फरवरी २०११
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
सिने सवाद
साझा करने के सभी राजनीतिक पुल हुए ध्वस्त
पुण्य प्रसून वाजपेयी

सुरेन्द्र मोहन की मौत ने दिल्ली में पहली बार एक जगह एक साथ कई धाराओं को जोड़ दिया। राईट, लेफ्रट से लेकर आरएसएस और माओवादी भी सुरेन्द्र मोहन की आखिरी विदाई देने के लिए जुटे। किसी ने इसे ७५ के आंदोलन का जमद्घट माना तो कोई इसे लोहिया के समाजवादी चिंतन का आखिरी पड़ाव मान रहा था। लेकिन दोनों ही समझ में एक समानता बेहद सापफ थी कि समाज के आखिरी व्यक्ति के लिए उठे हाथ के साथ आखिरी पायदान पर बैठे व्यक्ति को भी राजनीतिक तौर पर जोड़ने की पहल। यानी राजनीतिक जब सत्ता के रूप में सामने आये तो वह सत्ताधारी के तौर पर ही खुद को देखने-समझने ना लगे।
सीधे कहा जाये तो सत्ता पाने पर भी वह राजनीतिक विचार बने रहे और संगठन उस रास्ते पर काम करते रहे जिस लीक को चुन कर राजनीतिक धारा की शुरुआत की गयी। असल में गैर कांग्रेसवाद के लोहिया के प्रयोग ने लोहिया के बाद सबसे बड़ी मुश्किल यही खड़ी की विकल्प का रास्ता ही विकल्प की सोच खत्म करने लगा। इसलिए कांग्रेस से इतर जब भी सत्ता किसी राजनीतिक विचारधारा तले गयी सत्ता और राजनीतिक का चेहरा कांग्रेस से ही मेल खाने लगा। और लोहिया के बाद यह सवाल बार-बार खड़ा हुआ कि सत्ता का कोई अलग चेहरा कैसे बन सकता है। इसलिए जनता पार्टी से लेकर अब के एनडीए की पहल और उनसे निकले क्षेत्राीय दलों के कर्णधारों को जब भी सत्ता मिली उसमें विकल्प की सत्ता का कोई चि'' तो कभी नहीं ही देखा गया। उल्टे यह कयास शुरू से ही लगने लगा की सत्ता पाने के बाद किसका कितना कांग्रेसीकरण हुआ। यानी जिस राजनीतिक विचार ने समाज में राजनीतिक गोलबंदी शुरू की सत्ता मिलने के बाद वही राजनीतिक विचार हाशिये पर क्यों चला गया, इस सवाल का जवाब अब के लोहियावादियों के पास किस रूप में कितना है यह तो दूर की गोटी है। लेकिन सुरेन्द्र मोहन की अंतिम यात्राा के वक्त संद्घ परिवार से लेकर माओवादियों से निजी बातचीत में एक तथ्य बेहद सापफ उभरा की राजनीति के नाम पर सत्ता पाने की जो कवायद हो रही है उससे सभी नाराज हैं और संसदीय राजनीति के तौर तरीकों से हटकर कोई विकल्प बनाना चाहते हैं। लेकिन लेफ्रट-राईट या संद्घ या माओवादियों के बीच राजनीतिक सहमति की कोई लकीर खिंचने वाला नहीं है इसलिए सभी को अलग-अलग ही संद्घर्ष करना है और सुरेन्द्र मोहन सरीखे लोहियावादियों की अंतिम यात्राा में शामिल होकर सभी राजनीति में अतित की चूक चुकी लकीर को स्वाहा करने ही पहुंचे हैं।
असल में लोहिया के दौर और अब के दौर में राजनीतिक पहल का सबसे बड़ा अंतर यही है कि लोहिया राजनीति को कांग्रेस के पार ले जाने की कवायद करते हुये देश के हर आम का सवाल राजनीति से जोड़ने में लगे रहे। जबकि अब कांग्रेस की लकीर से मोटी लकीर खिंचने में राजनीति लगी है और आजमन को बहलाकर-पफुसलाकर सिपर्फ एक वक्त की सही सत्ता का स्वाद चखने को कोई भी विचारधारा तैयार है। जिससे उसकी छाती पर भी सत्ताधारी होने का