फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मीमांसा
उदात्त जीवन की लय : भालचन्द्र जोशी

साहित्य से एक स्वाभाविक अपेक्षा होती है कि वह अपने समय से मुखातिब हो। अपने समय के यथार्थ की ध्वनि उसमें हो। अपने समय से संब(ता एक जटिल प्रक्रिया है। खासकर कविता के लिए। कविता के लाउड होने का खतरा बढ़ जाता है। इधर की हिन्दी कविता पर हम न८ार डालें तो यह खतरा और भी सापफ न८ार आता है। कविता का समय से संवाद इतना मुखर हो गया है कि उसमें कविता से ज्यादा कवि की उपस्थिति हो गई है। अधिकांश कविताएँ सबकुछ जान लेने के दर्प के साथ सबकुछ बता देने की उतावली में वाचाल होती चली गई हैं। इतनी अधिक कि कविता के आशय का अतिक्रमण करने लगी हैं। ऐसा लगता है गोया कविता अभिव्यक्ति से अधिक लेखन का सरल माध्यम है। इस छूट और भ्रम में इजापफा मुक्त छंद कविता ने किया है। मेरा आशय छंदब( कविता की पैरवी करना नहीं है लेकिन एक ऐसा द्घटाटोप तैयार हो गया है जहाँ तसल्ली देने वाली कविता चुन लेना कठिन काम हो गया है।


निरंजन श्रोत्रिाय के दूसरे काव्य संग्रह 'जुगलबंदी' की कविताएँ इसी वाचालता और अतिरेक से बचती हुई लगती हैं। यह एक उम्मीद और उससे ज्यादा आश्वस्ति है। 'जुगलबंदी' कविता के बारे में ख्यात आलोचक विजय कुमार ने 'नया ज्ञानोदय' के मई २००७ अंक में लिखा है कि ''गुजरात के दंगों पर हिन्दी की तमाम पीढ़ियों के कवियों ने सैकड़ों कविताएँ लिखी होंगी पर इस कविता का कोई सानी नहीं है। हाँ, इसमें जरा भी अतिशयोक्ति नहीं। एक ठोस द्घटना की अखबारी इतिवृतात्मकता को चीरते हुए कवि ने वहाँ धरातल ढूँढ़ लिया है जहाँ यथार्थ और कल्पना का नितांत इंटेन्सिव और मौलिक संपुजन हो जाए।''
इस कविता की अर्थवत्ता और सार्थकता के प्रमाणीकरण में इतने संक्षिप्त में इतनी असरदार और अर्थवान टिप्पणी चमत्कृत कर देने वाली है। 'जुगलबंदी' द्घटना से पृथक, द्घटना से भिन्न लेकिन द्घटना के संदर्भ में एक दूसरी द्घटना का रचाव करती है। एक अतिरेक और एक भयावह के प्रतिरोध में एक अबोध प्रतिसंसार के निर्माण की मासूम इच्छा है। यह कविता हिंसा के प्रतिरोध में एक ऐसा मेटापफर रचती है जो प्रचलित हिन्दी कविता के मुहावरे से एकदम भिन्न है। यह अकल्पनीय को साक्षात करने के प्रयास की कविता है।
'जुगलबंदी नहीं प्रार्थना थी दरअसल/कि लहलहा उठें मुरझाई पफसलें/बहने लगें झरने सदियों से सूखे/भर जाएँ उजास से अंधेरी सुरंगे दुनिया की/स्पन्दन होने लगे पत्थरों में' ;'

इस इच्छा या कवि के शब्दों में कहें प्रार्थना की जो स्पेस कविता में बनी है वह दरअसल जीवन में बनाने की इस इच्छा का प्रतिपफलन है। यह कविता अपने बाहर से ज्यादा भीतर बड़ी स्पेस द्घेरती है। इसमें कवि से ज्यादा कविता की इच्छा भी शामिल है। इस प्रार्थना भाव में ऐन्द्रिक और विचार संवेदना के साथ वह भावबोध भी शामिल है जो 'देखना' या देखे जाने के दृश्य भाव से बाहर होने की संभावना के करीब पहुँचता है। इस कविता की सपफलता ही यही है कि उस द्घटित भयावहता के प्रचलित दृश्यबोध के समांतर कविता ने एक प्रतिसंसार रचा है। दंगों