फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
प्रश्नचिथ पर संवाद

बात निकली तो बहुत दूर तक चली गई

 
श्रवण कुमार गोस्वामी
 

दिसंबर २०१२ के 'पाखी' में मैंने अपनी डायरी का उल्लेख किया है। महुआ माजी १६ जुलाई २००४ को पहली बार अपनी 'मैं बोरिशाइल्ला पोला' की पांडुलिपि लेकर आई थीं। उनका अंतिम बार आगमन ५ दिसंबर २००४ को हुआ। इस दौरान मैंने उनकी पांडुलिपि पर लगभग एक हजार से अधिक पृष्ठों का संशोधन किया, लेकिन न तो वह इस द्घटना को स्वीकार करती हैं और न इंकार ही करती हैं। १४२ दिनों तक उनकी पांडुलिपि जो किस्तों में मुझे मिली थी। उनकी दृष्टि में इतने दिनों में मैंने केवल 'इकार-उकार' की छोटी-मोटी अशु(यिां दिखी होंगी तो उन्हें रेखांकित कर दिया होगा। ये बहुत 'माइन्यूट' चीजें थीं। इसे प्रकाशक अपने प्रूपफरीडर से ठीक करवा लेते हैं। गोस्वामी जी ने न तो कोई पंक्ति बदली, न कोई वाक्य।'
गनीमत है कि आपने इतना स्वीकार करने की अनुकंपा तो की कि मैंने बस इतना ही काम किया था। चलिए, कम से कम इसे आप 'माइन्यूट' तो मान रही हैं न? काश! आप यह भी जान लेती कि इस 'माइन्यूट' का कितना महत्त्व होता है।
महुआ ने यह भी कहा-'क्या कोई बुजुर्ग साहित्यकार इतना षड्यंत्राकारी और निर्मम हो सकता है?
इस प्रकरण के बाद अब भविष्य में शायद ही कोई नई लेखिका किसी वरिष्ठ साहित्यकार के पास साहित्य संबंधी जिज्ञासा लेकर जाने की हिम्मत कर पाएगी। भारत जैसे एक ऐसे देश में, जहां एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को उदारता के साथ ज्ञान हस्तांतरित करती आई है, ऐसा दृष्टांत अत्यंत निराशाजनक है। सम्मान पाने का अधिकारी वही होता है, जिसका आचरण सम्मान पाने योग्य होता है।'
महुआ जी, इस आचरण प्रमाण-पत्रा के लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूं। अब बड़े धैर्य के साथ आप मेरी भी कुछ बातों को सुनने का कष्ट करें।
महाभारत का एक पात्रा है-संजय। इस संबंध में जो कहा गया है वह इस प्रकार है-
'जब दोनों ओर से यु( की तैयारियां पूरी हो चुकीं और दोनों पक्षों की सेनाएं कुरुक्षेत्रा में जा डटीं, उस समय महर्षि वेद व्यास जी ने संजय को दिव्य दृष्टि का वरदान देते हुए धृतराष्ट्र से कहा-'राजन! यह संजय तुम्हें यु( का वृत्तांत सुनाएगा। संपूर्ण यु( क्षेत्रा में कोई भी ऐसी बात न होगी, जो इससे छिपी रहे। वह दिव्य दृष्टि से संपन्न और सर्वज्ञ हो जाएगा। सामने की अथवा परोक्ष की, दिन में होने वाली या रात में होने वाली और मन में सोची हुई बात भी इसे मालूम हो जाएगी। इतना ही नहीं, शस्त्रा इसे काट नहीं सकेंगे, परिश्रम से इसे थकान नहीं मालूम होगी और यु( से वह जीता-जागता निकल आएगा।'
