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मैं व सुधा बदहवास सी उस विशाल भीड़ के सामने खड़ी थी, समझ ही नहीं आ रहा था कि किधर से अन्दर जाऊँ? कहाँ जाकर बैठूँ? ८िान्दगी में पहली बार तो रामलीला देखने का अवसर मिला था, वह भी इतनी भीड़ के कारण रह जाएगा, तभी औरतों की ओर की उस भीड़ के बीच |
'में एक लड़की खड़ी हो कर चिल्लाई।
''ऐ! शीला। इधर से आ जाओ, इधर रास्ता है। मेरी छोटी बहन सुधा और मैं उसके बताए रास्ते से आगे बढ़े और हमने देखा कि ८ामीन पर बैठे लोग अपने आप हमें रास्ता देते गये। और हम दोनों उस लड़की के पास पहुँच गये। वह हँसी, ''पहचाना नहीं मुझे? मैं कमला।''
''हाँ! हाँ! तुम मेरे स्कूल में ही पढ़ती हो न? तुम्हें रो८ा ही तो देखती हूँ।''
''हाँ! मैं भी तो देखती हूँ। और तुम्हारा नाम भी जानती हूँ। तुम छठी कक्षा में पढ़ती हो न? मैं सातवीं में पढ़ती हूँ। तुम उधर मिल हाउस में रहती हो न।''
''हाँ, और तुम कहाँ रहती हो?'' मैंने पूछा।
उसने हाथ के इशारे से दिखाया, ''इधर ही नीचे बहुत नीचे मेरा द्घर है। वहाँ उधर बहुत सारी सीढ़ियाँ हैं न, वहीं से नीचे जाना होता है।'' तभी ढोल और बाजों की आवा८ाों में हमारी आवा८ों खो गई। रामलीला आरम्भ हो चुकी थी। और सब लोग शांत हो गये। स्टेज पर दो तीन माईक खड़े थे। उसके सामने पात्रा अपने अपने संवाद बोलते और पीछे हट जाते। बड़ा ही अच्छा लग रहा था। मैंने सिनेमा तो देखे थे किन्तु ऐसा नाटक नहीं। रोज कमला मेरे लिए जगह द्घेर कर रखती और रो८ा हम दोनो उसके पास बैठते थे।
दशहरे की दस दिन की छुट्टियॉं होती थीं, सो समाप्त हो गईं। किन्तु इन दस दिनों में मेरी और कमला की दोस्ती पक्की हो गई। हम दोनों साथ-साथ चलते। वह मुझसे तीन-चार साल बड़ी थी। उसने अपनी आयु चौदह साल की बताई थी।
बरेली में भी रामलीला होती तो थी, पर कहाँ किस जगह। हमें नहीं पता। वहाँ तो लड़कियाँ अकेले द्घर से निकलने की बात सोच भी नहीं सकती थीं। जाएँ भी तो किसी के साथ। और इतनी भीड़ में द्घुसने की बात? ऐसी भीड़ में तो कोई बड़ा भी हमें नहीं ले जाता। बरेली में तो हमारे ऊपर इतनी पाबन्दी थी कि हम लोग स्कूल के अलावा कभी द्घर के पफाटक तक नहीं जा सकते थे। दस साल के पूरे हो चुके थे न। पर नैनीताल में हमारे ऊपर इतनी पाबन्दियाँ नहीं थीं। पापा तो वैसे ही बड़े आ८ााद ख्य़ालों के थे। किन्तु बरेली में द्घर की मर्यादा को तोड़ना पसन्द नहीं करते थे। न बरेली में द्घर वालों का विरोध ही करते थे। वहाँ का जीवन ही वैसा था। ख़ैर।
उन्नीस सौ इकतालीस हो चुका था। द्वितीय विश्वयु( ८ाोरों पर था। हालांकि हमारा हिन्दुस्तान यु( में स्वयं शामिल नहीं था, किन्तु अंग्रे८ाों की गु़लामी बड़ी महंगी पड़ रही थी। मन से न भी होवे, तो भी तन से धन से लोग लुट रहे थे। रो८ा सैकड़ों लोग दूर दरा८ा गाँवों से आकर लड़ाई में भर्ती हो रहे थे। अधिकतर लोगों को तो मालूम भी नहीं था कि लड़ाई होती कैसी है। पहाड़ों पर दूर दूर न जाने कितने गाँव बसे थे, जिनके यहाँ मोटरगाड़ी तक नहीं जाती थी। वे लोग न जाने कितने पहाड़ चढ़ उतर कर उस जगह पहुँचते थे, जहाँ से मोटर गाड़ी पकड़नी होती थी।
हमारे द्घर का एक नौकर सत्य प्रकाश छुट्टी ले कर गाँव गया था। माँ ने उसे कुछ इनाम के साथ उसका पूरा वेतन देकर कहा, 'अपने बाप के हाथ में रखना, ख़ुश हो जाएगा' जब लौटा तो रो रहा था। कहने लगा मेरे बाप ने अपना सिर पीट लिया, 'इन कागद के टुकड़ों का मैं क्या करूँ? अरे एक सेर लूण ही ले आता, तो एक महीने की सब्जी ही बन जाती।' उसका गाँव कई पर्वतों के बीच में तराई में था। वहाँ के लोगों ने रेलगाड़ी तो क्या कभी मोटरगाड़ी भी नहीं देखी थी। एक सेर नमक तक के लिए मीलों चढ़ना उतरना पड़ता था।
महंगाई आसमान छू रही थी। इसी कारण उस साल पापा का आपिफ़स हमेशा की तरह जाड़ों में बरेली नहीं जाने वाला था। विश्वयु( के कारण अंग्रे८ा सरकार उतना ख़र्च करने में असमर्थ थी।
मैं छठी कक्षा में आ चुकी थी। और पापा चाहते थे कि मैं पिछले साल की तरह बरेली जाकर पिफर से उनकी गंगा बुआ के साथ मुहल्ला भूंड़ में रहूँ। मैं काँप गई। पिफर से मुझ पर हमले होंगे, पिफर से मेरी डाँट पड़ेगी, कि बहुत लड़ती है।
माँ पापा से पूरे साल अलग रहने की बात सुनकर मैं रोने लगी थी। ''मैं पूरे साल भर के लिए बरेली नहीं जाऊँगी।'' मैं यहीं पढ़ूँगी।
पापा परेशान, यहाँ कहाँ पढ़ोगी? स्कूल नैनीताल के दूसरे छोर पर है। वहाँ पहाड़ी चढ़कर जाना पड़ता है। कैसे जाओगी इतनी दूर? बहुत थक जाओगी।''
''वैसे ही जाऊँगी, जैसे और लड़कियाँ जाती हैं। मैंने दाई के साथ बहुत सी लड़कियों को स्कूल जाते देखा है।''
इतने सालों से पापा नैनीताल शहर के अन्दर ही द्घर लेते थे। किन्तु उस साल उन्होंने अपने एक दूर के रिश्तेदार के साथ मिलकर वह बड़ा सा द्घर ले लिया था 'मिल हाउस'। किन्हीं शाह साहब का था। सस्ता मिल गया था। नैनीताल मंेंं मोटरबस द्घुसते ही सरकारी क्वाटर दिखाई पड़ते थे। वहाँ से एकदम नीचे था वह 'मिल हाउस'। सामने से एक सड़क सिपाहीधारा को जाती थी। जहाँ सेना के सिपाही रहते भी थे, और बंदूक चलाने की प्रैक्टिस भी करते थे। उनको रंगरूट कहते थे। यह शब्द 'रिक््रयूट' का हिन्दीकरण था। कभी कभी आधी रात में किसी आदमी के ८ाोर से चिल्लाने की आवा८ा आती, 'हुकमदार।' पता लगा कि जो भी आदमी पहरे पर होता था, उसे चिल्लाना पड़ता था, 'हू कम्स देयर' जिसका हो गया 'हूकमदार' और रो८ा ढेरों सिपाही मार्चिंग करते हुए हमारे द्घर के सामने से निकलते थे। एक और शब्द 'पिलंटियों' भी उन दिनो बहुत अधिक प्रचलित था। वह अंग्रे८ाी शब्द 'प्लैन्टी' का हिन्दीकरण था
जजज
उस दिन से कमला के साथ मेरी दोस्ती हो गई थी। अब स्कूल जाते पर हम दानों बराबर साथ रहते थे। और दुनिया भर की गप्पें लड़ाते जाते थे। असली बात यह है कि हमारी दुनिया बहुत छोटी थी, आज के जैसी बड़ी विशाल नहीं थी। हमारी दुनिया में तो हिटलर और विश्वयु( भी नहीं था।
स्कूल जाना जैसे एक पिकनिक पर जाना होता था। द्घूमते द्घामते मटरगश्ती करते चलते थे, तो दाई गुस्सा करती। उसके हाथ में किसी पेड़ की एक पतली सी टहनी रहती थी। और हमारी ओर से ८ारा सी भी गड़बड़ हो तो छड़ी से मारती थी, यह बात और है कि उसकी मार खाकर हम लोग रोने के बजाय हँसते हुए, भागने लगते थे।
मिल हाउस से निकल कर, पूरा तल्लीताल पार करके पिफर हम झील के किनारे किनारे ऊपर वाली सड़क पर चलते थे। नीचे भी एक पतली सी कच्ची सड़क थी, जिस पर अंग्रेज लोग द्घोड़े दौड़ाते थे। ऊपर वाली पक्की सड़क पर द्घोड़े दौड़ाने की अनुमति उन लोगों को नहीं थी। उसके बाद मल्लीताल का बा८ाार पार कर एक पहाड़ी पर चढ़कर हमारा स्कूल 'गवर्न्मैन्ट गर्ल्स हाइ स्कूल' आता था। स्कूल एक बंगले में था। जिसमें कई कमरे थे। दसवीं कक्षा में केवल एक लड़की जिन्हें हम लोग 'चेलि दी' कहते थे। आठवीं नवीं में भी दो चार लड़कियों से अधिक नहीं थीं। हमारी छठी कक्षा में भी कुल ग्यारह लड़कियाँ थीं।
उन दिनों हमलोग, स्कूल आने से पहले सुबह नौ बजे खाना खाकर ही आते थे। उस दिन पता नहीं क्या हुआ था कि मैं ढंग से खाना नहीं खा पाई थी। खाने की छुट्टी थी। और मैं स्कूल के चबूतरे पर उदास बैठी थी। भूख के कारण मेरी हालत खऱाब हो रही थी।
पता नहीं किधर से कमला आकर मेरे पास बैठ गई -''भूखी हो?''
