फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
प्रतिक्रिया
 
कौन सा सृजन और कैसा संदर्भ
 
विजय बहादुर सिंह
 

 

 

'पाखी' दिसंबर २०१२ के पृष्ठ पांच पर 'आपका पन्ना' कालम में भारत भारद्वाज ने मुझ पर यह आरोप लगाया है कि मैं अपने एक ऐसे गुरु की दक्षिणा चुका रहा हूं जिसके माथे पर तीन पुख्ता कलंक हैं और जो मिटाने से भी कभी मिटेंगे नहीं। इसी सिलसिले में भारद्वाज का यह भी कहना है कि मैं एक सतही और संदिग्ध लेखक हूं। चूंकि हम दोनों एक ही समय में काम कर रहे हैं इसलिए कौन क्या है, क्या नहीं, इसका पफैसला भविष्य पर छोड़ता हूं। हां, अपने महान गुरु आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के माथे लगे कलंकों का प्रत्याख्यान जरूर करूंगा जो बेबुनियाद और झूठे हैं। ये सब सुनियोजित ढंग से, किसी बड़े षड्यंत्रा के तहत उनकी छवि नष्ट करने और उनके प्रति भावी पाठकों के मन में नपफरत जगाने और पफैलाने के लिए किए जा रहे हैं। बेचारे भारद्वाज तो अभी-अभी पैदा हुए हैं, ये षड्यंत्रा तो पचासों साल से चलाए जा रहे हैं। लेकिन क्यों? इसलिए कि हिंदी में हमीं हम बचें, और कोई नहीं। भारद्वाज के आरोपों का जवाब यहां उनकी सेवा में हाजिर है, इससे पहले यह निवेदन अवश्य कर दूं कि बीसवीं सदी की हिंदी आलोचना से वाजपेयी को बेदखल करने की भरपूर कोशिशें की गई हैं। और तो और जेएनयू के आचार्यों में से कई और अधिकांश छात्रा जानते ही नहीं कि शुक्लोत्तर आलोचना में वाजपेयी जैसों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। इसके पीछे गहरे षड्यंत्राों का एक लंबा सिलसिला रहा है। कहा जाता रहा है कि वे प्रेमचंद के दुश्मन थे। मित्रा निराला को चौके में नहीं खाने देते थे। उन्होंने नामवर सिंह को सागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से निकलवा दिया। सबसे बड़ी बात यह कही जाती है कि वे साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा के दुश्मन और प्रतिक्रियावादी थे।
जहां तक प्रेमचंद को लेकर वाजपेयी जी के अभिमत और संबंधों का प्रश्न है, वह सब लिखा-पढ़ा और किताब में दर्ज है। नंददुलारे वाजपेयी रचनावली के आठवें खंड में भी यह सब देखा जा सकता है क्योंकि यह सब १९३२ की बात है। प्रेमचंद की मृत्यु पर वाजपेयी जी ने प्रसाद पर अपने संस्मरणात्मक आलेख लिखते हुए 'व्यक्तित्व की एक झलक' में जो भाव प्रकट किए हैं, वे आज भी प्रेमचंद जी को लेकर वाजपेयी की श्र(ा के प्रमाण हैं। भारद्वाज के खिलापफ यह निराधार और सपफेद झूठ कि वे प्रेमचंद द्घृणा के प्रचारक लेखक हैं, किस आधार पर पफैला रहे हैं, इसका प्रमाण उन्हें देना चाहिए। केवल कहने और लिख देने से हिंदी का वह सचेत पाठक नहीं मानेगा जो तथ्यों में भरोसा रखता है। वाजपेयी जी की शुरुआती नोक-झोंक 'हंस' के आत्मकथा विवाद को लेकर हुई थी। प्रेमचंद ने अपनी बुजुर्गी दिखाते हुए वाजपेयी जी को लिखा... 'मेरी तो अच्छी-बुरी किसी तरह कट गई... लेकिन आपको अभी बहुत कुछ करना है, बहुत कुछ सीखना है, बहुत कुछ देखना है। आदर्श बहुत अच्छी चीज है। लेकिन संसार में बड़े से बड़े आदर्शवादियों को भी कुछ न कुछ झुकना ही पड़ता है... अब गुस्सा थूक दीजिए। आपने बिगड़कर मन को शांत कर लिया, मैंने आपके बिगड़ने का आनंद उठाकर मन को शांत कर लिया। आइए, हाथ मिला लें।' प्रेमचंद पर ५ पफरवरी १९५९ को
