फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•साहित्याकार शेखर जोशी को प्रथम चंद्रयान पुरस्कार २०१० से सम्मानित किया गया। •काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर केंद्रित विशेषांक गल्पेतर गल्प का ठाठ का लोकार्पण। •मदन कश्यप और शरद दत्त करे मिला शमशेर सम्मान। • कथा यू के का पआनन्द साहित्य सम्मान महेंद्र दवेसर दीपक को 'अपनी अपनी आग' एवं कादम्बरी मेहरा को 'पथ के पफूल' के लिये दिया जा रहा है।
 
 
 
चिट्ठी आई है
संदिग्ध् विश्वसनीयता वाले दिग्गज
'पाखी' का दिसंबर ०९ अंक पूरा पढ़ने के बाद आपको पत्रा लिखने से अपने को रोक नहीं पाया। 'पाखी' ने एक वर्ष में ही अपने महत्व को सि( कर दिया है। पत्रिाका का हर अंक उल्लेखनीय होता है। इस अंक की यद्यपि सभी कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं लेकिन संतोष दीक्षित और अरुण कुमार की कहानियाँ हिन्दी की वर्ष में प्रकाशित सभी कहानियों में श्रेष्ठ कही जाएँगी। कटु सत्य से साक्षात करवाती कहानियाँ हैं ये। इमरोज, डॉ. अंजना संध्ीर और नरेश कुमार टांक की कविताएं प्रभावकारी हैं। विजय शर्मा का आलेख 'एमिला जोला : हिंसा की सशक्त प्रस्तुति' और रूपसिंह चन्देल का आलेख

'गरीबों के मसीहा थे लियो तोल्स्तोय' नयी जानकारियाँ देते हैं। पहली बार आपको पत्रा लिख रहा हूँ जबकि प्रवेशांक से ही 'पाखी' का पाठक हूँ। यह पत्रा भी न लिखा जाता यदि हिन्दी पाठकों में भ्रम पैदा करने वाला किन्हीं ओमपाल सिंह का पत्रा इसमें प्रकाशित न हुआ होता। मैंने उस पत्रा को भी पढ़ा था जिसमें भगवानदास मोरवाल संबंध्ी कुछ प्रश्न उठाए गए थे। अच्छा होता ओमपाल जी उन प्रश्नों के स्पष्टीकरण देकर अपनी बात सि( करते। उस पत्रा में मोरवाल पर अपनी सहयोगियों के साथ मिलकर करोड़ों रुपयों के सरकारी द्घपले का जो आरोप पत्रा लेखक ने लगाया था उस पर चर्चा न कर एक ईमानदार ;संजीवद्ध लेखक के साथ एक भ्रष्ट लेखक ;मोरवालद्ध को जोड़कर उनकी जो छवि प्रस्तुत करने का प्रयास ओमपाल सिंह ने किया है वह पाठकों में यह संदेश दे रहा है कि यह एक प्रायोजित पत्रा है। जहाँ तक शब्द साध्क जूरी सम्मान के जूरी सदस्यों का सवाल है, आज सम्पूर्ण हिन्दी जगत डॉ. नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव और डॉ. विश्वनाथ त्रिापाठी की संदिग्ध् विश्वसनीयता के बारे में जानता है। मोरवाल को दिए गए अब तक के सभी पुरस्कारों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 'हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव की अहम भूमिका की चर्चा रही है। आजकल हो यह रहा है कि लेखक यदि दलित है तो उसके सारे अपराधें को ढकने के लिए इतना ही कहना पर्याप्त है कि हाय...हाय वह बेचारा तो बेदाग है लेकिन सवर्णवादी ब्राह्मणवादी लोग उसे उखाड़ पफेंकने में लगे हुए हैं। जस्टिस दिनाकरन के लिए दलित सांसद लामबंद होकर यही कह रहे हैं। लेकिन सच्चाई न छुपी है और न छुपाई जा सकती है। मैं भी दलित हूँ और ऐसी बातों से शर्मसार हूँ। वैसे मोरवाल कोई पहले भ्रष्ट लेखक नहीं हैं। हिन्दी में कितने ही सेल्सटैक्स, इनकम टैक्स और पुलिसिया नौकरीपेशा लोग हैं जो करोड़ों डकार रहे हैं। और उन्हें भी बेनकाब किया जाना चाहिए। पाठकों के सामने उनके चेहरे पर चढ़े नकाब उतारे जाने चाहिए। साहित्यिक संरक्षण में चलने वाले इनके कारनामों से पर्दा उठाने का यही समय है।
सुरेन्द्रपाल सोनकर, गोल मार्केट, नई दिल्ली

