फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संस्मरण
पिफर भी प्रवासी ही कहेंगे हाय?
शेखर जोशी
 

जन्म : सितंबर १९३२

'कोसी का द्घटवार', 'नौरंगी बीमार है' और 'बदबू' जैसी चर्चित कहानियों के समादृत रचनाकार। कहानियों की कई किताबें और हाल ही में एक कविता संग्रह प्रकाशित। कई सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित।
सी./ओ. प्रतुल जोशी
डी-८, रेडियो कॉलोनी,
सेक्टर-८, इंदिरानगर,
लखनऊ-२२६०१६, उ.प्र.
मो. ०९१६१९१६८४०

मैं अपनी किशोरावस्था से ही प्रवासी जीवन जीने के लिए अभिशप्त रहा हूं। हिमालय के प्रांगण का हरा-भरा भू-भाग, झरने, वे छोटी-बड़ी नदियां, चीड़ और देवदारु के द्घने जंगल, पफूलों-पफलों से लदे वृक्ष, गो-वंश का सान्निध्य और आत्मीय स्वजन जिनके बीच मेरा बचपन बीता, प्रवास में मेरे सपनों में आकर मुझे बेचैन कर देते। इसी मनःस्थिति के बीच न जाने कब और कहां एक कविता से मेरा साक्षात्कार हुआ :
...याद आते स्वजन
जिनकी स्नेह से भींगी अमृतमय आंख
स्मृति विहंगम को कभी थकने न देगी पांख
याद आता मुझे अपना वह 'तरउनी' ग्राम
याद आती लीचियां, वे आम
याद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भाग
याद आते धान
याद आते कमल, कुमुदिनी और तालमखान
याद आते शस्य-श्यामल जनपदों के
रूप-गुण अनुसार ही रखे गए वे नाम
याद आते वेणुवन के नीलिमा के निलय अति अभिराम

धन्य वे जिनके मृदुलतम अंक
हुए वे मेरे लिए पर्यंक

विपुल उनका आँण, सधा सकता मैं न दशमांश
ओह, यद्यपि पड़ गया हूं दूर उनसे आज
हृदय से पर आ रही आवाज
धन्य वे जन, वही धन्य समाज
वहां भी तो हूं न मैं असहाय
किंतु जीवन भर रहूं पिफर भी प्रवासी ही कहेंगे हाय!
मरूंगा तो चिता पर दो पफूल देंगे डाल
समय चलता जाएगा निर्बाध अपनी चाल...
वह 'तरउनी' ग्राम मेरे लिए 'ओलियागांव' हो जाता। लीचियां और आम, सेब, आड़ू और खुबानी का रूप ले लेते, कुमुदिनी बुरांश में अपनी छवि दिखाती। याद आते अपने धान के खेत, धानरोपाई का संगीतमय वातावरण, याद आते आत्मीय लोगों के मुदुलतम अंक। सब कुछ वैसा ही जैसा कविता में चित्रिात हुआ था। मैं बार-बार इस कविता को पढ़कर अपने मन का बोझ हल्का करता।
छुट्टियों में गांव जाने पर अपने बालसखा बसदा ;बसंत दाज्यूद्ध के साथ, जो शारीरिक रूप से कुछ कमजोर होने के कारण द्घर पर रहकर ही अपनी पढ़ाई पूरी करते और साहित्य प्रेमी थे, इस कविता का पाठ करता। कविता पूरी होते न होते दोनों की आंखें भर आतीं और कंठ अवरु( हो जाते।
गांव से वापिस दिल्ली आकर मैं वर्कशाप की ट्रेनिंग और खेलकूद के बाद रात में अपनी सद्यःअर्जित काव्य भाषा और शिल्प में अपने 'तरउनी' के विरुद रचता :
तज मोअर पथ संकीर्ण
लांद्घ, धान क्षेत्रा विस्तीर्ण
पिफर गह पद-पादुकाएं कर में
रख चना-चबैना गठरी सिर में
छेड़ क्रु(-सरिता-वेग से यु(, कर पार
रणमण के निकट, विकट कोसी की धार
नगपति गणनाथ के पथ पर
चीड़ देवदारु वन से चलकर
मिलता दुधपीता बालक सा, प्रकृति-अंक में सोया
अपने भूत-भविष्य चिंतन में खोया
छोटा सा एक गांव
जिसके चंचल सरिता धोती पांव

इसी गांव के एक छोर में
धरा के हरित वसन के एक कोर में
खड़ा है मौन
शांति सम्राट सा यह कौन?
