फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानियां
एक और हीरा-मोती : दया हीत
हीरूली' व 'मोतुली' कैंजा ;मौसीद्ध को जब भी मैं देखती, तो मुंशी प्रेमचन्द्र की दो बैलों की कथा 'हीरा-मोती' साकार हो उठती। हालांकि ये बैलों की जोड़ी न होकर, ननद-भौजाई की थी, पर नाम भी वही 'हीरा' व 'मोती' और बंध्न भी कुछ वैसा ही अद्भुत व अटूट। 'हीरूली' व 'मोतुली' ठेठ कुमाऊंनी विरासत, 'नाम पर ठाँस' मारने की ही देन थी, वरना असल नाम तो हीरा व मोती ही था।

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'हीरा' चार भाइयों की छोटी बहन थी। कई पुश्तों के बाद इस खानदान को कन्या रत्न की प्राप्ति हुई थी। इसीलिए कन्या को 'हीरा' नाम से सुशोभित किया। माँ-बाप के द्घर आंगन की रौनक लग गई। 'बिन चेलि ;लड़कीद्ध द्घर द्घर न हो' माँ हीरा की बलइयाँ लेते हुए कहती।
परन्तु ज्यों-ज्यों हीरा बड़ी होने लगी, माँ की आस पानी होने लगी। कद-काठी, चाल-चलन सब पर भाइयों की छाप। कन्याओं वाली कोई बात नहीं। द्घर की बजाय वह गाँव भर के छोकरों के साथ गिल्ली-डंडा या पिफर गेंद-बल्ला खेलने में व्यस्त रहती। दो-दो लड़कों को एक साथ पटकने का साहस रखती। उन्हीं के साथ खेलना-कूदना और उन्हीं के साथ जंगली मुर्गियों के शिकार पर जाना। न तो वह माँ के साथ चूल्हे-चौके में लगी, न खेतों में और न ही लड़कियों के साथ उसे खेतों की गुड़ाई करना भाया। भाइयों के लिए पफीते वाले जूते आते तो वह भी वैसे ही जूतों के लिए अड़ जाती। और तो और द्घाद्घरे की बजाय वह कुर्ता-पाजामा ही पहनती। अकेली लड़की थी सो हर जिद्द पूरी होती चली गई।
बड़ा बेटा मोहन जब बड़ा हुआ तो शुभ लगन देखकर उसका ब्याह पास की गाँव की मोती से हो गया। 'मोतुली' हीरा की समवयस्का थी। सो माँ ने सोचा अब बहू के साथ रहकर कुछ तो द्घर-गिरस्ती में मन लगाएगी। पर 'हीरा' पर कोई असर नहीं देखने को मिला बल्कि उसका लड़कपन दिन पर दिन बढ़ता गया। ऐसे में जहाँ कहीं उसकी बात चलती, उसकी सुकीर्ति उसके पहले ही वहाँ पहुँच जाती। माँ आँसू बहाती पर हीरूली पहले की तरह अलमस्त हो टहलती-पिफरती।
'अबकी पूरे चौदह की होने को आई इस चौमासे को,' मोहन के बाज्यू। वह पति को सुनाकर कहती, ''लड़की जात करे उत्पात।'' कौन ब्याह कर के ले जाएगा तुम्हारी छोरी को। अब मैं भी क्या करूँ। समझाते-समझाते तो सब थक गए हैं अब जो इसके भाग ;भाग्यद्ध में होगा, सहेगी।
'हीरा' के लिए एक अदद दामाद का जुगाड़ करते-करते बाकी बचे तीनों भी ब्याह गए, इस बीच द्घर का सरताज भी जाता रहा। जवान जहान बेटे द्घर के मुखिया बन गये तो द्घर अखाड़ा बन गया। नतीजा सब भाई एक-एक करके अलग हो गए।
