| अभी वही है निजामे कोहरा : प्रेम भारद्वाज |
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धुंध है। बहुत द्घनी। और इस धुंध में-गरीबी, सियासत, एक्षयाशी, प्रेम, नाटक, साहित्य, हत्या और शमशान। जिंदगी का हर पड़ाव। हर रंग। बदरंग भी। बेरंग हो जाना भी जिंदगी का एक ऐसा रंग है जिसमें इस देश-दुनिया की सबसे अधिक आबादी लिपटी हुई है। |
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धुंध है। सब जगह है। राजपथ। जनपथ। पफुटपाथ। झोपड़ी से लेकर महलों तक। यह उसका समाजवाद है। धुंध का समाजवाद। जब होता है तो रफ्रतार पर ब्रेक लग जाता है। आँखें होती हैं। दिन भी होता है। मगर कुछ दिखता नहीं। सूरज को अपनी काँख में दबाए वह अपने दामन में कांपते लोगों को देखता है। धुंध की चादर में लिपटी अलग-अलग जिंदगियां। उनकी रंगत। कहीं जद्दोजहद। कहीं रूमानियत। कहीं बीमारी। लाचारी। आइए देखते हैं कुछ तस्वीरें।
राजधानी दिल्ली का देशबंधु गुप्ता रोड। पफुटपाथ पर ठिठुरती जिंदगियाँ। धुंध का नया रूप है। धुंध है लाचारी और उपेक्षा की। पन्द्रह साल का सोनू चाय की दुकान पर काम करता है। आज वह कंबल खरीद कर लाया है। रात को चैन से सोने के लिए। उसी पफुटपाथ पर श्रवण भी है। उसके पास कंबल नहीं है। पैसा नहीं। संभावना भी नहीं। सर्दी से निजात उसे भी चाहिए। वह सोनू का कंबल चुराने आता है। सोनू उसे देख लेता है। कंबल छीनने और बचाने के लिए मारपीट। छीनने वाला अक्सर ताकतवर साबित होता है। श्रवण सोनू की हत्या कर देता है। कंबल के लिए। बड़े सुकून से वह सर्द रात कटती है। अगली सुबह पुलिस उसे गिरफ्रतार कर लेती है। जिस कंबल के लिए उसने हत्या जैसा जद्घन्य अपराध किया वो छिन गया। लेकिन वह यह सोचकर खुश हुआ, चलो जेल में कंबल तो मिलेगा ही। जेल के अंदर क्या? और बाहर क्या। जेल के बाहर क्या उसकी जिंदगी एक सजा नहीं। कौन है अपराधी? कंबल खरीदने वाला। कंबल की खातिर हत्या करने वाला। यह व्यवस्था या सुविधाओं की रजाई में दुबके वो लोग जिन्होंने खुद की ठंडक के आगे और किसी के बारे में सोचना ही बंद कर दिया। सोनू-श्रवण की कहानी प्रेमचंद की 'पूस की रात' के हल्कू से आगे की है। ठंड वही है। सत्ता-व्यवस्था का चरित्रा भी कमोबेश वही। वक्त बदल गया है। ठंड में कांपता हल्कू भी बदला है। वह ठंड में कुत्ते से चिपक कर सोता नहीं। हिंसक हो गया है। ठंड ने हल्कू को हिंसक बना दिया है। समय के हिंसक होने का सबूत है यह।
