फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संवाद

बहुत बड़ा है प्रगतिशीलता का दायरा

खगेंद्र ठाकुर
 
ब्रजमोहन : आज हम 'प्रगतिशील आंदोलन की चुनौतियां' विषय पर मूल रूप से बात करने के लिए बैठे हैं। यहां संयोग से हिंदी-उर्दू वाले दोनों ही मौजूद हैं। हमारे बीच हिंदी के प्रखर मार्क्सवादी आलोचक खगेंद्र ठाकुर हैं। 'न्यू एज' के संपादक एवं वामपंथी चिंतक शमीम पफैजी, अली जावेद, राज्यवर्(न और सेराज खान बातिश हैं।
खगेंद्र जी क्या इस समय हिंदी लेखन की जो स्थिति है या हिंदी में जो लेखक लिख रहे हैं, क्या वे अपने समय की समस्याओं या चुनौतियों के हिसाब से लिख रहे हैं। आज हिंदी कविता की जो स्थिति है, एक पाठक के रूप में मुझे लगता है कि आज की हिंदी कविता एक खास बौ(कि समाज, अभिजात्य और पढ़े-लिखे लोगों के लिए लिखी जा रही है।
खगेंद्र ठाकुर : अभी 'मुक्ति संद्घर्ष' में मेरा एक लेख आया है जो प्रगतिशील आंदोलन के ७५ वर्ष पूरे होने के संदर्भ में है। इस लेख के अंत में जो इस आंदोलन में कमजोरियां आई हैं, उनका जिक्र किया गया है। एक जो हमारी वर्ग दृष्टि है, वह लेखन में कमजोर पड़ गई है। अभी मैं राजनीति की बात नहीं कर रहा हूं। लेखन में हमारे पहले की पीढ़ी के जो प्रगतिशील लेखक थे, वे हिंदी, उर्दू या किसी भी भाषा में हों वे लड़ाई में भाग ले रहे थे। वे सचमुच में सामाजिक बदलाव के लिए लड़ रहे थे। कुछ लोग जीवन में लड़ रहे थे। कुछ लोग कलम से लड़ रहे थे। कुछ दोनों से लड़ रहे थे। इस साहित्य में बहुत तीखापन था। इधर आकर धीरे-धीरे वह कमजोर पड़ता गया। इधर २०-२५ वर्षों के लेखन में खास करके कविता में कुछ लोग अपने मन के भाव लिख रहे हैं, कुछ लोग मन की भड़ास निकाल रहे हैं। कुछ लोगों ने बाजार के खिलापफ लिखा, समाज की असंगतियों के खिलापफ लिखा।
ब्रजमोहन : ऐसे लोगों में किनका नाम प्रमुख है?
खगेंद्र ठाकुर : वर्ग दृष्टि तो सबमें है। इसे पूरा ट्रेस आउट कर लिखें तो वह केदारनाथ सिंह से ही शुरू है। प्रगतिशीलता का दायरा बहुत बड़ा है। अरुण कमल, राजेश जोशी लिखने में प्रगतिशील हैं। मेरा कहना है कि उनमें नागार्जुन वाला लड़ाकूपन नहीं है। जैसे नागार्जुन हिंदी में तो वैसे ही पफैज उर्दू में लिख रहे थे, लड़ाई में भी भाग ले रहे थे। ६० के दशक में लोहियावाद का प्रभाव बढ़ गया। रद्घुवीर सहाय और धूमिल का बड़ा नाम हुआ। लेकिन ये भीतर से कम्युनिस्ट विरोधी थे। हालांकि उन्होंने नेहरू की राजनीति के खिलापफ, कांग्रेस की राजनीति के खिलापफ तीखेपन से लिखा और इससे कुछ लोग बहुत खुश हुए।
लेकिन आठवें दशक, सत्तर के बाद से इसमें पिफर बदलाव आया। लोग लोहियावाद से मुक्त हुए। कहने का मतलब यह कि साहित्य में जो मानवीय संवेदना है, वह बची रहे। कविता है बची रहे, मनुष्यता बची रहे-इस तरह के भाव व्यक्त होने लगे। लेकिन बचाने में लेखक की भूमिका क्या है, ये यह नहीं कहते हैं। जनता और साहित्य का, जनता और लेखक का जो संबंध है, वह लगभग खत्म है। वे पर्यवेक्षण करके, देखकर, महसूस कर विषय ले लेते हैं, लेकिन साहित्य को जनता के बीच ले जाना हो तो वे कहते हैं कि मुझे क्या पड़ी है? कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं का काम है, वे उनकी कविताओं को ले जाएं। लेकिन आपको भी तो जाना पड़ेगा। जब नक्सलियों ने कहा कि कविता एक कार्रवाई है। मैंने देखा कि पाब्लो नेरूदा ने एक जगह लिखा है कि उन्हें जब सरकार