तमका लग जाये। जिससे भविष्य में राजनीतिक तौर पर सत्ताधारियों को जब भी संकट आये तो उसे संभालने सत्ताधारी का दूसरा तबका उसकी मदद के लिये खड़ा हो जाये। असल में लोहिया के दौर के बाद अब समाजवादी राजनीति या पिफर किसी भी धारा की राजनीति लोहिया की सोच तले इसलिये पिफट बैठती नहीं दिखती क्योंकि लोहिया राजनीति में सत्ता का विकल्प पैदा करना चाहते थे और अब की राजनीति सत्ता में द्घुसने के लिये बेताब हैं। लोहिया संद्घ परिवार के सच को भी राजनीतिक तौर पर सत्ता के विकल्प के तौर पर तैयार करने के प्रयोग की हिम्मत रखते थे और उन कांग्रेसियों की आत्मा को भी हिलाने की हिम्मत रखते थे जो परिवारवाद की राजनीति का विरोध कर सीधे जनता के बीच से राजनीति करने पर भरोसा रखते। लेकिन बदले दौर में परिवारवाद की राजनीति और सत्ता के लिये जनता के बदले पिछले दरवाजे से सत्ता भोगने की कुलबुलाहट कितनी तेज है इसका अंदाजा हर राजनीतिक विचारधारा तले देखा जा सकता है।
संसद के ५४३ सांसदों में से जब १५६ सांसद ही जब मम्मी-पापा का नाम लेकर बने हों और २५५ सांसद राजनीतिक परिवारों से ही आते हों तो पिफर यह सवाल उठाना कितना मुश्किल होगा कि संसदीय राजनीति के जरिये विकल्प की बात की जाये। या पिफर समाज के निचले पायदान तो दूर समाज के किसी भी पायदान के नवयुवकों को राजनीतिक तौर पर संद्घर्ष के लिये वैचारिक तौर पर खड़ा किया जा सके। लोहिया विकल्पों के आसरे वैकल्पिक मुद्दों को भी टटोलते थे। यह कोई चुटकुला नहीं है कि प्रधानमंत्राी नेहरू के खिलापफ खड़ा होने के लिये लोहिया उस सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को छूने की कोशिश करते हैं जो समाज हाशिये पर हैं और उदाहरण में नेहरू की रोजमर्रा की जरूरतों में उनके पालतू कुत्ते के मांस और द्घोड़े को मिलने वाले चने से देश के प्रतिव्यक्ति आय पर सवाल खड़ा करते हैं। जाहिर है सत्ता को लेकर इतना आक्रोश तभी किसी में आ सकता है जब वह प्रधानमंत्राी की कुर्सी पाने की लड़ाई के बदले प्रधानमंत्राी की कुर्सी को देश का बोझ उठाने की सोच वाला बनाना चाहता हो। लेकिन वक्त राजनीतिक तौर पर कितना बदल चुका है इसका अंदाजा अब लोहिया के नाम को लेकर राजनीति करने वालों के कद से भी समझा जा सकता है। यह कोई मजाक नहीं है कि लोहिया का नाम लेकर राजनीति करने वाले मुलायम और लालू के परिवार का हर सदस्य समूचे यूपी-बिहार के किसी भी नेता पर उनकी अपनी पार्टी में बारी दिखायी दें और उसी की जी हुजुरी राजनीति का मूल-मंत्रा दिखायी देने लगे। कैसे विकल्प की बात की जाये और कौन सी राजनीति इस दौर में लोहिया को हकीकत के आईने में देखने की हिम्मत करें।