यह दुनिया हल्कूओं की ही नहीं है। वे तो दुनिया के हाशिए पर पड़े अभिशाप्त जीव-जंतु हैं। दुनिया उनकी है जो आलीशान कोठियों, पफाईव सितारा होटलों में शराब-शबाब का मजा ले रहे हैं। धुंध वहाँ भी है। संवेदनहीनता के सुहाने जाम से उपजी दौलत और मस्ती की धुंध। यहाँ धुंध मस्ती है। मौसम की मार सुहाना जाम। सुविधाओं की वातानुकूल अट्टालिकाओं में मौसम असर नहीं करता। उन्हें कोई भी मौसम परेशान नहीं कर सकता। ये सिपर्फ जलजले से डरते हैं। उस जलजले के दहशत में हर पल मर-मर कर जीते हैं। यहाँ जो दीखता है वो सच नहीं। धुंध के भीतर का सच कुछ और है। चमक के पीछे का गहरा अंधेरा पसरा है। जरा सी धुंध की चादर हटाकर उनके भीतर उतरकर देखिए तो। कितनी उदासी। कितना अकेलापन। असुरक्षा। लेकिन आप वहाँ जाएँगे कैसे? मुख्य द्वार से आम लोगों को दाखिला मिलेगा तब न। यहाँ नो इंट्री है बिना बोर्ड के।
किसी छोटे कस्बे का अधबना मकान। ऊपरी हिस्से का एक कमरा। बिना पलस्तर का। आग जल रही है। एक अधेड़ उम्र की महिला ताप रही है। आग सीने में भी सुलग रही है। क्रांति की नहीं। प्यार की। पति इस सर्द में न जाने क्या ढूँढ़ने चित्राकूट गए हैं। पत्नी को छोड़कर राम को ढूँढ़ने। बेटा कोचिंग क्लास। द्घर में तन्हाई। यादों की जलती आग। प्रेम की। वह वर्ष १९५१ में प्रदर्शित पिफल्म 'मल्हार' का गीत गुनगुनाती है-'जहाँ हैं और जिस हाल में हैं, हम तुम्हारे हैं। तुम्हारी याद है दिल में, तुम्हीं को याद करते हैं... कहाँ हो। तुम, जरा आवाज दो... हम याद करते हैं।' पता नहीं जिसको यह याद करती है वो भी इसे याद करता है या नहीं। ब्लैक एंड व्हाइट जमाने की मुहब्बत से लवरेज यह महिला याद करने वाले को कभी कह भी पाई है या नहीं कि वह उसे भूल नहीं पायी है। दिल के किसी कोने में नहीं। समूचा दिल ही जिसकी गिरफ्रत में है। हर धड़कन में एक सरगोशी-'कहाँ हो तुम'...। ये सूर की वो राधा है जो वृंदावन में रह कर ही विरह वेदना झेलती है। हरिऔध की राधा की तरह द्वारका पहुँच नहीं जाती। प्रेम में पगी यह औरत करे भी तो क्या। पति हैं। पुत्रा है। संबंधों का संसार है। मगर बेजान। प्रेम की दुनिया चाहिए उसे। प्रेम। साहिर शायद पीछे छूट चुका है। अब इसे इमरोज की तलाश है। अमृता प्रीतम बनने की चाहत। मगर वैसी हिम्मत नहीं। अमृता प्रीतम बनने के लिए पति से अलग होना पड़ता है। साहिर को किसी 'खूबसूरत मोड़' पर छोड़ने के बाद ही मिलते हैं इमराेज। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाती। बाधा बनी है नैतिकता की धुंध। प्रतिष्ठा-पारिवारिकता का द्घना कोहरा। ऐसे में सर्द हुए रिश्ते में वह कांप रही है। ताप चाहिए उसे। वह उसे प्यार की पिछली यादों और संभावनाओं की आग में तलाशती है। काश, इस आग की तपिश में वह आज के दौर के इस गीत को गुनगुनाते हुए नैतिकता की धुंध को चीरकर खम्म ठोंकती-'अगर तुम मिल जाओ जमाना छोड़ देंगे हम।' प्रेम का आसमान पाने के लिए जमाने की जमीन छोड़नी पड़ती है। जिस तरह से पाँच सौ साल पहले मीरा ने छोड़ा था। प्रेम भी एक क्रांति हैं। मीरा ने की थी। अमृता ने भी की थी। अब जमाने को छोड़ने की बात कोई नहीं करता। जमाने को पाने की चाहत। परिवार के कब्र में दपफन होता प्रेम।