''नहीं तो।'' मैंने कहा।
''झूठ बोल रही हो? क्यों?'' वह मुस्कराई।
मैं चुप रही। उसने एक चवन्नी मेरे हाथ पर रखी ''जाओ कुछ खऱीद लो, और देखो थोड़ा मत खऱीदना।''
कमला के कहने से, दो पत्ते मटर आलू की चाट खरीद लाई। एक पत्ता उसे दिया तो नहीं लिया ''मैं नहीं खाऊँगी, मुझे भूख नहीं लगी हैं।''
इतनी सारी चाट मैं अकेले कैसे खा सकूँगी? मैंने कहा भी किन्तु वह उठ कर चली गई ''आराम से सब खा लोगी।'' बचे हुए पैसे मैंने उसके हाथ में ठूंस दिए थे।
कमला मेरा ध्यान ऐसे रखती ,जैसे मेरी बड़ी बहन हो।
वह अक्सर मेरे द्घर आ जाती थी। माँ भी उसे बड़ा पसन्द करती थीं। कमला ने अपने पिता का नाम पन्नालाल बताया था। कि वे एम.एस.सी. पास हैं। और कोई बि८ानेस करते हैं। एक दिन जब मैंने उससे पूछा- ''इतने सारे पैसे...? दो-दो चार-चार रुपये उसके पास कहाँ से आते हैं? तो कहने लगी कि हमारे द्घर में एक छोटी सी संदूकची रहती है। उसमें रुपये पैसे भरे रहते हैं। जब जी चाहता है, तो ले आती हूँ। मेरी समझ में उसकी बात कभी नहीं आती थी। मेरे द्घर में तो हम एक पैसा भी माँ के दिये बिना, अथवा माँगे बिना नहीं पा सकते थे।
आज भी सोचती हूँ, तो आश्चर्य होता है, कि उन दिनों इतना पैसा तो अच्छे अच्छे द्घरों में नहीं होता था।
जजज
हमारी कक्षा में एक लड़की कमली थी। बहुत ही सुन्दर और गोरी।
हम लोग सब साथ-साथ द्घर लौटते थे। मैं अपने रास्ते सिपाहीधारा की सड़क की तरपफ नीचे उतर जाती थी। वह सीधे मालरोड पर ही बढ़कर अपने द्घर चली जाती थी। और कमला आगे पगडंडियों से नीचे की ओर उतर जाती थी।
एक दिन मैं स्कूल नहीं गई थी। दूसरे दिन पता लगा कि हमारी टीचर ने किसी विषय में कुछ नोट्स दिये थे। मैंने कमली से उसकी कॉपी मांगी कि नोट्स उतार कर दूसरे दिन दे दूँगी। उसने कॉपी दे दी और कहा -''कल सुबह ही मेरे द्घर पहुँचा देना। मुझे काम करना है।'' दूसरे दिन रविवार था। कमली ने अपना द्घर समझा दिया था।
दूसरे दिन, रविवार को जब मैं माँ से पूछकर जाने लगी तो पापा ने मेरे हाथ से कॉपी लेकर देखी और मुझसे बोले ''देखो इस लड़की का काम कितनी सपफ़ाई से है। देखो यहाँ पर ये शब्द ग़लत लिखा है तो एक हल्की सी लाइन से काट दिया। मालूम भी नहीं पड़ता। एक तुम हो जो काटने में इतनी लाइनें बनाती हो कि कॉपी पर पफोड़े पफुंसी से न८ार आते हैं। सीखो, कुछ अपनी इस सहेली से।''
पापा ठीक ही कह रहे थे। उसकी कॉपी में किसी भी पृष्ठ पर काटपीट के चिन्ह अलग से नहीं चमकते थे। इतनी सपफ़ाई की लिखाई तो माँ की चिट्ठियों में भी नहीं होती है। जब माँ अपनी चिट्ठी में कोई लाइन अथवा शब्द काटतीं तो इतनी बार काटतीं कि समझ ही नहीं आता कि वहाँ क्या लिखा है। पूछने पर माँ ने समझाया कि ''पत्रा लिखते समय जब ग़लती से कोई ऐसी बात लिख जाएँ, जिसके लिए हम नहीं चाहते कि कोई भी पढ़ पाये तो ऐसे में कई-कई बार काटते हैं किन्तु स्कूल की कॉपी तो तुम्हारी टीचर देखती हैं। वे हल्का सा कटा हुआ देखेंगी तो वह पढ़ेंगी ही नहीं।''
मैं अकेली ही कमली के द्घर उसकी कॉपी लौटाने गई थी। कमली मेरे द्घर से और आगे रहती थी। उसी मालरोड पर और आगे जाकर थोड़ा नीचे उतर कर उसकी काटेज थी।
बाहर तरह-तरह के पफूल लगे थे। द्घर क्या था स्वर्ग का टुकड़ा था। द्घर बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर से उससे भी अधिक सुन्दर था। बड़ा ही क़ीमती पफर्नीचर और सुन्दर सुन्दर दो तीन मूर्तियाँ बाहर ड्राइंग रूम में रखी थीं।
कमली का द्घर मैं कभी नहीं भूली। क्या था वहाँ ऐसा? जैसे ही मैं उसकी कॉपी देकर उसके द्घर से चलकर ऊपर सड़क की ओर आई, तो लगा जैसे सड़क के पार पहाड़ी पर एक मोटा सा, बहुत बड़ा पीला कालीन बिछा है। इतना विशाल क़ालीन, वह भी पहाड़ के ऊपर? मंत्रामुग्ध सी देखती रही। वह दो-चार क्षण का प्यारा सा भ्रम मेरे मन-मस्तिष्क पर छा गया। वे पफूल थे। हजारों लाखों करोडों, चंचल हवा में झूमते हुए पफूल। कमली मेरे साथ ऊपर आ गई थी। वह भी देख रही थी मेरा दीवानापन।
''कितने सुन्दर पफूल हैं, हैं न?'' मैंने कहा।
''अरे ये तो जंगली पफूल हैं। ऐसे ही उग आते हैं।'' वह हँस दी।
''ऊपर चलती हो? इस पहाड़ी पर चढेंगे।'' मैंने उत्सुक हो पूछा था।
''चलो'' और हम दोनो उस पहाड़ी पर एक पतली सी पगडंडी का रास्ता खोजते हुए ऊपर पहुँच गये। वह कोई सपाट ८ामीन नहीं थी। वह पहाड़ के ढलान पर बहुत ऊपर तक उगे पफूल थे। पाँच-छः पतली पतली पंखड़ियों वाले बसंती और हल्दी के बीच के रंग के। मेरा मन एक अद्भुत आनन्द से नाच रहा था।
हम लोग देख रहे थे, पीले पफूलों के बीच पौधों की हरी हरी पत्तियॉं तथा डंडिया भी बीच बीच में झाँक रही थीं। ध्यान से देखने पर तो हर जगह अलग-अलग डि८ाायन दिखाई पड़ते थे। जैसे हरे क़ालीन पर तरह तरह के पीले डि८ाायन बनाए हुए हों। या पीले क़ालीन पर हरे डि८ाायन बने हों।
मेरा मन हुआ थोड़े से पफूल तोड़कर द्घर ले जाऊँ। मैं पफूल तोड़ने को झुकी ही थी कि एक आदमी सड़क से चिल्लाया ''ऐ, मुन्नी! ये पफूल मत तोड़ो।''
''क्यों, क्या तुम्हारे हैं? तुम इनके माली हो?''
वह हँसा, मैं माली नहीं हूँ पर तुम तोड़कर ले जाओगी, तुम्हारे द्घर पहुँचते-पहुँचते ये मुर्झाने लगेंगे और तुम इन्हें पफेंक दोगी। इससे तो इन्हें वहीं रहने दो। अपनी पूरी जिन्दगी तो जी लेंगे।''
सुनकर अजीब सा लगा 'क्या पफूलों की भी ८िान्दगी होती है?' पर मैंने पिफर पफूल नहीं तोड़े। स्कूल में पढ़ा तो था, कि पेड़ पौधे साँस लेते हैं। अगर साँस लेते हैं, तो ८ारूर इनकी ८िान्दगी भी होगी ही।
और हम दोनों नीचे उतर आए। बार-बार पीछे मुड़कर देखती रही। आज पूरे अड़सठ साल पश्चात् वे पफूल, वह लहराता क़ालीन वहां हो या नहीं, किन्तु मेरे अन्तस्तल में तो एक अद्भुत आनन्द की अनुभूति करा ही जाता है। और मुझे उन नन्हें पफूलों की स्मृति जैसे पागल करने लगती है। विलियम वर्डसवर्थ की कविता 'डैपफ़ोडिल्स' याद आती है। मैं शर्त बद सकती हूँ कि मेरी स्मृति, मेरी वह आनन्दानुभूति, विलियम वर्डसवर्थ की डप़ैफोडिल्स की अनुभूति से कहीं अधिक प्यारी, कहीं अधिक सुन्दर और आकर्षक है। मन का एक टुकड़ा वहीं छोड़ आई हूँ न मैं।
वे डैपफाडिल्स नहीं थे, वे मेरे पफूल थे। और मेरे पफूल सबसे सुन्दर।
जजज
एक दिन हम लोग स्कूल में थे। हमें याद नहीं कि वह इकतालीस का कौन सा महीना था। खाने की छुट्टी हो चुकी थी। पाँचवा अथवा छठा पीरियड था। तभी ८ाोर ८ाोर से स्कूल की छुट्टी की द्घंटी बजने लगी। कक्षा में बताया गया कि किसी रिश्तेदार के या सहेली के द्घर न जाएँ। बस सीधे द्घर जाएँ और दो तीन दिन की छुट्टियाँ।
पहले तो हम सब परेशान। वैसे तो स्कूल की छुट्टी का सदा ही स्वागत होता था, किन्तु ऐसे अचानक? हो क्या गया?
