इस पंक्ति को आपने कुछ इस तरह से लिखा-'मैं मन ही मन हिसाब लगाता रहता कि उसने कितने का खाया।'
मेरी पंक्ति-'उनका यह छोटो कॉत्ता संबोधन सुन मालिकाना अहसास से मैं गदगद हो उठता था और...' को आपने किया-'उनका यह छोटो कॉत्ता संबोधन सुन मालिकाना अहसास से मैं पफूल जाता और...'
जहां मैंने लिखा था-'तुरंत उस पर कार्रवाई की जाती है'
वहां आपने किया-'उस पर तुरंत कार्रवाई की जाती है'
...आदि-आदि।
संजीव जी, उपन्यास में ऐसे ही कुछ मामूली संशोधन किए थे आपने। कहीं-कहीं तो ढेर सारे पृष्ठों तक एक भी संशोधन नहीं दिखता। पर हां, करीब दो से ढाई लाख शब्दों वाले मेरे उपन्यास में आप ने एक जगह करीब सवा पांच पृष्ठों का पुनर्लेखन जरूर किया था। न किया होता तो शायद मेरे आत्मसम्मान को इतना आद्घात न पहुंचता। मुझे नहीं लगता कि उन सवा पांच पृष्ठों के वाक्यों में हेर-पफेर न करने पर भी उपन्यास की सेहत पर कोई खास असर पड़ता। क्या आपने उन सवा पांच पृष्ठों में इसीलिए हेर-पफेर किया था ताकि पूरे उपन्यास के लेखन का क्रेडिट खुद ले सकें?
आपने मेरी हस्तलिखित पांडुलिपि में जो भी संशोधन किए हैं, वह राजकमल प्रकाशन के पास तो सुरक्षित है ही, मेरे पास भी है। बांग्ला के आंचलिक शब्दों के आपके अपने अल्पज्ञान के कारण आपने मेरी पांडुलिपि में जहां-जहां सही शब्दों को काटकर गलत शब्द लिख दिया था, उन्हें सुधारने के लिए मुझे पुनः पांडुलिपि के एक-एक शब्द को ध्यान से पढ़ना पड़ा था। याद कीजिए, कार्तिक, गणेश लक्ष्मी, सरस्वती समेत एक ेम में बनी मां दुर्गा की प्रतिमा को मेरे द्वारा 'एक चाली में' लिखे जाने को आपने 'चाला द्घर' समझ लिया था। चूंकि आपने बहुत ही कम जगहों पर मामूली शब्दों को सुधारा था या उन्हें आगे-पीछे किया था इसलिए मैंने उन्हें देखते समय लाल स्याही से अपनी पांडुलिपि की जेरॉक्स प्रति में भी नोट कर लिया था। मूल प्रति राजकमल के पास चली गई थी।
अब जबकि आपने अपनी बातों से पूरे साहित्य-समाज को, 'मैं बोरिशाइल्ला' के तमाम पाठकों को गुमराह कर रखा है, इसलिए मैं चाहती हूं कि आपके द्वारा संशोधित पांडुलिपि को अविलंब विशेषज्ञों के सामने रखा जाए ताकि सच्चाई सामने आ सके और मैं अपने ऊपर लगाए गए कलंक से मुक्ति पा सकूं। इसके लिए मैं 'पाखी' और राजकमल प्रकाशन से अनुरोध करती हूं कि वे इस पर पहल करते हुए कुछ तटस्थ और वरिष्ठ साहित्यकारों के सामने मेरी पांडुलिपि को रखकर किसी हस्तलिपि विशेषज्ञ से सच्चाई की जांच करवा लें।