यही रे यही मेरा सूना सा द्घर
लिये वेदना पूरित अंतर...
लंबे बरामदों में इस द्घर के
अगणित सिंदूरी पुष्प दाड़िम के धर के
रचे कितने गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह
उन्हीं पुष्पों के बना दुल्हा-दुल्हिन, सेठ-शाह
डंके डोली और निशान

काली की बलि पूजा का स्वांग
रचा, लगा तिनकों की टांग
हरी ककड़ी के अंतर को छेद
छिन्नकर उसका मस्तक बांट प्रसाद
न रखा छूत-अछूत का भेद
...यहीं तो सांध्य बेला में
लौट, थका-मांदा खेल-मेला में
धर देव स्थान में आसन
पिता के समकक्ष करता मंत्रा जापन
भवन होता गुंजरित
जब मैं अष्टक, चालीसा, स्तोत्राादि करता उच्चरित
था कितना विश्वास और कितनी भक्ति!
उन तांबे, चांदी, पीतल के देवों पर कितनी अनुरक्ति!
सोचता था उनकी है अपराजित, अदम्य शक्ति
इसीलिए तो कभी हो जाती पूजा में यदि अबेर
शंकाएं लेती भोले मन को द्घेर-द्घेर
अपराधी सा कर ईश्वर के गुणगान
कहा हे भगवान!
दे दो मुझे आज क्षमादान
कल दो आवृत्ति पाठ कर दूंगा...
प्रवासी मन की पीड़ा को ऐसी मार्मिक अभिव्यक्ति देने वाले अपने प्रिय कवि से पहली बार कहां साक्षात्कार हुआ यह आज ठीक-ठीक याद नहीं, लेकिन निश्चय ही यह मुलाकात दिल्ली में किसी साहित्यिक संगोष्ठी में हुई होगी। शायद दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की साप्ताहिक संगोष्ठी के उत्साही संयोजक विजय जैन उन्हें किसी सप्ताह मुख्य अतिथि के रूप में ले आए हों। नागार्जुन ने मुझसे भी पता-ठिकाना पूछा, द्घर-गांव की जानकारी ली और दिल्ली में रहने का प्रयोजन जानना चाहा। मैं उन दिनों दिल्ली छावनी में ई.एम.ई. कोर में प्रशिक्षु था और वहीं अन्य छात्राों के साथ हॉस्टल में रहता था। साहित्य और साहित्यकारों का आकर्षण मुझे दिल्ली खींच लाता था। दिल्ली तब पचास के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इतनी जन संकुल नहीं थी। मन में इतना उत्साह और शरीर में इतनी ऊर्जा थी कि दिल्ली कैंट से पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के निकट दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी तक की यात्राा और वापसी हम साइकिल चलाकर पूरी कर लेते थे। शनिवार को आधे दिन की छुट्टी रहती थी इसलिए मेरा सप्ताहांत अपने मौसेरे भाई हरीश दा के द्घर जी-१५३, सरोजनी नगर ;तब विनय नगरद्ध में बीतता था। यही सब कुछ मैंने नागार्जुन जी को बताया होगा।
नागार्जुन जी तब तक बिहारी समाज में बहुत प्रतिष्ठित हो चले थे। दिल्ली में उनके कई अड्डे थे, जहां वह दिल्ली प्रवास में अपना डेरा जमाते। विनय नगर में भी संभवतः ऐसा ही एक आत्मीय मैथिल परिवार रहता था। एक रविवार को मैं हरीश दा के क्वार्टर में बैठा वहां रखी हुई पत्रिाकाएं पढ़ रहा था। भाई साहब की मित्रा मंडली ताश खेलने में व्यस्त थी। तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा नागार्जुन जी खड़े हैं। उस कमरे में उपस्थित सभी बाबू वर्ग के लोग पढ़े-लिखे थे बल्कि कुछ तो गंभीर साहित्य रसिक भी थे। नागार्जुन जी को अपने बीच पाकर सभी विस्मित और