ने देश निकाला दिया तो वे द्घोड़े पर चढ़कर रात में यात्राा करते थे और दिन में छिपकर रहते थे। गांवों में बैठकर वे लोगों को कविता सुनाते थे। वे कविता समझते नहीं थे, लेकिन वे ध्यान से सुनते थे। पाब्लो नेरूदा उन्हें समझाते थे, सुनाते थे। उस दौर में उन्होंने अपने अनुभव से लिखा कि मुझे मालूम हुआ कि कविता एक कार्रवाई है। कवि जब कार्रवाई करता है तो कविता कार्रवाई बनती है। कवि की कार्रवाई के बिना कविता कार्रवाई क्या बनेगी। इसलिए इस दौर में कमजोरी आई है। अब जो सत्ता है वह भी लुभा रही है। उन लोगों के जमाने में क्रांतिकारी परिस्थितियां थीं, क्रांतिकारी शक्तियां थीं, अब वे कमजोर पड़ गई हैं, इसलिए हमारे लेखकों को लगता है कि क्रांति तो होने वाली नहीं है। इसलिए समायोजन का भाव है। यह भाव सत्ता के साथ है। आज जनता के साथ लोगों का ताल्लुक कम हो गया है। सत्ता-प्रतिष्ठान, साहित्य अकादमी, पुरस्कार आदि के प्रति प्रलोभन है, ललक है। पुरस्कारों की ललक से लेखक में लड़ाकूपन कम होता है। यह लड़ाकूपन कम हुआ है। इस पर बड़े पैमाने पर बात करने की जरूरत है।
ब्रजमोहन : समाज में जहां तक परिवर्तन की बात की जाती है और इस संदर्भ में जो परिवर्तन लाने वाला लेखकीय समाज है, एक्टिविस्ट है, उसे जनवादी, वामपंथी, प्रगतिशील नामों से जोड़ा जाता है। इस हालत में आज के लेखक, बु(जिीवी, कार्यकता किस रूप में काम करें, कैसे समस्याओं को पहचानें? क्योंकि यह देखा जा रहा है कि समग्र भूमंडल में आज का यथार्थ पहले से ज्यादा जटिल होता जा रहा है, चीजों और परिदृश्य को समझने में कठिनाई हो रही है।
अली जावेद : मुझे तो यह लगता है कि आज पहले के मुकाबले में चुनौतियां ज्यादा संगीन हैं और हमारी कलम की धार उतनी तेज नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। हम भी कहीं न कहीं उपभोक्तावाद के शिकार हुए हैं। इस उपभोक्तावाद की चकाचौंध में हमारे प्रगतिशील लेखकों में जो पैनापन होना चाहिए, वह नहीं है। इसलिए हम एक तरपफ प्रगतिशील आंदोलन की बात कर रहे हैं, प्रतिब(ता की बात कर रहे हैं, दूसरी तरपफ इस ताक में लगे हुए हैं कि कहीं कोई अवार्ड मिल जाए। किसी बड़ी एकैडमिक बॉडी में, चाहे वह साहित्य अकादमी हो या विभिन्न प्रदेशों में जो अकादमियां हैं, उनके सदस्य हो जाएं, किसी सरकारी समिति में पहुंच जाएं। मैं इन समितियों में जाना बुरा नहीं समझता और न ही यह समझता हूं कि अवार्ड लेना गलत है। लेकिन अगर हमारे लेखक का लक्ष्य ही वही हो जाए तब क्या हो! समझौता करना शुरू कर दें, साहित्य अकादमी अवार्ड के लिए उर्दू में हम लोग रोजाना देखते हैं कि जोड़-तोड़ होती है। जिस तरह अपने जमीर का सौदा करके अवार्ड लिए जा रहे हैं, इसमें बदकिस्मती से अभी तक कोई अच्छे नाम साहित्य अकादमी की स्थापना से आज तक नहीं आए हैं।
खगेंद्र ठाकुर : ज्ञानपीठ पुरस्कार के संदर्भ में मैंने नामवर जी से कहा, वे भी रहते हैं ज्यूरी में। हिंदी में प्रथम श्रेणी के लेखक हैं, उनको ज्ञानपीठ अवार्ड कहां मिला है। वे कहने लगे कि अज्ञेय को मिला है। मैंने कहा कि अच्छा यह मान लिया कि अज्ञेय को मिला है, उसके बाद दिनकर को मिला है, कुंवर नारायण तो हिंदी में दूसरे दर्जे, श्रेणी के भी कवि नहीं हैं। इस तरह के लोगों को मिला है। नागार्जुन को नहीं मिला, शमशेर को नहीं मिला, यशपाल को नहीं मिला।