 
भाषाविद् भी थे प्रभाष जोशी
 

बुक स्टॉल पर अपने चहेते कथाकार संजीव का पफोटो आवरण पर देख तुरंत ही 'पाखी' का संजीव पर केंद्रित अंक खरीदा था। यही 'पाखी' से मेरा पहला परिचय था। विदेशों की तो मैं नहीं जानता, हाँ! अपने देश में जीते जी आदमी के काम का मूल्यांकन नहीं होता। उसके दिवंगत होने के बाद ही उसके बारे में सोचा जाता है। आपने इस परंपरा से हटकर आदरणीय संजीव के कृतित्व का मूल्यांकन किये जाने की एक सार्थक पहल की है। लीक से हटकर कुछ कर गुजरने की इस दीवानगी को सलाम। यह दीवानगी बनी रहेगी, ऐसी उम्मीद है। 'पाखी' का दिसंबर अंक मेरे हाथ में है। श्र(ेय प्रभाष जी पर विशिष्ट प्रस्तुतिकरण के साथ ७२ पृष्ठों की सामग्री संग्रहणीय है। इतनी सामग्री तो जनसत्ता ने भी नहीं दी। रवीन्द्र त्रिापाठी का यह मत बिलकुल सही है कि प्रभाष जोशी का वस्तुगत मूल्यांकन मुश्किल है। पत्राकार, संपादक, क्रिकेट प्रेमी, सामाजिक सरोकारों के पैरोकार का उल्लेख त्रिापाठी ने किया है। पर जितनी मेरी समझ है, इन सब से अलग प्रभाष जोशी का मूल्यांकन एक भाषाविद् के रूप में भी किया जाना चाहिए। हिन्दी में जो काम स्वर्गीय किशोरी दास वाजपेयी अध्ूरा छोड़ गये थे, उसे प्रभाष जोशी ने बेहतर ढंग से आगे बढ़ाया। मैं १९८४ में जनसत्ता के लिए सहारनपुर से रिपोर्टिंग करता था। जब भी दिल्ली आता, प्रभाष जोशी के दर्शन जरूर करता, अपनी रिपोर्ट उन्हें दिखाता। बात शायद १९८५ के आसपास की है, सहारनपुर के दो पत्राकारों पर गंगोह थाने में पफर्जी मुकदमे पुलिस ने दर्ज किये। मैं इसी की रिपोर्ट बनाकर लाया था। मैंने रिपोर्ट का शीर्षक दिया था 'सहारनपुर में पत्राकारों पर कहर' पर प्रभाष जी ने रिपोर्ट पढ़कर शीर्षक बदल दिया। उन्होंने शीर्षक दिया 'थाना बना हरामखाना'। 'जैसा सोच, जैसा देख, वैसा लिख' का मार्गदर्शन वे मेरे जैसे हर कस्बाई पत्राकार को देते। उनकी इस सोच का एक और प्रसंग है। १९८४ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्राी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने आबकारी मंत्राी के संबंध् में कुछ अनियमितताएँ पाए जाने पर मंत्रिामंडल से बर्खास्त कर दिया था। संयोग से मैं उस दिन जनसत्ता के कार्यालय में ही था और बर्खास्त किए गये मंत्राी महोदय सहारनपुर जनपद के ही थे। प्रभाष जी से नमस्कार करने के लिए उनके कक्ष में गया तो उन्होंने मंत्राी को बर्खास्त किये जाने संबंध्ी टेलीप्रिंटर पर आयी खबर को ठेठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लहजे में बनाने का आदेश मुझे दिया। खबर बनी और छपी। अगले दिन दूसरे अखबारों में टेलीप्रिंटर की ही खबर जस की तस छपी थी जबकि जनसत्ता में 'राजा ने मारी चौध्री को दुलत्ती' शीर्षक से खबर ठेठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मिजाज की छपी। तीन चार माह बाद ही बर्खास्त हुए मंत्राी महोदय ने कांग्रेस आलाकमान श्रीमती इंदिरा गाँध्ी की गंगोह ;सहारनपुरद्ध में एक बड़ी रैली आयोजित की। मैडम प्रसन्न हुईं और जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उन्हें