फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानियां
चोट : योगेन्द्र दत्त शर्मा
मैं अजीब उलझन में पड़ गया हूँ। चौंक-चौंककर उठता हूँ और उठ-उठकर चौंकता हूँ। वह मुझे चैन से सोने भी नहीं दे रहा और जागते में रह-रहकर कोंचता है।
मैं मानता हूँ कि वह सदेह उपस्थित नहीं है, पर अपनी अनुपस्थिति के बावजूद उपस्थित लगता है और लगातार मुझ पर, मेरे जेहन पर चोट करता जा रहा है। यों चोट खुद उसे लगी थी-वैसे थोड़ी-बहुत चोट तो मुझे भी

पहुँची थी- पर इसके बावजूद वह मुझे चोट पहुँचाने से बाज नहीं आता।
मैं उसे समझने की कोशिश करता हूँ, पर वह मानता नहीं, अपनी जिद पर अड़ा है। उसका आग्रह है कि जिन्हें मैं कुछ और समझ रहा हूँ, उन्हें गुंडा मान लूँ और पूरी ताकत से उनसे भिड़ जाने में उसका साथ दूँ!...... वह मेरी एक नहीं सुनता और लगातार उनके खिलापफ भड़काने पर तुला है।
यह जानकर अजीब लग सकता है, पर सच यही है कि मैं उसे जानता तक नहीं। उसका नाम, पता या ऐसी कुछ जानकारी मेरे पास नहीं है। मैंने उससे जानना भी चाहा तो उसने दो टूक जवाब दे दिया- ''नाम से क्या मतलब है! मैं कोई भी हो सकता हूँ! कुछ भी नाम हो सकता है मेरा! पर इतना तो आप जानते ही होंगे कि मैं आपके ही देश का, आपके ही जैसा एक संभ्रांत नागरिक हूँ।''
'संभ्रांत!' मैं अभी तक चौंक रहा हूँ। क्या कोई संभ्रांत नागरिक इस तरह के पचड़ों में पड़ने की हिम्मत कर सकता है? अपनी इज्जत जैसे-तैसे बचाने की बजाय, अपनी हिम्मत दिखाने के चक्कर में कोई संभ्रांत नागरिक पड़ता है क्या?
''इज्जत बचाने का मतलब पस्तहिम्मती बिल्कुल नहीं है, भाईसाहब!'' उसने कहा था।
जजज
अब सोचता हूँ, उस शाम ऑपिफस से सीधा द्घर जाने की बजाय पार्क में न बैठा होता, तो इतनी मुसीबत गले न पड़ जाती!
मेरी पत्नी अक्सर कहा करती है कि सई-साँझ भले आदमी द्घर से बाहर नहीं होते। पर ऑपिफस के तकलीपफदेह माहौल से अपने दिल-दिमाग को निजात दिलाने के लिए कभी-कभी पार्क में बैठ जाना मेरी मजबूरी है। पेड़ों से गुजरती ठंडी सुखद हवा के नर्म झोंकों और चिड़ियों की चिहुँक और किलकारियों से मन शांत हो जाता है, तो जिन्दा होने का अहसास लौट आता है।
इसी मजबूरी के तहत मैं उस शाम ;इंडिया गेट केद्ध पार्क में एक पेड़ के नीचे बैठा उस खुशनुमा माहौल को अपनी आँखों से पी रहा था।
सामने की झील में नावें तैराते कुछ जोड़े चप्पुओं से झील के पानी में हरे, रुपहले झाग उगा रहे थे। हवा के साथ-साथ कभी-कभी पानी की भीनी पफुहारें मन में सिहरन पैदा कर रही थीं। डूबते सूरज की तांबई परछाइयाँ पानी की डूबती-उतराती लहरियों पर झिलमिला कर टूटतीं और सम्मोहित कर ले जातीं।
कुहरा और शाम की गहराती धुंध गड्ड-मड्ड होकर अंधेरे की गुपफा बना रही थीं, जिसमें शहर और ट्रैपिफक का शोर धंसता चला जा रहा था।
इस सबसे निर्लिप्त वह आदमी बिजली के खंभे से पीठ टिकाये, उस गहराते अंधेरे में भी किसी किताब में खोया हुआ था- मुझसे कुछ ही दूरी पर! कई बार मैंने उसे इसी तरह किताब में डूबे देखा था।