को लेकर हिन्दी में बेहद दृश्यात्मक और मार्मिक कविताएँ मौजूद हैं लेकिन 'जुगलबंदी' की भिन्नता ही यह है कि दृश्यों के सजीव एवं मार्मिक विवरण में न जाकर एक दूसरे बिल्कुल भिन्न सांगीतिक दृश्य के साथ उसकी मार्मिकता प्रकट की। पंडित शिवकुमार शर्मा के संतूरवादन और उस्ताद सपफात अहमद खान के तबले के बीच जुगलबंदी है। इस निश्छल जुगलबंदी में एक असीम आत्मीयता और उदात्त जीवन की लय है। तमाम आपाधापी और जीवन त्राासदियों के साथ एक बेपिफक्र उपहास है। अद्घटित का एक ऐसा सम्मोहन दृश्य है जो यथार्थ के दुः स्वप्न को खारिज करने की इच्छा में प्रकट होता है। गोधरा काण्ड ही नहीं, इस विश्व की तमाम बर्बर द्घटनाओं और उनकी स्मृतियों के खिलापफ जीवन की सुंदरता का एक ऐसा मोहक दृश्य खड़ा किया गया है जो तमाम क्रूरताओं को एक सम्भाव्य की तसल्ली से निरस्त करता है।

हालांकि कविता में जुगलबंदी के दौरान संगीत की बुनावट, बनावट और उसके कलात्मक व्याकरण और आरोह-अवरोह का भी ध्यान रखा गया है। जो उसे ज्यादा विश्वसनीय बनाती है। लेकिन ये तमाम सावधानियाँ कविता के सहज और मार्मिक प्रवाह को अबाधित प्रमाणित करती हुईं एक सजग उपस्थिति बनकर रह जाती हैं। यहाँ सांगीतिक अभिप्राय जीवन के हर्ष और उसके वैभव की अभिव्यक्ति की ध्वनि का माध्यम बन जाते हैं। यह कविता महज जीवन की भयावहता की मुखालपफत की कविता ही नहीं है। बल्कि उसके सम्मुख मानवीयता से भरे एक बड़े जीवन दृश्य को खड़ा करने की कोशिश की कविता है। जैसा जीवन होना चाहिए उसे यथार्थ में तब्दील करके एक क्रूर यथार्थ को खारिज करने का एक आत्मीय और मानवीय दृश्य खड़ा किया है।
'चलती रही जुगलबंदी/समय भी था भौंचक रुका हुआ एक जगह/कि आखिर कौन कर रहा है किसकी संगत!!/यह एक कापिफर और एक म्लेच्छ की जुगलबंदी थी.../जो दुनिया को एक लय में बाँध लेना चाहती थी/यह जुगलबंदी एक विस्तार था उन जुगलबंदियों का.../जो खेतों कारखानों में पसीना बहाते/पत्थर तोड़ते- मकान बनाते/क्रिकेट और हॉकी खेलते/या विवाह के मंत्राोच्चार के बीच शहनाई बजाते/उस्ताद बिस्मिल्लाह खान द्वारा की जाती है।'' ;'

यह निरंतरता सिपर्फ इस जुगलबंदी की नहीं है बल्कि उस लय की निरंतरता भी है जो कविता में शामिल प्रार्थना के शिल्प में है। दुनिया को एक लय में बाँध लेने की विनम्र इच्छा दरअसल उस संवेदन लय से आई है जो मानवीय करूणा का एक बड़ा सांगीतिक पक्ष है। इस जुगलबंदी में संगीत के उत्सव का सेलिब्रेशन नहीं है। जीवन की सकारात्मक संभावना और उम्मीद का इस माध्यम में सेलिब्रेशन है। इस सेलिब्रेशन में संवेदना पूरे समय सक्रिय है।
निरंजन उस तरह के कवि हैं जो गूढ़ार्थ प्रकट करने के लिए शब्दों के आध्यात्मिक तल में नहीं जाते हैं। बल्कि कई बार सप्रयास अभिधा की तरपफ निकल जाते हैं। इसलिए उनकी कविताओं में भिन्नता का सुख मिलता है। 'कठिन समय की कविता' और 'युवा कवियों की पत्नियाँ' ऐसी ही कविताएँ हैं।
'युवा कवियों की पत्नियों को नहीं मालूम/कि दुनिया के किस कोने में छिड़ा हुआ है यु(/या गैर बराबरी की साजिशें रची जा रही है कहाँ।' ;'युवा कवियों की पत्नियाँ'-