महुआ जी, न तो मेरे पास कोई सुसाधनसंपन्न अपना कोई जनसंपर्क विभाग है और न मेरे पीछे चलने वाले समर्थकों का कोई गुट ही है। मैंने कभी भी अपने द्घर में पत्राकारों को जमा नहीं किया है। अगर किसी पत्राकार ने मुझसे मिलने या मेरे साक्षात्कार की दृष्टि से मेरे द्घर आना चाहा तो मैंने उन्हें बराबर सहयोग ही किया है। हां, दो पत्राकार आपके बारे में कुछ बातें करने के लिए मेरे पास आए थे। उनसे मैंने यह पूछा था कि क्या आपने महुआ माजी के दोनों उपन्यासों को पढ़ा है। जब दोनों ने स्वीकार कर लिया कि उन दोनों ने ही आपके उपन्यासों को नहीं पढ़ा है, तो मैंने उनसे कोई बात नहीं की। इस कारण यदि आपको कोई असुविधा हुई हो, तो उसके लिए मैं क्या कर सकता था। आप जिस ईमानदारी की प्रतीक्षा अब तक करती आ रही हैं, आपको यह जानकर अच्छा ही लगेगा कि आपकी प्रतीक्षा के खत्म होने का समय अत्यंत निकट ही आ रहा है।
'पाखी' के दिसंबर २०१२ और जनवरी २०१३ अंक के
प्रकाशन के बाद जैसे-जैसे तथ्य लोगों के समक्ष आए हैं, उन्हें जानकर मुझे बहुुत ताज्जुब लग रहा है। मैंने तो कभी यह सोचा भी नहीं था कि मेरे इस लेख 'महान लेखक बनते ही नहीं, बनाए भी जाते हैं' के पेट में कैसे-कैसे रहस्य छुपे होंगे। अब सब कुछ लगभग स्पष्ट हो चला है। कुछ लोगों ने इसे महिला लेखन के विरोध का जामा पहनाकर मुझे अपमानित करने का प्रयास भी किया। यह देखकर संतोष हुआ कि लेखिकाओं ने ही इस मुहिम को सही दिशा में मोड़कर यह प्रमाणित कर दिया कि लेखिकाओं में आज उनकी संख्या ज्यादा है, जो सत्य और तथ्य के पक्ष में खड़ी हैं। सुधा अरो़ड़ा जी ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है-'कुछ लेखिकाएं महुआ की सुंदरता और महिला होने को इसका कारण मानकर गोस्वामी जी पर हमले कर रही हैं और मुद्दे को भटकाने की कोशिश कर रही हैं, यह आपत्तिजनक है।'
जब से 'पाखी' के दिसंबर २०१२, जनवरी २०१३, तहलका ३१ दिसंबर २०१२, दैनिक जागरण ;रांचीद्ध के कुछ अंक तथा दैनिक भास्कर ;रांचीद्ध के कुछ अंक प्रकाशित हुए हैं, तब से महुआ माजी केवल एक ही राग आलाप रही हैं-'मैं ही 'मैं
बोरिशाइल्ला' की मूल लेखिका हूं। मेरे पास सारे प्रमाण मौजूद हैं। उनके कोई मामा न तो बांग्लादेश के मुक्ति यु( में शरीक थे और न उन्होंने महुआ माजी को कोई पांडुलिपि या डायरी दी थी। उनकी सपफलता से चिढ़कर ही लोग उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। बाकी सारे लोग झूठ बोल रहे हैं और महुआ माजी जो बोल रही हैं, वह केवल सच और केवल सच बोल रही हैं। लेकिन वह एक छोटी सी बात नहीं समझ पा रही हैं कि जहां कोई धुआं दिखता है, वहां आग का अस्तित्व भी अवश्य होता है। इस कार्य-कारण संबंध को भी वह नकारने की लगातार कोशिश कर रही हैं। दिनेश्वर प्रसाद भी झूठ बोल रहे हैं ;थेद्ध और उनकी पुत्राी नीला प्रसाद भी झूठ बोल रही हैं। सारी नगरिया, सारी दुनिया झूठ बोल रही है, केवल महुआ माजी सच और केवल सच बोल रही हैं!
