फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
स्मृति शेष
कामतानाथ का यों चुपचाप चले जाना
 
बलराम

 

अपनी पहली चर्चित कहानी 'छुट्टियां' से कामतानाथ बड़े कद के कथाकार के रूप समकालीन कथा परिदृश्य पर उभर आए थे। वस्तुतः वही था शिखर की ओर उनका उठान और उड़ान बिंदु। इस कहानी में कथानायक का छोटा भाई द्घर में अपफीम रखता है, जिसके अपराध में पुलिस उसे पकड़ ले जाती है। होली की छुट्टियों में जब कथानायक विपिन द्घर आता है तो उसे इसका पता चलता है। मां उससे छोटे भाई को छुड़ा लाने का आग्रह करती है, क्योंकि मंझले भाई को इसकी कोई चिंता नहीं। किसी तरह भाग-दौड़कर विपिन छोटे भाई को छुड़ा लाता है और पारंपरिक ढंग से होली का त्यौहार संपन्न होता है। बस, इतनी सी बात पर कामतानाथ ने 'छुट्टियां' जैसी बड़ी कहानी लिख दी। संयत और आवेशहीन संवाद, सहजता के साथ मानवीय संबंधों की रागात्मकता और निस्संगता का आख्यान। बड़ा कठिन होता है ऐसी सहजता को हासिल करना, लेकिन 'छुट्टियां' में कामतानाथ ने मानों सहजता के शिखर ही छू लिए। इसीलिए यह कामतानाथ की ही नहीं, उस समूचे दौर की प्रतिनिधि कहानी है। इस कहानी के परिवेश, पात्रा, शिल्प, भाषा और स्थितियों में ऐसा अपनापन है कि यह पाठक को अपनी ही कहानी लगने लगती है। आस-पास द्घूमते-पिफरते तीन भाइयों और उनकी मां के आपसी रिश्तों में गर्माहट और उनमें पैठ रहे ठंडेपन की कहानी है यह।
प्रमोद कुमार दुबे के संयोजकत्व में हमने एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम की किताब 'बसंत-३' में कामतानाथ की कहानी 'लाख की चूड़ियां' शामिल की, लेकिन वह कामतानाथ के प्रकाशित नौ संग्रहों में से किसी में भी नहीं है। मात्रा यही नहीं, उनकी अन्य साठ कहानियां भी संग्रहों में शामिल नहीं हो सकी थीं। 'लाख की चूड़ियां' समेत उन सब कहानियों को अब कामतानाथ के 'संपूर्ण कहानियां' संग्रह में एक जगह पढ़ा जा सकता है। 'लाख की चूड़ियां' कुटीर उद्योग और शहरी कारखानों के बीच चलने वाली सनातन प्रतिद्वंद्विता का करुण आख्यान है। गांव में रहकर लाख की चूड़ियां बनाने वाले ग्रामीण मनिहार के पस्त-परास्त होने का कारण बनती हैं कारखानों में बनने वाली रंग-बिरंगी चूड़ियां, जबकि उसका जीवन व्यापार कुटीर उद्योगों में बनने वाली लाख की चूड़ियों से ही चल रहा था। गांव में होने वाले शादी-ब्याह के मौकों पर उन चूड़ियों की वजह से उसका मान-सम्मान भी खूब होता था, लेकिन औद्योगीकरण ने धीरे-धीरे उससे उसका सब कुछ छीन लिया। कामतानाथ के नौ संग्रहों में आने से शेष रह गई प्रमुख कहानियां हैं- नास्तिक, बदाली, पफूल का मोल, जिस रात लखनऊ में चिराग नहीं जले, संतान, मुन्ने मियां, बहादुर बाबा, भूतनाथ, स्वर्गवास, कम्युनिस्ट, लड़ाई, अपने-अपने ताजमहल, शरीपफ, पफैसला, रामायण पाठ, मूर्ख, ममी, नौटंकी, द्घड़ा, दलाल, बालकनी, तरबूज, महात्मा बु( की वापसी, मेहमान, शब्द, दंगा, जुम्मन काका, दोस्त, अंजीर का पेड़, गली में शाम, यु(, अंत, गवाह, सुखी दाम्पत्य, क्लर्क, समय और कैद-ए-हयात आदि।