जब कांग्रेस के २०८ सांसदों में ७८ सांसद राजनेता मम्मी-पापा के नाम पर सांसद बने हों और कांग्रेस का विरोध करने वाले बीजेपी के २२ सांसद, बीएसपी के ७ सांसद, सपा के ६ सांसद, एनसीपी के ९ में से ७ सांसद, बीजेडी के १४ में से ६ सांसद और आरएलडी के तो ५ में से पांचों सांसद ही मम्मी-पापा नेता को लेकर संसद तक पहुंचे हों। इतना ही नहीं लोहिया जब संसद में पहुंचने का रास्ता आम चुनाव में संद्घर्ष को ही सही मानते थे और राज्यसभा का उन्होंने हमेशा विरोध किया तो पिफर अब के दौर में राजनीति में सत्ता का मतलब समझना भी जरूरी होगा। देश के प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह देश के किसी भी क्षेत्रा से चुनाव लड़कर संसद तक नहीं पहुंच सकते और उनकी यही कमजोरी उनकी ताकत बन जाती है और वह प्रधानमंत्राी। वह भी उस दौर में जब सत्ता लगातार बदलती रही। और मनमोहन के दौर में ही अचानक देश के राजनीतिक हालात में मनमोहन के नाम पर स्थायित्व ले आया। यानी अब की राजनीति लोहिया की सोच से कितनी दूर जा चुकी है या पिफर राजनीति का किसी भी धारा के सामने अब सत्ता के जरिये देश को समाजवादी चिंतन तले ढालना कितना मुश्किल हो चुका है इसका प्रमाण भी इसी दौर में मौजूद है जब विकल्प के सवाल की सबसे ज्यादा जरूरत देश को है।
वीपी सिंह, चंद्रशेखर से लेकर देवगौड़ा, गुजराल और पिफर वाजपेयी अगर इस दौर को देखें तो वैकल्पिक राजनीति के रास्ते कोई भी निकाल सकता था। क्योंकि इस दौर में गैर कांग्रेसवादी राजनीति सत्ता में थी। लेकिन इस दौर में हर किसी का कांगे्रसीकरण कुछ इस तरह हुआ कि २००९ में जब मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्राी बताकर लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में एनडीए ने चुनाव लड़ा तो जनता ने आडवाणी को पूरी तरह खारिज कर दिया। यानी पहली बार उस राजनीति को जनता ने इस रूप में तो आईना दिखा ही दिया कि कांग्रेस विरोध के जरिये अर कांग्रेस की कार्बन कॉपी बनकर कोई सत्ता में आना चाहते हैं तो पिफर उससे बेहतर पिछले दरवाजे से संसद तक पहुंचने वाले मनमोहन सिंह की ठीक हैं। जिनकी अपनी अहमियत यही है कि वह सोनिया गांधी के विश्वासपात्रा हैं।
यानी संसदीय लोकतंत्रा की नयी धारा में सत्ता जनता के पफैसले से सीधे नहीं निकलती बल्कि प्रधानमंत्राी की जगह किसी कंपनी के सीईओ सरीखा नौकरशाह भी चलेगा। यानी लोहिया की समूची सोच ही इस आधुनिक दौर में खत्म हुई जहां राजनीति का मतलब जनता की सीधी शिरकत और उसी भरोसे यह ऐलान की जिंदा कौमे पांच साल इंतजार नहीं करती। जाहिर है लोहिया के लोग ही जब लोहिया को अपनी सत्ता का हथियार बनाने भर के वास्ते देखते-समझते रहे और आर्थिक सुधार तले नतमस्तक होकर धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था को ही राजनीति का केन्द्र बनाकर अर्थव्यवस्था चलाने वाले बाजार को ही राजनीति का थर्मामीटर मानने लगे तो पिफर लोहियावाद की सोच का मतलब क्या होगा। यहां लोहिया के राजनीतिक प्रयोग तले देश की राजनीतिक समझ को १९५० से १९७० के दौर और १९९१ से २०१० के दौर में आये बदलाव को भी समझना होगा। लोहिया के तमाम राजनीतिक प्रयोग १९७० तक जीवित थे या कहें समूची राजनीति ही १९५०-७० के दौरान लोहिय की धारा तले विकल्प की राजनीति का प्रयोग करने के लिये बेताब थी। इसलिये कांग्रेस से इतर जो भी राजनीतिक प्रयोग किसी भी राजनीतिक धारा तले हुये वह पूरी तरह लोहिया की बनाई लीक पर ही चले। यहां तक की संद्घ परिवार और वामपंथी राजनीति भी कांग्रेस की धारा के खिलापफ समाजवादी सोच के राजनीतिक प्रयोग को करने से नहीं चूकी। और कई मौकों पर साथ आकर खड़ी भी हो गयी।