पुनः मंत्राी पद से नवाजे जाने का आदेश विश्वनाथ प्रताप सिंह को दिया। मैडम का आदेश था, टाला नहीं जा सकता था। राजभवन में सुबह दस बजे एक मात्रा मंत्राी के रूप में उन्हें शपथ करायी गयी। संयोग से मैं उस दिन भी जनसत्ता के कार्यालय में ही था और यह बात प्रभाष जी की जानकारी में थी। उन्होंने तुरन्त मुझे तलब किया और कहा मार नहले पे दहला। मैं उनकी इच्छा के आगे नतमस्तक था। प्रभाष जी के निर्देश पर टेलीप्रिंटर पर आयी खबर को इस बार भी मैंने ठेठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मिजाज में बनाया। अगले दिन जनसत्ता में 'दुलत्ती मार पिफर पुचकारा' शीर्षक से खबर छपी। अपने पाठकों को उनकी अपनी ही भाषा में दुनिया जहान से रू-ब-रू कराने की अपनी प्रतिब(ता से वह हमारे लिए पूजनीय हुए। उन्हें श्लाका पुरस्कार मिलने पर खुसर-पफुसर करने वाले परम विद्वानों से अनुरोध् है कि कम से कम अब जब कि प्रभाष जी इस दुनिया में नहीं रहे, उनके काम को देखें और आत्मविश्लेषण करें कि प्रभाष जी ने एक भाषाविद् के रूप में जो काम किया, क्या उसका दस पफीसदी भी वह अभी तक कर पाये हैं। संपादक होने की तमाम व्यस्तताओं के बीच छोटी से छोटी खबर के प्रति उनकी संवेदनशीलता और हम जैसे कस्बाई पत्राकारों के प्रति उनका पितातुल्य स्नेह आज कितने संपादकों के पास है। मेरे लिए तो वे मेरे पिता ही थे और अपना दायित्व उन्होंने बखूबी निभाया भी। यह बात अलग है कि मैं उनका सपूत नहीं बन सका। १९८७ में पत्राकारिता छोड़ सरकारी नौकरी में आने का मेरा निर्णय उन्हें पसंद नहीं आया। 'तुम सरकारी चाकरी के लिए नहीं बने हो पिफर भी करो हमेशा मन की यही मेरा आशीर्वाद है' प्रभाष जी का यह आशीर्वाद ही था कि २००४ में एक दिन उनके दर्शन करने के लिए गया तो उन्होंने द्घर परिवार के बारे में विस्तार से पूछा। इस क्रम में मैंने बताया कि पिछले साल ही पुत्रा प्राप्ति हुई है जिसका नाम वंश रखा है। यह सुनकर वह बोले तुम मेरा हक कैसे मार सकते हो बच्चू, पोते का नामकरण करना बाबा-दादी का हक है, तुम इसे क्यों हड़प रहे हो। प्रभाष जी ने मेरे बेटे के लिए नाम दिया 'स्नेहिल'। जन्म प्रमाणपत्रा, हलपफनामे आदि की लम्बी चौड़ी औपचारिकताएँ थीं, जो बाकायदा निभायी गयीं। अपने पुत्रा को उसके बाबा के अतुलनीय स्नेह से वंचित रखने का दुस्साहस करने की अपनी औकात नहीं थी। इस दुनिया से प्रभाष जी के जाने के बाद उन्हें पूरे जीवन मैं भुला नहीं पाउफँगा। न भूलने की गारंटी वो स्वयं देकर गये हैं अपने पोते का नामकरण करके।
एक सुझाव-'पाखी' में प्रकाशित कहानियों के लेखक का तो सचित्रा संक्षिप्त परिचय प्रकाशित होता है पर लद्घुकथा के मामले में ऐसा नहीं है। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि एक ही रचनाकार की तीन या चार लद्घुकथायें एक साथ छापते हुए उसका भी सचित्रा संक्षिप्त परिचय छापा जाए। प्रयोग करके देखिए, अच्छा लगेगा।
राजेन्द्र शर्मा, सहारनपुर, उ.प्र.
;लद्घुकथा के संदर्भ में दिया गया सुझाव अच्छा है, अवश्य उपयोग में लाया जाएगा। -सं.द्ध

