फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•साहित्याकार शेखर जोशी को प्रथम चंद्रयान पुरस्कार २०१० से सम्मानित किया गया। •काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर केंद्रित विशेषांक गल्पेतर गल्प का ठाठ का लोकार्पण। •मदन कश्यप और शरद दत्त करे मिला शमशेर सम्मान। • कथा यू के का पआनन्द साहित्य सम्मान महेंद्र दवेसर दीपक को 'अपनी अपनी आग' एवं कादम्बरी मेहरा को 'पथ के पफूल' के लिये दिया जा रहा है।
 
 
 
अदबी हयात
गुलजार की गुलरेज : राजीव रंजन गिरि

हिन्दी-उर्दू में गीतकारों की मजबूत परंपरा रही है। नरेंद्र शर्मा, माहेश्वर तिवारी, शैलेन्द्र, कैपफी आजमी, रमेश रंजक, गोरख पांडेय, नईम, नीरज, गुल८ाार, जावेद अख्तर, यश मालवीय, अंशु मालवीय, प्रसून जोशी सरीखे खास गीतकारों की श्रृंखला कापफी बड़ी है। इनमें से कुछ ने गीत के साथ-साथ अन्य विधाओं में भी महत्वपूर्ण रचा है। बावजूद इसके मौजूदा मुख्यधारा के साहित्य में इन्हें वाजिब जगह नहीं मिलती है। ऐसा आलम बना हुआ है कि साहित्यक विधाओं के संदर्भ में, गीत को 'शूद्र' का द८र्ाा हो। कभी हरिशंकर परसाई ने, 'व्यंग्य' की ऐसी ही हालत पर क्षोभ प्रगट