प्रपफुल्लित थे। उनकी नजरों में मेरा भी भाव बढ़ गया होगा। संक्षिप्त जलपान के बाद नागार्जुन जी ने आदेश दिया, 'चलो,
बारान्निकोव से मिल आते हैं।'
मेरे लिए इस नाम का बड़ा आकर्षण था। कुछ अर्सा पहले राहुल जी ने चैम्सपफोर्ड क्लब में एक संगोष्ठी में प्रसि( हिंदी सेवी रूसी विद्वान बारान्निकोव के संबंध में भाषण दिया था और उनके द्वारा रूसी भाषा में अनूदित रामचरित मानस के कुछ अंशों का पाठ भी किया था। इस अनुवाद की यह विशेषता थी कि दोहा-चौपाई को उन्हीं छंदों में रचा गया था और सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि बारान्निकोव कभी भारत नहीं आए थे। प.अ. बारान्निकोव इन्हीं महापुरुष के सुपुत्रा हैं और तब सोवियत दूतावास में सांस्कृतिक सचिव के पद पर आसीन थे। वर्ष १९५३ या ५४' को उस रविवार के दिन मृदुभाषी हिंदी विद्वान प.अ. बारान्निकोव से क्या बातें हुई थीं, यह आज याद नहीं। क्या यह संयोग है अथवा उस मुलाकात की याद उन्हें रही होगी कि कुछ वर्षों के अंतराल के बाद मुझे लेनिनग्राद से उनका एक पत्रा मिला जिसमें 'आजकल' में प्रकाशित मेरी कहानी 'परिक्रमा' की चर्चा थी और कहानी संकलन भेजने का आग्रह था। कालांतर में उन्होंने मेरी कुछ कहानियों का रूसी भाषा में अनुवाद भी किया।
मैं सितंबर, १९५५ में इलाहाबाद चला आया था। इलाहाबाद नागार्जुन के लिए भी दूसरा द्घर था। उन दिनों वे
उपेंद्रनाथ अश्क द्वारा संपादित प्रकाशनाधीन साहित्य संकलन 'संकेत' के लिए अपना लद्घु उपन्यास 'वरुण के बेटे' लिखने के लिए इलाहाबाद में टिके हुए थे। मैं दिल्ली से साथ आए तीन अन्य सहपाठियों के साथ मधुवापुर में रहता था। वह भवन तब 'डिप्टी साहब का बंगला' कहलाता था, अब 'बांगड़ धर्मशाला' के नाम से जाना जाता है। एक परिचित सज्जन के संपर्क से बंगले का एक भाग हमें किराए पर मिल गया था। दो-तीन अन्य साथी जुट गए और एक महाराजिन के सहयोग से हमारा मेस सुचारु रूप से चलने लगा था। मेरी कुछ रचनाएं तब तक 'कहानी', 'कवि', 'साहित्यकार', 'राष्ट्रवाणी' और 'नया पथ' इत्यादि पत्रिाकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं। पहली बार 'साहित्यिकी' की गोष्ठी में 'दाज्यू' कहानी पढ़ने के बाद कमलेश्वर ने अश्क जी के आदेश पर 'संकेत' के लिए जो रख लिया था। इसकी चर्चा स्थानीय साहित्यकारों में हुई होगी। प्रगतिशील खेमे और 'परिमल' ग्रुप में नगर के उदीयमान रचनाकारों को अपने दल में शामिल करने की होड़ लगी रहती थी। एक दिन