बड़े बेटे मोहन के हिस्से में आई माँ, हीरा तथा पुश्तैनी मकान। 'हीरा' भी सोलहवां पार कर रही थी, इध्र बूढ़ी माँ भी थकथका गई थी उसके लिए वर ढँूढ़ते-ढँूढ़ते। चाहती थी, आँखों के सामने इसकी डोली उठ जाए। न रहने के बाद कोई प्रयास करे न करे। कहीं आजन्म कँुवारी न बैठी रह जाए।
तभी कोई एक रिश्ता लेकर आया। एक दुहेजु का, जिसकी सालभर पहले शादी हुई थी और उसकी ब्याहता पुत्रा जन्म के समय प्रसवपीड़ा झेल नहीं पाई और भगवान को प्यारी हो गई। अब इतने छोटे बच्चे का रखरखाव कौन करे। माँ का बहुत मन तो नहीं था, इकलौती बेटी को एक दुहेजु से ब्याहने का परन्तु बेटों की धैंस के आगे एक न चली।
पर विधता ने न जाने किस स्याही से उसका विधन लिखा था। अभी माँ चैन से साँस भी न ले पाई थी कि जंवाई के सर्पविष से मौत का समाचार आ गया। माँ बेटी के इस दुख को झेल नहीं पाई और जाती रही। हीरा वापस मायके आ गई। भाई ने दो एक बार ससुराल को पठाया ;भेजाद्ध भी, पर वह बार-बार लौटकर मायके आ जाती।
हारकर भाई ने 'मोतुली' को समझा बुझाकर 'हीरा' को द्घर में ही रख लेने का आग्रह किया। 'मोतुली' को हीरा से कोई खार ;बैरद्ध नहीं थी, वह केवल उसकी ससुराल को लेकर चिन्तित थी। सो देखा वह वहाँ जाने को किसी प्रकार राजी ही नहीं है तो उसने भी मौन स्वीकृति दे दी। वैसे तो हीरा उन पर कोई बोझ नहीं थी। भाई के कंध्े से कंध मिलाकर काम करती। दूर बाजार से रसद मंगवाने का काम हो या पिफर हल जुताई का, नौले से पानी सारने का काम हो या पिफर जंगली तीतर-बटेरों के शिकार का, वह सबमें उस्ताद थी। हाँ, द्घर के भीतर का काम उसके बस का न था। पर उसके लिए, 'मोतुली' अकेली ही कापफी थी।
हीरा और मोती में एक अनकहा तालमेल था। कभी-कभी दोनों के बीच छोटा-मोटा वाक्‌ यु( भी हो जाया करता था पर उसमें लम्बी चुप्पी जैसा कोई विराम नहीं था। समय के साथ बाल बच्चों के साथ दोनों ऐसी द्घुलमिल गईं कि लगता बच्चों के दो-दो माएँ हैं। पारिवारिक स्नेह व वात्सल्य का खादपानी पाकर दोनों का रिश्ता और प्रगाढ़ होता गया।
समय कितनी तेजी से बदलता है। 'मोतुली' की तीनों बेटियाँ जंगली लताओं की तरह कब जवान हो गईं पता ही नहीं चला। वर देखने की बेला में गाँव में ऐसा हैजा पफैला कि द्घर के मुखिया का चढ़ावा पाकर ही शांत हुआ। सारा परिवार अनाथ हो उठा। द्घर में एक भी आदमी नहीं। कुछ अराजक तत्वों ने इस परिस्थिति का पफायदा उठाना चाहा। रात अंध्ेरे द्घर में द्घुसने की कोशिश की तो 'हीरूली' गरज उठी, खुखरी नचाकर चेतावनी दे डाली 'स्सालो-कमीनो, अनाथ समझ रखा है, मोहनदा गए हैं, पर हीरूली जिन्दा है। उसके रहते किस स्साले की इतनी हिम्मत हो गई है जो इस द्घर की देहली ;देहरीद्ध लांद्घ सके। काटकर रख दूँगी, हरामजादों को। उसके बाद किसी ने यह हिमाकत करने की जुर्रत नहीं की।
इस तरह हीरा ने पूरे परिवार को एक पुरुष की भांति सहारा दिया। कुटुम्ब की नैया खेते हुए उसने तीनों बेटियों को अच्छे द्घरों में ब्याहा। इस तरह परिवार की नैया तो किनारे आ लगी थी पर हीरूली और मोतुली भी उम्र की कटान पर पहुँच चुकी थीं।
