फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
प्रश्नचिथ पर संवाद

महुआ माजी के कमजोर तर्क

 
रूपसिंह चंदेल
 

महुआ के उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' और उनके मामा की चर्चा २००७ में ही शुरू हो चुकी थी। लेकिन श्रवण कुमार गोस्वामी जी के आलेख ने गुपचुप होने वाली चर्चा को मुखर कर दिया। उस चर्चा के उत्तर में महुआ माजी ने जो तर्क दिए हैं मैं यहां उन पर ही अपनी प्रतिक्रिया केंद्रित करूंगा।
स्पष्टीकरण में महुआ माजी के तर्क बहुत ही कमजोर हैं। उन्होंने अपने सगे मामाओं का जो विवरण दिया वह सच ही होगा, लेकिन मामा से अर्थ केवल सगे मामा से ही नहीं होता। तमाम लोग रिश्ते में मामा होते हैं। उनका यह कहना कि यु( के दौरान कोई डायरी कैसे लिख सकता है। उन्हें जानकारी होनी चाहिए कि यु( के दौरान डायरियां लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। द्वितीय विश्वयु( के दौरान कितने ही लोगों ने डायरी लिखीं। बड़े अपफसरों ने ही नहीं छोटे सैनिकों ने भी लिखी और ऐसी ही एक अमेरिकी सैनिक की डायरी का उल्लेख हावर्ड पफास्ट के उपन्यास के यु( संवाददाता नायक द्वारा किया गया है, हावर्ड पफास्ट के सभी उपन्यास तथ्यों पर आधारित हैं।
महुआ माजी कहती हैं कि तोलस्तॉय 'यु( और शांति' लिखने से पहले नेपोलियन के साथ यु( नहीं लड़े थे। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके पिता उस यु( में शामिल हुए थे और लियो तोलस्तॉय १८१२ के उस यु( से इतना प्रभावित थे कि वह उस पर लिखना चाहते थे और यु( क्या होता है इसे अपनी आंखों से देखने-जानने के लिए वह स्वेच्छा से सेना में भर्ती हुए थे। उनके बड़े भाई पहले से ही सेना में कमीशंड अपफसर थे। उन दिनों रूस में द्घर के एक युवक को सेना में भर्ती होना पड़ता था और लियो के बड़े भाई पहले ही जा चुके थे। अतः लियो तोलस्तॉय अपनी इच्छा से गए थे। किसी काउंट को सुख-सुविधा का जीवन छोड़कर सेना में जाने की क्यों आवश्यकता अनुभव हुई खासकर चेचन्या के ंट पर जहां चेचन लोगों के साथ निरंतर यु( होते रहते थे। लियो को कोई कमीशन लंबे समय तक नहीं मिला था। अपना खर्च वह स्वयं द्घर से मंगाए पैसों से करते थे। कपड़े-द्घोड़ा आदि अपनी जेब से खरीदा था। उस दौरान वह जिस कज्जाक गांव में रहे उसे केंद्र में रखकर उन्होंने 'कज्जाक' की रचना की और जो यु( उन्होंने देखा-जिया उस अनुभव का उपयोग उन्होंने 'यु( और शांति' और 'हाजी मुराद' में किया था। महुआ को यह भी मालूम होना चाहिए कि तोलस्तॉय ने पुनरुत्थान लिखते समय कितनी ही बार कोर्ट की कार्रवाई स्वयं देखी थी। तोलस्तॉय के विषय में कुछ लिखने से पहले महुआ को 'हेनरी ट्रायट' और विक्टर श्लोश्की द्वारा लिखी उनकी जीवनी अवश्य पढ़ लेनी चाहिए थी।
महुआ यशपाल के 'झूठा सच' का हवाला देती है। उनको पता होना चाहिए कि यशपाल लाहौर के चप्पे-चप्पे से परिचित थे और दिल्ली-अमृतसर आदि से भी। उन्होंने एक क्रांतिकारी का जीवन जिया था। विभाजन की त्राासदी को उन्होंने भोगा भले नहीं, लेकिन देखा भी नहीं यह महुआ माजी कैसे कह सकती हैं। उपन्यास का बड़ा हिस्सा दिल्ली केंद्रित है। विभाजन पर द्रोणवीर कोहली का उपन्यास 'शाह कैंप' क्या महुआ माजी ने पढ़ा है? वह उपन्यास कोहली द्वारा भोगा यथार्थ है। 'झूठा सच' के बाद विभाजन की त्राासदी पर वह एक उल्लेखनीय उपन्यास है न कि भीष्म साहनी का 'तमस'। भीष्म जी का श्रेष्ठतम उपन्यास है 'मैयादास की माड़ी'। महुआ माजी को शायद जानकारी नहीं कि स्पार्टकस ;अमृतराय जी ने जिसका अद्भुत अनुवाद 'आदि विद्रोही' नाम से किया थाद्ध लिखने से पूर्व हावर्ड पफास्ट ने रोम ही नहीं यूरोप के अन्य देशों की यात्राा करके तथ्य एकत्रा किए थे और उसके बाद ही वह अद्भुत उपन्यास लिखा गया था। कन्नड़ के चर्चित लेखक एस.एल.भैरप्पा ने १९९३ में साक्षात्कार के दौरान मुझे बताया था कि 'पर्व' लिखने से पूर्व उन्होंने हस्तिनापुर, दिल्ली, कुरुक्षेत्रा और उसके आस-पास के क्षेत्राों की धूल छानी थी। मदन दीक्षित किशोरावस्था से ही भंगियों की बस्ती में रहे थे तभी वह 'मोरी की ईंट' जैसा उपन्यास लिख सके थे। महाश्वेता देवी ने आदिवासियों के जीवन पर द्घर बैठे ही नहीं लिखा। सैकड़ों उदाहरण हैं।

 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)