लक्ष्मीकांत वर्मा अचानक द्घर पर आ गए। वह पड़ोस में ही सरयू कुटीर में रहते थे। मुझे बहुत अच्छा लगा। उन्होंने 'नई कविता' के आगामी अंक के लिए कविताएं देने का आग्रह किया। कथाकार ज्ञानप्रकाश से परिचय हो गया था। वह भी यदा-कदा आ जाते। मेरे साथी लोग सभी पश्चिमी सीमा प्रांत और विभाजित पंजाब प्रदेश के रहने वाले थे। उनके भाषाई संस्कार उर्दू और पंजाबी के थे। हमारी साहित्य चर्चा सुनकर वे मंद-मंद मुस्कुराते। हद तो तब हो गई जब एक दिन किसी साहित्यकार के आगमन की सूचना देने के लिए मेरे प्यारे साथी तरसेम लाल बसरा ने दरवाजे से ही पुकारकर कहा, 'ओए जोशी, तेरा कोई गद-पद आया ई।' बसरा का आशय आगंतुक की पहचान साहित्यकार होने से रही होगी। उपयुक्त शब्द न मिलने के कारण उसने अपनी सहजबु(ि से इसका पर्याय खोजकर 'गद्य-पद्य' का पंजाबी रूपांतर
प्रस्तुत कर दिया था। मैं अंदर के कमरे से बाहर आया तो देखा सामने नागार्जुन खड़े हैं। वे द्घर खोजते-खोजते मेस में पहुंच गए थे।
ऐसा नहीं नागार्जुन जी ने बसरा के शब्द नहीं सुने हों, यह उनका बड़प्पन था कि उन्होंने इस संबंध में कुछ नहीं कहा। यह भी हो सकता है कि पंजाब में दीर्द्घ काल तक रहने के कारण
उन्होंने 'गद-पद' की मन ही मन सही व्याख्या कर ली हो।
इन विडंबनापूर्ण स्थितियों से मुक्ति पाने और पढ़ने-लिखने के लिए एकांत की तलाश में मैं कुछ समय बाद मेस छोड़कर साउथ मलाका के एक लॉज में रहने लगा था। ज्ञानप्रकाश जी ने बताया कि अमरकांत भी कुछ समय तक उस लॉज में रह चुके थे।
नागार्जुन युवा रचनाकारों के कृतित्व से परिचित होने और उन्हें उत्साहित करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। अपने समकालीन लेखकों, कवियों के साथ बतकही, हंसी-मजाक और साहित्यिक विमर्श के लिए वह नगर के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच जाते। इन लोगों में आलोचक प्रकाशचंद्र गुप्त, शमशेर बहादुर सिंह, भैरवप्रसाद गुप्त, अमृत राय, श्रीकृष्ण दास, उदय नारायण तिवारी, भगवतशरण उपाध्याय उनकी आत्मीयता की परिधि में थे। युवा रचनाकारों में मार्कंडेय, कमलेश्वर, अमरकांत, अजित पुष्कल, बद्रीनाथ तिवारी, दीनानाथ सरोदे, शिव कुमार सहाय और अन्य कई लोग थे जिन्हें वह अपना समझते थे। मार्कंडेय उनके लिए 'लल्लू' थे, कमलेश्वर 'कमल' और अजित पुष्कल 'इकबाल'। कहते थे, जब इलाहाबाद से बाहर रहता हूं और तुम लोगों की याद सताती है तो प्रत्येक के नाम की दस बार आवृत्ति कर लेता हूं, तब चैन मिलता है।
इलाहाबाद में नागार्जुन स्वयं को कभी बाहरी नहीं अनुभव करते थे। नगर की साहित्यिक गतिविधियों में वह खूब सक्रिय रहते थे। इसका एक ताजा प्रमाण मुझे हाल ही में मिला है। अखिलेश द्वारा संपादित 'तद्भव' के किसी अंक में भगवतशरण उपाध्याय को विभिन्न लोगों द्वारा लिखे गए कुछ पत्रा प्रकाशित हुए हैं। उन्हीं पत्राों में एक पत्रा नागार्जुन का भी है। लिखते हैं : इधर हमने 'परिचय' नाम की एक नई संस्था शुरू की है। इसके मंत्राी शेखर जोशी हैं। 'परिचय' की अगली बैठक के लिए वह तो आपको पत्रा लिखेंगे ही, मैं भी आग्रह कर रहा हूं कि आप अवश्य आएं।