 
'हंस' ने चुना संजीव को
 
'पाखी' के नवंबर अंक में मस्तराम कपूर का पत्रा कुछ असमंजस में डाल गया। पत्रा यह तस्वीर सामने लाता है कि मस्तराम जी संजीव को सिपर्फ तब से जानते हैं, जब से संजीव 'हंस' से जुड़े। जबकि संजीव का अपना प्रभामंडल बहुत पुराना है। संजीव की कहानी अपराध् जब 'सारिका' सर्वभाषा कहानी पुरस्कार योजना में सम्मानित हुई थी तब उनका 'हंस' से कोई लेना देना नहीं था। उसके बाद संजीव ने उत्तरोत्तर विकास ही किया और जब वह आ कर 'हंस' से जुड़े, तब वह उनका 'हंस' के प्रभामंडल तले आना नहीं था, बल्कि 'हंस' ने ही संजीव से जुड़ना चुना था। ज्यादा बेहतर यह कहना होगा कि संजीव को जोड़ कर 'हंस' एक नई संभावना के लिए तैयार होना चाहता था। वह नहीं हो पाया, यह दीगर बात है, इसके दूसरे बहुत से कारण हो सकते हैं। मेरे लिए यह विश्वास कर पाना भी बहुत सरल नहीं है कि मस्तराम कपूर इतने समय तक संजीव से अपरिचित रहे हों। वह एक सचेत जागरूक व्यक्ति ही नहीं एक चेतना संपन्न साहित्यिक नाम भी रहे हैं। इस नाते मुझे यह पत्रा संशय में डाल रहा है। रही बात उनके द्वारा राजेंद्र जी को 'अत्याध्ुनिक और दिलपफेंक' बताने की, तो मेरा कहना यही है कि राजेंद्र जी के बारे में भले ही यह आकलन बहुतों का हो, लेकिन यह है एक बेहद सतही पफतवा ही। यह पफतवा देने वाले लोग राजेंद्र जी को समझ पाने के दरवाजे पहले ही बंद कर बैठे होते हेैं... शायद राजेंद्र जी खुद भी यही चाहते हैं कि लोग उन्हें यह सब कह कर खुश होते रहें और वह अपना काम करते रहें। मैं उन्हें बेहद अटपटे बाने में बहुत गंभीर चिंतक मानता हूँ।
अशोक गुप्ता, रोहिणी,दिल्ली
 
सौंदर्य प्रसाध्नों के अड्डे
 

'पाखी' का नवंबर अंक मिला। इस बार कविताएँ बढ़िया हैं। लीलाध्र मंडलोई की 'द्घरेलू मक्खी' की प्रशंसा किए बिना नहीं रहा जाता। उन्होंने द्घरेलू मक्खी का बहुत ही अंतरंग चित्रा खींचा है। उसके प्रति धरणा ही बदल गई। होठों पर बैठी मक्खी उन्हें जन्म के पहले दिन के बेटी के स्पर्श की याद दिला गई। बहुत खूब! इसी तरह उनकी दूसरी कविता 'तितलियाँ' और तीसरी कविता 'और रात में' भी प्रभावित करती हैं। राग तेलंग ने 'सुंदरता', 'झुकी हुई पीठ', 'पोस्टमार्टम के वक्त' कविताओं के जरिए समकालीन जीवन यथार्थ को बखूबी चित्रिात किया है। खासकर कविता 'सुंदरता' की निम्न पंक्तियाँ तो बहुत उल्लेखनीय हैं- यह बेहद अपफसोसनाक है कि/साँवली-सलोनियों के अंदर ही अंदर/हर वक्त हर तरीके से/कुंठा का भाव जागृत किया जा रहा है/क्योंकि उनका चेहरा उजला नहीं है/ऐसे में खुलने ही थे/ कृत्रिाम सौंदर्य प्रसाध्नों के अड्डे/गली-गली और नुक्कड़ों पर...।' सुनील कुमार पाठक की 'श्मशान-राग' भी ध्यान खींचती है। रत्नदीप खरे 'नदी' को कितनी सजीवता से चित्रिात करते हैं- 'सह रही बरसात जाड़े नदी/कुछ न ओढ़े, पड़ी तन उद्घाड़े नदी।' अशोक अंजुम की तीनों गजलों ने भी बहुत प्रभावित किया। अंजुम जी इनमें द्घर और बिटिया को विभिन्न कोणों से देखते हैं। इन गजलों का हर शेर सटीक और सार्थक है। सहजता और सरलता से उन्होंने जटिल यथार्थ को प्रस्तुत किया है।
'पाखी' का सितंबर अंक बहुत महत्वपूर्ण है। इसके जरिए संजीव के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को जानने का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने इस सच्चाई को निर्भयता से प्रकट किया कि लेखक कायर होता है। उन्होंने अपनी बातचीत में स्पष्ट कहा कि लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक नाम के जीव अक्सर, अगर कुछ अपवाद छोड़ दिए जाएँ, मापफी मांग लेते हैं। जैसे गैलीलियो ने चर्च के दबाव के आगे मापफी मांग ली और अंत में वह द्घुट-द्घुटकर मरा था। गणितज्ञ आर्यभट्ट ने जब कहा कि पृथ्वी द्घूमती है, तब उस समय राजा लोग थे, उनके दबाव में आर्यभट्ट ;छपा ब्रह्मगुप्त है, मुझे लगता है यहाँ आर्यभट्ट होना चाहिए।द्ध ने कहा, नहीं ये गलत है। संजीव ने आगे पिफर कहा- हिटलर के जमाने के जो लेखक थे वे क्रांति की बातें लिखते थे, जब दमन का दौर आया तब सभी निर्वासन में चले गए या चुप करा दिए गए।' जब लेखक समझौते कर सकता है, तो कायर क्यों नहीं हो सकता? क्या मानवीय कमजोरियाँ और अपना लाभ देखने की प्रवृत्ति लेखकों में नहीं हो सकती? लेकिन इस कारण लेखक को खारिज तो नहीं किया जा सकता और न ही किया जाना चाहिए। ये तो सिपर्फ एक सच्चाई को सामने लाना है। एक बदली सामने आ जाने से सूर्य अपना तेज तो नहीं खो देता।
पुनः 'पाखी' के नवंबर अंक की ओर लौटता हूँ। बीच बहस के अंतगर्त रत्नकुमार सांभरिया का लेख विचारोत्तोजक है। 'कपफन' के संदर्भ में सांभरिया की इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मुर्दा चाहे जिस जाति, र्ध्म या संप्रदाय का हो, रात में नहीं उठाया जाता। 'पाखी' वैचारिकता से भरपूर सामग्री दे रही है।
गोविंद सेन, धर, म.प्र.