करते हुए कहा था कि इसकी स्थिति शूद्र विद्या सरीखी है। बाद में, जब 'व्यंग्य' को तवज्जो मिलने लगा परसाई ने लिखा ''व्यंग्य की प्रतिष्ठा इस बीच साहित्य में कापफी बढ़ी है- वह शूद्र से क्षत्रिाय मान लिया गया है।'' उम्मीद की जा सकती है कि गीत को भी, निकट भविष्य में, महत्वपूर्ण स्थान हासिल होगा।
कुछ महीने पहले पत्राकार रवीश कुमार ने भी प्रसून जोशी को संदर्भ बनाकर साहित्यिक विधाओं में गीत की स्थिति पर सवाल उठाया था। वाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित 'वाक्‌' पत्रिाका ने छठा अंक गुल८ाार पर पफोकस किया है। नए विमर्शों की इस पत्रिाका के लिए स्वाभाविक था कि गुल८ाार जैसे महत्वपूर्ण रचनाकार के पिफल्मी गीतों की रचनात्मकता, भाव विन्यास और प्रभाव-क्षमता को रेखांकित करे। गुल८ाार जैसे रचनाकार, जिन्होंने कई विधाओं और कई जनमाध्यम में अहम काम किया है, को लेकर हिन्दी के साहित्यिकारों या 'साहित्य चिंतकों' का गापिफल रहना इनकी संकीर्णता और सीमा को उजागर करता है। 'वाक्‌' के संपादक सुधीश पचौरी ने ठीक लिखा है कि ''इधर बहुत से मसलों के बारे में समझ के टोटे हैं, ऐसों से शिकायत भी भला क्यों हो?'' यह शुभ संकेत है कि गुल८ाार पर दो युवा रचनाकारों, अमित कुमार और मिहिर पंड्या ने लिखा है। आशय यह कि नये रचनाकार गुल८ाार सरीखे महत्वपूर्ण रचनाकारों की खासियत समझ रहे हैं। इनकी बारीकियों को विश्लेषित करने में सक्षम भी हैं।
'वाक्‌' के इस अंक में किशोर वासवानी से बातचीत के दौरान गुल८ाार का इसरार है ''आप शब्द को आखिरी हथियार समझते हैं बस... जो मैं नहीं मानता... मुझे ये लगता है, ये जो विजुअल-मीडियम्स आए हैं, ये ज्यादा स्ट्रांग हैंऋ इसीलिए आपकी किताब वहाँ तक नहीं पहुँच पाती जहाँ यह सिनेमा पहुँचता है। इसीलिए ये बड़ा माध्यम है, इसी वजह से ये इंटराक्ट करता है... हम जो रीअंलिटि की बात को लेकर खामखाह बैठे रहें अपने पेडस्टल पर चढ़के कि नहीं साहब... वो तो मॅनिप्यूलेशन है... हकीकत में... पज पे मदींदबमउमदज वि बवउउनदपबंजपवद ूीपबी पे ींचचमदपदह... उसकी बढ़त हो रही है....तरक्की हो रही है... वो पीछे की तरपफ नहीं जा रहा कम्यूनिकेशन... तो खामखाह के एक कॉम्पलेक्स में बैठे रहें, कोई मायने नहीं रखता। आज जहाँ कॅमर्शियल सिनेमा है, वहीं कॅमर्शियल लिटॅरेट्युऍर भी है... जो प्युऍर सिनेमा है, वहाँ प्युऍर लिटॅरेट्युऍर भी है... प्युऍर लिटॅ्‌रेट्युऍर से प्युऍर सिनेमा ज्यादा दूर तक जाता है क्योंकि यह मॉडर्न प्रोग्रेसिव मीडिया है।''
युवा पिफल्मालोचक मिहिर पंड्या ने 'गुल८ाार के बहाने' एक गुल८ाार आलेख लिखा है। इसमें कई खास सवालों को समेटा गया है। इन सवालों की जटिलता को परखते हुए गुल८ाार, गुल८ाार की रचना और मसाइल को व्याख्यायित करने की सुंदर कोशिश की गयी है। मिहिर ने लिखा है कि 'सिनेमा एक मास मीडियम है। इसलिए इसके लोकप्रिय होने के लिए जरूरी है कि जन-आकांक्षाओं को वह अपने भीतर शामिल करे। और जन-आकांक्षाएँ स्वभाव से ही सत्ता-विरोधी होती हैं। अमिताभ की यही नाटकीय समाधान और आदर्श की पुनः स्थापना वाली पिफल्में सत्तर के दशक के असंतोष की एक प्रामाणिक तस्वीर भी अपने भीतर समेटे हैं। ...चाहे पिफल्म अपने 'आदर्श अंत' में शशि कपूर के नैतिक चरित्रा की जीत द्वारा व्यवस्था की पुनः स्थापना करे लेकिन यह सापफ है कि उन तमाम पिफल्मों का नायक हमेशा 'विजय' ही था। ...यही वह मूल द्वैध है जिनसे मिलकर लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा का ताना-बाना रचा गया है। व्यवस्था का तरपफदार होने के बावजूद हमें आम आदमी की बोली बोलनी पड़ती है।' मैथिली राव के हवाले से मिहिर ने बताया है कि लोकप्रिय सिनेमा दो विरू(ों के साथ सपफर करता है। उसकी दिलचस्पी यथास्थिति को बनाये रखने में होती है। और इस क्रम में वह बहुसंख्य नैतिकता की व्यवस्था को भी नहीं छेड़ना चाहता है। लोकप्रिय सिनेमा अपनी युग चेतना के अनुरूप होता है, वह सामूहिक इच्छा को इस प्रकार अपने अंदर प्रतिबिंबित करता है कि उसके माध्यम से वह अधिक-से-अधिक लाभ कमा सकें।
लोकप्रिय सिनेमा के इस द्वैध को हिगराते हुए मिहिर ने बिल्कुल ठीक समझा है कि एक सिरे का सच्चा प्रतिनिधि है लोकप्रिय सिनेमा का क्लाईमैक्स, वहीं दूसरे सिरे के सच्चे प्रतिनिधि हैं हिन्दी सिनेमा के गीत। आदर्श की पुनः स्थापना करने वाला क्लाईमैक्स यथास्थिति का पोषक बनकर उभरता है, वहीं हिन्दी सिनेमा के गीत आम जनमानस की उन आकांक्षाओं के सच्चे प्रतिनिधि हैं जिन्हें इस अर्ध-सामंती, अर्ध-पूंजीवादी समाज व्यवस्था में हमेशा दबाकर रखा गया। प्रतीक रूप में लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा के इन दो सबसे महत्वपूर्ण अंगों में ही सिनेमा के दो भिन्न विचार जगह पाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो गीतों में आगे बढ़ता प्रगतिशील और जनतांत्रिाक विचार अक्सर क्लाईमैक्स की भूल-भुलैया में जाकर दम तोड़ता नजर आता है। अमित कुमार ने भी इस द्वैध को बताते हुए लिखा है कि ''गुल८ाार जब पिफल्म बनाते हैं तो उनकी पिफल्मों में राजनीति और राजनीतिक पेचोखम बहुत हावी होता है। उनकी पिफल्मों के पात्रा राजनीति से प्रेरित और संवलित दोनों हैं, पर उनकी बेहतरीन न८में प्यार की खुशबू से सराबोर हैं। वहाँ बाहरी उपालंभ उतने ज्यादा नहीं हैं, जितनी कि वातावरण और पात्रा की भावनाएँ मुखर हैं।''