इसमें अज्ञान का उपहास नहीं, अबोध या मासूमियत का आदर है। सामान्यतः स्त्रिायों की जिन छोटी-छोटी तकलीपफों, व्यस्तताओं और तनावों को 'द्घर-गृहस्थी की झंझट' में रिड्यूस किया जाता है। वह एक द्घरेलू स्त्राी के जीवन को निगलने का कारक तत्व है। इस तरह की अलक्षित रह जाने वाली छोटी-छोटी चीजों के महत्वपूर्ण होने के प्रति कवि न केवल सजग है बल्कि उनके जिम्मेदार कारकों को उद्द्घाटित भी करता है। साथ ही 'उस टीस का उद्गम स्थल पता है' ;'कन्या महाविद्यालय की सड़क'- पृष्ठ २०द्ध कवि को कि 'वे झुण्ड में हैं तब तक हैं खुश और खूबसूरत' ;वही- इन कविताओं से समाजवादी यथार्थ के आग्रही परहेज पा ले यह मुमकिन है लेकिन इसकी सार्थकता कविता के संपूर्ण भावबोध द्वारा प्रकट एक वयस्क अंतर्दृष्टि में है। इसीलिए ब्लर्ब में विष्णु खरे भी लिखते हैं कि ''निरंजन श्रोत्रिाय कविता के पाठक को विश्वास में लेते हुए तथा कविकर्म का साक्षी बनाते हुए व्यंग्यात्मक, करूणापूर्ण, सामूहिक गतिविधि, शु( रचनाशीलता, आत्मकथानुमा कोई निर्णय, समूचे जीवन के किसी मौलिक ढंग को बचाने के लिए एक अनुरोध, मंच के लिए बर्तोल्त ब्रेख्त जैसी टिप्पणी और कभी कविता की भाषा में सक्रिय जीवन की खोज सरीखी अलग-अलग या मिलीजुली कोशिशें करते दिखाई देते हैं।''
'द्घर-गिरस्ती की पाँच कविताएँ' ;पृष्ठ-२४द्ध में दैनिक जीवन के वे आम दृश्य हैं जो मध्यवर्ग की गृहस्थी की अनिवार्य विवशता और कौतुक हैं। लेकिन कविता इन्हीं से शक्ति हासिल करती है और कविता को सार्थक भी बनाती है। मामूली से लगने वाले विवरणों में हम एकाएक मानवीय करूणा का एक ऐसा दरवाजा खुला पाते हैं जिसमें दाखिल होकर दैनिक जीवन की ऊब, संत्राास, एकरसता और असपफलताएँ हैं तो थोड़ी खुशी और उम्मीद की जगह भी है क्योंकि कवि को मालूम है कि

'हमारा बहुत सारा जीवन/उसकी तलाश में निकल जाता है/जबकि वह मौजूद होती है/हमारे बहुत करीब।' ;'आग' -पृष्ठ ६४द्ध
दैनिक जीवन का व्यापार किसी एक द्घर-परिवार तक सिमटा हुआ नहीं है। कविता में उसकी व्याप्ति है एक वृहत्तर दुनिया के परिवारों तक। कविता अगर मनुष्य जीवन की जटिलताओं और सामान्य होने, दोनों को एक साथ उनके अंधेरे-उजले कोनों में तलाशे, उन्हें उनके प्रकट और अप्रकट रूपों के साथ उद्द्घाटित करे तो यह मनुष्यबोध की न्यायप्रिय कविता है। निरंजन अपने काव्य संसार में ऐसी ही जुगत में लगे दीखते हैं।
'चुनें! दुनिया के तमाम बुजुर्गवार चुनें!/इन चहकती हवाओं के बीच/आँगन में रखी एक आरामकुर्सी/जिसके उदास हत्थे पर टिकाकर सिर/सुना जा सके ममत्व का संगीत।' ;'पफर्ज निभाना'- पृष्ठ ३०द्ध
निरंजन कविता को चमत्कृत करने के लिए टोने-टोटके की तरह इस्तेमाल नहीं करते हैं। वे किसी जादुई या करिश्मे से दुनिया के तब्दील होने का भोला भ्रम भी नहीं पालते हैं साथ ही प्रतिरोध की अनिवार्यता में कविता को पोस्टर या हथियार नहीं बनाते हैं। ऐसी द्घोषणाएँ नहीं करते हैं। वे जानते हैं कि
'गिराकर भी सारी पत्तियाँ/पराजित नहीं है पेड़/उन्हें भरोसा नहीं गर्व है/जमीन में धंसी जड़ों पर!'
