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ज्योति चावला
यह सोचकर कि दूर नहीं है दिल्ली
चल पड़ा है वह अपने द्घर से
मन में ठाने
पोटली में बाँध बाजरे की रोटियाँ और
लहसुन की चटनी
शुरू कर दी है उसने अपनी यात्राा
पहुँचकर दिल्ली मिलूँगा राजा से
करूँगा पफरियाद कि देखे आकर एक बार
दशा मेरे गाँव की, भूख से बिलखते बच्चों की
और ज्वर में तड़पती मेरी पत्नी की ओर
इसी उधेड़बुन में छोटे-छोटे पड़ाव लेता वह
बढ़ चला है दिल्ली की ओर
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रास्ते भर की प्यास को कंठ में दबाए वह
कल्पना कर रहा है उस क्षण की जब
मिल सकेगा वह अपने राजा से जहाँ
सजा होगा दरबार बैठे होंगे पफरियादी और
देता होगा राजा हुक्म प्रजा की खुशहाली के
दिल्ली पहुँचकर ढूँढ़ रहा है वह प्याऊ
नहीं मिलता कोई प्याऊ, पर दिख जाता है
बिकता पानी मोल के भाव
सोचता है वह क्या यहाँ भी पड़ता है सूखा
मेरे गाँव की तरह
क्या कमी है यहाँ भी जल के स्रोतों की
क्या नदियाँ नहीं पुरा पातीं पानी देश की राजधानी को?
वह पूछता है राह चलते लोगों से
कहाँ लगता है राजा का दरबार
हँस रहे हैं लोग उस पर यह कहकर कि
२१वीं सदी में कौन से युग से निकलकर
आया है यह प्राणी जो
ढूँढ रहा है दरबार राजा का
वह भटक रहा है दिल्ली की सड़कों पर
देख चुका है दूर से राजा का सारा राजसी गौरव
बड़ी-बड़ी इमारतें, सुन्दर भवन, चमकती सड़कें, पर
नहीं दिखता तो कहीं राजा का दरबार, जहाँ
वह लगा सके गुहार और कह सके अपना दुख
अपने राजा से
पर वह मासूम नहीं जानता कि
सरकारें चुनी तो जाती हैं प्रजा के माध्यम से ही
पर होतीं नहीं प्रजा के लिए
जहाँ की आधी से ज्यादा प्रजा
नहीं जानती अपने राजा को
यह वह लोकतंत्रा है, जहाँ
लगते नहीं दरबार कि
सुनी जा सके प्रजा की गुहार
वह लौट चला है वापस
अपने गाँव की ओर,
पर उसके कदम अब सधे हुए नहीं हैं।
भय का एक कोना
ज्यों ज्यों रात द्घिरती जाती है
यह दुनिया पुरुषों की होती जाती है
यूँ तो दुनिया सदा से पुरुषों की ही रही है
न हो यकीन तो पलट कर देख लीजिए
मिथक और इतिहास
जहाँ खड़े दिख जाएँगे कितने ही मनु, राम, पांडव, भीष्म
और ययाति जिनकी बलि चढ़ी हैं
न जाने कितनी ही असहाय स्त्रिायां
रात द्घिरते ही कम होती जाती है इस
चलती- पिफरती दुनिया में स्त्राी की छवि
वे छिप जाना चाहती हैं दूर कहीं किसी
चारदीवारी में जिसे सभ्य भाषा में
द्घर कहा गया है
यह द्घर जितना पुरुष का है उससे
कहीं ज्यादा है स्त्राी का, चूंकि
स्त्राी को इस द्घर के भीतर केवल
नहीं छिपाना होता सिर बल्कि
बचानी होती है अपनी अस्मत भी
इस दुनिया की नजर से
यूँ तो द्घूमती हैं कुछ स्त्रिायां भी सड़कों पर
रातों में
उनके लिए समय की नहीं होती कोई पाबंदी
लेकिन चस्पां हो गई हैं उनके साथ
कुछ खास संज्ञाएँ कुछ उपनाम कुछ परिभाषाएँ
ये स्त्रिायां नहीं होतीं किसी सभ्य द्घर की
न ही उन्हें जरूरत होती है द्घर की चारदीवारी की
ये तो द्घिरती रातों को निकलती हैं सड़कों पर
और शामिल हो जाती हैं पुरुषों की दुनिया में
द्घिरती रातों में बनती पुरुषों की दुनिया में आने वाली
ये स्त्रिायां ऐसा नहीं है कि हो जाती हैं उनके बराबर
बल्कि उनकी दुनिया में शामिल होकर भी
वे होती हैं केवल स्त्राी ही जिसके साथ
जुड़ी है एक देह, नरम मांस
भय का एक कोना
और पूरी एक संस्कृति |