आकाशवाणी से बोलते हुए नंददुलारे वाजपेयी ने लिखित रूप से कहा, 'हंस' के आत्मकथा विशेषांक को लेकर मेरा उनसे बहुत कुछ उत्तर-प्रत्युत्तर हुआ था। मेरी मान्यता थी कि आज साहित्य में आत्मकथा नहीं लेखन की आवश्यकता है। प्रेमचंद जी कहते थे कि लेखक ही नहीं, एक सामान्य मजदूर के जीवन की भी एक प्रेरणात्मक कथा हो सकती है।' यह विवाद प्रेमचंद जी ने अपने बड़प्पन से खत्म किया। इस प्रसंग में वाजपेयी जी याद करते हैं कि १९३२-३३ के लगभग एक दिन प्रेमचंद जी मेरे द्घर आकर ठहर गए... उस दिन मैंने समझा कि इस व्यक्ति में सामंजस्य की अद्भुत क्षमता है। तबसे मेरा उनका संबंध निरंतर द्घनिष्ठ ही होता गया।'
'प्रेमचंद : कलम का सिपाही' के पृष्ठ ४६६ पर इसी संदर्भ को याद करते हुए अमृत राय लिखते हैं कि वाजपेयी जी के मन में बस अपनी भूल की प्रतीति और मुंशी जी के प्रति निष्कलुष स्नेह और आदर का भाव रह गया और उसके साथ ही उन्हें याद आई उसके भी एक बरस पहले, 'भारत' में एक कापफी तीखे लेख की जिसे पढ़कर मुंशी जी ने उनको लिखा था, तारीपफ तो बहुत से लोग करते हैं पर कमियों को दिखाने वाले नहीं मिलते। आपका मैं शुक्रगुजार हूं, आपने कई मानों में मेरा उपकार किया।
भारत भारद्वाज जी ने मेरी अज्ञानता पर अपना जो ज्ञान हिंदी पाठकों के हित में परोसा है उसे जरा बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे प्रेमचंद के अगस्त '३३ और १२ जनवरी १९३४ के पत्राों में देख लीजिए। १२ जनवरी १९३४ के पत्रा का अंश...
'निर्मल जी को जवाब देते हुए मैंने 'जागरण' में जो लिखा था, क्या आपने उसको देखा? यह निर्मल बिलकुल सि(ांतहीन आदमी है। जिन दिनों पाक्षिक 'जागरण' बाबू शिवपूजन सत्ताय के हाथों में था, मेरे और 'जागरण' के बीच एक विवाद उठ खड़ा हुआ। पं. नंद दुलारे वाजपेयी ने कुछ लिखा था उसी को लेकर यह झगड़ा खड़ा हो गया। उस समय निर्मल ने 'जागरण' में एक लेख लिखा था जिसमें मेरे साहित्यिक कार्य का मूल्य गिराया गया था और मुझको दी गई थी कि अब मैं और कुछ न लिखूं... उसने मुझ पर यह दोष लगाया है कि मैं ब्राह्मण वर्ग का द्रोही हूं सिपर्फ इसलिए कि मैंने इन पुजारियों और महंतों और धार्मिक लुच्चे-लपफंगों के कुछ पाखंडों का मजाक उड़ाया है... यह निर्मल और उसी थैली के चट्टे-बट्टे दूसरे लोग ऊपर से बहुत राष्ट्रीयतावादी बनते हैं मगर उनके दिल में पुजारी वर्ग की सारी कमजोरियां भरी पड़ी हैं और इसीलिए वे हम लोगों को गालियां देते हैं...।
