द्घंटी बजी और ठेकेदारनी का ड्राइवर उसे मेरे फ्रलैट की दहलीज पार करा के गायब हो गया। 'उसे' यानी दस-ग्यारह साल के एक लड़के को।
''यह बीजी लाई है आपके लिए-मुलुक से।'' और 'वह' दरवाजे से पफुट भर अंदर हकबकाया, भौंचक सा खड़ा था।
साक्षात् कागभुशुंडि! |
खासकर कानों और गले में खूब कसकर लपेटे, सलेटी गुलूबंद की वजह से।
उसके बाद नजर एकदम सरक गई पाँवों की तरपफ-इंच-इंच भर पफटी बिवाई? हिक्क! एड़ी ही क्या, पूरे-के-पूरे पाँव दरक गई मिट्टी-से खुरदुरे।
बाकी की काया को गाढ़ी-भूरी जरसी जैसा कुछ ऊपर, और पैंट-पाजामेनुमा कुछ नीचे, पूरे पैरों में। बीचोबीच एकदम गुबरैले-सा चेहरा। लेकिन वह अपनी काया, अपने हुलिए से पूरी तरह बेखबर, वहाँ रहकर भी वहाँ नहीं था।
पाँव पफर्श पर भी मिट्टी के चूल्हे-से जमे हुए थे। सिपर्फ आँखें चारों ओर लटरुओं-सी द्घूमती हुई। दयार तलाशते, पंख पफड़पफड़ाते पाखी-सी।
और हाँ, इस हुलिए के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ा लाल-पीली-भूरी-गुलाबी चिंदियों की कलियोंवाला एक थैला, जिसे वह कसकर भींचे हुए, कंधे से लटकाए खड़ा था।
''हाँ तो,'' मैंने खँखारकर आवाज को नरमाई में लपेटा, ''नाम, नाम क्या है तेरा?''
और भी दम सधी चुप्पी। सिपर्फ उँगलियाँ थैले पर और ज्यादा कस गईं और होंठ एक-दूसरे से जुड़कर सिल गए।
''अरे! गूँगा है क्या तू?'' मैं नरमाई की लपेट झाड़ती हुई झुँझलाई, ''मैं पूछती जा रही हूँ और तू बुत बना खड़ा है। यह भी कोई बात हुई?''
लेकिन बात कुछ नहीं हुई, सिवा इसके कि लटरुओं-सी द्घूमती पुतलियाँ सीधम-सीध जमीन पर जा गड़ीं।
अब तक मजमा जुट आया था, मेरी हास्यास्पद स्थिति का नजारा लेने। सुसंस्कृत, नियोजित, परिवार के सारे सदस्य बेलौस अंग्रेजी में संवादों का आदान-प्रदान कर रहे थे।
''छोड़ो भी, नहीं बताता, न सही। वैसे भी नाम से क्या, काम देखो काम।''
मालूम था हँसा, उसपर नहीं, मुझपर जा रहा था। मौके का पफायदा कौन नहीं उठाना चाहता। इस समय उस मखौल को तूल देना अपने लिए ही हानिकर था-
''अरे वाह! इतना भी शऊर नहीं तो ऐसे उजबक का क्या करेंगे हम?''
''क्या करेंगे?'' छोटे मियाँ सुभान अल्लाह भी भला क्यों चूकते, ''मेरे खयाल से तो इसे शिवाजी मैदान में खड़ा करके टिकट लगा दिया जाए, क्यों पपा?''