पता लगा टिड्डी दल आ रहा है। पहले सोचा गया था कि नैनीताल नहीं आएगा, रास्ता बदल लेगा पर। अब पर वर नहीं, सीधे द्घर जाओ। बड़ी हैरानी हुई। टिड्डे, झींगुर, मेंढक ये चीजं़े तो हमेशा ही देखते हैं। हमारे स्कूल वाले टिड्डी से डरते हैं? डरतें हेैं तो डरें, हमें क्या? अपन की तो छुट्टी। अहः हा....
उस दिन भी दाई के हाथ में संटी थी, बार-बार चिल्लाती, ''अरी! जल्दी चलो, मस्ती छोड़ो हमें भी तो द्घर जाना है।''
हम तो स्कूल से बहुत दूर रहते थे। द्घर के करीब पहुँच नहीं पाए थे कि आकाश में अंधेरा छा गया। बा८ाार बंद हो चुका था। खोंचे वाले तक ग़ायब हो चुके थे। दाई बड़बड़ा रही थी। और जैसे आकाश से सैकड़ो टिड्डियाँ टपकने लगीं। द्घबड़ाकर हमने दौड़ लगा दी। दाई का क्या हाल हुआ होगा, हमें नहीं मालूम।
हमें क्या पता था, कि टिड्डियाँ ऐसे हमला करती हैं। मैंने कमला से कहा भी कि तुम मेरे द्घर ही आ जाओ। ''नहीं माँ द्घबड़ाएगी'' कहती हुई वह ते८ाी से भाग गई।
द्घर पहुँचे तो देखा दरवा८ो खिड़कियाँ सभी बन्द थे। किन्तु माँ एक पतली संद से झाँक रही थीं। जैसे ही मैं दरवा८ो पर पहुँची कि मुझे अन्दर खींच, दरवाजा बन्द कर दिया। पापा द्घर आ चुके थे।
टिड्डी होती तो बड़ी छोटी सी। कोई यूँ ही मार दे। वैसे मारे भी कोई क्यों? उन्हें भी जीने का हक़ होता है। पर टिड्डी दल, जैसे कोई पफौ८ा आ जाए और हमला बोल दे। जिस खेत पर बैठ जाये वह पूरा खेत मिनिटों में सापफ़, जिस पेड़ पर बैठ जाएँ वह पेड़ पूरा पत्तियाँ विहीन हो जाए। काग़ज कपड़ा कुछ भी तो नहीं छोड़तीं। वे ह८ाारों लाखों टिड्डियाँ नहीं, अरबों खरबों टिड्डियाँ थीं जो द्घने बादलों की भांति समूचे नैनीताल पर छा गई थीं। वे क्या गिनी जा सकती थीं?
मुझे याद नहीं कि कितने दिन बाद और किस प्रकार हम लोगों को सूचना मिली कि अब स्कूल जाना है। पिफर मुसीबत शुरू।
स्कूल गये तो टिड्डी दल के हमले का परिणाम आँखों के सामने था। सड़कों पर जगह-जगह मरी हुई टिड्डियाँ पड़ी थीं। पेड़ उजाड़ वीरान लग रहे थे और हज़ारों लाखों टिड्डियां झील पर छाई थीं, मरी या जिन्दा पता नहीं। उन टिड़िडयों को खाने के कारण ढेरों मछलियाँ भी मर गई थीं। और म८ोदार बात यह थी कि बीसियों लड़के बड़े-बड़े झोलों में टिड्डियाँ बटोर रहे थे। पता लगा कि वे लोग टिड्डियाँ खाते हैं। मछलियाँ भी जो खींच पाते पकड़ रहे थे। झील में उतरना खतरनाक था। क्यों कि झील में कुछ सोते थे जो आदमी को खींचकर ले जाते थे। वही पानी लगातार पोस्ट आपिफ़स के पीछे एक बड़े नाले के रूप में बहता रहता है। टिड्डी दल आया और तबाही के निशान छोड़ गया।
जो थोड़ी जिन्दा थीं या जिन्होंने आगे का सपफ़र मुल्तवी कर दिया था। वे अक्सर चलते-पिफरते लोगों के कपड़ों में द्घुस जाती थीं। अच्छा न८ाारा रहता। डाँस ड्रामा, समझिए उस दिन लोग अक्सर सड़कों पर ब्रेक डाँस करते चल रहे थे। वैसे यह बात अलग है कि हमें तो सुनने में भी और आज देखने में भी प्रेत डाँस ही लगता है।
जजज
कमला हमें अपने द्घर बहुत समय से बुला रही थी। मुझसे कहती तो मैं कह देती ''माँ से पूछकर, किसी दिन आ जाऊँगी।'' किन्तु माँ टाल जातीं। कह देतीं ''द्घर जाकर क्या करोगी? उससे तो रोज मिल ही लेती हो।''
मैंने उसे माँ का उत्तर बता दिया तो एक दिन द्घर आ गई, ''माँ इसे मैं अपनी ईजा ;माँद्ध से मिलाना चाहती हँू। वे कई बार कह चुकी हैं अपनी सहेली को लेकर आओ।'' और माँ ने इ८ााजत दे दी। अगले रविवार को जाने का पक्का हुआ।
जब रविवार आया और मैं चलने लगी तो हमारा नौकर लच्छी माँ के पीछे पड़ गया, ''बीबी जी! आप कहिए न, कि वहाँ कुछ खाये नहीं।'' तब माँ ने मुझे बुलाया और कहा ''देखो जा तो रही हो पर वहाँ कुछ खाना नहीं।''
''क्यो?'' मैं परेशान थी किसी के द्घर जाने का म८ाा तो जभी है जब खाने को मिले।
''खाऊँ क्यों नहीं?'' मैंने पूछा।
''कमला डोम जाति की है'' माँ ने कहा।
''डोम? डोम कौन होते हैं?'' मैं हैरान थी।
''डोम-जो लाशें जलाते हैं और कपफ़न रखते हैं। जैसे तुमने राजा हरिश्चन्द्र की कहानी पढ़ी है। उन्होंने आँषि विश्वामित्रा को दक्षिणा देने के लिए अपने को एक डोम के हाथों बेच दिया था।''
मैं आश्चर्यचकित थी। किन्तु मैं वहाँ चली गई। मेरे लिए जाति-पांत का कोई मतलब था भी नहीं।
कमला जिस जगह रहती थी, उस जगह का नाम विल्सनगंज था। वैसे यह बिल्डिंग हमारे द्घर के पीछे की खिड़की से बहुत नीचे की ओर दिखाई पड़ती थी। उस टेढ़े मेढ़े रास्ते से उछलती कूदती मैं नीचे चली गई और बिल्डिंग के पास पहुँच गई। वहाँ पहुँचकर बाहर का दृश्य देखकर तो मेरा जी द्घबड़ा उठा। बिल्डिंग के बाहर सीमेंट का एक पक्का मैदान सा बना था बहुत बड़ा नहीं था, किन्तु बच्चों के खेलने के लिए कापफ़ी अच्छा था।
वहाँ जगह-जगह खून में लथपथ गोश्त के टुकड़े पड़े थे। कुत्ते उनके लिए झगड़ रहे थे। परेशान सी मैं सोच ही रही थी कि क्या करूँ। कुत्तों से मुझे बहुत डर लगता है। चाहे पालतू हों, चाहे सड़क पर द्घूमने वाले। तभी कमला की बिल्डिंग में रहने वाली एक लड़की, जिसका नाम सरस्वती था, आ गई। वह हमारे ही स्कूल में पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी।
मुझे देख कर वह प्रसन्न हो गई और मेरा हाथ पकड़ कर बोली, ''देख संभल कर आना, सीढ़ियों पर बहुत अंधेरा है'' और मेरा हाथ पकडे़ पकड़े वह धीरे-धीरे सीढ़ियों से ऊपर ले गई। अंधेरा? वह मामूली अंधेरा नहीं, अमावस की रात का अंधेरा था। मुझे अपना हाथ भी नहीं दिखाई पड़ रहा था। बस उसके सहारे ऊपर चढ़ गई। ऊपर पहुँच कर वह मुझे एक कमरे में ले गई। वहाँ थोड़ी रोशनी थी, किन्तु इतनी कम कि उसका होना न होना बराबर था। कमला ने अचानक सामने आकर मेरा स्वागत किया। उसकी आवा८ा से उसकी प्रसन्नता झलक रही थी। सूरत तो उसकी भी स्पष्ट देख नहीं पा रही थी। अब कोई यह न समझे कि मेरी आँखें कमजोर थीं। मैंने तो चाँद की रोशनी में पूरी-पूरी कहानियाँ पढ़ डाली हैं। इस आयु तक भी बिना चश्मे के मैं, पढ़ भी सकती हूँ और टी.वी. भी देख सकती हूँ।
कहने का तात्पर्य यह है कि कमरे में प्रकाश इतना म(मि था कि मुझे यही नहीं समझ आया कि वह बिजली का प्रकाश था या लालटेन या दिये का। कमला ने अपनी ईजा ;माँद्ध को बुलाया। मेरी आयु साढ़े दस साल...जब वे आई तो मैं उनकी लम्बाई तक तो पहुँच नहीं सकती थी, उन्हें देखने को सिर उठाया, किन्तु उनकी सूरत? न...न... मुझे कुछ नहीं समझ आया। उसकी माँ के नाम से एक बहुत सारी चुन्नटों वाले लहंगे की याद आती है। उस लहंगे के अन्दर कोई स्त्राी थी, यह पता ही नहीं चला। उनकी सूरत भला कैसे देख पाती?
