फरवरी २०११
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
चिट्ठी आई है
प्रश्नों का उत्तर
'पाखी' का नामवर अंक बहुत पसंद आया। परंतु इस अंक में विजेन्द्र नारायण सिंह के आलेख को जगह नहीं मिलनी चाहिए थी। पता नहीं उनके पेट में नामवर जी के विरु( कितना जहर भरा हुआ था जिसे वे जीवन भर पोसते रहे और इस अंक में उड़ेल दिया। हालांकि उन्हें उनके तमाम प्रश्नों का उत्तर इस अंक के अन्य आलेखों में मिल गया है।
 
शब्बीर हसन, मुंगेर, बिहार
 

पत्रिका पढ़ने का सौभाग्य

'पाखी' पत्रिाका अपूर्व जोशी द्वारा प्रकाशित सही अर्थो में अपूर्व है। मुझे अभी पहली बार इस पत्रिाका को पढ़ने का सौभाग्य मिला। मैं बहुत सी पत्रिाकाएँ पढ़ता हूँ लेकिन पहली बार गुवहाटी में मुझे यह पत्रिाका मिली। मैं इस पत्रिाका से इतने दिनों तक वंचित रहा। संपादकीय लेख बहुत ही सुंदर है इसमें आपने 'अति सर्वत्रा वर्जयेत' का जो विश्लेषण किया है बहुत ही सटीक है। आपने कोई विषय इसमें नहीं छोड़ा है। सभी भाव इसमें है। पत्रिाका के सभी लेख अच्छे हैं।
जी डी के 'रतन' बीकानेर, राजस्थान

रचनाओं का चुनाव अच्छा

बहुत समय बाद 'पाखी' का नवंबर २०१० अंक खरीदा। पता चला कि जोशी जी ने संपादकीय दायित्व प्रेम जी को सौंप दिया है। पत्रिाका में अपूर्व जोशी की कमी तो खलेगी। पत्रिाका पढ़कर ज्ञात हुआ कि प्रेम जी का संपादकीय कौशल कमाल का है। रचनाओं का चुनाव बहुत अच्छा है। कहानियां अच्छी थीं विशेषकर दुर्गेश सिंह की कहानी 'अध्ूरी रात के पूरे सपने'। यह कहानी मन के किसी तह को छूकर निकल गई। अभिज्ञात की कहानी 'एक जीवन का उत्कर्ष' आध्ुनिक समाज के एक विशेष पहलू को दर्शाती है। कुमार विश्वबंध्ु एवं शैलेय की कविताएँ प्रभावित करती हैं। पीढ़ियाँ आमने-सामने एक महत्वपूर्ण आयोजन है।
सुनील कुमार शर्मा, दिल्ली