मैं पिफर 'मैं बोरिशाइल्ला' पर आता हूं।
महुआ माजी आपने अपनी उम्र छिपाकर भी यह सि( कर दिया है कि केवल आप ही सच्ची हैं और आपके जीवन में जो कुछ भी है, उसमें 'गोपन' का कोई स्थान नहीं है। आपकी इस नीति पर मैत्रोयी पुष्पा जी ने उचित ही टिप्पणी की है। किसी पुरुष के द्वारा किसी महिला से उसकी आयु नहीं पूछनी चाहिए। ऐसा करना शिष्टाचार के विरु( माना जाता है। चूंकि अब आप एक प्रसि( लेखिका मानी जा रही हैं, इसलिए आपके संबंध में कुछ लोग सब कुछ जानना चाहते होंगे ताकि वे आपको जन्मदिन की शुभकामना भी दें या भेज सकें। मगर आपके इस रुख से लोगों को निराशा हुई। इसी सिलसिले में आपका बायोडाटा किसी के पास देखने को मिला। इससे पता चला कि आपकी जन्मतिथि १० दिसंबर १९६४ है। आपने बांग्लादेश की राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या पर जो उपन्यास लिखा है, उसका कालखंड १९४०-१९९२ है। इस उपन्यास को राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली ने २००६ में प्रकाशित किया है। लेकिन आपने यह कहीं नहीं लिखा है कि उस उपन्यास का नाम 'मैं बोरिशाइल्ला' है और यह बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम से भी संबंधित है।
चलिए, जरा इस उपन्यास पर भी थोड़ा विचार कर लिया जाए-'मैं बोरिशाइल्ला' पृष्ठ १८१ के अनुसार '७ मार्च को ढाका रेसकोर्स के विशाल मैदान के मंच पर शेख मुजीब जी उपस्थित हुए सपफेद कुर्ता-पाजामा, काली बंडी और काले मोटे ेम का चश्मा पहने करिश्माई व्यक्तित्व के स्वामी, साढ़े सात करोड़ बंगवासियों के उस प्रिय नेता को देख मैं अभिभूत हो उठा, जिनके आह्वान पर वहां उस दिन दस लाख से अधिक लोग खिंचे चले आए थे। ओजपूर्ण और भावविह्वल कंठ से उन्होंने बंगवासियों को संबोधित करते हुए कहा, 'मेरे भाइयो! हम लोगों ने रक्त दिया है, हम और रक्त देंगे। ...एबारेर शौंग्राम मुक्तिर शौंग्राम... एबारेर शौंग्राम शाधीनोतार शांग्राम... यदि मैं आदेश न भी दे पाऊं तो भी द्घर-द्घर में दुर्ग खड़ा कीजिएगा। हमारे पास जो कुछ भी है उसी से शत्राुओं का मुकाबला करना होगा। पूर्वी पाकिस्तान की सात करोड़ जनता को दबाकर नहीं रखा जा सकता...।'
यह द्घटना है ७ मार्च १९७१ की है। इसके बाद ही ढाका में क्रैकडाउन की खूनी वारदात होती है और बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम का वास्तविक प्रारंभ भी हो जाता है। इसके बाद जितनी द्घटनाएं होती हैं, उनका लोमहर्षक वर्णन इस उपन्यास में मिलता है। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि महाभारत के संजय ही इस मुक्ति संग्राम की द्घटनाओं का वृतांत स्वयं देखकर सबको सुना रहे हैं।
यहां जरा इसे भी याद कर लें कि तब महुआ माजी की क्या उम्र रही होगी। उनका जन्म १०-१२-१९६४ में हुआ था। इस प्रकार ७ मार्च १९७१ को वह केवल ६ वर्ष २ महीने २८ दिनों की थी। ७ मार्च १९७१ से द्घटित सभी द्घटित द्घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी विवरण अपने कथित उपन्यास में उन्होंने देना शुरू कर दिया।
संजय को जो दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी, उसके सहारे वह धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्रा में हो रही द्घटनाओं का विवरण सुना सकते थे और उन्होंने यह काम किया भी था। लेकिन महुआ माजी तो संजय से भी उच्चतर कोटि की दिव्य दृष्टि प्राप्त कर आई हैं। उसकी अतिरिक्त योग्यता यह है कि वह भूतलक्षी प्रभाव से विगत की द्घटनाओं का भी विवरण दे देती हैं। इसका सीधा अर्थ यही है कि महुआ अपने जन्म काल के पूर्व के गांवों, नदियों, वहां के विभिन्न स्तर के व्यक्तियों के जन-जीवन, नावों, स्टीमरों, खान-पान, महंगाई, पर्व-त्यौहार, पोशाकों, अमीरी-गरीबी आदि के बारे में सब कुछ लिखकर दिखा देती है। ऐसी प्रतापी हैं हमारी महुआ माजी जिनके बारे में कहा जाना चाहिए 'न भूतो न भविष्यति'। ताज्जुब है कि ऐसी करिश्माई महिला का नाम अब तक 'गिनीज बुक ऑपफ वर्ल्ड रेकार्ड्स' में क्यों नहीं शामिल हो सका है? इसके संचालकों को इस भूल को सुधारने के लिए शीद्घ्रातिशीद्घ्र त्वरित गति से कार्रवाई करनी चाहिए और इस चूक के लिए आज ही महुआ माजी से मापफी भी मांगनी चाहिए!