बुढ़ापा अच्छे-अच्छे लोगों को तोड़ देता है। अब न वह दम रहा था न हिम्मत। पिफर भी दोनों द्घर को संभाले हुए थीं।
कभी लड़कपन तो कभी समय की मजबूरी में पुरुष का रोल निभाते-निभाते हीरूली की अन्तरात्मा भी पुरूषत्व के चोले की अभ्यस्त हो गई थी। औरतों की तरह मजमा लगाकर पंचायत करना, निन्दारस में डुबकी लगाना, जेवर आदि के प्रति स्वाभाविक मोह, इन सबसे उसका मन कब का विरक्त हो चुका था। बेटियाँ कभी कुछ रुपये पैसे की चाह करतीं तो झट अपनी नथ, पौजीं, गुलुबन्द पकड़ा देती। मोतुली समझाती थी, ले देकर यही तो है तेरे पास बुढ़ापे का आसरा, उसे भी बाँटे जा रही है। यहाँ बेटियाँ रुपये पैसे को तरस रही हैं और इसे बुढ़ापा संवारने की सूझी है, बुढ़ापा तो खुद ही संवर जायेगा जब बाल-बच्चे प्रसन्न रहेंगे, उसका जवाब होता।
वहीं, यदि मोतुली, हीरा की नजर बचाकर लड़कियों को अनाज-पानी की पोटलियाँ थमा डालती, और हीरा को इसका आभास मात्रा हो जाता, तो हंगामा खड़ा कर देती, 'रात दिन हड्डियाँ द्घिसो, तब दो दाने नसीब होते हैं और ये मोतुली मेरी मिहनत को ऐसे ही खैरात में बाँटे जा रही है। कभी-कभी तिलमिलाकर मोतुली झट पोटलियाँ झोले से बाहर निकाल डालती। पर उस पर भी दोहरी मार, अब क्या लड़कियों को नंगे हाथ भेजोगी और हम दोनों यहाँ डकार लेंगे, क्यों! वे वहाँ ससुराल में गाली खाएँगी तो हमारे गले से ये नाज ;अनाजद्ध उतरेगा। बस मैंने मुँह से कुछ कह क्या दिया, मानो वज्रपात हो गया।'
कभी-कभार मोतुली कैंजा देर तक किसी बैठकबाजी में रम जाती तो द्घर पहुँचने पर खैर नहीं। 'मैं यहाँ मर-मर कर खेतों में हल जोत कर आ रही हूँ कि दाल भात देगी पर इसको तो बातों से ही पफुर्सत नहीं। उनका बड़बड़ाना तब तक जारी रहता जब तक मोतुली गर्मागर्म सै ;एक प्रकार का हलवाद्ध या द्घी में तर 'कसार' बनाकर न परोस देती। ले देकर ननद-भौजाई का ये मानसिक संबंध् एक स्त्राी-पुरुष का होकर रह गया था।
दोनों का सम्बंध् जैसा भी था, था बड़ा विलक्षण। इतने वर्षों से साथ रहते-रहते जैसे दोनों एक दूसरे की नब्ज जान गये थे। एक बीमार पड़ जाता तो दूसरा विछोह की आशंका से ही आध हो जाता।
एक दूसरे के सान्निध्य में उनका बुढ़ापा आराम से ही कट रहा था। लड़कियाँ भी अपनी ससुरालों में इन्हें लेकर निश्ंिचत रहतीं। अपनी माँ से ज्यादा भरोसा उन्हें 'हीरूली बुआ' में था कि वे सब संभाल लेंगी। बुआ में उन्होंने हमेशा पितृअक्स का सम्मोहन पाया था, इसीलिए वे आश्वस्त रहतीं। बुआ ही साल में एक आध् बार लाठी टेकती-ठोंकती सबकी ससुरालों का चक्कर लगा आती। देख आती कि सब अपने द्घरों में राजी-खुशी से हैं। इसीलिए ससुराल वाले भी मोतुली से ज्यादा हीरूली को ही पूछते। पर मोतुली के मन में इसे लेकर कभी बैर नहीं जागा। बहुत उदारमना थी वह।