प्रगतिशील धारा के रचनाकारों को जोड़ने के लिए
'साहित्यिकी' संस्था की नींव पड़ी थी। एक लंबे अर्से तक इसके संयोजक कमलेश्वर रहे। कमलेश्वर के दिल्ली चले जाने के बाद बैठकों का सिलसिला खत्म हो गया। सभी को यह रिक्तता खलने लगी थी। तब भैरव जी, प्रकाशचंद्र जी और अश्क जी के सुझाव पर मैंने 'परिचय' की शुरुआत की थी। बैठकों का सिलसिला पिफर पूर्ववत हो गया। इसमें नागार्जुन की निश्चय ही प्रेरक भूमिका रही। उन दिनों पफणीश्वरनाथ 'रेणु' भी इलाहाबाद में पोनप्पा रोड पर रहकर 'परती परिकथा' लिख रहे थे। नागार्जुन उन्हें भी 'परिचय' की गोष्ठियों में ले आते। दोनों मैथिली भाषियों के परस्पर संवाद में क्रिया पद में 'छ' व्यंजन की प्रमुखता मुझे कुमाऊंनी बोली की प्रतीति कराती थी। दिसंबर, १९५७ में संपन्न हुए ऐतिहासिक लेखक सम्मेलन की तैयारियों के समय नागार्जुन इलाहाबाद में नहीं थे। इस सम्मेलन के प्रस्तावकों में प्रकाशचंद्र गुप्त, श्रीकृष्ण दास, भैरवप्रसाद गुप्त, श्रीपत राय, त्रिालोचन शास्त्राी, अमृत राय, नामवर सिंह, मार्कंडेय, कमलेश्वर, केदारनाथ सिंह, अमरकांत और शेखर जोशी थे। यूं तो सम्मेलन का द्घोषित विचारणीय विषय 'स्वाधीन भारत और लेखक' था, लेकिन मनुष्य विषय पर विद्वानों के भाषणों के अतिरिक्त साहित्य की विभिन्न विधाओं पर पृथक-पृथक गोष्ठियों में विचार विमर्श और कवि सम्मेलन का प्रावधान रखा गया था। अलग-अलग कमेटियां बनाकर
लोगों को कार्यभार सौंपा गया था। मुझे कवि सम्मेलन के संयोजन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मार्गदर्शन के लिए मैंने सीधे नागार्जुन जी को पकड़ा और पटना के पते पर उन्हें पत्रा लिखा। तत्काल १ नवंबर '५७ को पटना से भेजा उनका कार्ड मिला :
...सम्मेलन वाला तुम्हारा कार्ड आज शाम को ही मिला है। अभी रात के ११ः३० हो रहे हैं। दिन भर का थका-मांदा लौटा हूं, विद्यापति पर्व की तैयारियां चल रही हैं न! ५-६ नवंबर को यह समारोह प्रतिवर्ष यहां की मैथिली जनता धूमधाम से मनाती है...!
'सांस्कृतिक कार्य समिति' से मालूम हुआ... ठीक है। कवि सम्मेलन तो होना ही चाहिए, बाहर से पफीसबाज कवियों को नहीं बुलाना है। इतना ध्यान रहे... कहां से इतनी रकम जुटाएंगे? इप्टा के बारे में जो लिखा, संगत जंचता है।
सम्मेलन के बारे में ज्यादा तो कुछ मालूम नहीं हुआ। एक कमल का और एक अमृत का खत मिला। परिपत्रा छपे होंगे, भिजवाओ न! मैं नवंबर के अंत तक आ सकूंगा। आना ही होगा...। आऊंगा ही।
शेष, पत्रा जल्दी-जल्दी लिखो।
-नागार्जुन, तुम्हारा
'आना ही होगा...। आऊंगा ही' पत्रा जल्दी-जल्दी लिखो।'
तब जीवन के सैंतालीसवें वर्ष में चल रहे नागार्जुन का यह युवकोचित उत्साह आपको प्रभावित नहीं करता?