 
रुला दिया 'बौ सुरीली' ने
 

'बौ सुरीली' पढ़कर परेशान हूँ, हैरान हूँ, चैन नहीं पड़ रहा है, पता नहीं कितनी रातों को रुलायगी 'बौ सुरीली'? बहुत दिनों बाद पढ़ने को मिली इतनी सशक्त कहानी। नायाब कहानी देने के लिए विजय को साध्ुवाद और २० वर्ष बाद इसे पढ़वाने के लिए 'पाखी' को ध्न्यवाद। नवंबर अंक में पाठकों के पत्रा पढ़कर मन क्षुब्ध हुआ। न तो कोई लेखक कायर होता है और न ही संजीव दा कायर हैं। सूत्राधर, सावधन! नीचे आग है, जंगल जहाँ शुरू होता है, जैसी सशक्त रचनाएँ देने वाला कथाकार भला कायर भी हो सकता है। अकल्पनीय एवं निराधार लगा। संजीव दा का इंटरव्यू में ऐसा कहने का कोई और मंतव्य रहा होगा, जिसे न आप समझ सके न पाठक ही समझ पाये। अंक को आकर्षक बनाने के लिए आप ने संजीव दा की पफोटो के साथ 'लेखक कायर होता है' का कैप्शन भी मुखपृष्ठ पर चस्पा कर दिया, पर संजीव दा महान लेखक होने के साथ महामानव भी हैं, सो पचा गये होंगे इस प्रपंच को आसानी से। आसानी से नहीं भी तो कुछ परेशानी के साथ पचा गये होंगे।
भवानी सिंह, जयपुर, राजस्थान