'हीरूली' अब तक जिस अल्प विवाहित जीवन को एक स्वप्नदंश मानकर काल की गर्त में दपफना चुकी थी, वह अचानक सर्पदंश का पफन लेकर उसके सम्मुख यूँ खड़ा होगा, उसने दूर-दूर तक कल्पना भी नहीं की थी।
हीरूली का वह देवर एक दिन उसके जवान वाक्‌ पुत्रा को लेकर उसकी चौखट पर आ ध्मका। धूमिल दृष्टि और वृ( शरीर, बड़ी कठिनाई से अपनी विस्मृति के दायरे से उन्हें बाहर लाने में सपफल हो सकी। जिस वाक्‌ पुत्रा को दो-चार माह की देख-रेख के बाद पति की मृत्यु के बाद वह छोड़ आई थी और उसे पिफर देखने या पाने का मोह भी उसे कदाचित ही रहा था आज एक नौजवान के रूप में अचानक प्रकट हो आने पर, हृदय की परतों में छिपा उसका दर्द व प्रसन्नता, उत्तेजना बन आँखों की कोरों से छलक उठा। स्नेह से भरा उसका हाथ स्वयंमेव यंत्राचलित सा उसके सिर पर आशीर्वाद रूप में उभर आया। एक नारी हृदय जो समय की मजबूरी में इस्पात में ढल चुका था आज बरबस ममता के स्पर्श से भीग उठा।
परन्तु आने वाला किसी डोर से बंध चला नहीं आया था, बल्कि उसे तो स्वार्थ की डाेर यहाँ खींच लाई थी। हीरूली कैंजा का सौतेला बेटा, चाचा की छत्राछाया में पला बढ़ा। उचित संरक्षण न मिलने से वह बुरी संगत में पड़ गया था। जुआ, शराब जैसे कई ऐबों की सोहबत में पड़ चुका था। चाचा ने उसे अपने अन्य तीन पुत्राों के साथ-साथ पाला था और चूंकि उसके संरक्षक के रूप में केवल वही थे सो उन्होंने पंचायत से गुजारिश की थी कि दोनों भाइयों की जमीन को एक मानते हुए, उसके बराबर चार हिस्से होने चाहिये। परन्तु कर्ज में गले-गले तक डूबे भतीजे को यह प्रस्ताव क्योंकर भाता, सो वह पिता की जायदाद पर अकेले अपने हक को लेकर अड़ गया। सो पंचायत को निर्णय लेना पड़ा कि यदि 'हीरूली' आज भी ससुराल लौट आने को तैयार हो तो संपत्ति पर उसके वाक्‌ पुत्रा का अध्किार होगा और हीरूली की देख-रेख का जिम्मा भी। वरना जैसा चाचा का प्रस्ताव है वही सबको मानना होगा।
बस इसी के चलते वह चाचा को लेकर हीरूली के दरबार में हाजिर हो गया। उससे वापस लौट आने की विनती करने लगा। परन्तु जिस 'हीरा' को सतमासे अबोध् बालक का मोह भी नहीं रोक पाया था उसे यह सर्वथा संपन्न नौजवान का़ अनुनय विनय भला क्या लौटा लाता।
सो उसने एक स्वर में इन्कार कर दिया। पफरमान सुना दिया कि जिंदगी भर यहाँ रही, पली, सुख-दुख साथ-साथ बांटा-छांटा अब इस चलाचली की बेला में वहाँ जाना संभव नहीं। अब इस उम्र में तुम्हारा द्घर-बार संभालने का सामर्थ्य नहीं।