लेकिन १९९१ में आर्थिक सुधार के साथ ही बीते दो दशकों में यानी २०११ तक के दौर में कोई राजनीतिक धारा लोहिया की किसी सोच को आत्मसात कर पा रही हो ऐसा किसी भी राजनीतिक दलों के जरिये नहीं लगा। अगर मुलायम सिंह ने लोहिया को याद भी किया तो वह लखनऊ में लोहिया पार्क बनवाकर या वहां लोहिया की मूर्ति लगवा कर। इससे इतर चुनाव की समूची प्रक्रिया से लेकर कॉरपोरेट द्घरानों के वर्चस्व और कॉरपोरेट पूंजी के जरिये ही चुनाव मैदान में कूदने के कई कदम आगे बढ़कर सत्ता की जोड़-तोड़ की कॉरपोरेट से साझा करना हो गया। अब की परिस्थितियों में तो कॉरपोरेट पूंजी ही राजनीतिक दलों की राजनीतिक जमीन हो गयी और उस पर खड़े राजनीतिक दलों को जब सत्ता मिली तो कॉरपोरेट हित में ही सारी नीतियों को लागू कर विकास की अनूठी परिभाषा गढ़ने में ही समूची राजनीति लग गयी। दरअसल लोहिया के दौर से कितनी आगे राजनीति निकली थी कितनी पिछड़ी इसका अंदाज इस बात से भी लग सकता है कि राजनीतिक दलों में उन नेताओं का कद सबसे बड़ा होने लगा जिसके पीछे कोई उद्योगपति या कॉरपोरेट द्घराना खड़ा हो। यानी पूंजी को पार्टी तक लाने में जो माहिर नेता निकला उसके लिये राजनीतिक दलों में उनका कद सबसे बड़ा होने लगा। जिसके पीछे कोई उद्योगपति या कॉरपोरेट द्घराना खड़ा हो। यानी पूंजी को पार्टी तक लाने में जो नेता माहिर निकला उसके लिये राजनीतिक दलों की विचारधारा ही रेड कॉरपोरेट बन गयी। इतना ही नहीं इस प्रयोग को पहले तो राजनीतिक दलों ने चुनाव लड़ने की ताकत माना पिफर इस दलाली या बिचौलियापन की नेतागिरी ने समूची पार्टी की राजनीतिक धारा को ही इसी सोच में बदलना शुरू कर दिया। असल में लोहियावादी इस दौर में यहीं चूक गये। चूंकि बाजार अर्थव्यवस्था ने सूमची राजनीति ही जब पूंजी पर आश्रित करनी शुरू की तो उसका विरोध करने के बजाय उस राजनीति में भी आगे बढ़ने के तौर तरीके ही राजनीतिक दलों ने इजाद करने पर जोर दिया। चुनाव लड़ना भर महंगा नहीं हुआ। बल्कि समूची चुनावी प्रक्रिया को ही अगर देखें तो किसी भी राजनीतिक दलों को किसी राज्य या देश में चुनाव लड़ने के लिये करोड़ों रुपये होने चाहिए तभी उसके उम्मीदवार पफॉर्म भर कसते है और चुनाव प्रचार की न्यूनतम जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। जबकि लोहिया ने शुरू में ही इन परिस्थितियों के खिलापफ आवाज उठाई कि कैसे चुनावी प्रक्रिया को आम आदमी से दूर करने की साजिश रची रही है। इसलिए लोहिया ने देश की जड़ पर चोट की। उन्होंने देश के बहुसंख्यक तबके के सच को संसद में बार-बार बताकर सत्ता की रईसी पर सीधी उंगली उठाई।