 
भाषा में संयम आवश्यक
 

'पाखी' दिसंबर ०९ प्राप्त हुआ। इस पत्रिाका की कहानियाँ हमारी बहिन-बेटियाँ भी पढ़ती हैं। यदि किसी समाज में गालियां देकर बात करने की प्रथा है तो जरूरी नहीं कि कहानी में वास्तविकता लाने के लिए और उसे रोचक बनाने के लिए साहित्य में गालियों का प्रयोग करते हुए और अश्लीलता को छूने वाले वाक्यांशों का प्रयोग किया जाए। ठीक है कि साहित्यकार अपने युग की अवहेलना नहीं कर सकता। उसके साहित्य में तत्कालीन माहौल की झलक आये बिना नहीं रहती। लेकिन रचनाकार चाहे कितना ही सुप्रसि( और बड़ा साहित्यकार हो, भाषा में संयम तो आवश्यक है। मैंने आप विद्वानों से ही सुना है कि जीवन परमात्मा को अपने कार्यों का जवाबदेह है। यह सच है या नहीं, पता नहीं। लेकिन साहित्य मनुष्य के सामने जवाबदेह है। सिनेमा में प्रयुक्त द्विअर्थी संवाद तो देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों ने अपना ही लिए हैं। एक ओर तो भाषा में प्रयुक्त होने वाले अंग्रेजी शब्दों का विरोध् किया जा रहा है। यह कहकर कि भाषा को हिंग्लिश से बचाओ, रोमन का प्रयोग कम किया जाना चाहिए और दूसरी ओर पफूहड़ और अश्लील भाषा संस्कार में आ रही है। गालियाँ और अश्लीलता नये नहीं हैं और रीतिकालीन साहित्य की दृष्टि से ये साहित्य से अपरिचित भी नहीं हैं। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि वात्स्यायन और कोकपंडित को कोर्स में पढ़ाया जाए। सिनेमा में भी जब 'ए' सर्टिपिफकेट का प्रावधन है तो साहित्यिक पत्रिाकाओं को भी कहानी के शीर्षक के आगे कोष्ठक में 'ए' लिख देना चाहिए ताकि हम अपने चौथे और पाँचवें क्लास में पढ़ने वाले बच्चे-बच्ची से कह सकें कि बेटा ये कहानी मत पढ़ना। आश्चर्य इस बात का है कि एक ओर तो 'पाखी' में ;सितंबर ०९ अंतिम पत्राद्ध पत्रा प्रकाशित होता है जिसमें एक लद्घुकथा में व्यंग्य भरने के लिए अश्लील एवं भद्दे शब्दों के प्रयोग पर एक उफँचे दर्जे के लेखक पर आपत्ति दर्ज की गई और दूसरी ओर ऐसी ही भाषा से युक्त कहानी...।
ब्रजमोहन श्रीवास्तव, गुना, म.प्र.

 
झूला मुझे बहुत भा गया
 
'पाखी' का दिसंबर ०९ अंक पढ़ा। मुखपृष्ठ पर प्रभाष जोशी जी का झूले वाला चित्रा बहुत भाया। अगस्त ०९ के अंक में इसी झूले पर नामवर सिंह का चित्रा भी आपने प्रकाशित किया था। जोशी जी को हँसाकर यह चित्रा आप खींचते तो और सुंदर बन पड़ता। नामवर जी वाला चित्रा तो दिलो-दिमाग पर ऐसा चस्पा हो गया है कि उसे रिप्लेस करने कोई दूसरी तस्वीर इतनी जल्दी नहीं आने वाली। और हाँ... यह झूला मुझे बहुत भा गया है। सोच रहा हूँ अपने आँगन में ऐसा झूला बनवाकर लगवा लूँ। और पृष्ठ पलटते ही गुटरगूँ करते कबूतर। ध्ीरज, तल्लीनता और भीतर की खूबसूरती... पृष्ठ १०, १४ और १९ के रेखांकनों ने मन प्रसन्न कर दिया। 'मेरी बात' में संद्घ की दगाबाजी पर आपकी बेबाकी को सलाम। कहानियाँ सभी अच्छी हैं लेकिन 'कनचोदा' ;अरुण कुमारद्ध कथ्य की नाटकीयता और बोली के ठेठपन के ठाठ वाला शिल्प के कारण सबसे अच्छी लगी। 'द्घासपफूस का द्घोड़ा' ;शशांक द्घोष की पहली कहानीद्ध 'नई उमर का प्रेमपत्रा' है। उनकी यह भावुकता, संवेदनशीलता और परवान चढ़े। कविताओं में डॉ. अंजना संध्ीर की 'महानगर में एकाकीपन' विदेशों में रह रहे बूढ़ों के एकाकीपन का सजीव चित्राण करती है और परदेस से 'माँ की पाती' हिन्दुस्तानी यादों से सजी है। प्रभु त्रिावेदी जी के दोहों में पर्यावरण की चिन्ता तैरती है। सिने-संवाद में विनोद अनुपम ने अभिनेताओं की व्यावसायिक मानसिकता की अच्छी खबर ली है। तीसरा नेत्रा में रवीन्द्र त्रिापाठी ने ओबामा को नहीं बख्शा।
स्व. प्रभाष जोशी पर आपने ढेर सारी सामग्री देकर अपना दायित्व ईमानदारी से निभाया। उनके व्यक्तित्व और लेखन कला पर कहीं और से शायद ही इतना आ पाएगा।
कुँअर उदयसिंह 'अनुज', खरगोन, म.प्र.
 