यह गुल८ाार की खासियत है कि अलग-अलग पिफल्म में बिल्कुल जुदा-जुदा गीत रचते हैं। कई बार विभिन्न पिफल्मों के ये गीत, अपने अनूठापन की वजह से एक शायर के नहीं लगते। असल में यही गुल८ाार की सर्जनात्मक ताकत है।
हिन्द स्वराज और बाइसवीं सदी
वरिष्ठ कथाकार मार्कण्डेय के संपादन में प्रकाशित पत्रिाका 'कथा' ;ए डी-२, एकांकी कुंज, २४ म्योर रोड, इलाहाबाद-१द्ध की आंतरिक संरचना की अपनी विशिष्टता तकरीबन हर अंक में देखी जा सकती है। 'कथा' में पूर्व संपादकीय की प्रस्तुति, इसे अन्य पत्रिाकाओं की संरचना से अलग करती है। पूर्व संपादकीय के बाद विधिवत पत्रिाका की विषय-सूची के साथ अंक संयोजित रहता है। पत्रिाका का संयोजन और प्रस्तुति संपादक की चिंताओं और समझ का नतीजा होती है। 'कथा' के हर अंक में इसे महसूस किया जा सकता है।
'कथा' के चौदहवें अंक में, पूर्व संपादकीय में, महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अवदान पर कृष्णनाथ, अवधेश प्रधान, प्रणय कृष्ण और रमेश सिन्हा ने लिखा है। सनातन हिन्दू से आर्य समाज, बौ( धर्म, किसान आंदोलन का नेतृत्व करते हुए मार्क्सवाद तक का सपफर राहुल जी ने किया था। राहुल जी को महात्मा बु( का उपदेश प्रिय था, जिसमें बु( ने कहा था कि ''भिक्षुओं, मैं नौका की तरह धर्म का उपदेश करता हूँ। यह पार होने के लिए है, पकड़कर बैठने के लिए नहीं। जिसे हमने 'अधर्म' मान लिया है उसे तो छोड़ देना पड़ता ही है, किंतु जिसे हमने धर्म ही मान रखा है और कालांतर में हमें लगा कि वह धर्म भी अब त्याज्य है, तो उसे भी छोड़ देना चाहिए।'' बौ(-दर्शन की इन खूबियों से प्रभावित राहुल जी इसकी कमजोरियों से भी बाखबर थे। 'दर्शन-दिग्दर्शन' में इन्होंने लिखा है 'बु( का दर्शन द्घोर क्षणिकवादी है। किसी वस्तु को वह एक क्षण से अधिक ठहरने वाली नहीं मानते, किंतु इस दृष्टि को उन्होंने समाज की आर्थिक व्यवस्था पर नहीं लागू करना चाहा। संपतिशाली शासक शोषक समाज के साथ इस प्रकार शांति स्थापित कर लेने पर उनके जैसे शक्तिशाली दार्शनिक का ऊपर के तबके में सम्मान बढ़ाना लाजिमी था। राजा लोग उनकी आवभगत के लिए उतावले दिखायी पड़ते थे। उस वक्त का धन-कुबेर व्यापारी वर्ग तो उससे भी ज्यादा सत्कार के लिए अपनी थैलियाँ खोले रखता था।'
महात्मा गाँधी ने 'हिन्द स्वराज' में १९०९ ई. में तत्कालीन सभ्यता का क्रिटिक रचते हुए, एक विकल्प प्रस्तावित किया था। अपने इस मत पर गाँधी जी आजीवन बने रहे। राहुल सांकृत्यायन ने भी 'बाइसवीं सदी' में एक यूटोपिया रचा था। स्वाधीनता-आंदोलन के दरम्यान रची गयी इन दोनों कृतियों की रोचक तुलना प्रणय कृष्ण ने की है। 'कथा' के इस अंक में हमारे समय के एक जरूरी कवि चंद्रकांत देवताले पर भी खास सामग्री है। देवताले की कविताओं के अलावा, इन पर राजेश जोशी और वीरेन डंगवाल का मूल्यांकनपरक आलेख ध्यान खिंचता है। राजेश जोशी ने लिखा है कि 'चंद्रकांत देवताले की कविता पढ़ते हुए मुझे अक्सर यह महसूस होता है कि वे जनसंकुल समाज-जैसा कि हमारा भारतीय समाज है-कम-से-कम हमारे गाँव कस्बों और छोटे मझौले शहरों का समाज के, हमारी सार्वजनिक लीला भूमि के हिन्दी के अकेले कवि हैं। शायद ही हिन्दी के किसी अन्य कवि की कविता में इतने सारे लोग, इतनी सारी जगहें और इतनी सारी आवाजें एक साथ होंगी। इसमें बहुत सारे शब्द हैं, बहुत सारी आवाजें हैं और बहुत सारे लोग और उनकी चकल्लसे हैं, दुःख-सुख हैं, कार्यकलाप हैं। आपाधापी, लड़ाई-झगड़े और दैनंदिन कामों से भरापूरा जीवन है। देवताले की कविताओं को एक साथ पढ़ते हुए लगता है जैसे हम जीवन की सामान्यताओं के एक महाआख्यान से गुजर रहे हैं।' चंद्रकांत देवताले ने अनेक कविताएँ स्त्रिायों पर लिखी हैं। इन कविताओं पर विचार करते हुए वीरेन डंगवाल ने बताया है कि वैश्वीकरण की विडंबनाओं के बावजूद भारतीय समाज के ताने-बाने में औरत की जो विचित्रा, अद्वितीय और जटिल हैसियत है, और उससे भी ऊपर की सापेक्षता में उसका जो झुटपुटा और तिलिस्म है, हिन्दी में देवताले से ज्यादा उसे किसी कवि ने न समझा है, न लिखा है।
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;लेखक उभरते हुए युवा आलोचक हैंद्ध
बी-५/३०२, यमुना विहार दिल्ली, मो. ९८६८१७५६०१ तंरममअण्तंदरंदण्हपतप/हउंपसण्बवउ

 
 
 
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