गोस्वामी जी के आरोपों का भी खुलासा मैं उन वरिष्ठ साहित्यकारों के सामने करना चाहूंगी। उन्होंने पांडुलिपि की जिस जेरॉक्स कॉपी को पढ़ा था, वह भी मिल गई हैं। वरिष्ठ लेखक गण खुद अपनी आंखों से देख सकते हैं कि उन्होंने पढ़ते वक्त सिपर्फ और सिपर्फ कुछ वर्तनी ;इकार, उकार, एकारद्ध संबंधी अशु(यिों को ही चिथित किया है और वे इतने कम हैं कि उन्हें खोजते-खोजते हस्तलिपि विशेषज्ञ अवश्य ही थक जाएंगे। गोस्वामी जी ने मेरे उपन्यास में न तो कोई शब्द जोड़ा-द्घटाया है न कोई पंक्ति।
इस पूरे प्रकरण में हिंदी संसार के कुछ लोगों का व्यवहार देखकर वास्तव में दुख होता है। क्या हमारे मित्रा, हमारे वरिष्ठ अपने मन में पल रही शंकाओं से, गलतपफहमियों से मुझे अवगत नहीं करा सकते थे? मुझसे खुलकर बात नहीं कर सकते थे? यदि वे ऐसा करते तो मैं कब की उनके संदेह का निराकरण कर देती। ये तमाम खेल, जो पत्रिाकाओं एवं अखबारों के माध्यम से हो रहे हैं, नहीं होते और हिंदी साहित्य-जगत की इतनी जग-हंसाई भी नहीं होती।
पाठक सोच रहे होंगे, आखिर इतने सारे लोग एक साथ मिलकर मेरे ही पीछे क्यों पड़ गए?
तो पाठको! अगर आप लोगों ने 'थ्री इडियट्स' पिफल्म देखी होगी तो याद कीजिए, उसके एक दृश्य में रैंचो ;आमिर खानद्ध के पफर्स्ट आने पर उसके सबसे करीबी दोस्त पफरहान और राजू कितने दुखी हो उठे थे। पफरहान का 'वॉयस ओवर' था- '''्‌यूमन बिहेवियर के बारे में उस दिन हमने कुछ जाना। दोस्त पफेल हो तो दुख होता है। लेकिन दोस्त पफर्स्ट आए तो बहुत ज्यादा दुख होता है।'
अब बात रांची के धर्मराज दिलीप तेतरवे की। 'पाखी' के पृ. ४३ पर वे कहते हैं-१९९६-९७ के आस-पास मैं उनसे ट्यूशन लेने लगी क्योंकि मुझे हिंदी नहीं आती थी और एक साल से भी अधिक ट्यूशन देने के बाद, उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं बांग्ला या अंग्रेजी में ही लिखूं, हिंदी मेरे वश में नहीं है। हिंदी में लिखने पर मुझे किसी न किसी पर जीवन भर निर्भर रहना पड़ेगा।...
संजीव जी ने भी लिखा है कि 'महुआ एक बांग्ला लेखिका के तौर पर मुझसे पहली बार मिली थी।'
सच तो यह है कि मैंने आज तक बांग्ला में कुछ भी नहीं लिखा है। पढ़ा जरूर है। दरअसल मैंने रांची के एक प्रतिष्ठित मिशनरी स्कूल 'उर्सुलाइन कॉन्वेंट' से मैट्रिक की परीक्षा पास की है। उस स्कूल में बांग्ला की पढ़ाई होती ही नहीं थी। हमारे समय में पूरे झारखंड में ;जो उस समय बिहार का हिस्सा थाद्ध छात्रााओं का सर्वश्रेष्ठ स्कूल उर्सुलाईन कॉन्वेंट, रांची ही हुआ करता था और हिंदी में सर्वश्रेष्ठ अंक उसी स्कूल की छात्रााओं को ही मिला करते थे। स्कूल बोर्ड के रिकॉर्ड से इस बात की पुष्टि थी की जा सकती है। हमारे स्कूल की छात्रााएं आज
प्रोपफेसर, आई.ए.एस., आई.पी.एस., डॉक्टर, इंजीनियर वगैरह-