पिफर वह दोनो अन्दर चली गईं, किधर से पता नहीं। मैं और सरस्वती दोनो वहीं ८ामीन पर बिछी चटाई पर बैठ गये। मूर्ख सी मैं...मैंने सरस्वती से पूछा, ''कमला की जाति क्या है?''
वह चुप रही कुछ बोली नहीं, मैं भी चुप रही। तभी कमला एक हाथ में चाय का कप-प्लेट तथा दूसरे में प्लेट कुछ खाने को लाई, तब सरस्वती बोली, ''कमला! शीला तुम्हारी जात पूछ रही है।''
''क्या? शीला! तुम जाति पूछ रही हो मेरी?'' और मेरे सामने से कप उठाते हुए बोली, ''तब मैं तुमसे यही कहूँगी कि मेरे द्घर की चाय तुम मत पियो'' उसकी आवा८ा से जैसे रोना पफूट रहा हो।
मैं द्घबड़ा गई झट से उसके हाथ से कप लेकर, ''नहीं कमला ऐसी कोई भी बात नहीं। मैंने तो यूँ ही पूछा था।'' कहते, कहते एक द्घूंट में चाय पी गई। चाय का स्वाद समझने का तो समय ही नहीं था। हाथ में वह ख़ाली प्याला मैंने ध्यान से देखा। बेहद गंदा जैसे गंदगी के कारण काला पड़ गया हो, या उसका रंग ही काला हो। कप रख कर मैं खाने पर जुट गई जैसे जनम जनम की भूखी होऊँ। मेरी समझ में आया था कि वे बेसन के सेव थे। सारे सेव खा डाले। एक बार कमला या सरस्वती से खाने को भी नहीं कहा। तकल्लुपफ़ क्या होता है, मैं भूल ही गई।
कमला खुश थी और उसी में मेरी भी खुशी थी। सरस्वती भी हँसकर बात कर रही थी किन्तु मैं सोच रही थी कि मैंने उसकी जाति क्यों पूछी? वह मेरी सहेली थी, क्या यही कापफ़ी नहीं था?
जजज
हमारी छमाही परीक्षा के पश्चात् पिफर हमारी जाड़ों की छुट्टियाँ होने वाली थीं। भयंकर सर्दी थी। दो-दो स्वेटर पहनते तो भी सर्दी न जाती। उत्तर भारत में तो सर्दी के मौसम में भी खूब पानी बरसता है और सर्दी को कई गुना बढ़ा देता है। और हम लोग उस भयंकर सर्दी में स्कूल जाते, हँसते....खेलते मुँह से इंजन की तरह धुंआ छोड़ते छुक-छुक। सच बात तो यह है कि बच्चों के लिए तो हर मौसम दोस्त होता है। चाहे कड़कती ठिठुरती सर्दी हो, चाहे चिलचिलाती धूप हो, चाहे तालियाँ बजाती बरसात हो... चाहे धड़धड़ पड़पड़ ओले हों। सारे मौसम बच्चों के साथ अठखेलियाँ करते ही आते हैं। और बच्चे बाहें पसार उन सारे मौसमों का स्वागत करते हैं। यह तो बड़े लोग होते हैं, जो सदा झींकते रहते हैं। उन्हें तो कोई भी मौसम पसन्द ही नहीं आता है।
और मौसमों को भी वे बड़े लोग कहाँ पसन्द आते हैं। ख़ूब तंग करते हैं उन्हें।
एक दिन हम लोग स्कूल जा रहे थे। पानी बरस रहा था सो बरसाती तो पहने ही थे। अचानक ओले गिरने लगे। ओले तो बहुत देखे थे किन्तु इतने छोटे नहीं। जैसे चने मटर के दाने हों। कुछ तो उससे भी छोटे। शरीर पर ओलों की मार नहीं पड़ रही थी ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे कोई पफूलों से मार रहा हो। दाई ने ते८ा चलने को कहा। किन्तु क्या बरसाती पहन कर कोई ते८ा चल सकता है? किसी प्रकार हमलोग स्कूल पहँुच ही गये और सीधे कक्षा में। बाहर ओले गिर रहे थे और हमें खिड़की से सारा दृश्य दिखाई पड़ रहा था। पानी बरसने की आवा८ा ऐसी सुनाई पड़ रही थी जैसे बहुत सारे नन्हें बच्चे एक साथ तालियाँ बजा रहे हों।
खाने की छुट्टी में हम सब बाहर भागे।
'अरे! यह क्या? इतनी देर में यह क्या हो गया?' जैसे आकाश से बपर्फ़ के वस्त्रा पहने ढेर सी परियाँ उतर आई हों। या वे हंसनियां हों... जो झूम-झूम कर नाच रही हों। कह रही हों आओ हमारे साथ नाचो गाओ, मैं बरांडे से नीचे खुले मैदान में उतर आई थी। पानी बरसना बन्द हो चुका था।
हमारे स्कूल के सपाट मैदान के पश्चात् पहाड़ की उतराई थी। बच्चे गिरें गिरायें नहीं सो पूरे में सात आठ पफीट ऊँची मोटी जाली लगा रखी थी। जाली से दिखाई पड़ती थीं तरह तरह के पफूलों की क्यारियाँ तथा सुन्दर-सुन्दर पेड़ पौधे। पहाड़ों पर तो खेत क्यारियाँ सभी सीढ़ियोंदार होते हैं। हमारे स्कूल के मैदान में तो बच्चे खेलते थे, तो ऊपर पफूलों की क्यारियाँ बहुत कम थीं।
दीवानी सी मैं भागी जाली की ओर, पूरे मैदान में जैसे ओलों का बिस्तर बिछा था। और हर वृक्ष की डालियों पर, पत्तियों पर ओले, नन्हे-नन्हे ओले आराम से बैठे झूले का आनन्द उठा रहे थे। बड़े बड़े रंग बिरंगे पफूल, एक ही पफूल में दस-दस रंग, ऊपर से वे श्वेत हिम परियाँ उन पर जैसे नृत्य कर रही थीं, यहाँ तक कि उतनी पतली जाली पर भी तो जगह जगह ओले छिपा छिपउल का खेल खेल रहे थे।
''यह क्या बपर्फ़ है?'' 'नहीं' किसी ने कहा, ''यह सिपर्फ़ ओले हैं। बपर्फ़ ऐसी नहीं, कुछ अलग होती है।'' कुछ भी हो मुझे तो हर पत्ती, हर पफूल नाचता गाता दिख रहा था। मुझे दिशा, दिशा से एक अद्भुत संगीत सुनाई पड़ रहा था और मेरा मन झूम, झूम कर नाच रहा था, गा रहा था। 'नाचो... नाचो प्यारे मन के मोर।' और मैं सचमुच गुनगुनाने लगी थी।
पीछे से कमला ने कंधे पर हाथ धर कर कहा था, 'छुट्टी हो गई, द्घर नहीं चलोगी?'
''छुट्टी? अभी तो खाने की छुट्टी है। अभी द्घर कैसे?''
''नहीं आज जल्दी छुट्टी कर दी है द्घर चलो।''
उस समय पहली बार मुझे द्घर जाना अच्छा नहीं लगा था। शायद कक्षा में जाना भी अच्छा नहीं लगता। मैं तो वहीं खड़ी रहना चाहती थी। मेरे द्घर में न पफूल थे, न मैदान। द्घर पहुँचूंगी और माँ थोड़े से दूध में एक चम्मच ब्रांडी मिला कर पिलाएँगी और ओढ़ा कर लिटाल देंगी, कहीं सर्दी जुकाम न हो जाए, कहीं सर्दी से बुखार न आ जाए। पीछे मुड़ी तो देखा स्कूल की पूरी ढलवा छत भी ओलों से सपफेद हो गयी थी। वाह! दुनिया ऐसी भी होती है क्या? इतनी सुन्दर, इतनी प्यारी।
द्घर पहुँची तो हमारे द्घर की छत भी पूरी ओलों से ढकी हुई थी। पर मैं वहाँ सड़क पर खड़े होकर वह सौंदर्य निहार नहीं सकती थी। द्घर के अन्दर तो जाना ही पड़ेगा।
जजज
हमारी छमाही परीक्षा समाप्त होने को आ गई थी। हम लोगों को अब जाड़ों की छुट्टी में बरेली जाना था। इतनी भयंकर सर्दी में सभी के बीमार पड़ने की आशंका थी। सबसे छोटा राम तो पूरे दो साल का भी नहीं था। मैं ही केवल साढ़े दस साल की थी। सुधा और कीर्ति दोनों मुझसे छोटी, सो अबकी पापा और लच्छी को नैनीताल छोड़ हमलोग बरेली आ गये। पहाड़ी नौकर था। उसकी तो उस बपर्फ़ीली ठंड में रहने की आदत थी। पापा हमलोगों को काठगोदाम पर गाड़ी में बिठा कर लौट गये थे।
कितनी भी डाँट पड़े, मार पड़े, द्घर के सभी दुत्कारते रहें, किन्तु बरेली हमें बड़ा प्यारा था, वहाँ के सभी लोग हमें अपने लगते थे। द्घर था हमारा वहाँ।
इन्हीं छुट्टियों में हमारे पापा की प्यारी नानी हमें छोड़कर सदा सदा को चली गई थीं। उस साल वह बरेली जाना, मैं कभी नहीं भूल सकती।
बार-बार लगता कि क्या सचमुच वे सदा के लिए ही चली गईं? क्या अब हम उनको कभी भी नहीं देख पाएँगे। यह सवाल अक्सर मन को बेचैन करता था।
जजज
छुट्टियों से लौटकर, जब कमला से मिली तो वह बेहद प्रसन्न थी। बात, बात पर हँस पड़ती थी। रास्ते में मुझसे धीरे से बोली ''शीला! तुझे एक बात बतानी है।''
मैं उसे देखने लगी। उसने कहा ''थोड़ा आगे चलें न'' और हमलोग सड़क पर थोड़ा आगे बढ़ गये। वह धीरे से बोली जिससे कोई दूसरा सुन न ले, ''मेरी शादी ठहर गई है शीला।''
मैं थमक गई ''क्या सच्ची? तेरी शादी ठहर गई? किससे ठहरी?''