कामतानाथ की सब कहानियां पढ़कर हम जान सकते हैं कि महानगरीय शोर-शराबे से दूर चुपचाप सृजनरत रहने वाले हिंदी के इस उस्ताद कथाकार का रचना संसार कितना व्यापक और वैविध्यपूर्ण है, जहां एक तरपफ गांव में रहने वाले लोगों की जीवन स्थितियों का चित्राण हुआ तो दूसरी तरपफ छोटे शहर से लेकर महानगरों तक के लोग वहां अपने वास्तविक रूप में मौजूद हैं। भिन्न-भिन्न आस्थाओं के मानुष अपने मौलिक रूप में यहां हैं तो ट्रेड यूनियन लीडर और मजदूर भी। इस रूप में देखें तो कामतानाथ जैसा विषय वैविध्य उनके समकालीन किसी भी अन्य कथाकार में नहीं। शायद इसीलिए कमलेश्वर उन्हें खतरनाक मौन अन्वेषण का कथाकार कहते और विश्वंभरनाथ उपाध्याय मानते रहे कि सामान्य विवरण से पर्यावरण के समूचे सत्य को उभारने की कामतानाथ की कला अन्य किसी भी कथाकार में नहीं।
कामतानाथ की कुल एक सौ पैंतीस कहानियां उपलब्ध हैं, जिनमें पफरवरी, १९६१ के 'स्वतंत्रा भारत' में प्रकाशित पहली कहानी 'मेहमान' है तो २००६ में प्रकाशित 'कैद-ए-हयात' भी। इस तरह 'अंत्येष्टि', 'उसका बच्चा', 'सोवियत संद्घ का पतन क्यों हुआ', 'तीसरी सांस', 'शिकस्त', 'निमाई दत्ता की त्राासदी', 'रिश्ते-नाते', 'छुट्टियां', 'जब सिकंदर भारत में परास्त हुआ', 'चिरागां', 'मकान', 'सब ठीक हो जाएगा' और 'संक्रमण' उनकी चर्चित कहानियां हैं। कामतानाथ की पहचान उनके पहले उपन्यास 'एक और हिंदुस्तान' के जरिए एक बार अच्छे उपन्यासकार की बनी तो पिफर वह उनके वृहद उपन्यास 'काल कथा' तक लगातार पुख्ता होती चली गई और उनका शुमार हिंदी के उस्ताद
कहानीकारों में ही नहीं, बड़े उपन्यासकारों में भी होने लगा।
कामतानाथ की कहानियों से जब-जब सामना हुआ, हेमिंग्वे के उपन्यास 'दि ओल्ड मैन एंड द सी' का वह बूढ़ा याद आया, जो अथाह समुद्र में नाव के साथ अपनी जिजीविषा का ऐसा प्रतिमान गढ़ता है, जिसे लिखकर हेमिंग्वे को नोबेल पुरस्कार मिल गया। ऐसे ही कामतानाथ की कहानी 'संक्रमण' ने हजारों पाठकों और दर्शकों को तो अपनी जद में लिया ही लिया, नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेता तक इससे इस कदर अभिभूत हुए कि उन्होंने सौ से अधिक दपफे उसका मंचन कर बार-बार उसकी महत्ता और
प्रासंगिकता उजागर की। किसी लेखक की किसी कहानी का इस तरह थिएटरमय हो जाना अपने आपमें एक इतिहास है। इस रूप में देखें तो 'संक्रमण' कामतानाथ की कुछ वैसी ही महत्वपूर्ण कहानी है, जैसी गुलेरी की 'उसने कहा था', जयशंकर प्रसाद की 'पुरस्कार', प्रेमचंद की 'पूस की रात', रांगेय राद्घव की 'गदल', कमलेश्वर की 'राजा निरबंसिया', मोहन राकेश की 'मलबे का मालिक', राजेंद्र यादव की 'जहां लक्ष्मी कैद है', रेणु की 'तीसरी कसम', शेखर जोशी की 'कोसी का द्घटवार' और मंटो की 'टोबा टेकसिंह' आदि। कामतानाथ को पढ़ते हुए अक्सर हेमिंग्वे की कहानी 'डेथ इन द ऑफ्रटर नून' की कुछ पंक्तियां याद आ जाती रहीं- 'सबसे बड़ी बात है टिके रहकर अपना काम कर लेना। सुनना, सीखना और समझना और जब लगे कि हम कुछ जानते हैं, तब लिखना। न उससे पहले और न ही उससे बहुत देर बाद। जो लोग दुनिया को बचाना चाहते हैं, उन्हें उनकी समग्रता में सापफ-सापफ देख सकें तो पिफर उनका जो भी हिस्सा पूरी ईमानदारी से आप रचेंगे, वह उनकी समग्रता का प्रतिनिधित्व करेगा। असल बात है काम करना और किसी चीज को बनाने की कला सीख लेना।' और कामतानाथ ने वह कला बड़े जतन से सीखी, जिसका सदुपयोग उन्होंने कहानियां और उपन्यास लिखने में बखूबी किया।