जब यशपाल पाकिस्तान गए बिना 'झूठा सच' लिख सकते हैं और उनके उपन्यास को सर्वमान्य स्वीकृति मिल सकती है तो महुआ माजी को बांग्लादेश गए बिना 'मैं बोरिशाइल्ला' लिखने और उसे प्रकाशित करवाने और तरह-तरह के पुरस्कार तथा सम्मान प्राप्त करने से कौन रोक सकता है? अगर किसी में दम है तो वह 'मैं बोरिशाइल्ला' जैसा उपन्यास लिखकर दिखा दे!
सबसे मजे की बात यह है कि जब महुआ माजी ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम पर ऐसा विस्मयकारी और प्रभावशाली उपन्यास लिख दिया, जिसके वर्णन को देखकर महाभारत के संजय को भी अवश्य शर्म आने लगी होगी कि वह तो कुरुक्षेत्रा के महायु( का भी वैसा विस्तृत वर्णन धृतराष्ट्र के समक्ष नहीं उपस्थित कर सके थे, जैसा कि महुआ माजी ने करके दिखा दिया है, वह भी केवल ६ वर्ष २ महीने २८ दिनों की उम्र से ही उन्होंने बांग्लादेश के सुदूर गांवों के भीतरी क्षेत्राों का भी रहस्योद्द्घाटन करना शुरू कर दिया था। अवश्य उन पर सरस्वती की कोई विशेष कृपा दृष्टि रही होगी। नहीं, नहीं ऐसा कहना बिलकुल गलत होगा। वह तो स्वयं सरस्वती ही हैं!
अब जरा स्वाद बदलने के लिए थोड़ी चर्चा 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' की भी हो जाए। शशिभूषण द्विवेदी का प्रश्न है-'मैं बोरिशाइल्ला' को छोड़िए, 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' का मूल लेखक कौन है? इंटरनेट, एनजीओ की रिपोर्ट या कोई और? क्योंकि इस उपन्यास ;?द्ध में भी आपने कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा लेकर भानुमति का कुनबा जोड़ा है और इसे कोई भी सामान्य पाठक आसानी से पकड़ सकता है। मापफ करें, यहां मैं प्रायोजित समीक्षाओं और समीक्षकों की बात नहीं कर रहा और हां प्रायोजित पुरस्कारों की नहीं। उन महान आलोचकों के आशीर्वादों की भी नहीं जिन्होंने बिना पढ़े आपको आशीर्वाद दिया और जिस पर आप अभी तक इतरा रही हैं।'
अशोक प्रियदर्शी ने जादूगोड़ा के यूसिल गेस्ट हाउस में पांच दिनों तक रहकर वहां अपनी आंखों से जो देखा उसके बारे में लिखा है। इसे पढ़ा जाना चाहिए। यह जो प्रचारित किया गया है कि विकिरण के दुष्परिणाम भोगने वाले केवल आदिवासी ही हैं। यहां असत्य का पर्दापफाश हो जाता है। प्रियदर्शी बताते हैं-'संबंधित कारखाना भी द्घेरे में है, जहां प्रवेश निषि( है और यूसिल का पूरा कैंपस तो एक द्घेरे में है ही। आबादी दूर है। यहां अपने प्रवास के दौरान मैं सबसे पूछता, 'यहां विकिरण का कितना खतरा है?'
