| एक कविता कलावादियों के नाम |
|
 |
अरूण शीतांश
एक चिड़िया ने उड़ान भरने की कोशिश की
जहाँ से वह उड़ान भरना चाहती थी
वहाँ कई बहेलिये गुरुदेल टाने बैठे थे
उनका दुर्भाग्य था
कि उनके पास वह मिट्टी की गोली नहीं थी
जिस मिट्टी से बने हैं हम या वे
|
चिड़ियों का जमाना ऐसा आ गया है
कि जिससे बनते हैं
वह उसी से मारती हैं अपने को
कभी-कभी तो बच्चों को गुस्से में
खाना नहीं देती
बात नहीं करती
लेकिन चिड़ियों की आदत है बावजूद इसके
बारिश से बचाना
धूप से छुपाना
उड़ान भरवाना
पंख को प्यार से उड़ाना
चिड़ियों ने भी आजकल के अन्न खा लिए हैं
जिसका असर उन पर भी होने लगा है
जैसा हम अन्न बोएँगे
वैसी पफसल काटेंगे
कोई जादू की छड़ी तो नहीं पास में
हो सकती है यह कविता कलावादियों के नाम हो जाए
पर यह चिड़ियों के लिए ही है
जिसका जिनको दर्द सहा नहीं जाता
... अभी जिंदा होते तो पूछते
चिड़ियों से कलावादियों को दोस्ती करनी चाहिए!
यह बात पूछने से पहले
चिड़ियों के चेहरे के रंग बदल गए
और चिड़िया बेचारी दाना लेकर उड़ गई
जो चारों दिशाओं में बिखेर रही है। |
| |
|
| |
|