पर उस वर्दीधारी को इससे पहले मैंने इतनी मुस्तैदी के साथ यहाँ से वहाँ चक्कर लगाते नहीं देखा था, जैसा उस दिन देखा। वह दो-तीन बार उस आदमी की पीठ का सहारा बने बिजली के खंभे पर डंडे से चोट करके पार्क का चक्कर लगा आया था और इस बार जोर से खंभे पर डंडा पटक रहा था।
''क्या बात है, भाई! क्यों डिस्टर्ब कर रहे हो? देखते नहीं, मैं पढ़ रहा हूँ!'' वह आदमी खंभे पर डंडे की जोरदार चोट से चौंका था और किताब से नजरें हटाकर अब उस वर्दीधारी का मुँह ताक रहा था।
''क्यों बे, मुझे उल्लू का पट्ठा समझ लिया है क्या? इतनी देर से आवाज दे रहा हूँ और तू ध्यान ही नहीं दे रहा!..... इस कोकशास्तर से दीदे क्यों नहीं उठाता, बे!'' वर्दीधारी ने कड़ककर कहा।
''आप बात कैसे करते हैं! तमीज से बात कीजिए जरा!'' वह आदमी उठकर खड़ा हो गया।
''क्या मतलब!'' वर्दीधारी ने आँखें तरेरीं।
''आप तो जानते ही होंगे कि पढ़े-लिखे आदमी से कैसे बोला जाता है!''
''तेरे पढ़े-लिखे की हमने....।'' वर्दीधारी ने मोटी-सी गाली दी।
''आप इस गंदी भाषा का इस्तेमाल बंद करें, वरना.....''
''वरना क्या बे, उल्लू के पट्ठे! क्या करेगा तू!'' वर्दीधारी ने उसका गिरेबान पकड़कर झिंझोड़ा।
''तुम भी क्या कर लोगे?''.....
''मैं तेरी ऐसी-तैसी कर दूँगा!'' कहते हुए वर्दीधारी ने उसका हाथ मरोड़कर डंडा उठाया। उस आदमी ने उसका डंडा पकड़ लिया।
जजज
मैं चुपचाप सारी वारदात को देखता रहा। बीच में बोलने का मतलब था- मुसीबत मोल लेना। पर उस आदमी की हिम्मत रह-रहकर मेरा कौतूहल बढ़ा रही थी।
अब उसका ध्यान मेरी ओर गया।
''भाईसाहब!...... सुनिये तो!'' वह मुझी से कह रहा था।
जवाब देना खतरे से खाली नहीं था।
''ऐ भाईसाहब!.....मैं आपसे ही कह रहा हूँ!'' वह जोर से िचल्लाया।
इस बार बड़े बेमन से उधर देखना पड़ा।
''कमाल है, भाईसाहब! मैं आपको आवाज दिए जा रहा हूँ और आप अनसुना कर रहे हैं!'' वह भड़कते हुए बोला- ''इस तरह तो कोई भी आदमी मुसीबत में अकेला पड़ जाएगा और दूसरा यों ही बेपिफक्र बैठा रहेगा!''
मैंने उसकी तरपफ देखा! अब रुकना मुश्किल था। जाने कैसे मैं बेझिझक उसकी तरपफ बढ़ता चला गया- शायद उसकी हिम्मत देखकर। या पिफर शायद इसलिए कि उसने मेरी गैरत को ललकारा था।
''ले, आ गया तेरा भाईसाहब! अब इससे उखड़वा ले मेरी पूँछ!'' वर्दीधारी ने मेरी तरपफ इशारा किया।
''आप तमीज से पेश आइए! मैं पिफर कह रहा हूँ!'' मेरी मौजूदगी से जैसे उसका हौसला बढ़ गया था।
''तू बकवास बंद कर, वरना डंडा द्घुसेड़ दूँगा!.....चुपचाप थाने चल मेरे साथ!'' वर्दीधारी ने धमकाया।
''क्यों?.....क्यों चलूँ थाने!....किया क्या है मैंने?'' वह अकड़कर बोला।
वर्दीधारी ने उसका हाथ पकड़ा, लेकिन उसने झटके से छुड़ा लिया-''बिना वजह बताये तुम मुझे थाने कैसे ले जा सकते हो! मैं कोई अनपढ़ गंवार नहीं हूँ कि तुम मुझे बहका लोगे!''
''वजह तो बताइये, दरोगा जी!'' मैंने उसका पक्ष लेना चाहा।
वर्दीधारी ने मुझे द्घुड़ककर देखा, पिफर उससे बोला-''तू इस अंधेरे में क्या कर रहा था?''