अली जावेद : साहित्य अकादमी अवार्ड कृश्न चंदर जैसे लेखक को, सरदार जापफरी जैसे लेखक को नहीं मिला। कृश्न चंदर ने तो इस अवार्डगीरी के चक्कर में 'एक गधे की आत्मकथा' भी लिख दी।
खगेंद्र ठाकुर : एक बात मैंने सुनी थी कि कोई अरब से पैसा कमाकर आया था उसने अवार्ड ले लिया।
अली जावेद : हां, यह ठीक बात है। कहा जाता है कि उसने चालीस हजार रुपए दिए थे। खैर, जबसे गोपीचंद नारंग का अमल-दखल उर्दू अकादमी में हुआ है तब से हाल यह हो गया है। आपने शीन कापफ निजाम का नाम तक नहीं सुना होगा, लेकिन उन्हें अवार्ड मिला। शाइर हैं, सब कुछ है, ठीक है, लेकिन शीन कापफ निजाम के मुकाबले में एक से एक बड़ा शाइर बैठा हुआ है जो इस अवार्ड से वंचित हैं। उर्दू में तो बहुत ही बुरा हाल है।
सेराज खान बातिश : हिंदी में भी कमोबेश यही हाल है।
खगेंद्र ठाकुर : नामवर जी के जमाने में कुछ प्रगतिशील लोगों को मिला अरुण कमल, राजेश जोशी, ज्ञानेंद्रपति।
ब्रजमोहन : अभी-अभी उदय प्रकाश को उनकी अकेली कहानी पर अवार्ड मिला। क्या आप समझते हैं कि वह अकेली कहानी साहित्य अकादमी अवार्ड पाने के लायक है?
खगेंद्र ठाकुर : ऐसा होता रहता है। जैसे यशपाल को 'मेरी तेरी उसकी बात' पर साहित्य अकादमी अवार्ड मिला जबकि उनकी मास्टरपीस कृति को यह अवार्ड नहीं मिला, बाद में एक साधारण उपन्यास पर दे दिया गया। साहित्य अकादमी का जो अपना नियम है, जो तीन साल के भीतर ही छपा है, उसको ले लिया। दरअसल उदय प्रकाश तो पिछले २५-३० साल के अत्यंत महत्वपूर्ण, बड़े कहानीकार हैं। हालांकि आपने जो यह बात उठाई, वह ठीक है। 'मोहनदास' उनकी उतनी अच्छी कहानी नहीं है। यह नियम बदलना चाहिए। साहित्य अकादमी को किसी लेखक के समग्र सर्जनात्मक लेखन पर पुरस्कार देने के बारे में सोचना चाहिए।
दरअसल हमारी जो अपनी मजबूती, विचारधारा, अपने उद्देश्य की है, वह कमजोर पड़ी है। इनसे संबंधित कारणों की खोज की जरूरत है। जैसाकि अली जावेद समितियों और अवार्ड के बारे में कह रहे थे। मैं भी इसी खयाल का हूं। मैं बहिष्कारवादी नहीं हूं। कहीं किसी कमेटी में न जाएं, इसमें न जाएं, उसमें न जाएं, ये पुरस्कार न लें। लेकिन इन सब चीजों के लिए ललक हो तो वह कमजोरी है। सवाल उठता है कि इसका पफैसला, निर्णय कैसे लें। जनता से लगाव व्यावहारिक बात है। साहित्य जनता से जुड़े। मैंने इलाहाबाद की एक गोष्ठी में यह सवाल उठाया था कि हिंदी कविता में मजदूरों का आना बंद हो गया है, हिंदी कविता में पसीने की गंध नहीं आ रही है। मध्यवर्ग का रुझान आ रहा है। हालांकि वे बाजारवाद के खिलापफ लिख रहे हैं, मल्टीनेशनल के खिलापफ लिख रहे हैं। यह सब ठीक है, लेकिन हमें देखना है वे किस आधार पर लिख रहे हैं, कहां से लेकर लिख रहे हैं। यह मध्यवर्गीय रुझान है, जो व्यक्त हो रहा है। आज जरूरत है कि कवियों, लेखकों को वर्कशॉप करवाएं, खासकर नए लोगों को। आज से ५-७ वर्ष पहले उदय प्रकाश ने एक साक्षात्कार में कहा था कि प्रगतिशील लेखन करना आजकल के जमाने में मुश्किल काम है। जब मैंने पूछा कि क्या कठिनाई है तो वे टाल गए। यह बात रेखांकित करनी है कि आज का प्रतिष्ठित लेखक कहता है कि प्रगतिशील लेखन करना कठिन है। आज नए लेखकों के सामने आ रही कठिनाई को समझना है, जो नए लोग आ रहे हैं, उनको कैसे मोड़ा जाए।