वह हँसी। बोली, ''एक लड़का है, नाम है दुर्गा प्रसाद। मेरे भाई का दोस्त है। उनके साथ बी.एस.सी. में पढ़ता है।''
मैंने हुमग कर पूछा, ''देखने में कैसा है?''
''बहुत सुन्दर है। बहुत अच्छा है।'' वह बोली, ''किसी दिन दिखाऊँगी तुझे।'' वह जैसे हवा में उड़ी जा रही थी।
उन दिनों तेरह-चौदह साल की लड़कियों की शादी आम तौर से हो जाती थी। इस कारण उसकी शादी ठहरने की सूचना से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
जजज
मैं पहले ही लिख चुकी हूँ कि बरेली तथा नैनीताल के रहन-सहन में बड़ा अन्तर था। नैनीताल में हमारे रास्ते में तल्लीताल-मल्लीताल के बीच में ''पिक्चरपैलेस'' नाम का एक सिनेमा हॉल था। उसमें सदा हिन्दी के सिनेमा ही लगते थे। ताऊ जी जिसमें मैनेजर थे। वह ''राक्सी'' सिनेमा हॉल थोड़ी ऊँचाई पर था। उसमें सिपर्फ अंग्रेजी के सिनेमा ही लगते थे।
पिक्चर पैलेस में दोपहर में ;रविवार या छुट्टियों को छोड़करद्ध रो८ा केवल महिलाओं के लिए सिनेमा लगते थे और टिकिट होता था साढ़े चार आना। स्कूल से आते-जाते सिनेमा के पोस्टर देखती तो माँ को बताती थी। और माँ के पैसे देने पर सुधा और मैंने तीन पिक्चर, संत ज्ञानेश्वर, सहगल और कानन बाला की 'लगन' तथा मोतीलाल तथा ख़ुर्शीद की 'परदेसी' देखी थी। माँ पापा रात का शो देखते थे। किन्तु बरेली में तो हमें सिनेमा देखने की इ८ाा८ात नहीं थी। सूरदास, तुलसीदास जैसे सिनेमा ही देखे थे। जब देखो तो द्घर के बड़े लोग चले जाते थे। बच्चे द्घर में रोते ही रह जाते थे।
जजज
स्कूल रो८ा जाते थे। रास्ते भर हम लोगों की मस्ती चलती रहती थी। उस दिन देखा कमला बड़ी उदास है। पूछा तो उसकी आँखों में आँसू छलछला आये। पर बोली नहीं। खाने की छुट्टी में भी वह उदास बैठी रही। शाम को लौटते समय बोली, ''शीला, मेरे ताऊ जी मेरी शादी तोड़ने के पीछे पड़े हैं।'' ''क्या? शादी तोड़ने के?'' मैं हैरान थी ''पर क्यों?''
''मेरे ताऊ जी की लड़कियों की शादी पढ़े-लिखे लड़कों से नहीं हुई है। उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा है कि मेरी शादी एक बी.एस.सी. में पढ़ने वाले लड़के से हो।''
पिफर वह बोली, ''मेरे ताऊ जी ने मेरे लिए दूसरा लड़का चुना है। वह दसवाँ भी पास नहीं, कहीं छोटी सी नौकरी करता है। शीला, बताओ मैं क्या करूँ?''
द्घर पहुँचते-पहुँचते कमला द्घबड़ा गई, ''देखो उधर... उधर वह लड़का। जिधर उसने इशारा किया था, मैंने देखा, एक लड़का कापफ़ी गोरा, मुँह आधा खुला, मूर्खों की भांति कमला की ओर देख रहा हेै। कपड़े भी कोई कायदे के नहीं लग रहे थे। पहाड़ियों जैसी टोपी टेढ़ी टेढ़ी उसके सिर पर धरी थी। मुझे वह लड़का बहुत खराब लगा। मेरे कुछ कहने से पहले ही वह बोली-''यही है वह आनन्द प्रसाद, ताऊ जी ने इसी से मेरी शादी ठहराई है। मैं नहीं करूँगी इससे शादी'' जैसे पागल हो रही हो, ''मर जाऊँगी पर इससे शादी नहीं करूँगी।''
मेरा मन आनन्द प्रसाद को देखकर बड़ा खराब हो गया था।
जजज
उस ८ामाने में लड़कियों के लिए लोअर मिडिल छठी दर्जे की परीक्षा होती थी, और बोर्ड का सर्टिपिफकेट मिलता था। मैं छठी कक्षा में थी। कमला ने पिछले साल छठी की बोर्ड की परीक्षा दी थी- इंगलिश में पफेल हो गई थी। किन्तु उसे सातवीं कक्षा में बैठने की अनुमति मिल गई थी। शर्त यह थी कि वह अगली वार्षिक परीक्षा में छठी की परीक्षा ;केवल अंग्रेजी मेंद्ध पिफर से दे और पास हो।
कमला की उदासी वैसी ही थी। उसका मन पढ़ने में बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। एक दिन लौटते पर मैंने उससे पूछा, ''दुर्गा प्रसाद कैसा है देखने में?''
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे कोई बड़ा अपमान किया हो उसका। एकदम मेरा हाथ पकड़ा और बोली ''चल आज, तुझे दुर्गा प्रसाद से मिलवा दँू।'' वह मुझे खींचती सी ले गई। हम लोगों ने अपना रास्ता बदल दिया था, बजाय सीधे चलने के हम लोग तल्लीताल के बा८ाार में ऊपर चढ़ने लगे। दाई ने देखा चिल्लाई-''उधर कहाँ जा रही हो? नीचे आओ।''
कमला ने हँसते हुए कहा ''ऊपर मेरे पिता जी हैं उन्होंने कुछ सामान भेजने के लिए बुलाया है। अभी लेकर नीचे आते हैं।''
दाई चुप हो गई। सीधी औरत थी और उसे यह भी पता था कि कमला सीधी सी लड़की है। ऊपर पहुँचे तो दाँईं ओर एक नाई की दुकान थी। बढ़िया वाली दुकान थी वह। उसी दुकान पर एक सांवला सा लड़का खड़ा था, किसी से बात कर रहा था। कमला ने मुझसे धीरे से कहा ''देखो वह सांवला सा लड़का चश्मा लगाये खड़ा है न, वही दुर्गा प्रसाद है।'' बहुत लम्बा नहीं था लगभग पाँच पफीट छः इंच की लम्बाई होगी। उस समय तो लम्बाई का अंदाजा लगाना कठिन ही था मेरे लिए। किन्तु मेरे पापा से छोटा होगा। द्घुंद्घराले बाल थे बिल्कुल मेरे पापा जैसे। बड़ा ही आकर्षक लग रहा था वह लड़का। उसकी बातें मैंने नहीं सुनी थी किन्तु उसके खड़े होने, दूसरे से बात करने की भाव-भंगिमा मुझे अच्छी लगी थी। और पहली बार ऐसा प्रतीत हुआ कि आवश्यक नहीं कि गोरे व्यक्ति ही सुन्दर लगें, सांवले भी सुन्दर लग सकते हैं। एक ओर गोरा आनन्द प्रसाद दूसरी ओर सांवला दुर्गा प्रसाद। ८ामीन आसमान का अन्तर। ठीक ही रोती है कमला। जिसकी शादी दुर्गा प्रसाद जैसे लड़के से ठहरी हो वह आनन्द प्रसाद को कैसे पसन्द कर सकती है?
कमला दुकान के सामने ठहरी नहीं, न उसने दुर्गा प्रसाद की ओर देखने का प्रयत्न ही किया। मैं दो पल ठहर गई थी और पिफर हम लोग तेजी से नीचे उतर गये थे।
''कैसा लगा?'' उसने पूछा। ''बहुत अच्छा। बहुत ही अच्छा। पर तुम्हारे ताऊ जी इससे शादी क्यों नहीं करवाना चाहते?'' मैने पूछा।
''वे नहीं चाहते कि मेरी शादी एक पढ़े- लिखे, अच्छे लड़के से हो जाए''
मुझे बड़ा बुरा लग रहा था। क्या ऐसा भी कोई हो सकता है दुनिया में? क्या अपने ही द्घर की बेटी के लिए कोई इतना बेरहम हो सकता है?