वगैरह बनकर सिपर्फ हमारे राज्य को ही नहीं बल्कि पूरे देश को गौरवांवित कर रही हैं। हिंदी में अपनी पकड़ का पूरा श्रेय मैं अपने स्कूल की शिक्षिकाओं को ही देती हूं। यह बात सच है कि मैंने एम.ए., पी-एच.डी., यू.जी.सी.नेट वगैरह समाजशास्त्रा में किया है पर चूंकि हमारे यहां समाजशास्त्रा में कोई वैकेंसी नहीं थी और जल्दी शादी हो जाने की वजह से मैं शहर से बाहर नौकरी के लिए जा नहीं सकती थी इसलिए हिंदी साहित्य में अपना ध्यान केंद्रित किया। हमारे शहर के सबसे प्रतिष्ठित हिंदी पुस्तकालय 'पफादर कामिल बुल्के पुस्तकालय' में नियमित रूप से जाने लगी और हिंदी के महत्वपूर्ण लेखकों की कृतियों को, उन कृतियों पर किए गए शोध-कार्यों को मनोयोग से पढ़ने लगी। कालिदास की कृतियों का हिंदी अनुवाद तथा उन पर किए गए शोध-कार्यों को पढ़ने में मुझे सबसे ज्यादा मजा आता था। लाइब्रेरियन रेजिना जी से मैं रोज इतनी किताबें निकलवाती थी कि वे परेशान हो जाती थीं। पुस्तकालय-प्रभारी पफादर मैथियस डुंगडुंग जी भी मेरे पागलपन से अवगत थे। अक्सर उनसे विशेष अनुरोध करके मैं निर्धारित पुस्तकों से ज्यादा पुस्तकें द्घर ले आती और जल्द-से जल्द पढ़कर वापस कर आती। पुस्तकालय के रजिस्टर से मेरी बातों की पुष्टि की जा सकती है। यह सब मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि मेरे
विरोधियों ने मेरे बारे में भ्रामक बातें पफैला रखी हैं। उनकी बातों से ऐसा लगता है जैसे मैं अभी-अभी बंगाल से आई हूं और मुझे हिंदी आती ही नहीं। उपन्यास की भूमिका में तो मैंने लिखा ही है कि मेरे दादा जी १९३२ से रांची में रह रहे थे। मेरा जन्म और मेरी परवरिश रांची में ही हुई है। रांची एक हिंदी प्रदेश है और राधाकृष्ण जी जैसे हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार की कर्मभूमि भी रांची ही रही है।
तेतरवे जी, आपने मेरे दूसरे उपन्यास 'मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ' के बारे में पृ. ४४ में लिखा है-'...यह रचना एक चरम वामपंथी विचारधारा का आलेख मात्रा है। प्रचार सामग्री है।' मगर आपके परम मित्रा रणेंद्र जी ने तो 'नया ज्ञानोदय' में छपी अपनी समीक्षा में इसे वामपंथ-विरोधी, नक्सल-विरोधी और आदिवासी-विरोधी साबित करने की पुरजोर कोशिश की थी। एक ही मिशन पर यु(भूमि के लिए रवाना करने से पहले कमांडर को चाहिए कि वह अपने सभी यो(ाओं को 'पफॉल-इन' की मुद्रा में खड़ा करके 'ऑपरेशनल प्लॉन' के बारे में अच्छी तरह 'ब्रीपफ' कर दे ताकि दुश्मन पर वार करते समय उनके बीच तारतम्य बना रहे। यही यु(नीति है।
वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा जी से मुझे बस इतना कहना है कि मेरे कोई मामा जी मुक्ति यो(ा नहीं थे। और न ही उन्होंने मुझे बांग्लादेश मुक्ति संग्राम पर लिखी कोई डायरी सौंपी थी। मेरे बड़े मामा जी दिलीप द्घोष कोलकाता में पुलिस विभाग में कार्यरत थे। इसका प्रमाण मैं दे सकती हूं। दूसरे मामाओं की परवरिश भी कोलकाता में ही हुई। वे आज भी वहीं रहते हैं। यदि सुधा जी राजी हों तो मैं उन्हें अपने ननिहाल में ले जाकर उन लोगों से मिलवा सकती हूं। उन्होंने जिन स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई की है, वहां ले जाकर रिकॉर्ड निकलवाकर यह भी प्रमाणित कर सकती हूं कि मुक्तियु( से उन लोगों का कोई संबंध नहीं था। आपने लिखा है, दिनेश्वर प्रसाद जी की बेटी नीला जी ने आपसे कहा है कि उनके पिताजी ने मुझे इसी विषय पर लिखा एक उपन्यास पढ़ने के लिए दिया था जिसे मैंने उपन्यास लिखने के बाद, उनके मांगने पर भी नहीं लौटाया। सुधा जी, क्या बांग्लादेश पर हिंदी में ऐसा कोई उपन्यास है जिसे पढ़कर मैं यह उपन्यास लिख सकती हूं? मेरी जानकारी में उस वक्त रॉबर्ट पेन के उपन्यास के हिंदी अनुवाद 'कत्लगाह' के अलावा बांग्लादेश पर कोई उपन्यास था ही नहीं। और यह अनुवाद प्रियदर्शन जी द्वारा किया गया था। प्रियदर्शन जी के पिताजी विद्याभूषण जी से मैंने वह किताब ली थी और उसका जेरॉक्स करके उन्हें वापस कर दिया था। वह जेरॉक्स प्रति अब भी मेरे पास है।
सुधा जी ने यह भी लिखा है कि 'यु(भूमि में गए बगैर कोई भी लेखक-वह पुरुष हो या स्त्राी, यु( का इतना प्रामाणिक विवरण लिख नहीं सकता।'
संजीव जी ने भी लिखा है, 'अगर महुआ बांग्लादेश कभी गई ही नहीं तो वहां के छोटे-छोटे ब्यौरे उसने अपने उपन्यास में कैसे इस्तेमाल कर लिए।'
सुधा जी, संजीव जी और भी कई और लोगों के मन में यही सवाल है। शायद इसीलिए वे इसे मेरी रचना मानने से इंकार कर रहे हैं। अब मैं आप लोगों को दो-चार दृष्टांत देती हूं। विश्वविख्यात उपन्यास 'अराउंड द वर्ल्ड इन एट्टी डेज' में लेखक ने अपने पात्राों से मात्रा अस्सी दिनों में धरती का पूरा एक चक्कर लगवाया है। वह भी बिना हवाई जहाज के। दुनिया के विभिन्न देशों से होकर गुजरने की यह यात्राा इतनी प्रामाणिक और कथारस से भरपूर है ;विशेष रूप से भारत से गुजरने के दृश्य और द्घटनाएंद्ध कि यकीन ही नहीं होता कि इस पुस्तक के लेखक ने बिना उन देशों में गए उसे लिखा होगा। लेकिन यह एक सच्चाई है।
तोलस्तॉय ने 'वार एंड पीस' में यु(भूमि के इतने प्रामाणिक दृश्य कैसे दिए? क्या वे अपने पिछले जन्म में नेपोलियन के साथ यु( में शामिल हुए थे?