शमीम पफैजी : मैं इस बात को मानता हूं कि जो परिस्थितियां उभरी हैं, उन्हें एक ठोस शक्ल देने में हम कामयाब रहे हैं। दूसरी बात कि जो नई चुनौतियां आई हैं, वे क्यों आई हैं, उस क्यों का जवाब हम नहीं दे पा रहे हैं। मैं विचारधारात्मक स्तर पर इस चर्चा को आगे बढ़ाना चाहता हूं। कार्ल मार्क्स ने एक जगह लिखा है कि जब औद्योगिक पूंजी १० प्रतिशत मुनापफा कमाती है तो वह और ज्यादा पूंजी लगा लेती है। जब वह ३० प्रतिशत मुनापफा कमाती है तो और ज्यादा शोषण की ओर बढ़ती है। जब वह १०० प्रतिशत मुनापफा कमाने की स्थिति में आती है तो वह समाज को बिखराव की ओर ले जाती है। वह अगर ३०० प्रतिशत मुनापफा कमाती है तो
मुनापफे के लिए अपने आपको या पूरे समाज को सूली पर चढ़ा सकती है। कार्ल मार्क्स ने कहा था कि औद्योगिक पूंजी समय-समय पर संकट से गुजरती है, संकट आता है तो वह संकट पर काबू पाकर आगे बढ़ जाती है। इसे 'साइक्लिक क्राइसिस' कहते हैं। आज औद्योगिक पूंजी नहीं हैं। यह बुनियादी पफर्क आया है। आज हम वित्तीय पूंजी के राज में रह रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी इस विश्व का संचालन कर रही है। हमारी संस्कृति और हमारे साहित्य, सामाजिक जीवन पर जो हमले हुए, वे बाहर से नहीं हुए, अंदर से हुए। इसका नतीजा यह निकला कि हम वैचारिक दृष्टिकोण से जो संकट अंदर है, उसकी कल्पना नहीं कर पा रहे हैं। यह ठीक है कि कभी हम बाजारवाद के खिलापफ, उपभोक्तावाद के खिलापफ खड़े होते हैं लेकिन वित्तीय पूंजी जो सिपर्फ और सिपर्फ पूंजी लगाकर
मुनापफा कमाना ही जानती है, उसको आज भी हम निशाना बनाने के लिए तैयार नहीं हैं। इस वजह से उपभोक्तावाद आता है, पुरस्कार की ललक पैदा होती है। हमारे देश में ६०' के बाद लोहियावाद का असर हुआ। हिंदी और उर्दू दोनों में हुआ, लेकिन इस लोहियावाद के साथ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजादी से पहले हम वैचारिक दृष्टिकोण से सापफ थे कि हम किसके खिलापफ लड़ रहे हैं, लेकिन ६०' के बाद हमारे बीच दुश्मन की पहचान के सवाल पर भी मतभेद हैं।
खगेंद्र ठाकुर : यही तो इसका असर है।
शमीम पफैजी : इस कारण से हमारे साहित्य में भी भटकाव आया है, यह बात मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि जो कुछ लिखा गया, वह सब बकवास है। इन दस सालों के भीतर बहुत कुछ लिखा गया है। उर्दू के अंदर जो अच्छे अपफसाने, नॉवेल आजादी से लेकर आज तक आए उन सब में देखेंगे कि ये सब के सब बिहार के लेखक हैं। इनमें से एक भी बिहार के बाहर का नहीं है। वहां एक आंदोलन का स्वरूप आया था जिसकी वजह से उस आंदोलन ने सबको प्रभावित किया। इसके मुकाबले में हम बाकी साहित्य को देखें तो कोई स्पष्ट वैचारिक समझदारी अब नहीं दिखाई देती, यह हमारी कमजोरी है। इसलिए वे आज भी किसी न किसी तरह से अपने आपको समाज में एडजस्ट करने में लगे हैं। मेरी नजरों में पहले भी आया था और आज भी है, मापफ करें लेफ्रट भी अपने आपको इस पूरी व्यवस्था में एडजस्ट करने में लगा है।
खगेंद्र ठाकुर : यह तो मैं आपके डर से नहीं कह रहा था।
शमीम पफैजी : हमारी राजनीति ७०' के बाद से एडजस्टमेंट की है और उस भटकाव का नतीजा यह भी है कि हमारे साहित्य पर भी इसका असर है। जब हम क्रांति के बजाए, किसी को जिताने या हराने में लग गए तो लेखक क्या करेगा, वह क्रांति अकेले थोड़े ही कर सकता है। यह जो हमने
एडजस्टमेंट की राजनीति अपनाई है, यह भी भटकाव का एक रूप है। इसे कैसे दूर करेंगे, यह देखने वाली बात है।