कहना न होगा कि मेरे आग्रह पर नागार्जुन ने कवि सम्मेलन के संचालक की भूमिका निभाई। लेखक सम्मेलन का यह कार्यक्रम भी बहुत सपफल रहा।
नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली कवियों को आगे बढ़कर मंच सुलभ कराना उनका प्रिय शगल था। वर्षों पूर्व कवि
आलोक धन्वा पहली बार इलाहाबाद आए थे। हो सकता है, नागार्जुन जी उन्हें अपने साथ ही पटना से लेकर आए हों। मेरे द्घर पर उनके काव्य पाठ का कार्यक्रम रखा गया। शहर में दूत दौड़ाए गए, जहां-जहां पफोन की सुविधा थी वहां पफोन से सूचना दी गई। बहुत शानदार संगोष्ठी रही। आलोक धन्वा इलाहाबाद में अपनी छाप छोड़कर गए।
इसके साथ ही एक और गोष्ठी की याद आती है जिसके मूल में भी नागार्जुन ही थे। नगर की एक हिंदी सेवी संस्था ने संभवतः हिंदी दिवस पर उनको कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए दिल्ली से इलाहाबाद आने का निमंत्राण भेजा। नागार्जुन जी का स्वास्थ्य ठीक रहा होगा और पिफर इलाहाबाद का आकर्षण तो ठहरा ही। नागार्जुन आए और साथ में एक नामचीन कवि और काव्य पत्रिाका के संपादक को भी लेते आए। सोचा होगा, साथी कवि को भी पारिश्रमिक और मार्ग व्यय दिला देंगे, यात्राा में साथ हो जाएगा। कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ। कुछ कवियों के काव्य पाठ के बाद श्रोताओं के आग्रह पर नागार्जुन जी ने भी कविताएं सुनाईं। एक-एक कर अन्य कवि बुलाए गए लेकिन दिल्ली से नागार्जुन के साथ आए कवि महोदय को आमंत्रिात नहीं किया गया। आयोजकों ने आर्थिक कारणों से अपनी लाचारी प्रकट कर दी। नागार्जुन बहुत दुखी हुए और कुपित भी। वहीं उसी समय उन्होंने मंच से आयोजकों की भर्त्सना करते हुए उन सभी पाठेच्छु कवियों को, जिन्हें यहां काव्य पाठ का मौका नहीं मिला था, आश्वासन दिया कि आगामी रविवार को सायं ५ बजे १००, लूकरगंज में एक गोष्ठी होगी। वे लोग वहां आएं और अपनी कविताएं पढ़ें। यह द्घोषणा मेरी अनुपस्थिति में नागार्जुन जी ने साधिकार की थी। मैं कवि सम्मेलन में नहीं जा पाया था। मेरे साहित्य प्रेमी पड़ोसी चतुर्वेदी जी ने दूसरे दिन प्रातःकाल मेरे द्घर पर आयोजित होने वाली गोष्ठी की सूचना मुझे दी थी। नागार्जुन जी का आदेश तो पालन करना ही था। खूब अच्छा जमावड़ा रहा। नागार्जुन जी ने ही गोष्ठी की अध्यक्षता की और संचालन भी करते रहे। एक कविवर बहुत लंबी कविता लेकर सुनाने बैठे तो श्रोता अधीर होने लगे, नागार्जुन जी ने अध्यक्षीय हस्तक्षेप किया, 'महाकाव्य है क्या?' समवेत हंसी का पफव्वारा पफूटा और उन सज्जन को अपनी अति का भान हुआ।
गोष्ठी की समाप्ति के बाद जाते-जाते नागार्जुन जी ने सूचित किया कि वह कल आएंगे और भोजन भी यही करेंगे। मैंने पूछ लिया, 'मछली चलेगी?'
मुदित मन बोले, 'ये कोई पूछने की बात है? रोहू यहां मिल जाती है?'