२४ अगस्त १९३३ के पत्रा में एक टुकड़ा ऐसा है जिसमें प्रेमचंद 'भविष्य किनका है' का जवाब दे रहे हैं। पत्रा देखिए-'इतने लिखने वाले हैं कि उनमें से कुछ को विशेष रूप से गिनाने के लिए चुनना जरा कठिन है। साहित्य केवल कहानी नहीं है। उसमें नाटक है, कविता है, आलोचना है, कहानी है, उपन्यास है, निबंध है, हमें उन्हें इस तरह विषयानुसार लेना पड़ेगा।'' आलोचना पर जवाब देते हुए प्रेमचंद जिन दो नामों की तारीपफ करते हैं उनमें से एक शायद रामदयाल तिवारी का है और दूसरा मथुरा म्युजियम के क्यूरेटर का जिनका नाम डॉ. कृष्णदत्त वाजपेयी हैं जो बाद में भारत के विख्यात पुरातत्वविद् माने गए। इसके ठीक बाद आलोचना में प्रेमचंद सीधे जिस नाम का जिक्र करते हैं और जिस स्नेह से करते हैं वह उन्हीं के शब्दों में-'नंददुलारे वाजपेयी में भी अद्भुत व्याख्यात्मक-विश्लेषणात्मक शक्ति है।'
भारत भारद्वाज चाहें और पढ़ने की आदत हो तो इन दोनों पत्राों को मदनगोपाल-अमृत राय द्वारा संकलित चिट्ठी-पत्राी में देख सकते हैं। आचार्य वाजपेयी मेरे गुरुदेव नहीं थे, प्रेमचंद जिनका स्नेहपूर्वक उल्लेख करते हैं। आचार्य वाजपेयी ने अपने तमाम लेखन में और बीसवीं सदी के महान हिंदी लेखकों में जो नाम बार-बार गिनाए और लिए हैं उनमें प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल, प्रसाद और निराला हैं। भारद्वाज की लिखने के साथ अगर ईमानदारी से पढ़ने में भी रुचि हो तो देख लें। पिफलहाल प्रेमचंद जी के बारे में आचार्य वाजपेयी का यह एक वाक्य हिंदी और 'पाखी' के पाठकों के लिए-
'मैं उन्हें भारतीय जीवन का यशस्वी कलाकार मानता हूं।'
निराला वाले प्रकरण लेकिन तो भारद्वाज ने सामान्य साहित्यिक विवेक से भी काम नहीं लिया है। जो उन्होंने कुप्रचारवादियों से सुना, उसे जांचें-तौले बिना लिख डाला। यह उनकी अपनी अदा है।
निराला की स्वर्ण जयंती की मूल योजना निश्चय ही वाजपेयी जी की थी। पर उस समय जो स्थिति थी, उसमें न रामविलास जी ने अपेक्षित साथ दिया, न ही हजारीप्रसाद द्विवेदी ने। वाजपेयी रचनावली के पहले खंड में जो चिट्ठियां हैं, उन्हें पढ़कर इसका अनुमान लग सकता है। निराला को लेकर बड़े-बड़े विवाद, दुराग्रह, आग्रह और षड्यंत्रा थे। वाजपेयी ही थे जो उनका मोर्चा जीवन भर संभालते रहे।
आश्चर्य यह कि भारद्वाज ने अक्ल को ताख पर रखकर लिख मारा कि वाजपेयी ने निराला को ग्यारह हजार की राशि न देकर धोखा किया। यह भी किसी कारण द्घर वालों ने निराला की पिटाई की। आश्चर्य की बात यह कि धोखा वाजपेयी ने किया और पिटाई निराला की हुई।
अब जरा रामविलास शर्मा लिखित 'निराला की साहित्य साधना' के खंड एक पृष्ठ ३७७ से पृष्ठ ३८० ;पेपर बैकद्ध देख जाइए। ग्यारह हजार न मिलने से नाराज द्घर वालों द्वारा की गई निराला की पिटाई का कोई जिक्र नहीं है। यह शायद कोई और रामविलास शर्मा हों जिन्होंने भारत भारद्वाज के लिए अलग से यह सब लिखा हो। पृष्ठ ३८१ पर सुमित्रााकुमारी सिन्हा के पति चौधरी राजेंद्र शंकर पिता प्रो. अजित कुमार, कीर्ति चौधरी से झगड़े का जिक्र है। पृष्ठ ३८५ पर निराला के गांव गढ़ाकोला और ससुराल उलमऊ में कहीं जरूर निराला के पिटने का जिक्र है। सो भी बहुत बुरा।
निराला जी को दी गई राशि जिस बांस की पोंगी में थी, वह सचमुच खाली थी पर दूसरे दिन ही निराला ने उनके सम्मान में अपना काव्य-पाठ करने आए कवियों को सौ-सौ, दो-दो सौ रुपए बांटे।