कामतानाथ की कहानियों का जिक्र आने पर सहजता की बात न की जाए, यह मुमकिन नहीं। समग्रता और सहजता दो ऐसे गुण हैं, जिनके कारण कामतानाथ प्रेमचंद, रेणु, अमरकांत और भीष्म साहनी की पांत के कथाकार ठहरते हैं। आंदोलनों से संब( रहते हुए भी उनकी लफ्रपफाजी, नारेबाजी, शोरगुल और चीख-पुकार से कामतानाथ की कहानियां प्रायः मुक्त रहीं, हालांकि उनकी
राजनीतिक प्रतिब(ता को उनकी कहानियों में ढूंढ़ना मुश्किल नहीं। उदाहरण के लिए 'छुट्टियां' का एक अंश देखिए : 'जब स्वतंत्राता नहीं मिली थी, तब जीवन मामा कांग्रेस की बड़ी तारीपफ करते थे। स्वतंत्राता मिलने के बाद अब वह कांग्रेस की बुराई और कम्युनिस्टों की तारीपफ करने लगे हैं।'
कामतानाथ ने 'मेरी कथायात्राा' में कुछ ऐसे प्रसंग दर्ज कर दिए हैं, जिन्हें पढ़कर उनके कथा संसार में उतरकर अतिरिक्त आनंद पाया जा सकता है। वे बताते हैं कि उनके परिवार में
साहित्यिक माहौल का पूर्णतः अभाव था। पिता अंग्रेजी और उर्दू जानते थे। हिंदी की कोई किताब उनके द्घर में नहीं थी, रामायण और महाभारत तक नहीं। वैसी धार्मिक किताबें उर्दू में थीं, जिन्हें पिता कपड़े में बांधकर रखते थे। अलिपफ लैला, गुल सनोवर और किस्सा हातिमताई जैसी उर्दू पुस्तकें भी थीं, जिन्हें वे दूसरे बस्ते में बांधकर रखते थे। कामतानाथ ने भी शुरू में उर्दू ही पढ़ी और चोरी-छिपे उन किताबों को उर्दू में ही पढ़ा। बहुत बाद में बुआ के द्घर जाने पर गर्मी की छुट्टियों में 'चंद्रकांता संतति' और
'भूतनाथ' आदि किताबें हिंदी में पढ़ने को मिलीं। प्रेमचंद की उर्दू में लिखी कहानियों का संग्रह 'प्रेम पच्चीसी' और 'प्रेम बत्तीसी' पढ़ने पर उन्हें साहित्य का एक नया रूप देखने को मिला।
'शंकर्स वीकली' में अंग्रेजी कविता भेजी तो छपने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के हस्ताक्षरों वाला सर्टिपिफकेट प्राप्त हुआ। प्रारंभ में हिंदी में भी कुछ कविताएं लिखीं, जिनमें से एक को नामवर सिंह ने 'जनयुग' में छापा था। प्रारंभिक कहानियां अरुण, साथी और रेखा आदि सामान्य पत्रिाकाओं और 'स्वतंत्रा भारत' और 'नवजीवन' जैसे तब के बहुपठित अखबारों के रविवारीय परिशिष्ट में छपती रहीं, जिनका अब कुछ अता-पता नहीं। ऐसी दस-बारह कहानियां शायद कोई शोध छात्रा तत्कालीन पत्रा-पत्रिाकाओं से खोज निकाले और वे भविष्य में कामतानाथ की 'संपूर्ण कहानियां' संग्रह में जुड़ जाएं, लेकिन पिफलहाल तो वे उपलब्ध नहीं हैं।