दो-चार दिन बाद कमला ने मुझसे मेरे द्घर का पता पूछा। मेरे बताने पर उसने मनीआर्डर पफार्म पर वह लिख दिया और पोस्ट आपिफ़स से वह मनीआर्डर भेज दिया। मैंने पूछा ''क्या था यह? किसको हमारा पता भेजा है?'' तो बोली- ''शीला मुझे मापफ़ करना मैंने तुमको बिना बताए तुम्हारा पता भेज दिया है।'' पिफर मुझे एक हिन्दी के अखबार का टुकड़ा दिखाया उसमें एक विज्ञापन 'जादुई रूमाल' का था, जिसके पास रखने से प्रेमी को उसकी प्रेमिका, प्रेमिका को उसका प्रेमी मिल जाता है। व्यापार में हानि हो, विद्यार्थी परीक्षा में पास न होता हो, कोई भी परेशानी हो, सभी दूर होती है। और हर बिगड़ा काम बन जाता है। सभी जगह सपफलता प्राप्त होती है। यदि आपके पास जादुई रूमाल हो तो सभी बिगड़े काम बन जाते हैं।
मैं कुछ नहीं समझी। कमला ने पाँच रुपये मनीआर्डर किये थे। किसी रूमाल के लिए? वह जादुई रूमाल है? जिससे सारे बिगड़े काम बन जाते हैं, वाह! बढ़िया ची८ा है।
वह बोली- ''मैं इस रूमाल को इसलिए मंगा रही हूँ कि दुर्गा प्रसाद से ही मेरी शादी हो। यदि ताऊ जी ने वह शादी तोड़कर आन्नद प्रसाद से करने की बात की तो मैं मर जाऊँगी। सच्ची कहती हूँ मैं मर जाऊँगी।
''अच्छा इस रूमाल को मंगाने से तुम्हारी शादी दुर्गा प्रसाद से हो जाएगी, कमला?''
''पता नहीं'' वह स्वयं ही पूर्ण विश्वास नहीं कर पा रही थी, ''शायद हो ही जाए, शायद ताऊ जी का दिमाग पिफर जाए।'' निराशा उसके स्वर में थी। पिफर बोली ''देखो शीला यह रूमाल मैंने तुम्हारे पते पर इसलिए मंगाया है, कि मेरे द्घर में किसी को पता नहीं लगे। पर तुम्हारी माँ जरूर पूछेंगी कि कमला ने यह रूमाल क्यों मंगाया है? तो तुम हर्गिज नहीं कहना कि दुर्गा प्रसाद के लिए मंगाया हैं।''
''तो और पिफर क्या कहँूगी माँ से?''
''कह देना कि कमला पिछले साल छठी कक्षा में पफेल हो गई थी। इस कारण वह रूमाल मंगाया है कि पास हो जाए।''
मैं चुप हो गई, पर माँ के सामने झूठ बोलना आसान नहीं। पता नहीं वह पफट से हरेक का झूठ कैसे पकड़ लेती हैं?
वह पार्सल आया तो मैं स्कूल में थी। माँ ने उसे खोल लिया था। उन्होंने मुझसे पूछा, ''यह पारसल कमला ने मंगाया हैं?''
''हाँ'' मैं अचकचा गई।
''क्यों? किस लिए मंगाया है?''
मैं चुप। माँ गुस्से में थीं ''क्या कमला किसी से प्रेम करती हैं?''
मैंने सिर हिलाया ''मुझे नहीं मालूम।''
''तो ये क्यों मंगाया है।? दो पैसे का रूमाल पाँच रुपए वी.पी.पी. के देने पड़े।''
''पाँच रुपये? वी.पी.पी. क्या होता है?''
''पहले यह बताओ कमला किससे प्रेम करती हैं?'' डर के कारण मेरा बुरा हाल था। पिफर उसकी कही बात कह दी ''माँ वह पिछले साल छठी कक्षा में अंग्रेजी में पफ़ेल हो गई थी इसलिए उसने यह रूमाल मंगाया है कि...।''
''पागल है, इस रूमाल से पास होएगी वह? पढेग़ी तो पास होएगी। ये दुष्ट लोग, लोगों को लूटते हैं। मूर्ख बनाते हैं। कुछ नहीं होता है इन रूमालों से। सब बकवास है।''
मैं बच गई। अधिक सवाल करतीं, तो शायद मैं सच बोल देती। माँ के सामने झूठ बोलना मेरे लिए बड़ा कठिन था।
हमारा नौकर लच्छी एक वाक्य बहुत कहता था, ''सच मैं कहता नहीं, झूठ मैं बोलता नहीं।'' इस समय इस वाक्य का अर्थ समझ में आया था। दूसरे दिन कमला जब पार्सल लेने आई तो माँ ने एकाध सवाल उससे भी पूछा। पिफर बोलीं -''कमला छठी कक्षा की परीक्षा देने की गलती कभी न करना। चुपचाप द्घर बैठी रहना। स्कूल में कोई कुछ कहे तो कह देना बीमार हो गई। भले डाक्टर का सटिपिर्फकेट दे देना पर परीक्षा मत देना।'' माँ उसे कापफी देर समझाती रहीं।
जजज
एक दिन कमला ने बताया कि आनन्द प्रसाद उसके पीछे ही पड़ गया है। हर जगह पेड़ों पर, पत्थरों पर लिखता रहता है कमला आनन्द... कमला आनन्द। यहाँ तक टिपिफ़न टाप पर भी पेड़ों पर लिखा है। वह रोने-रोने को हो रही थी, ''शीला मैं मर जाऊँगी। पर उस आनन्द से शादी नहीं करूँगी।''
मैं क्या बोलती। क्या कहती मेरी कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।
जजज
हमारी बोर्ड की वार्षिक परीक्षा मार्च में होने वाली थी। पढ़ाई ८ाोरों से चल रही थी। एक दिन तबियत खराब होने के कारण मैं स्कूल नहीं गई थी। दूसरे दिन मैं एक बार पहले ही पहनी हुई धोती पहन कर चली गई थी। आज तक याद है कि कुछ हरे काले रंग का बार्डर था और उस सपफ़ेद धोती को द्घर में ही गुलाबी रंग से माँ ने रंग दिया था। धोती गंदी तो नहीं थी, पर बहुत सापफ़ भी नहीं थी।
जैसे ही मैं कक्षा में द्घुसी, लड़कियाँ हाय हाय करने लगीं ''ये क्या पहन कर आई है। आज पार्टी के दिन।''
''कैसी पाटीर्?'' मुझे कुछ भी समझ नहीं आया।
''अरे हमारी बोर्ड की परीक्षा है तो दसवीं और छठी कक्षा को, शुभकामना देने को सातवीं ,आठवीं और नवीं कक्षा पार्टी देती है।''
''तो?'' मैंने पूछा।
''तो क्या मूर्ख! तू क्या इन कपड़ों में जाएगी? इन गन्दे कपड़ों में। हम सब तो बढ़िया-बढ़िया कपड़ों में जाएँगी।''
''पर तुम लोग तो स्कूल के सादे कपड़ो में हो।'' मैंने कहा।
''नहीं, हमलोग खाने की छुट्टी में पास रहने वाली सहेलियों के यहाँ जाकर कपड़े बदल कर आएँगे। सब लोग सजधज कर जाएँगे पार्टी में।''
पर मेरी कोई भी ऐसी सहेली नहीं थी, जिसके द्घर जाकर मैं उसकी साड़ी पहन लँू। मैं चुप रही।
एक दो लड़कियों ने कहा, ''ऐसा करो तुम बाहर पार्टी में मत जाना। नहीं तो सब लोग क्या कहेंगे कि सबके कपड़े इतने बढ़िया और तुम्हारे इतने रद्दी हैं।''
मैंने स्वीकृति में सिर हिला दिया। अकेले हमलोगों को द्घर जाने की इजा८ात नहीं थी। नहीं तो मैं द्घर ही चली जाती।
जब कार्यक्रम आरंभ हुआ। सारी लड़कियाँ बाहर चली गईं। हमारे स्कूल में बहुत बड़ा लम्बा बरांडा था। आधा बरांडा खुला रहता था और शेष आधे में शीशे के दरवाजे लगा कर बन्द कर दिया गया था। वहाँ अक्सर कक्षा भी लगती थी।
तो उस शीशे वाले कमरे को खूब सजाया गया था। पूरे में झंडियाँ आदि लगीं थीं। मेजों पर सपफ़ेद चादर बिछे थे। पर मैं अकेली अपनी कक्षा में बैठी थी।
तभी कमला मुझे खोजती हुई आई।
''अरे तुम! यहाँ अकेली क्यों बैठी हो। सब बाहर बैठे हैं।''
''नहीं! मैं नहीं जाऊँगी, मेरे कपड़े बढ़िया नहीं हैं।''
''तो क्या? कपड़े बढ़िया नहीं हैं तो भी बाहर तो जाना चाहिए न। चलो''
''नहीं सभी लड़कियों ने मना किया था, कि इतने खऱाब कपड़ों में मत जाओ।''
तब कमला मुझे पीछे के रास्ते अपनी कक्षा में ले गई। वहाँ दूसरी कक्षा की सारी लड़कियाँ जमा थीं और खाने पीने का सारा सामान रखा था।
बाहर खाने का सामान पहुँच चुका था। सभी लड़कियाँ मुझे देखकर परेशान थीं और मेरी कक्षा की लड़कियों की बदतमी८ाी पर गुस्सा हो रही थीं। इतनी सारी लड़कियों के बीच मेरा बोलना भी मुश्किल था। कमला ने एक प्लेट में सारी ची८ों मुझे खाने को दीं, और भी कई लड़कियाँ मेरा लाड़ कर और भी मिठाइयाँ मेरी प्लेट में डाले जा रहीं थीं और मैं बहुत ही खिसिया रही थी।
बाहर सातवें, आठवें तथा नवीं कक्षा की लड़कियों के प्रोग्राम चल रहे थे। कोई हास्य नाटिका, कुछ गाने। ;दसवीं कक्षा की चेलि दी का स्कूल में अन्तिम साल थाद्ध तो विदाई में उन दिनों का अत्यन्त प्रचलित गीत ''रुक न सको तो जाओ, तुम जाओ,'' भी गाया गया था। ये गाना बरेली स्कूल में हमारी अंग्रेज प्रिंसिपल मिसे८ा एलॉय की विदाई पर भी गाया गया था।
मैं अंदर बैठी सब सुन रही थी। तभी हमारी क्लास टीचर मिस पद्मा गरब्याल बोलीं ''ये क्या है? सारा प्रोग्राम सातवीं, आठवीं, नवीं की लड़कियाँ दे रही हैं। छठी की लड़कियाँ क्या कुछ भी प्रोग्राम नहीं दे रही है?''