मेरी बिपफरती दृष्टि मनोज की तरपफ उठी तो पफौरन बेटे की प्रतिरक्षा पंक्ति में बड़े मियाँ आ डटे-''अरे भई, अब ये सब हम लोग क्या जानें। आखिर ठेकेदारनी की आरजू-मिन्नत करके सैकड़ों मील दूर से आपने उसे मंगवाया है तो कुछ सोच-समझकर ही तो। इधर के नौकरों की खुदगर्जी और कमीनेपन से तो आप आजिज आ गई थीं तो अब भलमनसाहती और नेकनीयती की खान से निकले इस सच्चे नगीने को सहेजिए।''
हर शब्द से विद्रूप की तीखी धार झर रही थी। मालूम था, अपने ड्राइंगरूम में उसकी उपस्थिति मात्रा सारे अभिजात को बेहद पफूहड़ बनाए डाल रही थी। कोई उसके पास से पफटकना तक नहीं चाह रहा था।
हर कोई अपनी नाक पर एक काल्पनिक रूमाल रखे हुए ही साँस् ले रहा था। अपना पक्ष बेहद कमजोर था। इसलिए सारे आक्षेपों की तरपफ से आँखें मूँद, मैं सिपर्फ एक ही राग का 'स्वर-विस्तार' किए जा रही थी, अपने आप में तैश खाकर पैर पटकती सी चीखी-
''कमाल है! कहने का मतलब यह तो नहीं कि जो भी जाहिल-जपट्ट मिले, उसे लाकर मेरे मत्थे मढ़ दिया जाए। ठेकेदारनी को इतनी भी अक्ल नहीं थी कि...''
''दरअसल ठेकेदारनी थोड़ी लेट पहुँची। तब तक तो अक्ल का ठेका तुम्हारे नाम अलॉट हो चुका था न।'' परिहास अब बंद बारूद में पलीते का काम कर रहा था। मीता ने इसलिए हमेशा की तरह आकर जल्दी से मोरचा संभाल लिया-
''बी काम, मम्मी! तुम पापा के कपड़े निकालो, इसे मैं हैंडल करती हूँ।''
हट आने के सिवा दूसरा कोई चारा भी न था। लेकिन यह हार जैसे चैन नहीं लेने दे रही थी। आस-पास से गुजरते, मंडराते हुए भी कान मीता की आवाज पर लगे थे।
''इधर आ, चाय पी ले।''
भकुआई आँखें वापस पट्ट से जमीन पर।
''अरे, थैला पकड़े-पकड़े कैसे चाय पिएगा? रख दे थैला। यहाँ नहीं, यहाँ से दिखाई देगा, उधर टेबल के पीछे।''
''शाबाश! अब ये ले चाय! चाय के साथ क्या खाएगा? रोटी? या...''
''परामठे हैंगे मेरे पास। मेरी माँ ने दिए हैं।''
स्वाभिमान से लहकता हुआ पहला बोल पफूटाऋ जैसे कोई ऐलान हुआ हो। जो जहाँ-जहाँ था, वहीं चौंककर ठमक सा गया। वाह रे गरूर!
विस्मय से मुक्ति पा, मैं धीमे से बुदबुदाई, ''शुक्र है खुदा का, कम-से-कम गूँगा तो नहीं।''
उधर मीता निहाल हो कामयाबी के दूसरे चरण में प्रवेश कर रही थी-''वाह! वेरी गुड! तो निकाल ले परांठे थैले से।''
चाय की सुड़प-सुड़प की आवाज के बीच मीता उससे बातों के बीच एकाध बार और हँसी तो मैंने लगभग चिल्लाकर कहा, ''मीता! पहले उससे नहाने को बोल। सारे द्घर में बुसी-बुसी सी गंध...''
लेकिन मीता ही क्यों, मैं खुद क्यों नहीं? कहीं मैं खुद इस अदने, जंगली-से लड़के से हारी, आतंकित सी तो नहीं महसूस कर रही हूँ? हरगिज नहीं न, तो पिफर कब तक टकराती रहूँगी- नहीं, अभी इसी वक्त। सुनता है तो ठीक, वरना इसी दम थैले सहित निकाल बाहर करती हूँ। इस तरह भरपूर साहस, शक्ति जुटा, एक बादामी साबुन की टिक्की लिए ठीक उसके सामने जा खड़ी हुई। आश्चर्य! ठीक सामने होते ही पिफर से अंदर कुछ डगमगाया और आवाज की बुलंदी आपसे आप नीचे आकर ठहर सी गयी। मैं दुबारा खांसकर बोल नहीं, मिन्नत सी कर रही थी-
''ये ले साबुन, जाकर नहा ले! अच्छा! कपड़े हैं न तेरे पास?''