'झूठा-सच' के लेखक यशपाल का बचपन अवश्य ही लाहौर में बीता था, लेकिन भारत-विभाजन के समय वे वहां नहीं थे। और न ही गए। उन्होंने अपनी आंखों से विभाजन की त्राासदी नहीं देखी थी। पिफर भी लखनऊ में बैठकर उन्होंने विभाजन की त्राासदी पर इतना बड़ा, इतना प्रामाणिक और महत्वपूर्ण उपन्यास लिखा।
दूूसरे ग्रहों में रहने वाले एलियंस को किसी ने देखा नहीं है पिफर भी इतनी प्रामाणिक पिफल्में बनाई जाती हैं।
लेखकों में, कलाकारों में परकाया-प्रवेश की क्षमता तो होनी ही चाहिए, उन दृश्यों को 'विजुलाइज' करने की क्षमता भी होनी चाहिए जिस पर वह काम कर रहा होता है। वर्ना वह लेखक कैसा? यथार्थ और कल्पना के मिश्रण से ही तो साहित्य-सृजन होता है। वर्ना हत्या के दृश्यों को लिखने से पहले हर लेखक को हत्यारा बनना पड़ता। मेरे लिए
बांग्लादेश पर लिखना आसान इसलिए हुआ क्योंकि मैं
बांग्लादेश से सटे पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में बराबर जाती रही हूं। गले तक पानी में डूबे हुए जूट और धान के खेत, पान-बोरोज, ऊंचे टीलों पर बने मिट्टी के द्घरों का समूह, बांस के मचान पर पफैले कोंहड़े, लौकी के लत्तर... टीलों के हर ढलान के नीचे पानी से लबालब पोखर, संकरी पगडंडियों के दोनों ओर तालाबों पर झुके हुए नारियल, ताड़ के पेड़... केले के पेड़ के तनों से बने भैला या छोटी नावों में बैठ सुबह-सुबह तालाबों से कमल पफूल तोड़ते मालाकार... बैलगाड़ियां... गोधूलि वेला में मवेशियों को हांकते हुए द्घर लौटते राखाल बच्चे... ठीक वैसे, जैसे मेरी दादी, नानी बताया करती थीं बांग्लादेश के बारे में, ठीक वैसे जैसे उत्तम कुमार, सुचित्राा सेन, सुप्रिया देवी या माधवी देवी अभिनीत अनगिनत बांग्ला पिफल्मों में देखा था मैंने... ठीक वैसे जैसे उपन्यास के लिए साक्षात्कार लेते वक्त अनगिनत मुक्ति यो(ाओं ने बताया था मुझे...
एक 'कोलाज' ही तो है 'मैं बोरिशाइल्ला'। अनगिनत दृश्यों... अनगिनत द्घटनाओं... अनगिनत आत्मकथाओं... अनगिनत विचारों का कोलाज! मैंने तो सिपर्फ उन्हें सलीके से सजा दिया है शब्दों के कैनवस में! लोग समझते हैं किसी की डायरी होगी। क्या किसी एक व्यक्ति का जीवन इतना वैविध्यपूर्ण हो सकता है? एक मुक्ति यो(ा लड़ेगा या महाभारत के संजय की तरह पूरे देश-विदेश में द्घटती राजनीतिक
सांस्कृतिक द्घटनाओं की जानकारी ले-लेकर रोज अपनी डायरी के पन्ने काले करेगा। उस वक्त न इंटरनेट था और न ही संचार के इतने सारे साधन। अस्त्रा-शस्त्राों से लैस होकर पानी में डूबे अंचलों में शक्तिशाली पाकिस्तानी सैनिकों से बचते-बचाते, नदी-नाला, कीचड़ और दलदली जमीन पर इधर से उधर भागते हुए, मूसलाधार बारिश में भीगते हुए नाव-बजरे में द्घूम-द्घूमकर गुरिल्ला यु( करते उन मुक्ति यो(ाओं को कुछ लिखने की पफुर्सत और सुविधा थी ही कहां? अरे, उन मुक्ति यो(ाओं के पास तो अक्सर लालटेन या मिट्टी तेल तक नहीं हुआ करते थे कि रात को पफुर्सत में बैठकर कुछ लिख-पढ़ सके। चूंकि मुझे विस्तार में बांग्लादेश की कथा कहनी थी, विभाजन की त्राासदी दिखलानी थी, सांस्कृतिक,
राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक बदलावों को दिखलाना था, इसलिए अपने एक-एक पात्रा में सैकड़ों पात्राों के जीवन की द्घटनाओं को इस तरह से पिरो दिया कि कोई भी महत्वपूर्ण द्घटना छूट न जाए। ;हांलांकि अब भी मैं यह दावा नहीं करती कि बांग्लादेश-त्राासदी से जुड़े सभी पक्षों को मैं सामने ला पाई हूं।द्ध उन सैकड़ों पात्राों में कुछ पात्रा तो पहले से हमारे परिचित थे पर कुछ पात्राों को लेखन के क्रम में खोजना पड़ा। यदि कोई उन पात्राों से मिलने को इच्छुक हों तो उन लोगों से तो उन्हें मिला ही दूंगी जिन्हें अपना परिचय देने में कोई आपत्ति नहीं है। चूंकि केष्टो के ननिहाल के दंगे का दृश्य मैंने अपनी मां के ननिहाल के दंगे की द्घटना से प्रभावित होकर लिखा है इसलिए उस द्घटना के साक्षी रहे कुछ लोगों से तो मैं बड़ी
आसानी से मिलवा सकती हूं। असली गांव का नाम आदि भी बता सकती हूं।
ऐसा नहीं है कि 'मैं बोरिशाइल्ला' मेरी पहली कथा-कृति है। 'मैं बोरिशाइल्ला' के छपने से पहले मेरी कुछ कहानियां हिन्दी मुख्यधारा की पत्रिाकाओं में छप चुकी थीं। २००१ में 'कथादेश' के नवलेखन अंक में 'मोइनी की मौत', सहारा समय में 'उपफ ये नशा कालिदास!' और 'हंस' में कहानी 'मुक्तियो(ा' आदि। मुक्ति यो(ा कहानी 'मैं बोरिशाइल्ला' लिखने के दौरान उसी से कुछ थीम उठाकर लिखी थी, पाठकों की राय जानने के लिए। यह सोचकर कि यदि पाठकों को यह पसंद आ जाए तो समझूंगी, 'मैं बोरिशाइल्ला' भी पसंद आएगा।
मैंने इतनी मेहनत से इतनी ईमानदारी के साथ 'मैं
बोरिशाइल्ला' लिखा पर अनाड़ीपन में कुछ गलतियां कर बैठी। उपन्यास लिखने के बाद शुरुआती उत्साह और जिज्ञासावश आस-पास के कुछ लोगों को अपना उपन्यास पढ़ने के लिए दे दिया। सबसे पहले मैंने अपने उपन्यास की पांडुलिपि रविभूषण जी को दी। उन्होंने अपना कीमती वक्त लगाकर उसे पढ़ा। उन्होंने उसमें कोई संशोधन, परिवर्(न तो नहीं किया मगर पांच-सात जगहों पर कुछ कमेंट्स अवश्य लिख दिए जिन्हें मैं हू-ब-हू आप लोगों के सामने रख रही हूं-
-'द्घटनाओं का उपन्यास की मूल थीम से संबंध आवश्यक।'
-'विस्तार नहीं।'
-'स्थानों के वर्णन में ;मुंबई आदिद्ध पर पुनर्विचार।'
-'केष्टो की आत्ममुग्धता।'
-'अतीत की अधिक चर्चा।'... आदि।
उपरोक्त पंक्तियां मेरी पांडुलिपि के हाशिए में रविभूषण जी की हस्तलिपि में मौजूद हैं जिन्हें मैं वरिष्ठ साहित्यकारों को दिखाना चाहूंगी। संजीव जी और गोस्वामी जी ने क्या किया यह भी उन्हें दिखाकर मैं जल्द से जल्द इस झंझट से मुक्त होना चाहूंगी। साथ ही पूरी दृढ़ता के साथ यह भी कहना चाहूंगी कि इनके अलावा किसी और ने मेरे उपन्यास में कुछ भी नहीं किया।
और हां, संजीव जी ने जिन बीस-पच्चीस लोगों का जिक्र किया है, उन्हें भी उन वरिष्ठ साहित्यकारों के सामने हाजिर करने की दरख्वास्त करूंगी ताकि वे उनसे पूछ सकें कि उन्होंने इस उपन्यास में क्या काम किया है।
मैं वरिष्ठ साहित्यकारों के सामने किसी भी सवाल का जवाब देने को पूरी तरह से तैयार हूं क्योंकि मैं बोरिशाहल्ला के एक-एक शब्द को मैंने द्घंटों चिंतन-मनन करके ही लिखा है। मुझे पता है कि मैंने किस व्यक्ति से, कहां से कौन सी जानकारी ली है। कौन-सी कविता, लोकोक्ति, या गीत कहां से ली गई है। उपन्यास में दो पंक्तियां हैं-एइ बांगालिर दुर्गा पूजा? ऊपोरे चिक्कोन चाक्कोन आर तॉले पुआल गोंजा?