राजधानी दिल्ली का मंडी हाउस। भारत रंग महोत्सव। देश-विदेश से अलग-अलग भाषाओं में नाटकों को लेकर आए रंगकर्मी। मेला का सा माहौल है। रंग मेला। जिंदगी एक रंगमंच है। हम सब एक अभिनेता। स्टेज, एक पागलपन, एक नशा। यकीन नहीं तो रंगमंच के इन रंग-कर्मियों को गौर से देखिए। १८-१९ साल से लेकर ७५-८० साल के वे चेहरे यहाँ दिख जाएँगे जिनकी धमनियों में 'रंगमंच' रक्त बनकर प्रवाहित हो रहा है। खून में नाटक-प्रेम एक वायरस बनकर कभी खत्म न होने के लिए मौजूद है। यहाँ जिंदगी नाटक है। नाटक जिंदगी। कुछ पता नहीं चलता। सबको मंजिल नहीं मिलती। कामयाबी एक को। अधिकतर को नाकामयाबी। लेकिन जो सपफल नहीं है, वो सार्थक है।
हिन्दी साहित्य में छायावाद युग डेढ़ दशक में ही समाप्त मान लिया गया। लेकिन इसमें छायी धुंध कभी समाप्त नहीं होती। यह कभी न खत्म होने वाला 'धुंधवाद' है। महंत की गद्दी। साहित्य में सियासत। रचने से ज्यादा उसे बेचने की कला-कौशल। पुरस्कार का रास्ता जुगाड़ से होकर गुजरता है। जो मठ में नहीं है। दिल्ली से दूर है। वो उपेक्षा की धुंध में बेवजूद और बेकार मान लिए गए हैं।
शीतलहर से भी सर्द रातें धुंध के रूप में जैसे मौत की चादर तान लेती हैं। यह धुंध नहीं, मौत की चादर है। दशकों पहले महाकवि सूर्यकांत त्रिापाठी निराला ने लिखा था-'शिशिर की शर्वरी, हिंस्र पशुओं से भरी' तब उनको भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि आने वाले दिनों में शिशिर गरीबों के लिए मौत का मौसम साबित होगा। इस साल अब तक हर तीन सौ से ज्यादा जाने गईं। पफर्ज कीजिए इतने लोग किसी रेल दुर्द्घटना या किसी अन्य हादसे में मरे होते तो देश में वबाल मच जाता। तीन सौ लोग मरे। कहीं कुछ नहीं हुआ। एक बयान तक नहीं। ठंड में मरने वाले किसी एक व्यक्ति के बारे में भी मीडिया ने लिखा या दिखाया नहीं। वे भीड़ के हिस्से थे। लाचारगी का चेहरा। ऐसे गरीब कमजोर लोगों को जो सर्दी से बचने के लिए सहूलियतें न जुटा पाने के चलते लाश में तब्दील होने को अभिशप्त हैं, उन्हें कैमरे के लिए 'आउट ऑपफ पफोकस' मान लिया गया है। शीतलहर क्या, मौसम की हर मार गरीबों पर ही पड़ती है। वे ही मरते हैं। उनका कोई वजूद नहीं होता। एक संख्या भर होते हैं। वो अलग बात है इसी संख्या ;वोटद्ध की बदौलत सरकार बनती है। वे चेहरा विहीन भीड़ के हिस्से हैं। लाचारी, कमजोरी और बेबसी की भीड़। इस भीड़ की अपनी कोई पहचान नहीं। बेमतलब सी जिंदगी जीते लोग। ये गैर जरूरी मौतें हैं। इन्हें बचाया जा सकता था। मौसमी वजहों से हुई एक भी व्यक्ति की मौत हमारी व्यवस्था की कलई खोलती है कि उसे बचाने के लिए समुचित उपाय नहीं किए गए। शीतलहर के बाद उनकी मौत का सिलसिला रुकेगा नहीं। वे लू में भी मरेंगे। और बाद में भी। वे मरेंगे हर मौसम में। क्योंकि उन्हें जीना नहीं आया है। जीना जो राजनीति की रपटीली राह, अनैतिकता की अंधी गली, अपराध, भ्रष्टाचार की डगर से होकर गुजरता है।