बेटे ने जब देखा कि बुढ़िया किसी तरह टस से मस होने वाली नहीं है तो उसने अपना अंतिम पासा, जिंदगी की शतरंज पर पफेंका। 'मोतुली' कैंजा को तो उसके भतीजे अग्नि दे देंगे पर तुझे कौन देगा। तेरा कोई नहीं होता तो और बात थी पर जीते जागते बेटे के होते हुए कोई और तुझे अग्नि दे, क्या मुक्ति हो पाएगी तेरी। यहीं इस लोक में भटकती रहेगी तू। तेरी विमुक्ति मेरे ही द्वारा पीपलपानी ;तेरहवींद्ध द्वारा संभव है। अपना द्घरबार होते हुए दूसरे की देहरी पर प्राण देगी क्या? वहाँ तुझे कौन द्घर बार संभालने को कह रहा है। बैठे-बैठे मुझे बताना कि क्या करना है कैसे करना है बस, तेरी क्या उमर रह गई है इस तरह खटने की। मोतुली कैंजा की तो मजबूरी है, लड़कियाँ हैं सब, क्या करे ऐसे ही रहना पड़ेगा।
इस लोक की किन्तु-परन्तु से नित्य लोहा लेने वाली 'हीरा' का मन भी परलोक की मुक्ति-विमुक्ति के तर्क दर्शन के समक्ष भरभरा कर ढह गया। पिफर भी मोतुली को यूँ अकेली मंझधर में अकेला छोड़ जाने को उसका मन मानने को तैयार न था। वहीं मोतुली न चाहते हुये भी, हीरूली को अपने द्घर लौट जाने को कह रही थी। सच है जिसके द्घर आग लगी है वह तो जलेगा ही पर दूसरा अपना हाथ क्यों दे।
पता नहीं क्यों? इंसान जो सामने है, प्रत्यक्ष है उस पर विजय पा लेता है, संद्घर्ष कर लेता है परन्तु यह परलोक जो कल्पना पर आधारित है या जिसकी वास्तविकता पर संदेह है, या जो है भी या नहीं उससे अवश्य भयग्रस्त रहता है। और इसी भय के आगे 'हीरूली' भी टूट गई। वर्षों का नाता तोड़, वह वाक्‌ पुत्रा के साथ यूँ चली गई जैसे खूंटी से बंधी गाय। चलती है। साठ-पैंसठ वर्षों का यह अटूट संबंध् जो अनेक सावन-वसंतों का साक्षी रहा था, कई जेठ और पतझड़ों का मिलकर संद्घर्ष किया था, आज स्वार्थ की बेदी पर स्वाहा हो गया। इध्र मोतुली अकेले अपने झोपड़े में बैठी, अपने भाग्य पर अश्रु बहा रही थी तो दूसरी ओर 'हीरूली' जिस उत्साह से द्घर लौटी थी, वह जाता रहा। वह नितांत अकेली रह गई थी इसलिए अकेली थी तो हीरूली सब लोगों के बीच भी अपने आपको नितांत अकेला पा रही थी। दोनों का ही रुदन जारी था।
मोतुली को गाँववाले समझाते, तू तो सूरज को थाल समझे द्घर में टिकाये थी, उसका तो द्घर ही वहाँ था, तूने उसे अपना समझ रखा था, पर वह थी तो पराई। जहाँ की थी, वहीं चली गई। तू क्यों अपना दिल छोटा करती है, हम सब हैं न तेरे। तू तो शुक्र मना तेरे सिर से बला टली। पहले आदमी की टोका-टाकी सही पिफर यह सवार हो गई। दो द्घड़ी भी कहाँ बैठ पाती थी किसी के पास, हर समय हीरूली का डर। तुझे तो निजात मिली। अपने मन-मुताबिक जीने का समय तो मिला। दो रोटी के पीछे हाहाकार क्यों? वो तो वहाँ जाकर लड़के के सिर पर बैठकर धन मान रही है और तू उसकी याद में द्घुली जा रही है।