मेरी पूछी गई बात का बगैर कोई जवाब दिए वह उलटे दो-टूक लहजे में पूछता है, ''जे पूरी टिक्की मेरी है?''
''हाँ-हाँ, पूरी।'' मैं सगर्व बोली और अपने लड़खड़ाते साहस की थिगलियाँ चट से सहेज, आपे में आ गई, ''थैले में अभी पहनने को कपड़े हैं क्या?''
''है न, सलूका जर्सी-मेरी माँ ने मणवा कर दिए।''
उसने थैला उलटा तो गुड़े-मुड़े कपड़ों के साथ मुसमुसी गंध का एक भभका सा उठा। लेकिन उसकी दृष्टि ने मुझे नाक पर रूमाल रखने से रोक दिया।
''ठीक है, पिफर अभी पहन ले नहाकर। बाद में हम तुझे और कपड़े सिलवा देंगे।''
थोड़ी देर में नहा-धोकर निचुड़े गीले कपड़ों और बालों से पानी टपकाता खड़ा था वह।
''अरे-रे-रे, पहले पानी तो पोंछ बालों से। ये ले तौलिया।'' एक पफटी-सी तौलिया रैक से उतारकर जल्दी से बढ़ा दी।
''जे भी मेरी?''
अंदर गुस्से का भभका-सा उठा। वाह! आने के साथ ही अपनी चीजें हथियाने, सहेजने के मनसूबे शुरू हो गए। लेकिन जाने क्यों, अभी तक मुँह से बाहर आने से पहले ही आवाज संभलकर नरमा जा रही थी।
''हाँ-हाँ, और ये ले, ये कंद्घी भी तेरी।''
आँखों की बीर बहूटियाँ चमकीं। वह कंद्घी के लाल पारदर्शी प्लास्टिक को चमत्कृत भाव से निहारने लगा।
मैंने मनोज को आवाज दी कि इसे पीछे की बालकनी दिखा दे, जहाँ ये अपने कपड़े भी पफैला सके और उठ-बैठ भी सके।
लौटकर मनोज बड़बड़ाया, ''ड्राइंगरूम की कारपेट पर चमाचम पैर रखता चला गया। इतनी भी तमीज नहीं कि किनारे से जाए, ईडियेट!''
''सो तो है ही। पूरा जंगली। अभी इसके साथ कापफी माथापच्ची करनी पड़ेगी।'' मैंने अपना अपराध स्वीकारा।
दूध की बोतलें लिए शेवंती आई तो उसे देखते ही थपोड़ी मार के खिलखिलाई, ''ओय होय, ये 'कावड़ा' किदर से लाया, बाई? मुलुक से? हे? नाँव काय तुझा?''