क्या संजीव जी द्वारा बताए गए बीस-पच्चीस लोगों की मंडली में से कोई व्यक्ति यह बता पाएगा कि मेरे उपन्यास में ये पंक्तियां कहां से आईं?
या पिफर प्रशिक्षण-शिविर में एक दूसरे के साथ कविता का खेल खेलते मुक्ति यो(ाओं की कविताएं मैंने कहां से लीं?
कौन सा मुहावरा कहां से लेकर डाला है। किस स्थान के वर्णन में किस स्थान की प्रकृति का इस्तेमाल किया है, बता सकता है कोई? ढाका में क्रैकडाउन के बाद पाक पफौजियों से बचते-बचाते केष्टो और आलम को जिन-जिन रास्तों से गांव-देहात, जंगल, नदी-नाला पार करवाकर बोरिशाल ले गई, उन जटिल रास्तों को खोजने में, उनका प्रामाणिक चित्राण करने में मुझे क्या-क्या करना पड़ा, किन-किन लोगों से, किन-किन मानचित्राों से, दस्तावेजों से मदद लेनी पड़ी, बता सकता है कोई?
मैं बता सकती हूं। सब कुछ बता सकती हूं। ऐसे में कोई झूठा दावा करने वाला व्यक्ति कैसे मेरा सामना कर पाएगा? इसीलिए तो मैं चाहती हूं कि वे आएं और मेरे सामने मुंह खोले। ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए और भविष्य में किसी भी नई लेखिका के खिलापफ इस तरह का षड्यंत्रा करने की जुर्रत न करे कोई। मैं यह लड़ाई सिपर्फ अपने लिए नहीं, भविष्य की तमाम लेखिकाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए लड़ रही हूं ताकि पिफर कभी कोई किसी लेखिका की प्रतिभा को शक के 'कटद्घरे में' खड़ा न कर सके। इस तरह से उनका अपमान न कर सके। अतः एक बार पिफर हिंदी समाज के वरिष्ठ जनों से, 'पाखी' और राजकमल प्रकाशन से मेरा विनम्र अनुरोध है कि जल्द से जल्द वे एक समिति का गठन करें जो स्वतंत्रा और निष्पक्ष रूप से समस्त पांडुलिपियों का अवलोकन और आरोपों तथा प्रत्यारोपों की जांच करते हुए किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचे। मेरे लेखन पर यह जो शंका प्रकट की गई है, उसका निराकरण हो और यह मामला अंतिम रूप से समाप्त हो ताकि मैं शांतिपूर्वक अपना लेखन-कार्य कर सकूं। इस समूचे प्रकरण से मुझे अत्यंत मानसिक पीड़ा है और मैं शीद्घ्रातिशीद्घ्र इससे मुक्ति पाना चाहती हूं। हिंदी समाज के विवेक पर मुझे पूरा भरोसा है और उसका निर्णय मुझे स्वीकार्य होगा। वैसे यह सब लिखकर मैं स्वयं को कापफी हद तक तनावमुक्त महसूस कर रही हूं।
अंत में उन सभी महानुभावों के प्रति हार्दिक आभार, जिन्होंने इस कठिन समय में मुझ पर विश्वास किया। मेरे साथ खड़े हुए और इस जंग को लड़ने में मेरी मदद की।
१४ जनवरी २०१३

 
 
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