असलियत जानना अच्छा लगा

जब तब मैं 'पाखी' पढ़ लेता हूँ। होटल मैनेजमेंट का छात्रा होने के कारण अपने विषय की सामग्री पर ज्यादा ध्यान देना पड़ता है। 'पाखी' अच्छी लगती है। नामवर सिंह पर अंक अच्छा लगा। विजेंद्र नारायण सिंह का लेख इस अंक की जान है। नामवर जी के अंध्े चेलों को भले ही यह लेख बुरा लगे। इस लेख को छापने का साहस करने के लिए आपको दाद देना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि हम लोग जीते जी किसी भी आदमी को देवता बना देते हैं। और इसी कारण उसकी कमजोरी जानना, सुनना, पढ़ना पसंद नहीं करते। सोचने वाली बात है कि आज के समय में जो आदमी इतना उफपर गया है वह व्यक्तिगत जीवन में बगैर चालाकी के क्या इतना उफपर जा सकता है? नामवर सिंह अभी हिन्दी के सबसे बड़े आदमी हैं। इसलिए इनकी असलियत जानना अच्छा लगा। विजेंद्र नारायण सिंह को बधई।
इसी अंक में अरुण कमल की कविता गंभीर है। कमेर्ंदु शिशिर, नंदकिशोर नवल, राजीव रंजन गिरि और काशीनाथ सिंह का उन पर लिखा संजोने लायक है। रामबहादुर राय ने भी आवश्यक लिखा है। विमल कुमार कई लोगों को एक साथ 'बटर' लगा दिए हैं। खैर हिन्दी के नए लोग अपने पफायदे के लिए 'बटरबाजी' खूब करते हैं। नवंबर अंक में लताश्री और अभिज्ञात की कहानी कापफी अच्छी लगी। पीढ़ियाँ आमने-सामने में कुछ जरूरी बात भी है। पर इसका दायरा और बढ़ाना चाहिए था। हाशिए पर हपर्फ अब अपनी जगह से शुरू में आ गया है। काश हाशिए के लोग भी ऐसी जगह पा लेते। अदबी हयात हमारे लिए जरूरी स्तंभ हो गया है। केदारनाथ सिंह की कविता पर राजीव रंजन गिरि ने जो जानकारी दी है, उसे पढ़कर सोचने को विवश हो गया। केदारनाथ सिंह जैसा कवि क्या किसानों की तकलीपफ के बारे में भ्रम पफैला रहा है। क्या साहित्य भी किसान की पीड़ा को नहीं समझेगा?
आदर्श अनिकेत, देहरादून, उत्तराखण्ड

यह कागज किसी बेहतर काम आए

अनेक साहित्यिक हलचलों और धराओं को केन्द्र में रखकर चलने वाली पत्रिाका 'पाखी' इन दिनों देश की प्रमुख पत्रिाका बन गई है। भ्रष्टाचार का द्घोड़ा पछाड़ आज जीवन के नैतिक मूल्यों को पछाड़ता जा रहा है। साहित्य की सुर्खियों में भी भ्रष्टाचार है और साहित्यकार बेबस हैं। यह कागज किसी बेहतर काम में आए लेकिन कोई यह तो बताए कि साहित्य से ज्यादा बढ़िया काम और क्या? अपूर्व जोशी का लद्घु लेख केवल संजीदा होने के लिए कापफी है। दिसंबर अंक की पहली कहानी ही पढ़ सका। इस कहानी में बाजारवाद और कंपनीवाद की नामुराद जमीन पर द्घरेलू अपसंस्कृति का पैचवर्क है। कहानी का उत्तरार्( जहाँ संवेदना ज्यादा उभर कर आ सकती थी वहाँ जल्दी ही कहानी का अन्त आ जाता है। 'क्या मनु लौटेगा' शीर्षक क्यों? जबकि हालात का शिकार मनु लौट आता है। यह सही है कि आज के इस ग्लोबल पूंजीवाद में वर्चस्व की दौड़ है जो प्रत्येक वर्चस्वी को तनहा करती जाती है क्योंकि यह दौड़ ईमानदारी की नहीं चालाकियों की है अतः यहाँ सभी खलनायक हैं। आखिर इस खलनायकवादी व्यवस्था का विकल्प क्या है? विकल्प का साहित्य कहाँ है?
वीरेन्द्र आस्तिक, कानपुर, उ.प्र.