प्रारंभ में एक नए लेखक की तरह कामतानाथ भी सोचा करते थे कि उनकी कहानियां कभी छप भी सकती हैं क्या? डर और संकोच के कारण उन्होंने अपनी कोई कहानी कभी छपने के लिए भेजी ही नहीं, हालांकि लिखने वे तभी लगे थे, जब हाई स्कूल के छात्रा हुआ करते थे। स्वाध्याय से उन्होंने हिंदी साहित्य का अध्ययन किया और रचनाकार के रूप अपनी अलग भाषा शैली विकसित की सहज, सरल और सादगी भरा अंदाज-ए-बयां, बेहद-बेहद आत्मीय, विश्वसनीय और प्रामाणिक, लेकिन उनकी पहली कहानी प्रकाशित करवाकर उन्हें प्रकाशन पथ पर अग्रसर करने का श्रेय उनके मित्रा गिरधारीलाल पाहवा को है, जिन्होंने उनकी कहानी 'मेहमान' खुद टाइप करवाकर 'स्वतंत्रा भारत' में भेज दी, जो १९६१ में तत्काल छप गई। प्रोत्साहन पाकर उसी वर्ष 'देवी का आगमन' और 'स्वर्गवासी' जैसी कहानियां लिखीं, जो 'सारिका' और 'कहानी' मासिक में छपीं। उसके बाद लिखी गई कहानी 'लाशें' की बहुत चर्चा हुई। 'उसका बच्चा' उस समय की उनकी दूसरी चर्चित कहानी है, हमारे आस-पास की, द्घर-परिवार की, जमीन से गहरे तक जुड़ी हुई। सहज और स्वाभाविक संवाद लिए एक-एक चरित्रा को उभारती यह कहानी न जाने कब खत्म हो जाती है, रह जाता है जीवन का सच। बच्चे की मृत्यु पर केंद्रित यह कहानी मानवीय रिश्तों की कशमकश को बड़ी कुशलता से अंकित करती है, हालांकि 'लाशें' पर अकहानी की छाया है, लेकिन उसके बाद के दौर में कामतानाथ खुद को उससे प्रायः बचाकर ही आगे बढ़े। 'पहाड़' कहानी कामतानाथ का एक अलग ही रूप हमारे सामने रखती है, जिसमें नई चीजों के प्रति उनका एडवेंचरस रवैया अंकित हुआ है, जिसे बाद में विकसित रूप में उनके उपन्यास 'समुद्र तट पर खुलने वाली खिड़की' में देखा जा सकता है। 'मकान' वर्तमान के साथ अतीत में जीने की कहानी है। कामतानाथ इसमें जगह-जगह नॉस्टेल्जिक हो उठे हैं।
कहानी की अपनी इयत्ता को बचाकर कामतानाथ ने उसे कभी स्लोगन नहीं बनने दिया। कथानायकों को विशिष्ट बु(जिीवी बनाए बिना उन्होंने व्यवस्था को एक्सपोज ही नहीं किया, उसका विरोध भी किया है। इस संदर्भ में उनकी कहानी 'यु(' को पढ़ा जा सकता है। 'पूर्वार्(' कहानी एक ट्रेड यूनियनिस्ट की व्यस्तता की कहानी है, जिसमें उसके पास अपने परिवार तक के लिए समय नहीं। कहानी ट्रेड यूनियनिस्ट की जीवन स्थितियों का महज वर्णन नहीं, बयान भी है, अपने समय की सच्चाइयों का, आदमी के दुख-दर्द और उसकी परेशानियों का, जिससे रचनाकार सीधे तौर पर संब( है और संब(ता शायद बयान की पहली शर्त होती है। असंब( व्यक्ति किसी स्थिति का वर्णन तो कर सकता है, लेकिन उसके बारे में बयान नहीं दे सकता और अपनी रचनाओं में कामतानाथ संब(ता के कायल रहे हैं। शायद इसीलिए एक ट्रेड यूनियनिस्ट के द्घर-परिवार की कशमकश 'पूर्वार्(' में प्रामाणिकता से व्यक्त हो सकी। आत्मकथ्यांश जैसी आत्मीयता और सहजता का संस्पर्श लिए कामतानाथ की यह कहानी देर तक और दूर तक पाठक का पीछा करते हुए उसके मानस में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है।