अब आगे का टुकड़ा भारत भारद्वाज से मन ही मन इजाजत लेकर वाजपेयी जी का लिखा पढ़ें-'दूसरे दिन काशी विश्वविद्यालय में अध्यापकों और विद्यार्थियों की सभा में उन्होंने बहुत संतुलित भाषण दिया और अपने हाथ से नई पीढ़ी के दस बारह कवियों को सौ और दो सौ रुपए का उपहार देकर हर्ष का अनुभव किया।'
वाजपेयी निराला के लिए क्या थे, इसे स्वयं निराला द्वारा लिखे रचनावली के खंड पांच पृष्ठ ४४२ पर देख लें। भारत भारद्वाज के पूज्य भ्राता जी का ही संपादन है। बकौल राम विलास शर्मा, उसी साहित्य साधना खंड एक पृष्ठ ४८७ पर-'जब निराला कलकत्ते से बीमार होकर काशी आए, उस समय प्रसाद ने अपने व्यवहार से उनके मन को कुंठाग्रस्त होने से बचाया, औषध उपचार का प्रबंध करके उनकी सहायता की। प्रसाद के प्रभाव से रूपनारायण पांडेय आदि का समर्थन निराला को मिला, वर्ना उन्हें शत्राु बनाने में निराला ने कुछ उठा न रखा था। काशी और वैसवाड़े संब( नंददुलारे वाजपेयी का नाम यहां उल्लेखनीय है, जिन्होंने अपने छात्रा जीवन से ही निराला का आदर करना सीखा था, जो निराला के लिए बहुत बार लड़े और जिन्हें निराला समर्थन के कारण 'भारत' से नौकरी छोड़नी पड़ी।'
'पाखी' के पाठक खुद निर्णय करें कि सपफेद झूठ का कारोबार कौन कर रहा है और साहित्य में प्रदूषण कौन पफैला रहा है। यह कौन सा सृजन और कैसा संदर्भ है? क्या इससे पत्रिाकाओं का सौंदर्य बढ़ता है, पाठकों को गंभीर और विश्वसनीय सामग्री मिलती है? इससे किस कोटि का
मनोरंजन होता है।
वाजपेयी के माथे पर बकौल भारद्वाज लगा तीसरा कलंक 'सागर विश्वविद्यालय से नामवर सिंह का निष्कासन है।' नामवर जी के अनुसार सागर विश्वविद्यालय में वाजपेयी जी के न चाहते हुए भी, किन्हीं ताकतों ने उन्हें नियुक्ति दी और वाजपेयी जी के चाहने पर उन ताकतों के रहते हुए भी नामवर जी सागर से हटा दिए गए। क्या कमाल है?
इस पूरे प्रकरण पर मैंने अपनी पुस्तक 'आलोचक का स्वदेश' ;नंद दुलारे वाजपेयी की साहित्यिक जीवनीद्ध में
सविस्तार लिखा है, जो स्वयं नामवर जी के पास भी है। अभी तक नामवर जी ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। कुल पांच साल हो गए हैं। हां, नाराज और दुःखी वे जरूर हुए क्योंकि वे मुझे अत्यंत स्नेह देते रहे थे और मुझसे उन्हें यह उम्मीद न थी। लेकिन उन्हीं के गुरुदेव का ही तो वाक्य है-'सत्य के लिए किसी से भी नहीं डरना।' सो मैंने निडर होकर उतना सच कहा जिससे नामवर जी का झूठ तो सामने आ जाए लेकिन उनकी मर्यादा बची रहे। यह मेरे माथे चढ़ा कलंक जरूर है।
अब भारत भारद्वाज जैसे टिप्पणीकार मुझे लेखक नहीं मानते, संदिग्ध और सतही लेखक मानते हैं, गुरु भक्त मानते हैं या पिफर अंध भक्त यह सब उनकी कृपाएं हैं। वे अपने इस विवेक ;?द्ध को कायम रखें। मैं भी अपनी कोशिश भर जैसा भी 'सतही' और 'संदिग्ध' होगा, मरता क्या न करता के तर्क पर लिखता चला जाऊंगा।

 
 
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