हृदय पर छाप छोड़ती कविता
 
'पाखी' ने साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में आलेख, कविता, कहानी, गीत-गजल, लद्घु कथा, सिने संवाद, नाटक, विचार विमर्श, बीच बहस में आदि विभिन्न प्रकार से एवं विविध् विधओं से पाठकों को रूबरू करा कर हिन्दी सृजनकारों और सुध्ी पाठकों का मन मोह लिया। आपके साहित्यिक योगदान की जितनी भी प्रशंसा की जाए मेरे हिसाब से बहुत कम है। बिना लागलपेट तथा राजनीति के प्रपंचों से बचकर और अंधाधुँध् बाजारीकरण के विज्ञापनों की लालसा से हटकर 'पाखी' ने अपने विशु(, निर्मल, निर्द्वन्द्व एवं निष्पक्ष भावों को पाठकों के लिए सरलता से परोसा है। प्रकाश मनु की कहानी 'जादू' दिल को छू गई। कहानी का पात्रा नंदू नटखट और चंचल है पिफर भी जीवों से अगाध प्रेम रखता है। नन्ही सी चिड़िया के लिए सब कुछ तो करता है। सुध ओम ढींगरा की कहानी 'टार्नेडाे' प्रवासी कहानी है। गोविंद उपाध्याय की 'दामोदर मिसिर का लरिका' कहानी में अवध्ी संस्कृति और भोजपुरी विरासत की यथास्थिति का जायजा लिया गया है। किसी अध्किारी का बेटा पढ़-लिखकर शादी योग्य हो जाता है तो उसके पिता के दिल में क्या-क्या अरमान पैदा होते हैं। उन भाव-भंगिमाओं से परिलक्षित आयामों की झलक सुंदरता की प्रतीक है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के साहित्यकार इतालो काल्विनो की 'एक रात नींद की तलाश में' विदेशी भाषा शैली और संस्कृति से रची बसी कहानी है जिसमें प्रकृति की अजीबोगरीब द्घटनाओं का चित्राण अति सुंदर दर्शाया है। इसका अनुवाद हसन जमाल साहब ने किया है। हसन जमाल साहित्य के क्षेत्रा के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। 'शेष' पत्रिाका का सपफल संपादन इनकी बहुमूल्य विध है। साहित्य भूषण उपन्यासकार हृदयेश की कहानी 'अंकल सैम' ने भी अपनी चिरस्थायी वस्तुस्थिति का सही जायजा जतलाया जो कि एक हकीकत बयां करती है। कविताओं ने अपने-अपने विचित्रा रंगों की रंगोलियों से पाठकों को मंत्रामुग्ध् कर दिया। कविताएँ मानवजीवन, प्राणीजीवन और जीव-जन्तु की प्राकृतिक दशाओं की पारदर्शिता से रूबरू करा कर हृदय पर अपनी छाप छोड़ती हैं। लीलाधर मंडलोई, डॉ. हरदयाल, राग तेलंग, सुनील कुमार पाठक, अरूणा राय, रत्नदीप खरे और अंत में युवा साथी अशोक अंजुम की कविताओं ने हम सभी का मन मोह लिया। रंजीत वर्मा की 'पुरस्कार की राजनीति', विजय बहादुर सिंह की 'आलोचना की पिफसलनें', मैत्रोयी पुष्पा की 'उधे कहिबे को बस बातें', साहित्य के क्षेत्रा में विविध् विषयों पर प्रेरक बातों का चित्राण करके हमें कुछ सीखने के लिए सीख दे गयी हैं। दलित-विमर्श विषय पर इस पत्रिाका में गम्भीर चिंतन और अपनत्व की पक्षधरता संपादक ने निर्भीकता से प्रस्तुत करके कंवल भारती, रत्नकुमार संभारिया, अजय नावरिया, रजनी गुप्त, आराध्ना को अपनी-अपनी मौलिकता की पकड़ को तथ्यपरक और न्यायपूर्ण तरीके से पेश करने में खुलकर मौका दिया है। दलित साहित्यकारों को गर्व होना चाहिए कि गैर दलित साहित्यकार भी दलितों की दलीलों के पक्षध्र हैं। स्नेहलता रेड्डी का 'सांप का बिल', राजीव रंजन गिरि का 'आरंभिक आध्ुनिकता की तलाश', पुण्य प्रसून वाजपेयी का 'राजनीति की कोख में पलती मीडिया', विनोद अनुपम का 'न ब्रुयात सत्यम अप्रियम्‌', रवीन्द्र त्रिापाठी का 'चिंतन योगी पत्राकार' और प्रेम भारद्वाज का 'आसमान में धन बोने की जिद' में अपना-अपना वैचारिक मंथन दर्ज करके महत्वपूर्ण सामग्री परोसी है। अंत में धीरज सार्थक ने 'अब न बसौ एहि गाँव' कहानी में ठाकुर प्रथा की अटपटी कथा को तिरस्कृत और निंदनीय भावों के साथ उकेरा है।
जसवन्त सिंह जनमेजय, नई दिल्ली
 