सब चुप ''कौन दे रहा है प्रोग्राम?'' वे पिफर बोलीं।
''शीला कहाँ है? दिखाई नहीं पड़ रही है।'' असल में मैं कई बार स्कूल के शनिवार के प्रोग्रामों में गाना गा चुकी थी। एक बार नाटक में भी पार्ट लिया था। सो हमारी टीचर को मेरी याद आ गई।
''वह आज नहीं आई है'' किसी ने कहा।
''आई कैसे नहीं हैं सुबह उसे मैंने क्लास में देखा था। कहाँ है वह?''
तब कुछ लड़कियों ने कहा, उसके कपड़े अच्छे नहीं थे। इसलिए नहीं आई।
''कपड़े अच्छे नहीं थे? क्यों, कपड़ों में क्या खराबी है? और ऐसे वह अकेले द्घर कैसे जा सकती है?''
''द्घर नहीं गई टीचर वह अन्दर बैठी है।'' कमला ने बताया। और मुझे आवा८ा दी गई। स्थिति ऐसी हो गयी थी कि मैं अब गाने के लिए मना भी नहीं कर सकती थी।
बाहर गई तो टीचर ने कहा - ''पहले इसको खाने की प्लेट दो।''
''मैं अन्दर खा चुकी'' मैंने धीरे से कहा। कैसे कहती कि मुझे तो तिगुना मिल गया। और मैंने ''मुक्ति'' पिक्चर का गाना गाया...
''कैसा उजड़ा चमन खुशी का, कैसा नसीबा पफूट गया''
मैंने यह पिक्चर नहीं देखी थी। माँ बताती थी कि इसमें कानन बाला और पी.सी. बरूआ थे। बड़ी बढ़िया पिक्चर थी। यह ग़८ाल मुझे सबसे अधिक पसंद थी।
दूसरे दिन कक्षा में टीचर सारी लड़कियों पर मुझे बाहर न जाने की राय देने के कारण कापफी गुस्सा हुईं। एक वाक्य मुझे याद है ''बस कपड़े बढ़िया पहन लो। पिफर चाहे गुण कोई हो या न हो। याद रखो आदमी के गुणों के कारण उसकी तारीपफ़ होती है, कपड़ों के कारण तारीपफ़ नहीं होती है।''
शायद द्रौपदी ने उन्हें सारी द्घटना सुनाई थी। वह उनकी छोटी बहिन थी न। इस एक वाक्य ने मुझे कापफ़ी उत्साह प्रदान किया। काश मैं उसी स्कूल में रह पाती।
जजज
हमारी 'बोर्ड ऑपफ़ एंग्लोवर्नाकुलर मिडिल' की वार्षिक परीक्षा मार्च में शुरू हुई। परीक्षा केन्द्र कहीं और था। स्कूल से कापफ़ी पहले रास्ते में पड़ता था। उस दिन दो पर्चे थे। दोनों इंग्लिश के थे। कमला भी आई थी। परीक्षा का समय सात से दस बजे तक था। माँ ने कहा था कि तुम्हारे लिए गरम- गरम खाना बनाकर भेज दूँगी। दो बजे से दूसरा पर्चा आरंभ होना था।
जब हमलोग नीचे आए तो मेरा खाना नहीं आ पाया था। कमला बोली-''तुम परेशान न हो। मेरे पास खाना रखा है। ईजा ने बनाकर दिया है। मुझे भूख नहीं है, इसे तुम खालो।''
जब मैं अकेले खाने को तैयार नहीं हुई तो उसने भी खाना शुरू कर दिया। उसकी शायद रात की बनी पूरियाँ थीं।
तभी लच्छी दौड़ता हाँपफता सा आ गया -''बहू जी ने कहा था कि रास्ते में दही खरीद लेना। दुकान वाले ने बड़ी देर लगा दी।'' टिपिफन कैरियर था। गरम-गरम पतली-पतली पूरियाँ, दो सब्जियाँ, दही रखने के लिए कटोरी, शक्कर। बड़े करीने से रखा था सारा सामान। माँ परीक्षा के समय हमेशा ही मेरा बहुत अधिक ही ध्यान रखती थीं। सुबह सात बजे की परीक्षा जब बरेली में होती, मेरे लिए हमेशा चार गुलाबजामुन रखी होती थी। उस दिन भी गुलाबजामुन ही खाकर आई थी।
कमला ने जैसे ही मेरा डिब्बा देखा अपना डिब्बा मेरे सामने से खिसका लिया-''तुम्हारा खाना ता८ाा है, बढ़िया है, तुम अपना वाला खाओ और मैं....''
कमला को दुखी देखना मुझे अच्छा नहीं लगता था। मैं भूखी न रहूूँ इस कारण उसने स्वयं न खाकर अपना पूरा डिब्बा मुझे दे दिया था। अब मैं अपना ता८ाा खाना खुद कैसे खाऊँ?
मैंने कहा, मुझे बहुत बढ़िया लग रहा है। तुम मेरा वाला खाना खाओ। खैर किसी प्रकार मिल बांट कर हमदोनों ने खा लिया।
पर्चे ठीक ही हो गये थे। हाँ! जब माँ को पता लगा कि कमला ने छठी की अंग्रेजी की परीक्षा दी हेै, तो वे बहुत परेशान हो गई थीं।
जजज
और एक दिन पापा ने कहा कि अब मई में पूरा आपिफ़स हमेशा के लिए आगरा जा रहा हेै। और अब से आपिफ़स ईस्टर्न कमांड के बजाय सेंट्रल कमांड कहलाएगा।
दूसरी बात पापा ने कही कि आपिफ़स में एक क्लर्क का स्थान है। नरेश को यह जगह मिल सकती है
नरेश चाचा को नौकरी? सुनकर मैं बेहद द्घबड़ा गई थी।
उसी सप्ताह बरेली से पत्रा आया कि उमेश की शादी है। पंडित ने कहा है कि यदि पंद्रह दिन में शादी न हुई, तो पिफर तीन साल तक शादी नहीं हो सकेगी।
जजज
नैनीताल छूट रहा था किन्तु दिल में कोई दर्द अनुभव नहीं हो रहा था। कमला आई थी। बेहद उदास और दुखी थी। किन्तु इतनी छोटी थी मैं कि दूसरों के दुखों को अनुभव करने की क्षमता भी नहीं थी। मेरे अन्दर उत्साह था, बरेली जाने का, द्घर वालों से मिलने का उत्साह, उमेश चाचा की शादी का, एक नये शहर... ताजमहल के शहर आगरा जाने का उत्साह। मुझे नहीं समझ आ रहा था कि मुझसे क्या छूट रहा था। एक ऐसा प्यार जो मुझे सदा के लिए एक शून्यता से भर देगा।
कमला का प्यार? हाँ कमला आज तक पीड़ा का एक शूल बन कर हृदय में करक रही है। इस संसार में जहाँ भावनाओं का कोई महत्व ही नहीं, वहाँ कमला की बात को लेकर मेरा दुख कोई भी नहीं समझ सकता। ऐसी द्घटनाएँ तो नित्य ही होती रहती हैं। संसार में ऐसे दुख कोई अद्भुत नहीं। सामान्य हैं। किन्तु कहते हैं न कि पक्के द्घड़े पर कोई चोट जल्दी प्रभाव नहीं डालती है जबकि कच्चा द्घड़ा शीद्घ्र ही दरक जाता है। कमला मेरे बाल मन पर, अभी तक वैसे ही विद्यमान है।
किन्तु यहाँ मैं कमला की बात नहीं कर रही हँू। मेरा वह प्यार है नैनीताल। नैनीताल जो पहाड़ों का नगर है। नैनीताल नैनीझील का सौन्दर्य आकर्षण, नैनीताल जिसने मुझे मेरे माँ, पापा संपूर्ण रूप में दिये थे। उनका प्यार डाँट पफटकार जो भी हो, सब हमारा हम भाई बहनों का था। नहीं तो बरेली में, पापा तो हमारे थे ही नहीं। वे केवल अपने उस वृहत परिवार के थे। और कभी कभी लगता कि माँ भी उन्हीं लोगों की हो गईं। हम तो कोई पराये ही थे। जैसे ही नैनीताल हमसे छूटने लगा कि उसने मेरा पीछा करना आरंभ कर दिया, और मैं छोटी सी बच्ची सड़क के किनारे बनी मुंडेऱ पर उल्टे दौड़ने लगी थी। नैनीताल से मैं दूर जा रही थी। वह मेरे पीछे आ रहा था। कहाँ लगा था कि नैनीताल हमसे हमेशा के लिए छूट रहा है? कब लगा कि अब कभी ये आँख भर देख ही नहीं पाऊँगी? तल्लीताल और मल्लीताल को जोड़ने वाली वह लम्बी सीमेंट की सड़क जो झील के साथ-साथ दूर तक चली जाती है। उस पर अब कभी भी नहीं द्घूम पाऊँगी।
जजज
सन् १९९४ में मेरी बेटी अपनी एक सहेली के साथ नैनीताल द्घूमने गई थी। तो लौटकर बताया कि वहाँ नैनीताल में पक्की चौड़ी सड़क पर केवल अंग्रेज चलते थे। भारतीय केवल नीचे की कच्ची सड़क पर ही चल सकते थे। इतिहास क्या इस तरह से तोड़ा मरोड़ा जा सकता है? हम तो अंग्रेज बच्चों के साथ सड़क पर चलते द्घूमते थे। हम तो अंग्रेजों के बीच में बैठकर रॉक्सी में अंग्रेजी सिनेमा देखते थे। एक साल ताऊजी रॉक्सी के मैनेजर रहे थे, तो हम कभी भी हॉल में सिनेमा देखने बैठ जाते थे। हमारा किसी ने अपमान नहीं किया, हमें हमारे परिवार वालों ने तो बहुतेरा उल्टा सीधा कहा- किन्तु अंग्रेजों या उनके बच्चों ने हमारा अपमान कभी नहीं किया।
सच तो यह कि नैनीताल में बिना मॉल रोड की चौड़ी सड़क पर चले, कोई भी व्यक्ति द्घर, आपिफ़स, या स्कूल नहीं जा सकता था। उसी मॉल रोड पर तो लोग प्रभात पफेरी पर 'झंडा ऊँचा रहे हमारा' गाते निकलते थे।
वह कच्ची पतली सड़क तो अंग्रे८ाों के लिए थी, वे उस पर द्घोड़े दौड़ाते थे। भारतीय भी जब चाहते, उसी पर द्घुड़सवारी करते थे। या लड़के मछली पकड़ने के लिए किनारे बैठ जाते थे।
जजज
ये कहाँ आ गये हम?