तरह-तरह के जवाब-मैंने यहां सारी जिंदगी बिताई है। यूसिल के एक आदिवासी अधिकारी ने पूरा सेवा काल बिताया और अब सेवानिवृत्ति के बाद दो साल के अवधि विस्तार पर कार्यरत हैं। एक आदमी ने कहा, 'आपके रांची में जगह-जगह जो मोबाइल टावर लगे हैं और हाथ में मोबाइल हैं, उससे अधिक खतरा यहां नहीं है। वैसे हम हर सावधानी बरतते हैं। एक टेम्पो वाले ने कहा उसकी तीन पीढ़ियां वहीं गुजरी। वह बलिया का था।'
जादूगोड़ा यानी मरंग गोड़ा का निराशाजनक चित्रा प्रस्तुत कर महुआ माजी ने जो काम करना चाहा है, उस पर दिलीप तेतरवे ने अपने लेख-'विवाद के मूल में' में प्रकाश डाला है।
महुआ माजी जी मैं आपसे केवल यह कहना चाहता हूं कि इस अनियंत्रिात लालसा से अपने को अब भी बचा लीजिए। इस लालसा ने आपको अभी ही बेहद कृतघ्न, द्घमंडी, अशालीन, दुर्विनीत तथा कटुभाषी बना दिया है और ये सारे दुर्गुण आपको कहां पहुंचा देंगे, क्या कभी इस पर आपने सोचा है? जरा इस विषय पर सोचने के लिए थोड़ा समय निकालिए और अकेले में शांतचित्त से कुछ चिंतन कर लीजिए। आपके मामा या चाहे जो रहे हों, उनकी डायरी/पांडुलिपि ;पूरी या अधूरीद्ध को ही आप हिंदी संसार के सामने सार्वजनिक कर दें ताकि सच लोगों के सामने आ जाए। इससे आपका मान ही बढ़ेगा। हमारे यहां यह पुरानी कहावत चलती है कि सुबह का भूला हुआ यदि शाम को भी लौट आता है, तो उसे भूला नहीं माना जाता।
लेकिन आपने जैसा तेवर अपना रखा है, उससे ऐसा नहीं लगता कि आप कोई कल्याणकारी रास्ते के बारे में भी सोच रही हों। शुरू से ही आप एक ही बात को दोहरा रही हैं कि मैं ही 'मैं बोरिशाइल्ला' की मूल लेखिका हूं। अब तो लोग आपके दूसरे उपन्यास को भी आपकी रचना को मानने से इंकार करने लगे हैं।
मुझे आशंका है कि इसे प्रमाणित करने के लिए कि आप ही 'मैं बोरिशाइल्ला' की मूल लेखिका हैं कि वह डायरी किसी अतल तहखाने में छिपा दी गई होगी या वह नष्ट कर दी गई होगी।
माननीय राजेंद्र यादव जी ने 'मेरी तेरी उसकी बात' ;जनवरी २०१३द्ध में मेरे बारे में ठीक ही लिखा है कि 'बारह उपन्यास लिखने के बाद भी उन्हें वह यश नहीं मिल सका जो महुआ ने अपने एक उपन्यास बटोर लिया है।' यह आपने २०१३ के जनवरी में लिखा है। अब क्या यह सच नहीं है कि महुआ माजी को जिन लोगों ने इस ऊंचाई पर चढ़ाया है, उनमें आप भी एक हैं। आज महुआ के दोनों उपन्यासों की चूलें हिलने लगी हैं और मेरे उपन्यास जहां थे, वे आज भी वहीं पर मौजूद हैं। जो कुछ है, वह मेरा अपना ही है और मेरे किसी प्रकार के लेखन के लिए अब तक कोई उंगली नहीं उठा सका है। क्या यह मेरे लिए संतोष की बात नहीं है?
अंत में-महुआ माजी जी, मैं आपसे दो अनुरोध कर रहा हूं। उम्मीद है, आपका सहयोग अवश्य प्राप्त होगा।
'मैं बोरिशाइल्ला' ;२००६द्ध के पृष्ठ-३९ पर आपने जो लिखा है-'मैं तीन-चार आम ही... गले में पड़ी सोने की मोटी-सी सिकड़ी चमक-बुझ रही थी।' आप चुपके से मुझे बता दीजिए कि उस दृश्य को आपने कहां से उड़ाया है। यह दृश्य जरा 'केवल वयस्कों' के लिए है इसलिए इसे सार्वजनिक करना जनहित में नहीं है।
अब जरा भी 'मैं बोरिशाइल्ला' ;२००६द्ध के पृष्ठ-४५ के इस अंश को देखने का कष्ट करें-
'गजब की जिद्दी लड़की है। वहां से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। हम उससे पीछा छुड़ाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक मैंने देखा, उसके चाचा ससुर नरहरि पाल दो और लोगों के साथ एक नाव करके इधर ही आ रहे हैं।