''किताब पढ़ रहा था, और क्या?''
''झूठ बोलता है! कहाँ खिसका दिया उस लड़की को?''
''कौन लड़की?'' वह हकबकाया-सा बोला और वर्दीधारी को हैरत से देखने लगा।
''मुझी से पूछ रहा है, कौन लड़की! कहाँ गई वो जिसके साथ सरेआम गुलछर्रे उड़ा रहा था तू।'' वर्दीधारी ने कड़ककर कहा-''ये पारक है या कोठा..... जो तू यहाँ उसके साथ मुँह काला कर रहा था अंधेरे में!''
अब उस आदमी के चेहरे की हवाइयाँ उड़ने लगीं।
''लेकिन मैं तो यहाँ अकेला बैठा पढ़ रहा था!.....मेरे साथ तो कोई नहीं था!'' उसने द्घबराकर कहा।
''स्साला! ऊपर से झूठ भी बोलता है!....मैं बहुत देर से तुझे ही ताड़ रहा था। मुझे आता देखकर उल्लू के पट्ठे ने जाने कहाँ चलता कर दिया उसे!'' वर्दीधारी ने मेरी तरपफ देखते हुए कहा।
''देखिए भाईसाहब!.......कैसा झूठ बोल रहा है यह आदमी!....आपने भी देखा होगा......मैं यहाँ अकेला बैठा पढ़ रहा था। आप इसे बताइए कि मैं एकांत में गीता पढ़ रहा था!.....जरा बताइए इसे!....सरासर झूठ बोल रहा है यह!'' उसने मेरा समर्थन चाहा।
''दरोगा जी, यह तो बहुत देर से अकेले बैठे किताब पढ़ रहे थे!'' कापफी देर बाद मैं कुछ बोला।
''तुझसे कौन पूछ रहा है बे!.....तू खामखां बीच में क्यों टपक रहा है!.....चलता बन यहाँ से!''
वर्दीधारी की द्घुड़की से मैं चुप हो गया। पर मैं वहाँ से हटा नहीं।
''हाँ बे, क्या पढ़ रहा था यहाँ?....कहाँ गई वो नंगी तसवीरों वाली किताब.....जिसे अंध्ेरे में मजे ले-लेकर पढ़ रहा था तू!'' वर्दीधारी अब उस आदमी से मुखातिब हुआ।
''देखिए जनाब! आप जरा जबान संभालकर बोलिए! मैं गीता पढ़ रहा था!....ये देखिए आँखें खोलकर......ये गीता है या और कुछ!'' इस बार उस आदमी की आवा८ा में दृढ़ता लौट आई थी।
वर्दीधारी की द्घुड़की से मैं चल देने की तैयारी में था, लेकिन उस आदमी का बढ़ता हौसला देखकर वहीं खड़ा हो गया।
वर्दीधारी ने किताब को उलट-पुलटकर देखा और वापस उसके हाथों में लौटा दी।
उस आदमी ने किताब ली और अपनी साइकिल उठाने लगा।
जजज
मैंने सोचा था कि मुसीबत टल गई पर अभी और आपफत आनी थी।
वर्दीधारी ने पीछे से उसकी कमीज का कालर पकड़ लिया और अपनी तरपफ द्घसीटते हुए बोला-''जाता कहाँ है? थाने चल मेरे साथ!''
''क्यों? क्या जुर्म किया है मैंने, जो थाने चलूँ?'' उसने एक झटके से अपना कालर छुड़ाया और साइकिल पर सवार होने लगा।
वर्दीधारी ने तेजी से बढ़कर साइकिल के पिछले पहिये की हवा निकाल दी।
''ये क्या.....? ये क्या कर दिया?'' वह झुंझलाया-''मुझे सात-आठ किलोमीटर दूर जाना है और तुमने साइकिल की हवा निकाल दी!''
''अभी तो तेरी भी हवा निकलेगी!...... निकाल पचास रुपये!''
''किसलिए?'' उसने सख्ती से कहा।
''तू पार्क में साइकिल क्यों चला रहा था?''
''कब चला रहा था? मैं तो पैदल ही लाया था साइकिल!''
''झूठ बोलता है!....जल्दी से पचास रुपये निकाल!''
''कमाल करते हो, यार! किस बात के दूँ पचास रुपये!''