पर 'हीरूली' का हाल और बुरा था। दो चार दिन तो पुत्रा ने उसे सिर आँखों पर बिठाया, पर जैसे ही जमीन का पट्टा उसके नाम हुआ, तो आँखें पफेर लीं। ऐबी तो था ही, उजड्ड भी कम नहीं था। द्घर-गिरस्ती हीरूली क्या जाने? सो आए दिन झिकझिक होने लगी। बाहर आने जाने पर भी रोक लगा दी गई। उसने यूँ दबकर रहना ही कहाँ सीखा था। पुरुषत्व की आंच में सिंकते-सिंकते उसका मन और शरीर दोनों दबंग और ऐंठी हो गए थे और यहाँ इस वाक्‌ पुत्रा के दिशा -निर्देशों के भीतर रहना, वो भी बुढ़ापे में, क्या उसके बस में था। नतीजतन ऐंठ में कई-कई दिन भूखे पड़ी रहती, पर कोई पूछने वाला नहीं था। वहाँ वह मोतुली पर कितना धैंस जमाती थी। पिफर भी बेचारी ने कभी एक शब्द भी उल्टा सीध नहीं कहा बल्कि उसे मनाने के उपक्रम में कभी 'सै' तो कभी 'कसार' खिलाती। ऐसे भूखे तो कभी नहीं छोड़ा। आज उसके दुर्भाग्य पर बहने वाले इन आँसुओं को पोंछने वाले कोई नहीं था।
पति-पत्नी का संबंध् भी यदि प्रौढ़ावस्था तक बना रहता है तो दोनों के बीच एक अनोखा तारतम्य स्थापित हो जाता है। जवानी का बिछोह दोनों सह जाते हैं परंतु बुढ़ापे का नहीं। एक जाता है तो दूसरा भी पीछे-पीछे आने की तैयारी कर लेता है। परंतु इनका संबंध् तो पति-पत्नी का नहीं था, पिफर भी बिछोह का दुख ये दोनों भी नहीं झेल सके।
एक रात 'मोतुली' खाकर क्या सोई, पिफर कभी नहीं उठ सकी। खबर सुनकर हीरूली अपने गाँव से गिरती पड़ती, द्घर पहुँची तो मोतुली को लोग ले जा चुके थे। वह अपनी जीवन संगिनी से आखिरी भेंट भी नहीं कर सकी थी। चारों ओर श्मशानी सन्नाटा विखरा पड़ा था। बाहर आँगन में उसका लाया आलू-प्याज का कट्टा ;बोराद्ध ज्यों का त्यों उढ़का पड़ा था। गगरे बिन पानी के पत्थर पर लुढ़के पड़े थे। चूल्हे में लगता था कई दिनों से आग ही नहीं सुलगी थी। उसका हृदय दुख की धरा में रिसता रहा। जितना वह द्घर आँगन में पफैली चीजों पर नजर दौड़ाती, उसका दुख भरभरा कर उमड़ आ पड़ता। मुँह में आँचल का टुकड़ा ठूंसे, अविरल बहते आँसू मोतुली की कसमसाहट में गालों में सूख जाते। आज उन्हें कोई पोंछनेवाला नहीं था। वह क्यों उसे छोड़ कर चली गई।
दिन-रात, कभी द्घर के भीतर कभी बाहर, मोतुली की याद में बहते उसके आँसू की झड़ी लगी थी। गाँववालों ने बहुत समझाबुझाकर लौट जाने को कहा। पर वह न मानी और न ही उसका बेटा उसे लेने आया। इतने दिनों से उसने अन्न का एक दाना मुँह में डाला नहीं था। अगल-बगल के द्घरों से भेजे गए खाने पीने के सामान पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं।
मोतुली का पीपलपानी भी नहीं हुआ था कि 'हीरा' एक दिन अपने हल-ज्योड़ के ऊपर औंध्ी पड़ी मिली। उसकी अंत्येष्टि के लिए उसके पुत्रा को संदेश भेजा गया, पर वहाँ वह तो टुन्न पड़ा था। कौन इजा, किसकी इजा, उसका जवाब था। सो गाँव वालों ने मिलकर उसे अंतिम विदाई दी।
'हीरा-मोती' का जो सुखद अंत प्रेमचंद की कथा में था वह इंसानों के भाग्य में कहाँ। वे तो स्वार्थ-लोभ, ईर्ष्या, द्वेष की भेंट चढ़ जाने के लिए होते हैं।

 
 
 
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