;'पतझड़ की कविताएँ' पाँच-पृष्ठ ३७द्ध
जैसे कविता की अपनी एक लय है वैसी ही एक धारा और कवि जानता है कि वह 'खड़ा उस धारा के बीचोंबीच' ;'चप्पलें'-पृष्ठ ४८द्ध। लेकिन यह बीचोंबीच खड़ा होना असमर्थता की स्थिरता नहीं है वरन्‌ धैर्य से उपजा भरोसा है 'जो अपनी ईजाद से मिटा सकता है पृथ्वी की उदासी' ;'एक बेरोजगार लड़का' - पृष्ठ ५१द्ध। कवि के पास पृथ्वी की उदासी मिटाने के लिए अपनी कविताएँ हैं, देश्ा-दुनिया का ज्ञान-विज्ञान है साथ ही एक उम्मीद और बड़ा संकल्प।

'उसकी एक जेब में तह की हुई नौकरी थी/और दूसरी में इस दुनिया को बदलने का ड्राफ्रट।' ;वही- पृष्ठ ५२द्ध
जीवन में कठिनाइयाँ, दुःख और संद्घर्ष इतने बड़े हो गए हैं कि कविता में उससे सामना करने की बातें एक किस्म का अबोध विश्वास लग सकता है लेकिन उसकी तरपफ पीठ पफेरकर बैठ जाना कविता का भरोसा तोड़ना है। दरअसल कई बार लगता है कि इस तरह की कविताएँ, लड़ाई की द्घोषणाएँ, जय-पराजय के निर्णयों की अपेक्षा कविता का भरोसा बचाने की कविताएँ हैं। कविता का यह भरोसा ही बड़ा और महत्वपूर्ण है। ऐसा भी हुआ है कि अनेक कवि ज्ञान की संपूर्णता की अभिव्यक्ति के दर्प और हड़बड़ी में सूचनाओं और विज्ञापन की कविता लिखने लगते हैं। कई बार एक कविता से चार कविता पैदा कर लेने की कलात्मक मुग्धता चारों कविताओं में सम रूप से नजर आती है। ऐसी कविताएँ कविता की निर्मम हत्या के साथ एक द्घोषित आत्महत्या भी है। निरंजन के पास यह सजगता और संयम है। वे ऐसी स्थितियों से बचते हैं। संभवतः इसीलिए लगता है कि ये कान उनके अपने हों जब वे कहते हैं 'द्घटाते हुए प्रतिशत आत्महत्या का', 'पफूँक जाता कोई मंत्रा कान में' ;'आत्महत्या के विरू('- पृष्ठ ५७, ५८द्ध। साथ ही अपने ही कानों को असंख्य कानों में तब्दील करते हैं।
निरंजन कई बार कारक स्थितियों का हिस्सा बनकर स्थितियों पर व्यंग्य करते हैं। निरंजन खुद को उसमें शामिल करते हैं। प्रत्यारोप की व्यंग्यात्मक काव्य- स्थिति निर्मित करते हैं।
'मैं उसकी मृत्यु की गवाही से बचकर/शामिल हो जाना चाहता था उसी औपचारिक/भीड़ में।' ;'सूर्यास्त नहीं'- पृष्ठ ६०द्ध
या पिफर

'कभी गए हों या न गए हों/पिफलहाल आप सभी आमंत्रिात हैं/देखने को एक समूचा शहर डूबते हुए।' ;'डूबते हरसूद पर पिकनिक'- पृष्ठ १९द्ध
इसमें आत्मालाप नहीं बल्कि आत्म-संशय और आत्मालोचन है। जैसे खुद को कटद्घरे में खड़ा किया गया है। जैसे खुद को सलाखों के पीछे खड़ाकर देखा गया कि सलाखों के दूसरी तरपफ की दुनिया भी सलाखों के पीछे है इस तरपफ से देखने पर। यानी सारा दारोमदार देखने की जगह पर है। निरंजन की कविता इस 'देखने' की जगह की तलाश और उस सुरक्षा की कविता है।