''अच्छा तू थाने चल! वहीं होगा पफैसला!'' वर्दीधारी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
''हाँ, चलो!'' वह वर्दीधारी के साथ हो लिया।
मैं वापस मुड़ने लगा, तो वर्दीधारी ने मेरा हाथ भी पकड़ लिया-''अब तू कहाँ भाग रहा है?.....तुझे तो थाने में गवाही देनी है।....अभी तो बड़ी तरपफदारी कर रहा था इसकी!''
अब मैं बुरी तरह डर गया। मैंने उस आदमी को समझाया-''भाईसाहब क्यों थाने के चक्कर में पड़ते हैं? पचास रुपये देकर अपना पिंड छुड़ाइए न!''
''आप भी अजीब बात करते हैं!...... ये आदमी कभी कोई, तो कभी कोई झूठा इलजाम लगाकर पैसे ऐंठना चाहता है!...मैं इसे एक पैसा नहीं दूँगा!'' वह इतनी जोर से चीखा कि शोर सुनकर दो-तीन वर्दीधारी न जाने कहाँ से आ धमके!
उन्हें देखकर मेरे होश गुम हो गये।
''अब भी वक्त है, भाईसाहब! दे दीजिये पचास रुपये!.....क्यों पफंस रहे हैं चक्कर में?'' मैंने धीरे से उसके कान में कहा।
''आपको मापफी मांगकर छूटना है, तो मांग लीजिए मापफी! मैं कतई नहीं झुकूँगा!....आप जैसे लोगों ने ही इनका दिमाग ऊपर चढ़ा कर रखा है!'' वह बहुत जोर से दहाड़ा।
जजज
नये आये वर्दीधारी इस बीच पहले से ही मौजूद उस वर्दीधारी से बातचीत में व्यस्त थे। उस आदमी की दहाड़ सुनकर वे हमारी ओर मुड़े।
''क्या है बे, खुसरे की औलाद!......आराम से बात कर! साला कानून तोड़ता है और ऊपर से कुत्ते की तरह भौंक भी रहा है!'' एक नये वर्दीधारी ने कहा और एक वजनदार गाली दी।
यह वर्दीधारी कद्दावर और हट्टा-कट्टा था। उसके मुँह से शराब की तीखी भक्‌ आ रही थी और जबान लड़खड़ा रही थी।
''गाली देने में तो माहिर हैं आप लोग!....इसी की ट्रेनिंग दी जाती होगी!'' मुझे हैरत हो रही थी कि वह आदमी अब भी नहीं द्घबरा रहा था।
वर्दीधारी ने गुस्से में अपना हाथ हवा में लहराया और जोरदार थप्पड़ से उस पर वार किया, लेकिन नशे की वजह से उसका निशाना चूक गया और वह खुद ही लड़खड़ाता हुआ जमीन पर गिरा। बाकी वर्दीधारी उसे सम्हालने में जुट गये। उसे उठाया तो सम्हलते-सम्हलते वह पिफर ध्ड़पफड़ाकर गिर पड़ा और चीखने लगा- ''मुझे छोड़ दो!...मैं इसकी ऐसी-तैसी कर दूँगा!......मेरा नाम हुकूमत सिंह है!.....मैं.....मैं इसकी खाल में भुस भर दूँगा....!'' कहता-कहता वह औंधा पड़ गया।
''अरे, पहले खुद को तो सम्हाल लो!......मुझे बाद में ही देख लेना!'' उस आदमी ने चुनौती दी।
''अबे, तेरी मौत आई है क्या?.....बार-बार कुत्ते-सा भौंक रहा है....मां के खसम!'' एक और वर्दीधारी ने कहा। बाकी वर्दीधारी अपने साथी को उठाने में लगे थे, लेकिन वह उठ नहीं सका।
''मैंने पहले ही मना किया था, पर माना नहीं, पूरी बोतल गटक गया.....अकेला ही!'' एक और वर्दीधारी बोला।
''अच्छा, इन दोनों को तो चलता करो!......ये साले इस कंजर का तमाशा देख रहे हैं!'' एक वर्दीधारी ने कहा।
''निकाल बे पचास रुपये और चलता नजर आ!'' पहले वाले वर्दीधारी ने उससे कहा।
''मैं हरगिज नहीं दूँगा!....तुम थाने ले चलो!'' उस आदमी का हौसला बुलंद हो आया था।
''थाने के बच्चे....मैं तुझे यहीं भुगत दूँगा!'' कहते हुए वर्दीधारी ने तड़ातड़ दो थप्पड़ बरसा दिए। उसके साथी ने उसे रोका।
उस आदमी ने शोर मचाना शुरू कर दिया। वह जोर-जोर से बोलता जा रहा था-''मैं कतई नहीं दूँगा!......तुम मुझे मार डालो, तब भी नहीं!.....तुम लोग शरीपफ आदमियों के साथ ये व्यवहार करते हो!....थाने चलो, तब तुम सबको देखूँगा!''