मूल्यों का बाजार से संद्घर्ष
 
नवंबर ०९ में हिन्दी पत्राकारिता का एक प्रकाश-स्तम्भ बुझ गया। यह अपने समय का अकेला स्तम्भ था। यह मनहूस समय तो एक न एक दिन आना ही था, पर अब सवाल है कि आगे क्या? यह समय बहुत कठिन है। मूल्यों का बाजार से संद्घर्ष हो रहा है, जिसमें बाजार विजेता बनकर उभर रहा है। मूल्य इतने खोखले हैं कि बाजार के सामने नहीं टिकते। इस समय ऐसे प्रभाष जोशियों के लिए कोई जगह नहीं है। यह चारणगान का समय है। बीते लोकसभा चुनावों में पत्राकारिता के स्खलन पर चीखने वाली एकमात्रा आवाज इस नक्कारखाने में गुम हो गयी। वर्तमान में कुछ एक छोटे-मोटे नाम हैं तो वे समय, सत्ता, जाति एवं र्ध्म के सापेक्ष राग टेरने वाली आवाजें भर हैं। तो क्या पत्राकारिता का अंत हो गया? बाजारू जनसंचार पत्राकारिता को निगल गया? आने वाला वक्त इस सवाल का जवाब देगा। 'पाखी' का दिसंबर अंक इसमें मददगार साबित होगा।
कृष्णकांत, यमुना विहार, दिल्ली
 
सीमित दायरे में नवलेखन
 
'पाखी' के सितंबर विशेषांक में छपी संजीव की कहानियां बहुत सशक्त और प्रभावशाली हैं। उनमें विविध्ता, मेहनत, सरलता और रचनात्मक सौंदर्य झलकता है। जबकि नवलेखन अध्किांशतः सीमित दायरे में जल्दबाजी में भाषायी जादू के सहारे किया जा रहा है। पत्रा और संस्मरण दिलचस्प हैं लेकिन आलेख खानापूर्ति अध्कि लगते हैं। सबसे अध्कि खटकता है संजीव के बहुआयामी जीवन के अनेक पहलुओं को नजरअंदाज करना है। संजीव अच्छे लेखक और इंसान ही नहीं हैं वह नए लेखकों का मार्गदर्शन भी करते। आजकल इतना कष्ट कितने संपादक और लेखक उठाते हैं। न ही उन्हें तारीपफ की परवाह है न ही बदले में कुछ मिलने का स्वार्थ। बस अपने कर्म में लीन रहते हैं। जोड़-तोड़ की पफास्ट दिल्ली में ऐसे लोग विलुप्तप्राय हैं, जिनकी सख्त जरूरत है लेखन में और जीवन में भी।
सरिता शर्मा, गुड़गांव
'पाखी' के अंक २ ;नवंबर ०९द्ध में छपी आप ;सुधा ओम ढींगराद्ध की कहानी 'टार्नेडो' पढ़ी। आपने इस कहानी में बड़ी ही बारीकी से भारतीय और पाश्चात्य संस्कृतियों को एक दूसरे के बरक्स रखकर कथा बुनी है। इतनी खूबसूरत कहानी के लिए कोिटशः बधई।
सत्यकाम, मैदानगढ़ी, दिल्ली
आदरणीय संजीव पर विशेषांक निकालने के लिए आप बधई के पात्रा हैं। यह अंक सहेज कर रखने वाला है। संजीव की सभी कहानियाँ दिल को छू गईं। विशेष रूप से 'बाद्घ' और 'सागर सीमान्त'। संजीव समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य के शिखर-पुरुष हैं व कालजयी कहानियों के रचयिता हैं। मैं अब तक इनकी कहानियों से वंचित था, यह सोचकर दुख होता है। संजीव दीर्द्घायु हों, यही कामना है।
सुशान्त सुप्रिय, नई दिल्ली
 
 
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