मैं कोई सीपीआई, सीपीएम या सीपीआई ;एमएलद्ध किसी एक की नहीं पूरे वाम की बात कर रहा हूं जो भटकाव का शिकार हुआ है और इस वजह से इसका प्रभाव हमारे लेखकीय आंदोलन पर पड़ा है। वह भटकाव का शिकार है, क्योंकि वह सोचने वाला है। वह एक्टिविस्ट भी नहीं है, वह लिखने वाला है तो उसने लेखन में सुस्ती आना, उसके लेखन में दिशाहीनता राजनीतिक पार्टी की तुलना में जल्दी प्रतिबिंबित होती है।
खगेंद्र ठाकुर : मैं इस क्रम में दो बातें जोड़ना चाहता हूं। मार्क्स ने पूंजीवाद का अध्ययन किया। एंगेल्स ने समाजवाद के बारे में लिखा, आगे बढ़ाया। अगर हम मार्क्सवादी हैं तो हमारा कर्तव्य एवं दायित्व है कि हम अपने समय के पूंजीवाद का अध्ययन करें, अपने समय के यथार्थ का अध्ययन करें। ठीक बात शमीम जी ने उठाई कि यह वित्तीय पूंजीवाद है। इसके बारे में कहा जाता है कि इसमें बिना निवेश किए पूंजी बढ़ती है-'ग्रोथ विदाउट इंवेस्टमेंट' और 'प्रॉपिफट विदाउट जॉब' बिना रोजगार पैदा किए उसका मुनापफा बढ़ता है। उपभोक्ता शेयर बाजार में, सट्टा बाजार में वित्तीय पूंजी का खेल खेलता है। वित्त से वित्त पैदा होता है, कोई क्यों इंवेस्ट करेगा। यह
डिस्इंवेस्टमेंट है। अगर सार रूप में कहें तो यह कहेंगे कि आज के उत्पादन में मनुष्य का जो रोल है, मानवीय श्रम है, वह कम हो गया हैं।
शमीम पफैजी : न्यूनतम हो गया है।
खगेंद्र ठाकुर : न्यूनतम हुआ होगा, हमारे देश में नहीं हुआ है, विदेशों में हुआ है। इसे तो मनुष्य की ही जरूरत नहीं है, अगर मनुष्य की जरूरत है तो खरीदार के रूप में, उपभोक्ता के रूप में। अगर आप खरीदार हैं तो ठीक अन्यथा हटिए, आपकी जरूरत ही नहीं है। हिंदुस्तान के बारे में अमेरिका में एक सेमिनार हुआ था वहां के बड़े-बड़े अर्थशास्त्राी एवं व्यवसायी उपस्थित थे जहां यह तथ्य उभरकर आया कि
हिंदुस्तान में एक अरब से ज्यादा जनसंख्या है, जहां २५ प्रतिशत से ज्यादा मध्यवर्ग है। उन लोगों ने कहा कि तो यह अमेरिका के बाजार के लिए कापफी है। अतः बाकी चिंता करने की जरूरत नहीं अब हिंदुस्तान में इस पूंजीवाद के विकास में एक खास बात यह हुई है कि मल्टीनेशनल कंपनियां हिंदुस्तान में पैदा हो गईं। ये भी पूंजी का निर्यात करने लगी हैं। यहां मल्टीनेशनल होने का अर्थ यह है कि हिंदुस्तान के पूंजीवाद में साम्राज्यवाद का स्वार्थ आ गया है। इसलिए भूमंडलीकरण से इनका जो तालमेल है, वह गहरा है, यह बहुत खतरनाक चीज है।
कबीर ने कहा है कि लाख चौरासी योनि में मानुष जनम अनूप। चौरासी लाख योनियां हैं भी या नहीं, जो भी हो, इसमें मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो सृजन करता है, उत्पादन करता है, उसे ही अनुत्पादक बना दिया गया है। हम साहित्यकार हैं, इसलिए यह उत्पादक एवं सर्जक मनुष्य हमारी चिंता का विषय है और होना भी चाहिए। इस सबको कैसे उद्द्घाटित करें और अपने लोगों, पाठकों को खासकर नई पीढ़ी को बताएं कि यह जो पूंजीवाद है वह मनुष्यता विरोधी, जनतंत्रा विरोधी है। इसने दुनिया भर में एक नए प्रकार की राजनीति पैदा की है। यह पफासिज्म का निर्यात करता है, यह पुराने जमाने वाला पफासिज्म नहीं है। दूसरे देशों में कैसी सत्ता होगी, यह अमेरिका तय करना चाहता है। जब मैं पाकिस्तान में यह बोल रहा था तो उन लोगों ने कहा कि हम ऐसी बातें नहीं कर सकते। यहां पब्लिक सेक्टर हैं, बैरिंग है, उद्योग भी है। इस कारण हमारे यहां थोड़ी बहुत आत्मनिर्भरता है। आत्मनिर्भरता का मतलब साम्राज्यवाद विरोध है। हमारे अर्थतंत्रा में यह विशेषता पब्लिक सेक्टर के कारण है जिसे ये