मैं मन ही मन उस आदमी को दाद दिए बिना न रह सका। वह लगातार अपने साहस का- बल्कि, कहना चाहिए, दुस्साहस का परिचय दे रहा था। लेकिन यह मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आ रहा था कि वर्दीधारी उसे मारने से बच क्यों रहे थे!
इसका एक कारण संभवतः वह नशे में ध्ुत वर्दीधारी रहा होगा। वैसे भी नये आये सभी वर्दीधारियों ने शराब पी हुई थी। हो सकता है, वे उस आदमी को मारते, तो वह चीख-चीखकर भीड़ इकट्ठी कर लेता और उनकी पफजीहत होती। या भनक पाकर फ्रलाइंग स्क्वैड वाले आ जाते और वे ध्रे जाते। यह भी हो सकता है कि वे नकली वर्दीधरी हों।
जजज
वर्दीधारी आपस में पफुसपफुसा रहे थे। उनकी पफुसपफुसाहट मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही थी-
''मुझे तो लगता है, ये इंटैलीजेंस का आदमी है या पिफर होम मिनिस्ट्री में है। तभी तो इतना अकड़ रहा है!.....कहीं पफंसवा न दे!'' एक वर्दीधारी ने चेताया।
''तुझे बेकार बहम हो रहा है!.....ये ऐसे ही बकवास कर रहा है! दो थप्पड़ पडे़ेंगे, तो सारी अकड़ निकल जाएगी!'' पहले वाले ने तर्क किया।
''चलो, इसकी तलाशी ले लेते हैं! सब असलियत पता चल जाएगी!'' तीसरे वर्दीधारी ने सुझाव दिया।
सुझाव पर जल्दी ही अमल होने लगा। दो वर्दीधारियों ने उस आदमी के हाथ पीछे से पकड़ लिए और पहले वाला वर्दीधारी उसकी कमीज और पैंट की जेबों में हाथ डालने लगा।
उस आदमी ने एकाएक उछलकर लात द्घुमाई और वर्दीधारी लात के प्रहार से तड़पकर दूर जा गिरा।
वर्दीधारी चोट खाये नाग की तरह पफुंकारता हुआ उठा और बूटों की ठोकरों से उसकी टाँग तोड़ने लगा। बाकी वर्दीधारियों ने लातों से उसकी जमकर ध्ुनाई की। उसकी चीख को दबाने के लिए उन्होंने उसके मुँह पर भी द्घूंसों की बौछार कर दी। उसके बाल खींच-खींचकर उन्होंने लगभग उखाड़ ही डाले, जिसके कारण उसकी आँखों में पानी तैर आया था। उसका जबड़ा सूज गया था और मुँह से खून बह रहा था। उस नीम उजाले में भी यह सब सापफ दिखाई दे रहा था। मैं बुरी तरह काँप उठा।
वह आदमी औंध पड़ गया। अब वह कुछ नहीं बोल पा रहा था।
वर्दीधरियों ने उसकी तलाशी लेनी शुरू की। इस बार वह कोई प्रतिरोध् न कर सका। वह उठ भी नहीं पा रहा था।
जेब की तलाशी में केवल बत्तीस रुपये प्राप्त हो पाये।
''स्साला कंगला!'' कहते हुए वर्दीधारी मेरी ओर बढ़ा।
मैंने स्वयं ही अपनी जेब के सारे पैसे निकालकर उसके हवाले कर दिए।
''अच्छी तरह देख ले, कहीं किसी और जेब में तो नहीं पड़े पैसे!'' उसने मुझे आदेश दिया।
मैंने दुबारा सारी जेबें टटोलीं। कुछ न निकला।
उसने चुपचाप सारे पैसे रख लिए।
''अब पफूट ले यहाँ से!'' वह गुर्राया।
मैं डरता-डरता चल पड़ा। वह आदमी अब बैठ गया था और बार-बार थूकता चला जा रहा था- शायद मुँह से निकलते खून की वजह से.....या शायद उन वर्दीधारियों के प्रति हिकारत से!