''अभी मरहट्ठी नहीं समझेगा तेरी।'' आश्चर्य! उसके सामने मिनमिन करती मैं शेवंती को देखते ही बिपफर पड़ी, ''और अभी काम भी नहीं जानता, इसलिए इसे देखते ही छुट्टी मारने का जुगाड़ बिठाना मत शुरू कर देना तू।''
अपनी झेंप को खिसियानी हँसी में समेटती शेवंती चली गई।
''मम्मी, पफोन।''
ठेकेदारनी ही थी-''हल्लो जी, वो लड़का-देवा-पौंचा क्या? हाँ-हाँ, वहीऋ सुब्बे ड्राइवर को मैंने ही रुकने को माने बोला था। गुप्ताजी को साइट पर पोंचाने की जल्दी रैती है न! इन ड्राइवरों को तो कोई बहाना चाहिए मटरगश्ती के लिए। दूसरे, आज काम भी हजार। तड़के सुब्बे ही तो पौंचे भरतपूर से। आपने इतना कै रखा था तो मैंने सोचा, चाहे जैसे भी हो, बिना लिए जाऊँगी नहीं। बड़ी मुश्किल से पटाया इसकी माँ को। अभी नया-नया इत्ते बड़े शहर में आया है न तो थोड़े दिन तो लगेंगे ही आदमी बनने में। और अभी काम भी कुछ नईं जानताऋ लेकिन जरा बहला-पफुसलाकर रखेंगी तो थोड़े दिनों में बहुत सहारा हो जाएगा। है भी अक्ल का दुरुस्त-सिपर्फ जरा उद्दंड और बतूना-पिक्चरबाज भी हो रहा था संग-साथ के लड़कों में। सच पूछिए तो इसी से इसकी माँ ने और भेज दिया कि वहाँ से हटकर शायद सुधर जाए।''
''मैंने पुचारा भी खूब दिया कि बड़े सेठ के पास ले जा रही हूँ, जिंदगी बन जाएगी इसकी। नहीं तो गरीब होने पर भी औलाद को आँखों की ओट करने को तैयार नहीं हो रही थी इसकी माँ। और पिफर आजकल तो रुपए-पैसे का लालच भी ज्यादा नहीं चलता। दस-पाँच रुपए तो इनकी ईंट- गारे ढोने की मजूरी हो गई है- इसी सबसे तो ये लोग और सिर चढ़ गए हैं, क्या कहा जाए। अच्छा जी, कोई दिक्कत हो तो बताइएगा और सिपर्फ बहला- पफुसलाकर नहीं, थोड़ा डरा- धमकाकर भी।''
और मेरी जली-भुनी 'ओ.के.' सुनने से पहले ही ठेकेदारनी ने रिसीवर खट् से वापस बिठा दिया। एहसान, हिदायतों और सीखों से भरपूर टोकरा मेरे सिर पर औंधाते हुए। एहसान!... हुँह! एक कलूटे, उद्दंड, पिक्चरबाज और जंगली लड़के को मेरे सिर मढ़ देने का एहसान।
''मम्मी ((!'' मीता तैयार होकर आ रही थी।
मैं हड़बड़ाकर उठी। काम कुछ भी कायदे से नहीं हो पाया थ्ाा आज। शेवंती भी मेरी लथाड़ की कसर बरतनों पर निकाल, यहाँ-वहाँ ढूहों की तरह ढेरी लगा निकल गई थी। पीछे की बालकनी से 'उसे' पुकारा- ''ओय!'' याद आया, ठेकेदारनी ने बताया था, ''देवा! इधर आ जरा किचेन में।''
वह आया।
''रोटी बेलनी आती है तुझे? जरा बेल तो।'' मैं उसी हड़बड़ी में बोली। उसे शायद याद आया, अभी-अभी मैंने ही उसे साबुन की एक पूरी बादामी टिक्की, एक पफटा तौलिया और टूटे दाँतों वाली प्लास्टिक की लाल कंद्घी दी है। इस एहसान के एवज में उसने हामी भरी।
मैंने चकला खिसका दिया और आधे मिनट के अंदर-अंदर उसने आटे की लोई चकले पर खींच-खींच सातों महाद्वीप के नक्शे चिपका दिए।
''औफ्रपफोह! बस कर, छोड़। ऐसा कर, तू सिपर्फ लोई बना।''
उसने आधे पाव के करीब गुंधा आटा हाथों में ले एक बड़ा सा लोंदा बनाया।
''यह? यह लोई है? इत्ती बड़ी रोटी बनती है कहीं?'' मैं संभालते-संभालते भी झल्ला पड़ी।
''मणती है, मेरी माँ मणाती है।''
खट्! वही निश्चयात्मक गुरूर भरी लहक और एक स्थिर टिका हुआ निष्कंप स्वर।
अस्थिर तो मैं हुई- ''ठीक है, ठीक हैऋ लेकिन यहाँ हम इत्ती बड़ी रोटी नहीं खाते न, ऐसी छोटी-छोटी लोई बना, देखा, ऐसे!''