इस संग्रह की एक और खूबसूरत कविता है 'खोज'। आत्महत्या के कारणों के अंतिम और विस्मयकारी छोर पर टंगी यह कविता हमारे बाजार समय के सूचनातंत्रा में उलझी और भ्रमित युवा मानसिकता की पराकाष्ठा का अद्भुत उदाहरण है। इस इलेक्ट्रानिक युग में अद्घाये नैराश्य की अंतिम परिणति में कवि के पास पिफर भी भरोसा है। 'सब कुछ पा चुकी इस दुनिया में/बहुत कुछ बचा है खोजने को' ;'खोज'- पृष्ठ १४द्ध।
इधर कुछ समय से दुःख, करूणा और संत्राास का भी एक कविताई मुहावरा बन गया है। जीवन की विडंबनाओं को लेकर निर्णय तय हो गए हैं। ये सारे मुहावरे, रचाव इतने सरलीकृत रूप में कविता की जमीन पर पफैले हैं कि किसी भी कवि का इनसे टकराकर लड़खड़ाना स्वाभाविक है। निरंजन इनसे बचते हैं और कविता को बचाते हैं। इसीलिए निरंजन की कविता में बड़बोलापन नहीं है। जीवन के छोटे-बड़े दुःखों को राजनीतिक संकट की भाषा में नहीं बदलते हैं। 'ब्लड प्रेशर', 'मैं अटपटा आदमी', 'एक रंग को बचा लेने की अपील', 'मंच पर गाँव' ऐसी ही कविताएँ हैं, जिनके निहितार्थ इतने सूक्ष्म और भिन्न हैं कि कई बार मात्रा एक पंक्ति में तो कई बार एक शब्द के उच्चारण से प्रकट हो जाते हैं। 'मोबाइल' कविता तकनीकी विकास के दारूण दुःख को प्रकट करती है।

'मोबाइल हमें वह झूठ बोलना सीखाता है/जिसे दुनियादारी कहते हैं।' ;
'इस विकलांग दौर में', 'ईश्वर', 'अब समय आ गया है', 'उसका चेहरा', 'तलाश', 'विचार' इन कविताओं का स्थापत्य सहजता में काव्यार्थ को आकार देता है। यह सहजता गढ़ी नहीं गई है। यह कविता का सहज हिस्सा है। कविता की निरंतरता में काव्य स्थितियाँ अपनी जगह खुद बनाती हैं। कवि बस, धीरे से उसके लिए जैसे जगह छोड़ता है। कई बार छोटे-छोटे नाट्यान्तरालों पर तो कई बार सामान्य और रोजमर्रा की द्घटनाओं को एक विशिष्ट अर्थवत्ता देकर। बहुत सहजता से। यह इस कारण भी संभव हुआ है कि निरंजन विचार को अनुभव में नहीं बदलते हैं वरन पूरे अनुभव जगत को मानवीय संवेदन के साथ कविता की नोक पर टिका देते हैं। निरंजन की कविता बेहद आक्रामक नहीं लगती हैं। व्यंग्य का भी एक महीन स्वर है। ऐसी कविताएँ जटिल समय और समाज के दारूण दुःखों को हमें बहुत गहरे स्तरों पर अनुभव कराती हैं। और यह अनुभव अपने में बेहतर जीवन की इच्छा में प्रकट होता है। एक सामान्य आदमी की भी अपने दायरे में पहचान और व्यक्तित्व का आकार होता है। इसी का बेहतर उदाहरण 'पान की गुमटी' कविता है।
'निकलेगी चिंगारी/वह तो बस एक उदास-सा बिम्ब है रोशनी का।' ;'पान की गुमटी'- पृष्ठ ८७द्ध