''सुन बे!'' सहसा पीछे से आवाज आई। मैं द्घूमा।
''इसे भी ले जा अपने साथ, वरना मारा जाएगा स्साला!.... और इसे समझा दे कि आगे से हमसे पंगा न ले!'' वर्दीधारियों में से एक ने कहा।
वह आदमी खड़ा नहीं हो पा रहा था। मैंने उसे सहारा देकर खड़ा किया और उसकी साइकिल को अपने हाथों में सम्हाला।
''चलिए!'' मैंने कहा।
वह रुका रहा। मेरा ख्याल था, वह चल पाने में असमर्थ होगा, पर वह शायद प्रतिरोधवश नहीं चल रहा था।
''चलिए भाईसा'ब!'' मैंने दुबारा कहा।
एक कदम चलकर वह ठिठका और जोर से बोला- ''ये गुुंडागर्दी है! मैं तुम सब बदमाशों को देख लूँगा!''
गनीमत थी, उन्होंने उसकी बात नहीं सुनी। वे लोग अपने उस धराशायी साथी को सम्हालने में लगे थे।
वह मेरे साथ चल पड़ा।
जजज
कापफी देर तक वह चुपचाप मेरे साथ चलता रहा।
''आप मेरे साथ थाने चलेंगे क्या?'' सहसा वह बोला।
''क्यों?''
''मैं इन लोगों की रिपोर्ट करूँगा।''
''किनकी?'' मैंने हैरत से पूछा।
''इन्हीं गुंडों की!''
''ये गुंडे कहाँ थे? ये तो खुद.....!''
''भाईसाहब! ये गुंडे ही थे। मैं इनकी रिपोर्ट करूँगा!... ये भोली-भाली जनता को लूटने चले आते हैं... शाम के वक्त! मैं इन्हें अच्छी तरह जानता हूँ!... इन्हें ठीक करना बहुत जरूरी है!'' वह जाने क्या-क्या बोलता जा रहा था, मेरी समझ से परे था।
''आप बात को ज्यादा मत बढ़ाइए! ये लोग तो खुद पुलिस के....!''
मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वह बोला- ''कैसी बात करते हैं आप!....ये लोग गुंडे थे और मैं इन्हें देखूँगा!...आप मेरे साथ थाने चले चलिए, बस्स......!''
मैं उसके आग्रह से त्रास्त हो उठा था। मैंने चुप रहने में ही खैरियत समझी।
अचानक साइकिल वाले की दूकान दिखाई दी।
''लाइए, मैं आपकी साइकिल में हवा भर देता हूँ। आपसे शायद भरी न जाए!'' मैंने कहा।
''नहीं मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है। आपको थाने चलना हो, तो चलिए मेरे साथ, वरना द्घर जाइए!'' उसने रूखेपन से कहा।
मैंने समझाने की कोशिश की, तो वह भड़ककर बोला- ''क्या इनकी गुंडागर्दी को यों ही सहन करते रहें हम!......आप बताइए, ये हादसा कल आपके साथ भी हो सकता है! तब भी क्या आप यों ही चुप बैठ जाएँगे। आखिर किसी को तो इनका मुकाबला करना पड़ेगा।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। वह खड़ा रहा।
''मैं आपको द्घर पहुँचाये देता हूँ। आपको बहुत चोट आई है!'' मैंने उसकी साइकिल हाथ में लेते हुए समझाया।
''चोट!'' वह व्यंग्य से तिलमिलाती बेधक मुस्कान के साथ बोला- ''चोट तो मुझे आपके व्यवहार से पहुँच रही है!.....जाइए, आप अपने द्घर जाकर चैन से सोइए!'' उसने कहा और झटके से साइकिल मेरे हाथों से ली और मरियल चाल में चल पड़ा।
जजज
मुझे पता नहीं, वह अपने द्घर पहुँच भी पाया या नहीं! उस दिन के बाद मैंने उसे देखा भी नहीं! पर वह रह-रहकर मेरी आत्मा को कोंचता है। मैं त्रास्त हो चला हूँ!
मेरी समझ में नहीं आ रहा कि वह उन लोगों को गुंडा कहकर कहाँ चोट करना चाहता था, जबकि मेरी आँखों के सामने अभी तक उनकी वर्दी और डंडे द्घूम रहे हैं! और उनके डंडों की वह चोट......

 
 
 
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