दरअसल लोहिया ने यूं ही समाज का खाका आर्थिक तौर पर नहीं खिंचा। लोहिया ने साठ के दशक में ही आर्थिक विसंगति से भरे समाज में सबसे निचले पायदान का सवाल यूं ही नहीं उठाया। असल में लोहिया आजादी के बाद से ही इन परिस्थितियों को सूंद्घ रहे थे कि कैसे सत्ताधारी तबका देश में लोकतंत्रा की व्यवस्था को ही हड़पना चाहता है और अपनी सुविधानुसार, अपने मुनापफे के लिये लोकतंत्रा की परिभाषा गढ़ना चाहता है। लोहिया की गैर कांग्रेसवाद की सोच इन्हीं परिस्थितियों से पैदा हुई थी जहां गांधी भी मान रहे थे आजादी को चंद रईसों ने हड़प लिया है और कांग्रेस की राजनीतिक धारा अब इसी लीक को आगे बढ़ायेगी। लोहिया ने इस समझ को १९४७-४८ में ही समझा। इसीलिए संसदीय व्यवस्था को लेकर भी लोहिया लगातार जनता की शिरकत का सवाल कई तरीके से उठाते रहे। लोहिया की सप्त क्रांति भी लोकतंत्रा में आम जन के हक का सवाल उठाती है, और अर्थव्यवस्था का आंकलन भी सामाजिक-आर्थिक समाजवादी दृष्टिकोण को लागू कराने पर जोर देता है। वहीं १९९१ के बाद से उन्हीं मुद्दों के आसरे राजनीति सत्ता पाने के लिये होती रही जिसमें आमजन से हटकर एक राजनीतिक तबका देश में खड़ा हो गया। यानी जनता की भागीदारी राजनीतिक तौर पर बीते दो दशकों में कैसे गायब हुई और कैसे इन्हीं दो दशकों में राजनीति करने वाला तबका जनता से अलग दिखाई देने लगा। यह सब हर किसी की आंखों के सामने है वजह भी यही है कि राजनीतिक तबके के द्घेरे को बढ़ाने के लिये अगर राहुल गांधी राज्य दर राज्य युवाओं को साथ लेने के लिये दौड़ रहे हैं तो दूसरा सच यह भी है कि हर राजनीतिक दल में युवा शक्ति किसी राजनीति विचारधारा की वजह से नहीं बल्कि राजनीतिक रोजगार की वजह से छात्रा कैडर के तौर पर जुड़ी है।
यानी लोहिया जिस राजनीति के आसरे देश को स्वावलंबी बनाना चाहते थे उसी राजनीति ने खुद को स्वावलंबी बनाकर देश को ही कंगाल बना दिया है। और स्वावलंबन की राजनीति का मूलमंत्रा सत्ता हो चुका है। इसलिए विपक्ष की राजनीति भी अब चूक चुकी है। और विपक्ष भी स्थायी सत्ता का हिस्सेदार बन चुका है। ऐसे में लोहिया को अब याद किया भी कैसे जाये यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है क्योंकि लोहिया जहां खड़ा होते थे वहां राजनीति की हर धारा अपने अस्तित्व को दिखलाना चाहती है। और अब के दौर में लोहियावादियों की कड़ी के आखिरी यो(ा सुरेन्द्र मोहन की आखिरी यात्राा के दौरान हर राजनीतिक धारा जब दिखायी दी तो यही लगा अब इस देश में कोई मंच भी ऐसा नहीं बचा जहां विकल्प की राजनीति करने वाली हर धारायें एक साथ जमा होंगी और कोई लोहियावादी भी नहीं बचा जिसकी अंतिम यात्राा में अब हर धारा के लोग जमा होंगे। तो क्या लोहियावाद अब पफूंकी हुई कारतूस है या पिफर लोहिया जनवादी तोप है जिसके गोले से अब भी अलख जगाई जा सकती है। ऐसे तमाम सवाल अब की पीढ़ी में रेंग सकते हैं। ऐसे में लोहिया अब याद क्यों किया जायें या पिफर लोहिया की जरूरत आज कहीं ज्यादा है। यह आप तय किजिये।

;लेखक सामाजिक सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्राकार हैं। वर्तमान में 'जी न्यूज' चैनल के राजनीतिक संपादक।द्ध
२०३, पत्राकार परिसर, सेक्टर-५, वसुंधरा, गाजियाबाद, उ.प्र.

 
 
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