लोग बेचना चाहते थे। वे चाहते हैं कि अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों के अनुकूल राजनीति दुनिया भर में साम्राज्य कायम करे। यह एक नए प्रकार का रिमोट कंट्रोल है। इसलिए हमारा जनतंत्रा भी खतरे में है। हमारी आजादी भी खतरे में है। आजादी का मतलब आत्मनिर्णय का अधिकार है। जनतंत्रा का मतलब है कि हम जनता के हितों के अनुसार व्यवस्था कायम करें। यह संसदीय संप्रभुता है और संसद जैसी भी हो, लेकिन कोई भी व्यक्ति उससे ऊपर नहीं हो सकता है, वह तानाशाह हो जाएगा।
जनता को जाति, संप्रदायवाद के बंधन में, धन के लोभ में बांधकर रख दिया गया है। जितने एनजीओ हैं, ये सारे पूंजीवाद के दायरे में आने चाहिए। इन सबका अध्ययन इसी परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए। बहुत सारे लोग कहते हैं कि वर्गीय दृष्टिकोण भारत के अनुकूल नहीं है। मेरे पास जवाब है कि दुनिया भर में सबसे पहले, कार्ल मार्क्स से भी बहुत पहले वर्ग दृष्टिकोण पर जो चर्चा करने वाला आदमी है, उसका नाम महात्मा बु( हैं उन्होंने 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' कहा था-यह बहुजन है, सर्वजन नहीं। कुछ लोगों को छोड़ दिया था, वे कौन लोग थे, जिनको छोड़ दिया गया। ये उस समय के धनाढ्य लोग होंगे, शासक लोग होंगे, राजा होंगे, बड़े-बड़े व्यापारी होंगे, इन सबको छोड़कर जो समाज है, वह बहुजन है। इसलिए बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की बात कही गई। इसके जवाब में वैदिक समाज वालों ने, वैदिक कर्मकांड वालों ने सर्वोदय या सर्वजन समाज की बात कही है। हम 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की बात करते हैं, बु( ने अद्भुत बात कही है। अंधकार से प्रकाश की ओर मत जाओ। यह तो पलायन है। इसको छोड़कर वहां चले गए। इसमें कौन सी बहादुरी है। जहां अंधकार है, वहीं प्रकाश पैदा करो। बु( ने कहा कि सच खोजने की जरूरत नहीं है। सच सामने है। उसे स्वीकारने का साहस दिखाओ। उन्होंने कहा कि दुःख का कारण है, दुःख का निवारण है और उसका उपाय भी है। उपाय उन्होंने अपने जमाने के हिसाब से बताया। वही उपाय आज लागू नहीं होगा। लेकिन दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निवारण है, ये सत्य है, दुःख का कारण यही निजाम है और यही निवारण भी है, इसी दुनिया में है, यही सच है,
स्वीकार करो, इतना कर लोगे तो तुम्हें मृत्य एवं अमरत्व की चिंता नहीं होगी। यह मृत्यु निःसंगमय है।
राज्यवर्(न : उदारीकरण के बाद से जो हमारे यहां
कॉरपोरेट सेक्टर और मीडिया आया है। उसके पास दृश्य-श्रव्य माध्यम है और हम लेखकों के पास सिपर्फ लेखन है और
जो वैकल्पिक माध्यम हैं वे कमजोर हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया और पत्रिाकाएं हमारी बातों को नहीं कहेंगे, प्रोजेक्ट नहीं करेंगे। अब हमारे पास सिपर्फ लद्घु पत्रिाकाएं बची हैं। लद्घु पत्रिाकाओं का स्वरूप इतना सिमटकर रह गया है कि जो लेखक है, वही पाठक है और ये आम जनता तक नहीं पहुंच पा रही हैं। इसके विकल्प के बारे में आप कुछ बताएं।
खगेंद्र ठाकुर : मीडिया रिलेटिव टर्म है और बाजार के हिसाब से चल रहा है। किसका मीडिया? उसका नियंत्राण किसके हाथ में है? यह समझना होगा।