यही क्या ताजमहल का शहर आगरा है? हे भगवान! ये हम कहाँ आ गिरे?
कहाँ नैनीताल की शीतल ठंडी हवाएँ और कहाँ आगरा, भट्टी की तरह धधकता शहर।
हमारा परीक्षापफल निकल चुका था। मैं सेकेंड डिवी८ान में पास हो गयी। मुझे सदा की भांति एक रुपया ईनाम का मिला। क्या करूँ इस रुपये का? न यहाँ नैनीताल है, न नैनीताल के अखरोट। न अखरोट खाने का मौसम। और जब रात का अंधेरा छाता, मैं आकाश के तारे देखती हुई खुली छत पर लेटती, तो नैनीताल मेरे हाथ पकड़कर अपने साथ ले जाता, हवा में तैरते बादलों को छूती हुई मैं, वह ओलों का मैदान वह पफूलों का कालीन, वह पफूलों पर नाचती श्वेत हिमपरियाँ, वह तारा लॉज, जहाँ वे बादल द्घर में द्घुसकर कहीं भी छिप जाते थे। सिलवर्टन हाउस, वह इठलाती बलखाती तल्लीताल, मल्लीताल के बीच की चमकती सड़क, वह हिलोरें लेती हरे रंग की नैनीझील, झील में रंग बिरंगी, मदमस्त नौकायें मन को बाँध अपने पास ही बिठा लेतीं। सिपाहीधारा की ओर जाती ढलवां सड़क, वह मिलहाउस, वह विल्सनगंज जहाँ मेरी प्यारी कमला रहती है। आँख खुलती, सुबह उठती तो ऊपर आगरे का शून्य आकाश, न पहाड़, न पेड़, न वे ठंडी हवाएँ। मन रोने राने को करता। कहाँ गया मेरा नैनीताल?
जजज
कमला से मेरा पत्रा व्यवहार होता रहता था। सातवीं कक्षा की वार्षिक परीक्षा का समय आ रहा था। मैंने कमला को पत्रा लिखा था कि मेरी परीक्षाएँ होने वाली हैं तुम्हारी भी थोड़े दिनों में होंगी। तुम आठवाँ पास करके नवें में आ जाओगी। मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे लिए।
आज अड़सठ साल से ऊपर हो चुके हैं। कमला के पत्रा का एक-एक शब्द मुझे याद नहीं है किन्तु उसके दुख का, उसकी पीड़ा का अहसास आज भी ज्यों का त्यों है। उसने जो कुछ भी लिखा था, उसका सार यही था।
''शीला मैं तुम्हें कभी लिख नहीं सकी थी, किस मुँह से लिखती कि मैं सातवीं में वार्षिक परीक्षा में तो पास हो गई थी, आठवीं के लिए प्रमोशन हो चुका था। किन्तु तुम्हारी माँ के बार-बार मना करने पर भी मैंने छठी कक्षा की परीक्षा दी थी और जब बोर्ड का परिणाम आया तो मैं पफेल हो गई थी और मैं बजाय आठवीं में जाने के छठी कक्षा में उतार दी गई। पूरे दो साल पीछे हो गई। अच्छा हुआ तुम यहाँ से चली गई थी। तब तुम्हारा सामना कैसे करती मैं? अब लगता है जीवन में कोई भी सपफलता मुझे नहीं मिलेगी। शायद मेरे जीवन में अंधेरा ही रह गया है।''
माँ तो उसका हर पत्रा पढ़ती थी। यह भी पढ़ा था, बेहद दुखी हुई। बार- बार कह रही थी ''मैंने इतना समझाया था कमला को कि परीक्षा मत दो, किन्तु नहीं मानी। पहले भी मैंने कई लड़कियों को बताया था। जिन्होंने नहीं दी उनका साल बर्बाद नहीं हुआ।''
उस बार माँ ने उसे एक पत्रा लिखा था। सांत्वना के दो शब्द लिखना मेरे लिए कठिन था। इतने सारे शब्द मेरे पास थे ही नहीं।
सातवीं कक्षा में मैं अंग्रे८ाी में चार नम्बर से पफ़ेल हो गई थी। जुलाई में रीइक्८ामिनेशन होगा, यह लिखकर दिया गया था। तब मैंने कमला को पत्रा लिखा था। उसे बताया था कि मैं इंगलिश में पफेल हो गई और जुलाई में मेरी परीक्षा होगी। छुट्टियों में डेंगू पफ़ीवर हो गया था। बहुत बीमार हो गई थी इस कारण पढ़ाई भी नहीं हो पाई। पता नहीं अब पास हो भी पाऊँगी या नहीं। कापफ़ी लम्बा पत्रा था। खूब सारी बकवास थी उसमें। वास्तव में सांत्वना के कुछ शब्द थे वे। लगभग एक माह बाद मेरा लिपफ़ापफ़ा लौट आया था। लिपफ़ापफे पर इंगलिश में लिखा था 'पत्रा पाने वाले की मृत्यु हो चुकी है, अतः इसे वापिस किया जा रहा है' मैं पत्रा लौटती पौटती रही। यह इतना आकस्मिक था, कि मन उसे स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था। कि ऐसा संभव ही नहीं। कमला के मरने की ख़बर पर आँखें नहीं रोईं, दिल रोया था।
जैसे एक धक्का लगा था मुझे। कमला मर गई? क्यों? कैसे? क्या हो गया था उसे? जब से आज तक मैं कमला की याद संजोये हँू। उस समय मन में जितने प्रश्न उठे थे, उससे अधिक प्रश्न अब उठते हैं।
क्या हुआ था उसे? क्या उसके ताऊ जी ने दुर्गा प्रसाद से शादी तोड़ ही दी थी? अथवा उसी लड़के ने स्वयं शादी तोड़ दी। पढ़ा लिखा लड़का, लड़की कुछ तो पढ़ी हो। आठवीं में होती तो वह मना न करता। छठी में पढ़ने वाली पन्द्रह साल की लड़की से शादी करने का क्या मतलब? कमला बीमारी से मरी अथवा उसने आत्महत्या की? कहती भी थी, ''मैं मर जाऊँगी पर आन्नद प्रसाद से शादी नहीं करूँगी।''
तभी बचपन में ही एक बार सपने में भी उसे देखा था, मेरे पूछने पर उसने हँसकर कहा ''मैं मरी थोड़े ही थी। वे लोग मेरी शादी आनन्द प्रसाद से कर रहे थे सो मैं द्घर छोड़ कर भाग आई थी। तब मेरे द्घर वाले तुम्हें ये थोड़े ही लिखते कि कमला भाग गई।'' और मेरी आँख खुल गई। अगर कमला द्घर छोड़कर भागी होगी, तो कहाँ गई होगी? किस दशा में होगी? किन्तु वह ऐसी लड़की नहीं थी। न दुर्गा प्रसाद ही ऐसा लगा था।
आज अड़सठ साल पश्चात् भी मन करता है कि नैनीताल जाकर पता लगाऊँ, पर कमला तो अतीत के अंधेरे में खो गई। मैंने तो सरस्वती को लिखकर भी नहीं पूछा कि कमला को क्या हुआ था। मुझे उसके द्घर का नम्बर भी नहीं मालूम था। लोग तो अब उसका नाम भी न जानते होंगे। उन्हें तो पता भी नहीं होगा कि कभी एक ऐसी अभागी लड़की रहती थी वहाँ।
ऐसा लगता है कि जैसे कमला नैनीताल की कठोर बरपफ़ में सलीब की तरह खड़ी होगी कहीं...
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