उनकी रसना के संबंध में उन्हीं के द्वारा कही गई बातों से थोड़ा-बहुत ज्ञान हो चला था। एक बार उन्होंने बताया, 'श्रीलंका से लौटने के बाद भोजन में मछली का अभाव बहुत खलता था। हमने एक तरकीब निकाली। बाजार में कहीं-कहीं मछली का चूर्ण मिलता है। हम एक-दो डिब्बे ले आते और दाल में चूर्ण मिला देते तो स्वाद आ जाता। कई सात्विक लोगों के बर्तन-बासन हमने पवित्रा किए हैं।' वह खिल-खिलाकर हंसते।
मैंने मछली की दावत तो दे दी लेकिन तभी खयाल आया कि पितर पक्ष चल रहा है, पड़ोसी चतुर्वेदी परिवार को मालूम पड़ गया तो बहुत पफजीहत होगी। चंद्रकला ने समाधान निकाल लिया। द्घर के सामने बंग परिवार के सहयोग से उन्होंने झोल वाली मछली बनाई। नागार्जुन जी ने रुचि लेकर भोजन किया। कौन-कौन से अचार द्घर में हैं इसकी जानकारी ली और उनका भी स्वाद लिया। चंद्रकला जी सोचें कि नागार्जुन जी अब उनकी पाक कला की प्रशंसा करेंगे। लेकिन जब उधर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई और इनके धैर्य का बांध टूटने लगा तो इन्होंने स्वयं ही पहल की-
'मछली ठीक बनी थी?'
नकियाए स्वर में नागार्जुन जी ने उत्तर दिया, 'हमारी
अपराजिता जी सरसों लपेटकर बनाती हैं।'
पिफर जैसे कुछ एहसास हुआ हो, थोड़ा रुककर, बोले, 'ठीक बनी है।'
उसके बाद नागार्जुन जी दो-तीन दिन लूकरगंज में रहे थे। बच्चे उनकी उपस्थिति से बहुत प्रसन्न रहते। यह स्वाभाविक था, क्योंकि हमारे तीनों बच्चों ने 'अकाल और उसके बाद' और भवानीप्रसाद मिश्र की 'गीत पफरोश' कविता के बल पर अपने स्कूल कार्यक्रमों में बहुत बार पुरस्कार बटोरे थे।

 
अप्रैल, १९६२ में जब हम लूकरगंज में रहने के लिए आए तो हमारी पहली संतान जिसे हमने लाड़ से पुतुल नाम दिया था, एक माह का था। जून माह में नागार्जुन आए तो बच्चे की मां ने उनसे बच्चे को अच्छा सा नाम देने का अनुरोध किया। यह भी बताया कि बंगालियों की तर्ज पर इन्होंने इसे पुतुल कहना शुरू कर दिया है। यह तो लड़कियों का नाम होता है।
'अरे भाई, ये प्रतुल कुमार हैं' नागार्जुन जी ने तत्काल उनकी समस्या हल कर दी थी।
द्घर में नागार्जुन जी की उपस्थिति एक पारिवारिक बुजुर्ग की हैसियत रखती थी। वह पूरे अधिकारपूर्वक द्घर में रहते थे। जब आवश्यक हुआ, अपना तेवर भी दिखा देते थे। यह अनुभव वाचस्पति जी, अजित पुष्कल और अन्य सभी लोगाें का होगा जिन्हें
उनका सान्निध्य मिला है।
भोजन के पश्चात गुड़ की डली मांगकर नकार के उत्तर में सौंपफ की मांग और पिफर उसके भी अभाव में तीखे स्वर में 'खड़ा धनिया है?' का स्वर किसी भी अकुशल गृहिणी को भविष्य में इन चीजों को सहेजकर रखने को सचेत कर देता होगा। यही उनका आत्मीय व्यवहार था जो उनकी प्रतीक्षा करवाता था।
वर्ष १९४३ में जब संदर्भित कविता 'सिंदूर तिलकित भाल' लिखी गई थी, तब की बात और थी यायावरी का जीवन रहा था। वैद्यनाथ मिश्र 'नागार्जुन' बन चुके थे लेकिन तब तक जगत 'बाबा' नहीं बने थे। १९९८ तक आते-आते बाबा कितने प्रदेशों में, कितने नगरों-कस्बों में, कितने गृहस्थों में पारिवारिक सदस्य के रूप में प्रतिष्ठित हो चले थे। स्नेहीजन उनकी राह देखते, बहुएं बाबा की प्रतीक्षा करतीं और बच्चे तो बहुत दिनों तक बाबा की अनुपस्थिति से अधीर हो उठते।
पूछने का मन होता है, 'तब तो बाबा आपके मन की स्थिति-'किंतु जीवन भर रहूं पिफर भी प्रवासी ही कहेंगे हाय! -वाली नहीं रही होगी न?'
 
 
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