शमीम पफैजी : एक बार अपने डेली पेपर की गोल्डेन जुबली पर आयोजित सोमिनार का उद्द्घाटन करते हुए लेनिन ने कहा था कि कम्युनिस्ट जर्नलिस्ट आर्गेनाइजर होता है, मोबलाइजर होता है, प्रोपगेंडिस होता है। लेनिन के कथन को हम भूल गए, लेकिन कॉरपोरेट सेक्टर यह समझ गया कि अगर उसे अपने वर्गीय हितों का रक्षण करना है तो मीडिया को अपने कंट्रोल में करना होगा। वैसे आप देख रहे हैं जो जीए/डीए जो कमर्शियल आउट हैं, जो उनकी देखरेख में हैं, वे सारे मीडिया को कंट्रोल कर रहे हैं। यह कोई अचानक नहीं हो रहा है कि मुंबई के उर्दू अखबार 'इंकलाब' जिसका ५०-६० वर्ष का इतिहास है, उसे 'जागरण' समूह ने खरीद लिया है।
खगेंद्र ठाकुर : यह जो पूंजीवादी सत्ता है, वह मुख्य दुश्मन नहीं है, मुख्य दुश्मन इसलिए कह रहा हूं कि वामपंथियों में भी तो मतभेद हैं, इसलिए इतने वामपंथी हैं, नहीं तो क्यों होते। लेकिन कोई वामपंथी वामपंथ को ही अपना मुख्य दुश्मन कहे तो यह चिंता की बात है। जैसे महाश्वेता देवी ने कहा कि ममता बनर्जी वामपंथ का शोकगीत लिखेंगी, वे ऐसा पहले भी बोलती रही हैं, वे अतिवामपंथी शुरू से ही रही हैं। हमारे बीच बंटवारा है, हम आपस में लड़ रहे हैं और यह हमारे दुश्मनों की चाल है।
शमीम पफैजी : प्रगतिशील आंदोलन की तहरीक हमेशा रही है, रहेगी, यह सच है, लेकिन हम सिपर्फ पढ़े-लिखे लोगों में सिमटकर रह जाएंगे, यदि संगठन से न जुड़े। संगठन से जुड़े बिना हम जनता में नहीं पहुंच पाएंगे।
खगेंद्र ठाकुर : जैसे पहले और आज में पफर्क है, भक्ति आंदोलन में कबीर ने जगाया जनता को, रैदास, दादू, नानक, नामदेव सबने जगाया। लेकिन जगाकर कहां ले गए। एक प्रगतिशील आंदोलन ने जनता को जगाया और कहा कि जनता बदल सकती है सत्ता को, किसी के पास जाने की जरूरत नहीं है, ताकत तुम्हारे पास है, जैसा बु( ने कहा था-अप्प दीवो भव। अपने दीपक खुद बनो। यह पफर्क पड़ा है। कबीर का लिखा हुआ प्रगतिशील तो है ही लेकिन प्रगतिशीलता का जो अर्थ उस वक्त था, प्रेमचंद के समय में जो था, वह आज नहीं है... इसको ठीक से पहचानने की जरूरत है।
राज्यवर्(न : संगठन में आने का पफायदा यह है कि
प्रतिरोध की क्षमता बढ़ती है।
खगेंद्र ठाकुर : संगठन के बिना हम लड़ ही नहीं सकते हैं।
ब्रजमोहन : यह एक असुविधा दिखाई दे रही है कि जो संगठन है एक साहित्यिक संगठन हो या उससे मिले-जुले जो राजनीतिक संगठन हैं, कम्युनिस्ट पार्टियां, सीधे-सीधे दोनों के भीतर, परिवर्तन की सदिच्छा है। उसके लिए जो न्यूनतम प्रयास है, वह कम हुआ है। मैं मैक्सिमम ;अधिकतमद्ध प्रयास की बात नहीं कर रहा हूं।
खगेंद्र ठाकुर : पहले तो यह है कि समझ पैदा करें। आज की शोषक शक्ति और पूंजीवाद को पहचानने के लिए हम प्रगतिशील लेखक वातावरण पैदा करते हैं। कोई लेखक यह समझता हो कि हम समाज को बदल देंगे, तो यह ज्यादा है। समाज को बदलने का काम राजनैतिक आंदोलन से ही होगा। लेनिन ने यहां तक कहा है कि क्रांतिकारी क्रांति नहीं करते, जनता करती है। क्रांतिकारी इसकी अगुवाई करते हैं। लेकिन राजनैतिक आंदोलन के बिना सत्ता परिवर्तन या सामाजिक परिवर्तन नहीं हो सकता है। इसलिए लेखकों को राजनैतिक आंदोलन से जुड़ना ही पड़ेगा। इसीलिए मुक्तिबोध कहते थे कि 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है।'
ब्रजमोहन : लेखकों को संद्घर्ष से जुड़ना पड़ेगा। एक समय ऐसा था, जब हम कविता पोस्टर निकालते थे, भेजते थे, अब हमने इसे बंद कर दिया। आज अन्याय होता है,