इन दिनों में एक और धुंध छायी हुई है। जिसकी भयावहता का किसी को अंदाजा नहीं है। दो सप्ताह के भीतर केवल महाराष्ट्र में ४० छात्राों ने खुदखुशी की। मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में छात्राों की खुदखुशी का अंतहीन सिलसिला। छोटी उम्र, उम्मीदें बड़ी। जिंदगी में सबसे आगे निकल जाने की होड़। सपफलता के पायदान को ही जीवन मान लेने का भ्रम। हर कोई इस माहौल में खुद को दर्ज करना चाहता है। करियर का जान लेवा माहौल। जिंदगी की चकाचौंध ही जिंदगी में हताशा भर रही है। अवसाद की धुंध। जीने का मतलब जैसा धुंध में कहीं खो गया है। रिश्ते और सरोकार पीछे छूट गए हैं। पिता शमशान द्घाट पर पुत्रा की चिता को अग्नि दे रहा है। मन से कलाकार बेटे को वह इंजीनियर बनाना चाहता था। हर तरह से दबाव बनाया। गणित बैठाया। वह नहीं सह पाया दबाव। बेटे ने इस होड़ से मुक्ति का रास्ता मौत में ढूँढ़ा। अब सामने से जलती चिता है। चिता से उठती धुंआ। अरमानों की चिता। महत्वाकांक्षाओं का धुंआ। जिम्मेदार कौन? क्या जीने का अर्थ शिख्ार पर टंगकर ही जीना होता है या पिफर इसका कोई और मतलब है?
धुंध में शमशान द्घाट। चिता से उठते धुंए की धुंध। साहिर लुधियानवी याद आते हैं। पिफल्म धुंध का वह शीर्षक गीत -इक पल की पलक पर है ठहरी हुई है दुनिया/इक पल के झपकने तक हर खेल सुहाना है/संसार की हर शय का इतना पफसाना है/इक धुंध में आना है, इक धुंध में जाना?
पल झपक चुका है। कल तक जो अपनी महत्वाकांक्षाओं को पुत्रा का थोपने का खेल सुहाना लगता था। जिस में गोल दागने के लिए एक पूरी तैयारी की गई। अब वह खेल खत्म। बस रह गया है गम। गहरी धुंध। ऐसे मन में ख्याल की करवट-
क्या कहें इस मौसमे सरमां के नखरे अललमा/धुंध है कोहरे की या धुंधला गई है जिंदगी
ऊपर आपने देखीं धुंध में लिपटी कुछ तस्वीरें। इन्हीं तस्वीरों से मिलकर बनता है देश। ये धुंध इसलिए भी है कि खुद सियासत भी धुंध में लिपटी है स्वार्थ की धुंध में। कभी सरोकार में लिपटी होती थी। लेकिन वे दिन हवा हुए। अब चारों तरपफ कोहरा है। निजाम बदलता है। लेकिन हर निजाम का अपना कोहरा होता है। वह छंटता नहीं। यह कोहरा छंट जाए तो हर धुंध खुद-ब-खुद छंट जाएगी। ऐसा होगा- इसी उम्मीद में हम जीते चले जा रहे हैं। यह भी एक धुंध है। भ्रम सरीखी।
धुंध में लिपटी ये कुछ तस्वीरें थीं। तस्वीरें और भी हैं। दूर-दराज किसी कोने में छिपी। धुंध है न। सबकुछ दिखता कहाँ है। सब कुछ न दिखे इसीलिए तो धुंध है। मैं भी बहुत सी तस्वीरों को नहीं देख सका हूँ। जब आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगे। धुंध छट चुकी होगी। लेकिन क्या वाकई ऐसा होगा? क्या धुंध तभी होती है जब धुंध होती है। अगर ऐसा होता तो जेठ की दुपहरी में पत्थर तोड़ती महिला मजदूर निराला को ही क्यों दिखती है। नेहरू को क्यों नहीं?
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