उसके चेहरे पर ऐसा भाव झलका जैसे मैंने अपनी गलती मान ली। इससे वह प्रसन्न है।
मुझे खुद अपने लहजे की नरमाई पर लगातार ताज्जुब और खीझ सी आती जा रही थी।
''अभी ही थोड़ी देर के अंदर एक-एक कर सब लोग जाएँगे न! उन्हें टाइम से खाना नहीं मिला तो सारे दिन भूखे रह जाएँगे।''
आश्चर्य! इस वाक्य ने जादू का सा काम किया। वह सरपट दोनों हाथों से गोल-गोल लोइयाँ बनाने में जुट गया। जैसे अपने आपको काम में जुट जाने के लिए ललकार रहा हो। पफुसला रहा हो कि समझ लो, ये आटा नहीं, मिट्टी का लोंदा है और लोइयाँ नहीं, खिलौने के लड्डू बनाने हैं-एक, दो, तीन, दस...
मीता खाना मांगने आई तो वह मुझसे बोला, ''इन्हें मैं क्या बुलाऊँ?''
'''दीदी', दीदी बुलाना!''
वह खुश लगा, ''और उन्हें? आपके लड़के को? 'भाई साहब' न?''
''हाँ-हाँ, ठीकऋ लेकिन ये तू सारे आटे की कितनी ढेर सारी लोइयाँ बनाता जा रहा है? बस, अब नहीं चाहिए। हाथ धो।''
लेकिन उसे अब तक खासा मजा आने लगा था, सचमुच लड्डू बनाने जैसा हीऋ सो मेरे कहने के बावजूद उसी तरह आटा निकाल-निकालकर गोल-गोल द्घुमाता रहा, तेज-तेज और तेज...
''अरे कहा न, अब नहीं चाहिए।'' अब मैं खीझी तो वह चौंका, मैं भी, थोड़ी संतुष्ट सी थी अपने लहजे पर।
''जा छोड़, सबको पानी दे पफटापफट।''
वह अचकचाकर हाथ धोने लगा। धोता-धोता मुझे भाँपता, जाँचता सा भी।
तब तक मीता ने उठकर, 'ओ.के. मम्मी' कहा तो उसका ध्यान बंटा। हाथ धोना छोड़ एकदम मीता के पास पहुँचकर बोला, ''दीदी, आप वापस कब तक आओगी?'' जैसे वह उसकी कोई अलग की सगी, अपनी है।
''मैं? ओ((,'' मीता का हमेशा हँसते रहना ही शायद उसे सबसे ज्यादा भाता लगा- ''मैं शाम को वापस लौटँूगी।'' मीता पिफर हँसी।
''और ये, भाई साहब?''
''ये भी, ओ.के.!''
मीता दरवाजे तक पहुँची तो मैं किचेन से बाहर आती हुई बोली, ''चल, इसी के साथ तू पहले दरवाजा खोलना-बंद करना सीख ले। देख ऐसे, इतनी जोर से, 'भड़' की आवाज के साथ नहीं। ऐसे तो लैच ही टूट जाएगी।''
सीख गया तो यह काम भी उसे मजेदार लगा। अब दसियों बार बिना बात दरवाजा खोलता, बंद करता रहा, पिफर वही झुंझलाहट, खीझ। दोपहर होते-न-होते मैं थकान से चूर हो रही थी, और दिनों से कहीं ज्यादाऋ एक-एक ची८ा बताना, सिखानाऋ टोकना, रोकनाऋ ऊपर से और दिनों से भी ज्यादा रोटियाँ थोपनी पड़ी थींऋ उसका बिखेरा आटा समेटना पड़ा था।
शरीर से ज्यादा शायद मन की झुंझलाहट और खीझ। मौका मिलते ही उससे पिंड छुड़ाती हुई बोली, ''अच्छा, जा अब। मैं जरा आराम करूँगी। तू उधर पीछे वाली बालकनी पर जहाँ थैला रखा है न अपना, वहीं बैठ बाहर सड़क देख, नहीं तो सोऋ पर मुझे डिस्टर्ब नहीं करना, समझा!''