साहित्यकार भूत जगाने वाले अद्घोरी

कौन नायक, कौन खलनायक? के सवालों को प्रेम भारद्वाज ने उठाया है। मेरी बुि( तो अध्यात्म के आधर पर ही दुनिया देखती है। दुनिया आज जिसे अध्यात्म कहती है वास्तव में वह अध्यात्म के अक्षर ज्ञान का 'अ' से ज्यादा कुछ नहीं। अध्यात्म में जो व्यक्ति सर्दी-गरमी, सुख-दुख और लाभ-हानि को समान समझता है वही अध्यात्म की पाठशाला में दाखिला पाता है। सर्दी-गरमी, सुख-दुख और लाभ-हानि को समान मानने वालों की मैं बात नहीं कर रहा हूँ। मानना और समझना में उतना ही अंतर है जैसा जन कर जननी बनने और गोद लेकर या एडॉप्ट करके माँ बनने में होता है। ऐसे में मुझे आपको पत्रा लिखने और यह बताने में कि आप अतीत के किस नायक की बातें कर रहे हैं, नायक हैं कृष्ण, केवल कृष्ण, थोड़ी भी झिझक नहीं हो रही कि आप बहुत मोटा देखते हैं। और बहुत पास का ही देख पाते हैं। कृष्ण कोई बहुत पुराने नहीं आप चाहें तो कृष्ण संवत से कृष्ण के काल का पता कर सकते हैं। अगर आप ५/६ हजार साल तक भी नहीं देख पाते तब आपकी दृष्टि बहुत पास देखने वाली ही मानी जाएगी। उसके साथ-साथ आप भीष्म को देख रहे हैं तो कृष्ण क्यों नहीं दिखता, भीष्म का क्या प्रमाण नाम के अलावा। परंतु कृष्ण का प्रमाण तो गीता है। गीता पढ़कर कृष्ण को जाना जा सकता है। भारत के लोग जब गाँध्ी को रोते हैं तब दया आती है उनके भारतीय होने पर। कृष्ण कोई अमेरिका में पैदा नहीं हुए थे भारत के थे, भारत में रहे और हमें भारत दिया। गाँध्ी तो देशी बोतल में विदेशी शराब से ज्यादा क्या थे, गाँध्ी के गुरु हमारे कृष्ण क्यों नहीं हुए। कारण कृष्ण को गुरु बनाना हर ऐरे गैरे की औकात नहीं। अब आप लगे हो, ऐसी ही अनेक को रोने के लिए। भइया जी अंग्रेजी राज ने क्या हमारी बु(ि को इतना हीन बना दिया है कि मुर्दों को ही रोना जगाना हमारी पिफतरत में शामिल हो गया है। हम लोग मुर्दे जला देते हैं जिन्हें जगाने का कोई साध्न ही नहीं होता। मैंने साहित्यकारों को पहिचाना ही अभी। पहले तो मैं साहित्यकारों को बहुत ज्ञानी विद्वान समझता था लेकिन हंस, ज्ञानोदय, पाखी पढ़कर लगा साहित्यकार तो भूत जगाने वाले अद्घोरियों से ज्यादा कुछ नहीं होते। अगर ऐसा नहीं था तो क्या अध्यात्म शब्द का अर्थ अभी तक यूँ छिपा रहता।
अरविंद कुमार जैन, दिल्ली