भगवान ने हम लोगों की सुन ली थी। मैं खुश हो गया और चिल्लाकर शौंकारो से बोला, 'वो देखो तुम्हारा खुड़शोशुर।'
शौंकरी द्घबरा उठी। द्घूंद्घट के लिए आंचल ढूंढ़ने लगी। पर उसके हाथ लगा ॉक का निचला हिस्सा। उसने थोड़ा-सा उठाया भी। क्रमशः अनावृत होती गई वह। तभी दांतों से जीभ काटते हुए उसने एकाएक पानी में छलांग लगा दी। उसने ॉक के नीचे कुछ नहीं पहना था। कुछ भी नहीं। शायद अति उत्साह में यूं ही चली आई थी। उसे देख शर्म से पानी-पानी होकर मैंने पानी में तैरते अपने भैला को आगे बढ़ा दिया। कुछ देर जाकर जब मैं पीछे मुड़ा तो देखा, वह सिर पर पांव रखकर द्घर की ओर भाग रही है।'
कैसे-कैसे पढ़ाकू लोग होते हैं! वाराणसी के एक सज्जन ;प्रमोद कुमार पाठकद्ध ने कह दिया कि महुआ माजी ने 'पफूलो का कुरता' कहानी से इस दृश्य को टपाया है। पाठक जी ने यह भी बता दिया कि इस कहानी के लेखक यशपाल जी हैं, वही 'झूठा सच' वाले यशपाल जी। यह कहानी उनके 'पफूलो का कुरता' ;कहानी-संग्रहद्ध में है। इसे राजकमल प्रकाशन की सहयोगी प्रकाशन-संस्था लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद ने छापा है। जरा, पाठक जी की हिमाकत तो देखिए! उन्होंने कहानी की छाया प्रति ही मेरे पास भेज दी है। मैं बिलकुल लाचार हो गया। इसलिए उसे मुझे इस लेख में शामिल करना पड़ रहा है। 'पफूलो का कुरता' की भूमिका ;पृष्ठ-९द्ध का प्रमुख अंश यों है-
'संदू को खेल में आया देखकर सुनार का छह बरस का लड़का हरिया चिल्ला उठा-'आहा, पफूलो का दूल्हा आया!'
दूसरे बच्चे भी उसी तरह चिल्लाने लगे।
बच्चे बड़े-बूढ़ों को देखकर बिना बताए-समझाए भी सब कुछ सीख और जान जाते हैं। यों ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति की परंपरा चलती रहती है। पफूलो पांच बरस की बच्ची थी तो क्या ;वह जानती थी, दूल्हे से लज्जा करनी चाहिए। उसने अपनी मां को, गांव की सभी भली स्त्रिायों को लज्जा से द्घूंद्घट करते देखा था। उसके संस्कारों ने उसे समझा दिया था, लज्जा से मुंह ढंक लेना उचित है।
बच्चों के चिल्लाने से पफूलो लजा गई लेकिन वह करती तो क्या एक कुरता ही तो उसके कंधों से लटक रहा था। उसने दोनों हाथों से कुरते का आंचल उठाकर अपना मुख छिपा लिया।
छप्पर के सामने, हुक्के को द्घेर कर बैठे प्रौढ़ भले आदमी पफूलो की इस लज्जा को देखकर कहकहा लगाकर हंस पड़े।'
काका राम सिंह ने पफूलो को प्यार से धमका कर कुरता नीचे करने के लिए समझाया।
शरारती लड़के मजाक समझकर 'हो-हो' करने लगे।'
अगस्त १९४९
यशपाल
इतनी बड़ी लेखिका जिन्हें लंदन के हाउस ऑपफ कॉमंस में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्राी नवाज शरीपफ ;?द्ध की
उपस्थिति में इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया गया था, वह ऐसा द्घटिया काम कभी कर ही नहीं सकतीं।
महुआ जी, मुझे तो यशपाल की मौलिकता पर ही शक होने लगता है। जो आदमी 'झूठा भी और सच भी' लिखे उनकी बात पर कितना यकीन किया जा सकता है। मुझे तो लगता है कि यशपाल जी ने ही आपके 'मैं बोरिशाइल्ला' से नकल कर 'पफूलो का कुरता' नामक कहानी लिख डाली
होगी।
इंटरनेट तो एक महासागर है। इसमें से यदि कोई एक लोटा पानी निकाल ही लेगा तो उसका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। यदि उससे किसी का भला हो जाता है तो इसमें इतना हाय तौबा करने की क्या जरूरत है? आप बिलकुल निश्ंिचत होकर कट और पेस्ट का खेल खेलती रहिए...। शुभकामनाएं...।

 
 
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