वह बगैर 'हाँ-ना' किए या चेहरे पर कोई भाव लाए चुपचाप हट गया।
टला तो जैसे चैन की साँस ली। सुबह का अखबार उठाया और बिस्तर पर पड़ी रहीऋ लेकिन दिमाग लगातार उठक-बैठक करता रहा। यह कहाँ का मूजी पल्ले पड़ा। अभी तो महीनों इसे आदमी बनाने में खप जाएँगे, 'भेजा' अलग। कह दूँगी सापफ-सापफ ठेकेदारनी से- अगले कुछ महीने हम इसे कुछ भी तनख्वाह के नाम पर देने वाले नहीं। खुराकी देंगे वही क्या कम! जब तक सीखेगा नहीं, उलटे मुझे उसे बनाकर खिलाना पड़ेगा। अरे, झाडू-चौका तो सब शेवंती करती ही है। मुझे तो किचेन के लिए चाहिए था, जिसके लिए थोड़ा अंदाज, अक्ल और करीना चाहिएऋ और इसके पास इनमें से कुछ भी नहीं। छोड़ो यह सब, सबसे पहले जो बात सापफ करनी है वह यह कि पैसा एक नहीं, खाना दूँगी मुफ्रत में, वही क्या कम! थोड़ा चैन पड़ा इस विचार से तो नींद आ गई।
दरवाजे की द्घंटी के साथ आँखें खुलीं। थोड़ा इंतजार किया। सिखा तो दिया है सुबह। लेकिन उठकर खोलने का सलीका हो तब तो। छिह! इतना भी नहीं। दूसरी बार द्घंटी बजी तो खुद ही उठकर खोलना पड़ा।
मालूम था, मीता है, अंदर कदम रखते ही हँसी।
कहाँ है वो, तुम्हारा 'पेट' ;पालतूद्ध
''खर्राटे भर रहा होगा उधर बालकनी में, और क्या? अच्छा बेवकूपफ बनाया मुझे ठेकेदारनी की बच्ची ने। एक-दो दिन देखकर मैं तो इस जंगली को वापस उसके मत्थे मढ़ जाऊँगी।''
''बस-बस, छोड़ो भी। चलो, हम चाय पीते हैं।''
''अरे वाह!'' मैं तड़की, ''तो क्या चाय भी नहीं बनाएगा?''
''छोड़ो, सिखाने भर में तुम्हारा ब्लडप्रेशर हाई हो जाएगा। मैं बनाती हूँ। और पिफर, शायद पहली बार इतने लंबे सपफर से आ रहा है। थका भी होगा- नई जगह...''
बढ़ती उम्र के एवज में मीता की समझदारी मुझे संभाल गई। अपने ब्लडप्रेशर को लेकर उसकी चिंता भी।
चाय की एक ही दो चुस्कियाँ ली होंगी कि अचानक हलकी रीं-रीं की आवाज कान में पड़ी। कुछ होगा सड़क पर, सोचकर ध्यान हटाने की कोशिश कीऋ लेकिन आवाज तेज होती ही गई। इतनी कि प्याले की चाय खत्म करनी मुश्किल हो गई। तब तक तो खूब तेज हुमस-हुमसकर बिलखती आवाज। किसी तरह आखिरी द्घूँट गटककर बालकनी तक दौड़े आए तो धक्-अवाक्।
नींद से जगा वह, चारों तरपफ की अजनबीयत को द्घूरता, डरा, डभर- डभरकर रोए जा रहा था। साँवली, गुबरैली काया डोंगी-सी हिचकोले ले रही थी। हर हिचकी के साथ- मटमैली आँखों से बहते नाले- परनाले से गाल और ठोड़ी तक तर-बतर।
एक निश्चित दूरी पर खड़े मैं और मीता एक-दूसरे को हकबके से देखते रहे- उलझन-उधेड़बुन में उलझे से। कुल नौ-दस द्घंटों के आधे परिचित, आधे अजनबी इस लड़के को कितने आगे बढ़कर कैसे क्या समझाया जाए! किसी तरह कोशिश शुरू भी की तो पहले शब्द के साथ ही उसकी हिचकियाँ और तेज हो गईं। दो-चार सुने-सुनाए शब्दों की बेगारी और की गई और उसके बाद वितृष्णा और झल्लाहट का एक रेला-सा आया-