संवेदनशील कहानियाँ

दिसंबर अंक २०१० देखा। वह अति सुन्दर और विचारणीय लगा। प्रेम भारद्वाज ने संपादकीय में कौन नायक? कौन खल नायक? के संदर्भ में, गाँधी, नेहरू, तिलक, पटेल, लोहिया जे.पी., भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद नायकों के जीवन, चरित्रा, आदर्श एवं देश के प्रति समर्पित सेवाओं का दृष्टांत देकर महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन लोगों में जनसेवा की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी और उनके पूर्वजों ने मातृ-भूमि की रक्षा के लिए मर मिटने के लिए आह्वान किया था। आजकल के नायक और खलनायक किसी भी क्षेत्रा के क्यों न हों, सबकी करनी और कथनी में महा अंतर मिलता है। देश सेवा पहले सी करने की भावना से युक्त कम पाए जाते हैं लोग। देश को लूटने के लिए कैसे-कैसे हथकण्डे अपनाए जाएँ? उस विद्या में चतुर अवश्य हैं।
कर्तव्य परायण्ता के बोध का संपादक महोदय ने निर्भीकता के साथ परिचय करा कर पाठक जगत को हकीकत से रू-ब-रू कराया है। वह धन्यवाद के पात्रा हैं। उनका प्रयास सार्थक हुआ।
'क्या मनु लोटेगा' कहानी में लेखक विजय ने यूरोपीय सभ्यता और आर्थिक व्यवस्था के दरमियान की चर्चा खुलकर की है। जो भारतीय युवक पूंजीवाद के दंश को मिटाने के संबंध में यूरोप में कामधंधे के लिए बस गए आज औपचारिकता हेतु तरसते हैं। लेखक ने इस कहानी में ननुआ कैसे बन गया मिस्टर निकसन से संबंधित सारी बातें बतलाई हैं। ऐसी गंभीर कहानी के पात्रा यूरोप की अर्थ-व्यवस्था को छोड़ कर स्वदेश वापिस आ जाते हैं।
कहानी 'एक अंजाने खौपफ़ की रिहर्सल', लेखक मुशर्रपफ आलम जौकी ने मानव के दिल का दर्द या धर्म की आस्था में कट्टरपन की भावना से ओत-प्रोत प्रस्तुत की है। उन्होंने यह बतलाने की कोशिश की है कि एक सीधा-सादा आदमी धर्म की आड़ में चन्द रुपयों की खातिर अपना दीन-ईमान बेचकर भयंकर आतताई का रूप धारण कर लेता है। कुछ पलों में वह आक्रांत मानव के समस्त समाज को बारूद के ढेर पर-नेस्ताबूद कर देता है। पाकिस्तानी और तालिबानी तानाशाही वाले आंतकियों के नापाक खतरनाक इरादों से भी रू-ब-रू कराया है।
'वह ट्रेन निरंजना को जाती थी' में लेखक संजीव चंदन ने गर्ल्स हॉस्टल की दो हम जोली उभरती हुई यौवनता की नवेलियों के परस्पर आलिगंनव( प्रेम की दास्तान में प्रस्तुत की है सुनिधि और श्यामली के निश्चल प्रेम के इर्द गिर्द कहानी द्घूमती रहती है। गृहस्थ जीवन में प्रत्येक दंपती को एक सुंदर, सुशील और सभ्य कन्या की अपेक्षा होती है। कहानी के मुख्य सूत्राधार पंडित कपिल देव की एक ऐसी वास्तविक कहानी दर्शायी है जिसमें निरंजना नदी को ऐतिहासिक तथ्यों से जोड़ दिया है। निरंजना और रोहिणी नदी की अधिकतर चर्चा बौ( दर्शन में मिलती है। दोनों नदियों की करुणामयी मार्मिक कथा संसार में विख्यात है। सि(ार्थ गौतम के जीवन की मुख्य धारा उन दोनों नदियों पर ही टिकी हुई है। मुनीरका और कटवारिया सराय में ज्यादातर विहार के छात्रा रहते हैं। सुनिधि और श्यामली की अंतरंग मित्राता कटवारिया सराय में पनपकर कुछ अंतराल के बाद अपने गंतव्य को चली जाती है।
पत्रिाका में कमल चोपड़ा की लद्घुकथा के दृष्टांतों से मन कुछ हलका हो जाता है। पाठक कहानियों को पढ़ता-पढ़ता ठिठक जाता है तो लद्घुकथाओं में कुछ सीख की बातों से मन की शांति मिलती है। बल्कि मैं तो यही कहँूगा कि नेक कार्यों की प्रेरणा लद्घुकथा में छिपी रहती है। पृष्ठ-सज्जा और रेखाचित्राों में वंशीलाल परमार और राजेन्द्र परदेशी ने अपने अपने संवेदनशील विचारों को तूलिका के माध्यम से पत्रिाका में प्रस्तुत करके चार-चांद लगा दिए हैं। यह भी कार्य मील का पत्थर है। 'पाखी' पत्रिाका में विविध प्रकार की पठनीय सामग्री और साहित्यिक गतिविधि व पुस्तक समीक्षा भी अपने अपने रंगों में रंग गए हैं। सिने संवाद, यात्राा संस्मरण, खबरनामा, मेरी बात ने इतना बढ़िया और रुचिकर साहित्यिक मसाला प्रस्तुत किया है जिसको पाठक बड़े ध्यान से पढ़कर अपने आपको हर्षोंल्लासित करता है।
जसवन्त सिंह जनमेजय, नई दिल्ली