बदतमीजी होती है, कुछ भी हो जाता है, एक साधारण पोस्टर भी प्रतिरोध में नहीं दिखता है। राजनीतिक पार्टियां भी नहीं जाती हैं, हमारा लेखक समुदाय भी आगे नहीं आता है। इस आग को अब जगाएगा कौन, हम सोचते हैं कि हमारे नेता आगे बढ़ें। तब हम आगे बढ़ेंगे। यह भावना लुप्त होती जा रही हैं। अखिल भारतीय स्तर पर आप लोग प्रमुख आंदोलन से जुड़े हैं। इलैक्ट्रानिक मीडिया की बात छोड़ दीजिए, प्रिंट मीडिया में भारतीय या भारत से इतर जो लेखक हैं, उनमें आपस में संवाद, संपर्क, आदान-प्रदान होना चाहिए, वह गायब है।
खगेंद्र ठाकुर : हम अपना मुकाम पैदा करें। निराला 'राम की शक्ति पूजा' में कहते हैं-'आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर।' प्रेमचंद भी रास्ता दिखा रहे थे। राजनीति को रास्ता दिखाने की हैसियत लेखक को अर्जित करनी होगी।
अली जावेद : जब तक लेखक मशाल लेकर चल रहा था तब तक लेखक आंदोलन की दिशा थे, जो दिशा दे रहा था, उससे लोग जुड़ रहे थे। वे समर्थ लेखक थे। जब लेखक के हाथ से मशाल निकल गई, तब वह आंदोलन कमजोर हो गया।
खगेंद्र ठाकुर : सहिष्णुता द्घटी है। वातावरण गड़बड़ाया है, आलोचना के प्रति असहिष्णुता बढ़ी है, आजीविकावाद हावी हो गया है।
राज्यवर्(न : चुनौतियां उस वक्त से ज्यादा गंभीर हैं। पहले हमारा एक शत्राु था-साम्राज्यवाद या अंग्रेज। वह शत्राु स्पष्ट दिखाई पड़ता था, आज वह दूर से नियंत्राण करता है, इसलिए प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ता। अब हमें द्घर, परिवार के अंदर और अपने भीतर लड़ना है। मजाज ने जो अपनी आखिरी गजल पढ़ी उसका आखिरी शे'र है
'जमाने से आगे बढ़िए मजाज
जमाने को आगे बढ़ाना भी है'
मेरे खयाल में आप जो कह रहे हैं प्रगतिशील आंदोलन और आगे भी जा सकता है।
ब्रजमोहन : जहां तक सांप्रदायिकता के खतरे की बात है, यह विचारणीय है कि आज के समय में सांप्रदायिकता के खतरे बढ़े हैं या कम हुए हैं?
अली जावेद : बढ़े हैं।
खगेंद्र ठाकुर : अब हमें समझने में कठिनाई हो रही है कि साम्राज्यवाद किस तरीके से हमारे लिए खतरे पैदा कर रहा है। बहुत से तरीके हैं, वातावरण के रूप में, इस समय वह इस स्थिति में हैं कि लीबिया का ही वाकया ले लीजिए। वहां की जनता के बीच में अपने एजेंट को भेजकर, वहां की जनता को बरगलाकर, जनवाद के नाम पर, जम्हूरियत के नाम पर सारा जो उसका उद्देश्य था, वहां के तेल पर कब्जा करना है, उस देश को तबाह करना है, आर्थिक व्यवस्था को पूरे अीका में, एशिया में ठेस लगी है। आज वह उस स्थिति में हैं कि हमारी जनता को बरगला सकता है। आज यह एक बहुत बड़ा खतरा है।
सेराज खान बातिश : वह लगातार बहकाए जा रहा है। उस समय लेखकों की जरूरत और भूमिका बहुत ज्यादा थी। आज लेखन हमारी प्रथम प्राथमिकता नहीं है।
अली जावेद : इसी कारण आज अदब भी दूसरे दर्जे का पैदा हो रहा है। अगर आपका पहला मकसद अदब हो तो बड़ा अदब पैदा होगा।
ब्रजमोहन : आज के समय में लेखन की चुनौतियां, कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका, पूंजीवाद और सांप्रदायिकता का खतरा बढ़ा है। हमारे जो प्रगतिशील साहित्यकार और कवि हैं उन्हें पब्लिक के बीच जाने का तरीका या कायदा पैदा करना चाहिए।
खगेंद्र ठाकुर : प्रोटेस्ट या प्रतिरोध एक तरह का
आलोचनात्मक यथार्थ है, जबकि हमें आलोचना से आगे बढ़कर वैकल्पिक यथार्थ की बात करनी है। जनता की मनोदशा विकल्प चाहती है। आर्थिक, राजनीतिक सांस्कृतिक
विचारधारात्मक यानी पूरी व्यवस्था का विकल्प...।
 
 
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