यह बिम्ब महज उस रोशनी का नहीं है। यह बिम्ब अनेक अपरिचित रह गए सामान्य, हताश, लाचार और पराजित लोगों के जीवन का है। कविता के सहज प्रवाह में एक लय इस जीवन की जोड़ देने का हुनर निरंजन के पास है। वो कविता की लय को बाधित किए बगैर ऐसा कर देते हैं। निरंजन की कविता में एक संवेदन आवेग है। भाषा में आक्रामकता की अपेक्षा संयम है। वे शब्दों को चुनते हैं और भाषा से उसका बर्ताव तय करके ही उसे जगह देते हैं। निरंजन की कविता में बसे महत्वपूर्ण और भिन्न बात लगी वह है उसकी पठनीयता या कहे संप्रेषणीयता। कविता कवि के ज्ञान के दर्प से दबी हुई नहीं है। वह अपनी सहजता और संप्रेषणीयता में पाठक से आसानी से तादात्म्य स्थापित कर लेती है। संभवतः इसी कारण जो कविता के पाठक नहीं हैं उनसे भी निकटता बना लेती हैं। हालांकि कुछेक आलोचक और कवि भी इसे कवि और कविता दोनों की कमजोरी मानते हैं। उनके लिए कविता की जटिलता ही अभीष्ट है। दुरूहता के कारण सामान्य पाठक से दूरी को वे कविता की विशिष्टता में दर्ज करते हैं लेकिन पिफर भी अब ये धारणा बदलने लगी है और यह स्वर प्रकट होने लगे हैं कि कविता में चुम्बकतत्व होना चाहिए।

निरंजन की कविता पढ़ना शुरू करने पर पूरी पढ़ने के लिए बाध्य करती है। वह ज्ञान और कविता के प्रचलित आग्रहों से पाठक को आतंकित नहीं करती है। इन कविताओं की पठनीयता कविता की विश्वसनीयता को कम नहीं करती है। इसके स्थापत्य में कविता का वैभव प्रकट होता है, कवि की चतुराई का दर्प नहीं। ये कविताएँ पाठक के साथ एक आत्मीय रिश्ता बनाती हैं। निरंजन की कविता की अर्थवत्ता बेहद गहरी और अनुभव सद्घनता विपुल हैं। इसी सद्घन अनुभव से वे कविता का एक प्रीतिकर संसार रचते हैं। अच्छी कविता के लिए शब्द संयोजन की लयात्मकता या भाषा ही जरूरी नहीं बल्कि कवि के पास एक विजन भी होना चाहिए और जो वैयक्तिक न हो। उस विजन की सीमाएँ विस्तारित हों। यह विजन अपने समय के संकट और उसकी चुनौतियों से संब( होना चाहिए। निरंजन की कविता में यही विजन उल्लेखनीय है।
ज्यादातर होता यह है कि कविता से कवि का ही रिश्ता ज्यादा सद्घन और लगाव भरा होता है। निरंजन इस धारणा को तोड़ते हैं। उनकी कविताएँ इस भ्रम से बाहर खड़ी हैं। ये कविताएँ हलपफनामा नहीं हैं बल्कि वे हमें अपने उसी जाने-पहचाने संसार में खड़ा करती हैं जिसका हम हिस्सा हैं लेकिन एक अपरिचय की स्थिति में। ये कविताएँ उस संसार से परिचित कराती हैं। अलक्षित चीजों और स्थितियों को प्रकट करती हैं और कहती हैं- 'अब समय आ गया है इन सब बातों के लिए।'
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