क्या मनु लौटेगा

दिसंबर २०१० के 'पाखी' का संपादकीय अपनी परंपरा के अनुसार दमदार है। संपादकीय अपनीे समय की सच्चाइयों को पकड़ता है और उन पर चिंता जताता है। इस अंक में दो प्रकार की कहानियां दी गयी है। एक में मैं 'क्या मनु लौटेगा?', 'एक अनजाने खौपफ की रिहर्सल' तथा 'राख होती जिंदगी' को रखता हूँ। दूसरे में 'मेमोरी पफुल', 'ये भी समय है' तथा 'वह ट्रेन निरंजना को जाती है' को। यद्यपि हर कहानी की अलग विशिष्टता है। 'क्या मनु लौटेगा?' अपनी जमीन से कट गए एक युवा और अपने ही देश दुनिया से बंध्े माता-पिता के रिश्तों को उजागर करती है। अमेरिका जिनका स्वर्ग है भारत उन्हें कूड़ा लगता है। पर इस देश में कुछ खूबियां भी हैं। यहाँ अभी बिना कारण कोई किसी को मार नहीं देता। अमेरिका में निजी मानसिक उद्विग्नताओं का शिकार कोई व्यक्ति किसी भी राह चलते को गोली से उड़ा सकता है। अपने देश में भी कमियां हैं पर यह अपना है और हम इसकी कमियों को ठीक कर सकते हैं। अमेरिका में भी खूबियाँ हैं। पर उसकी कमियों का हम क्या कर सकते हैं? इस कहानी के मनु का स्केच बड़ा प्रभावशाली बन पड़ा है। चित्राकार को बधई। 'अनजाने खौपफ की रिहर्सल' विजुअल एप्रोच प्रधन कहानी है। यह अपना संदेश पाठकों तक पहुँचा देती है। मेरी समझ से जौकी साहब ने कहानी में पफेंटेसी और शॉट्स के ज्यादा उपयोग किए हैं। जौकी यदि शॉट्स की संख्या कम करते और उसकी जगह कहानी का नैरेशन बढ़ाते तो उनका मैसेज अध्कि स्पष्ट होता। 'राख होती जिंदगी' का ट्रीटमेंट सही है पर अंत अस्वाभाविक लगता है। 'मैमोरीपफुल', 'ये भी समय है' तथा 'वह ट्रेन जो निरंजना को जाती थी' किस्सागोई के भाषाशिल्प की याद दिलाती है। 'मैमोरीपफुल' और 'वह ट्रेन जो निरंजना को जाती थी' का आरंभिक हिस्सा ज्यादा लंबा है। इसे छोटा किया जाता तो शायद कहानियाँ ज्यादा पावरपफुल बन जातीं। 'ये भी समय है' में भाषा और कथातत्व का संतुलित निर्वाह किया गया है। पर अंत में कहानीकार 'छिपकर रोने' का रास्ता क्यों दिखाता है? मेरी समझ से रोने की खास जरूरत नहीं है। बोलते-लिखते भी रहा जाए तो समस्या सुलझाने का कोई न कोई रास्ता निकल आएगा। प्रमोद कुमार की कविताएँ 'साइकिल से चलते हुए' तथा 'खिलौने' बड़ी आत्मीय और पड़ोसी किस्म की कविताएँ है। अपूर्व जोशी ने संपादन से हाथ खींचा है पर लिखने से नहीं यह खुशी की बात है। किसी कविता की एक पंक्ति है- 'दुख कोई एक रूप गढ़े'। दुख लिखा जाएगा तो साझे में बंट भी जाएगा। उनके लेखन में संवेदनशीलता, बेबाकी और अजब पफक्कड़पन का संयोग है। यह बना रहे।

 
मदन मोहन पाण्डे, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड
 
 
 
 
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