कामतानाथ ने आत्मस्वीकृतियों में बहुत कुछ बताया है, लेकिन यह नहीं बताया कि उनके एक छोटे भाई भी थे, जो उनसे बहुत पहले दुनिया को अलविदा कह गए- 'विदा-अलविदा'। हां, यही नाम था कामतानाथ के समकालीन और तेजस्वी कथाकार राम अरोड़ा की 'सारिका' में छपकर चर्चित हुई कहानी का। 'सारिका' में 'आँतुशेष' जैसी राम की कहानी पढ़कर हम चमत्कृत हो उठे थे और पिफर 'सारिका' के दिल्ली आ जाने पर राम की ऐसी ही एक अविस्मरणीय कहानी 'यातना' हमने छापी थी, जिसका नायक मनुष्य बने रहने की कोशिश करता-करता पार्टी रोबोट में बदल दिया जाता है। उनकी वह कहानी छापते समय हमें पफणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'आत्मसाक्षी' याद आ गई थी। राम अरोड़ा जैसे तेजस्वी और आत्महंता रचनाकार सिपर्फ और सिपर्फ भुवनेश्वर नजर आते हैं, जिन्हें तो हमने नहीं देखा, लेकिन सोचता हूं तो लगता है कि वे शायद राम अरोड़ा जैसे ही रहे होंगे। राम अरोड़ा और से.रा.यात्राी के साथ हमने और कामतानाथ ने गाजियाबाद और दिल्ली में कई शामें एंज्वॉय कीं, जिनके आधार पर कह सकता हूं कि भुवनेश्वर और राम अरोड़ा जैसे ही प्रखर रचनाकार रहे कामतानाथ, लेकिन ऐसे लोग एक समय में बहुत ज्यादा नहीं होते। भाषा विज्ञानी अरविंद कुमार ने राम अरोड़ा को व्यवस्थित करने के लिए 'रीडर्स डाइजेस्ट' के हिंदी संस्करण 'सर्वोत्तम' में महत्वपूर्ण पद और जिम्मेदारी दी थी, लेकिन किसी दिन अंग्रेज संपादक द्वारा जवाब तलब किए जाने पर राम अरोड़ा ने नौकरी के साथ उसे भी लात मार दी। कमलेश्वर और जितेंद्र भाटिया ने भी राम को मुंबई में व्यवस्थित करने की कोशिश की, लेकिन राम कहीं भी टिक नहीं सके। भावना प्रकाशन से सतीशचंद्र मित्तल ने राम अरोड़ा का पहला और शायद आखिरी संग्रह 'आँतुशेष' और एकमात्रा उपन्यास 'बसेरे' छापा, लेकिन उसके बाद से राम का कुछ अता-पता नहीं। भुवनेश्वर का भी तो यही हस्र हुआ था। भुवनेश्वर और राम अरोड़ा के साथ कामतानाथ के बारे में सोचते हुए मन में सवाल उठता है कि बड़ी प्रतिभाएं अक्सर ऐसी ही क्यों होती हैं?
एक मनुष्य के रूप में और एक लेखक के रूप में भी कामतानाथ का तेज और ताप कुछ-कुछ भुवनेश्वर और राम अरोड़ा जैसा ही रहा, लेकिन उन दोनों की तरह उन्होंने आत्मध्वंस की राह पर बढ़ने की बजाए खुद को आंदोलनों से जोड़ दिया और सर्वेश्वर के शब्दों को अपनी जिंदगी के कागज पर दर्ज कर दिया- दुख तुम्हें क्या तोड़ेगा/तुम दुःख को तोड़ दो/अपने सपनों को/औरों के सपनों से जोड़ दो...। इस तरह दुनिया के दुःखाें से जुड़कर कामतानाथ ने खुद को हिंदी का बेजोड़ कथाकार सि( किया, जिसे उनके उपन्यास 'तुम्हारे नाम' से लेकर भारतीय ज्ञानपीठ से
प्रकाशित आखिरी उपन्यास 'बपर्फ पिछलेगी' तक को पढ़कर महसूस किया जा सकता है, लेकिन हिंदी समाज से प्रतिदान के रूप में जो मान उन्हें मिलना चाहिए था, उस मामले में जमी बपर्फ नहीं पिद्घली तो पिफर नहीं ही पिद्घली, और पिछले दिनों इस दुनिया से वे चुपचाप चले गए। इतने बड़े सर्जक के चले जाने पर देश की राजधानी में एक पत्ता तक नहीं खड़का, न सत्ता की तरपफ से, न प्रलेस-जलेस जैसे वामपंथी संगठनों की तरपफ से, जबकि जीवन भर वे वामपंथ की डोर थामे रहे!
 
 
 
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