''छोड़ दे इसे मीता, रोने दे। देखें, आखिर कब तक रोता है।''
मीता ने सहमी आँखों से मुझे देखा और धीमे-धीमे हट गई।
वही हुआऋ रोते-रोते, हिचकते-हिचकते कई बार साँसें उखड़ीं, पस्त हुईं और अंत में जैसे शक्ति चूकती सी लगी। आवाज बहुत धीमी रीं-रीं में तब्दील होते-होते पफंसकर सूख-सी गई। हाँ, हिचकियों से अभी तक पूरी पीठ रह-रहकर हिलक उठती थी। पिफर वह भी बंद। हारकर हथियार डाल दिए गए हों जैसे... अब चुप, भयातुर सा बैठा वह चारों तरपफ द्घूरे जा रहा था। एक सहमी, बेहद डरी हुई सी चेतना पैठने लगी थी। कहाँ है वह? कहाँ? किन अजनबियों से द्घिरा? अपना द्घर, द्घर के लोग किधर गए सब! कहाँ छूट गए? क्या करे वह? भागकर कहाँ, कैसे द्घर पहुँच जाए! लाचार, बेजार और डर की जगह अब एक दहशत जैसे हर तरपफ से सुन्न करने लगी।
झुटपुटा द्घिरने लगा। मैं विचित्रा सी उद्विग्न किचेन में आई। जि से सब्जियाँ निकाल नल की धार से धोने लगी कि अचानक पीछे खटका सा-पलटकर देखा तो अपना थैला उठाए वह सुबह जैसा ही निस्पंद, काठ-सा खड़ा है। चेहरे पर असंख्य सूखी धारों के निशान।
''मैं अपणे द्घर जाऊँगा।''
एक धूसर, ठसी चुनौती सी। आवाज में दयनीयता या गिड़गिड़ाहट का नाम-निशान नहीं। कुछ देर पहले थोड़ा पसीजा, रुँधा सा मन, वापस सबकुछ झटककर उखड़ गया।
''तो जा।'' एक पथरीली ठोकर मारकर मैं वापस सब्जियों पर जुट गई, अंदर-अंदर बुरी तरह उत्तेजित होते हुए भी।
जैसे वह इन दो शब्दों की खोखली निरर्थकता अच्छी तरह समझता हो, अपने एक शब्द पर जोर देता हुआ और उन्हें मजाक से परे करता वह पिफर से दुहरा रहा था, ''मुझे मेरे द्घर भेज दो।''
अनुनय अभी भी नहीं। पिंजरे के शेर की तरहऋ लेकिन था तो शेर पिंजड़े में। मेरे पिंजड़े में। अपमानित, लाचार।
मेरी जीत प्रमाणित थी अब। उस दंभ से अगराई मैं बड़ी कृपापूर्वक बोली, ''ठीक है, भेज दूँगी तुझे। लेकिन अभी इस वक्त कैसे और किसके साथ? कुछ सोचा तूने? इस तरह इतनी दूर तुरत-पफुरत जाने का इंतजाम हो सकता है क्या? कौन ले जाएगा तुझे? इसलिए ठहर जा। मैं खुद ठेकेदारनी से कह दूँगी, बस?''
वह समझता सा लगा तो मैंने पफौरन सख्ती से जोड़ा, ''लेकिन इस तरह चीख-चीखकर रोने से हमारी बेइज्जती होती है। अगल-बगल वाले समझेंगे, हम तुझे कहीं से उठा के लाए हैं और तुझे मार-पीटकर सता रहे हैं। तेरे पफेर में हमारी तो खासी बेइज्जती हो गई न!''
वह सिर न हिलाते हुए भी जैसे मेरे शब्द को सही-सही समझने की कोशिश में लगा था।
''तो अब जा, थैला रख दे, पीछे की बालकनी में और हाथ-मुँह धोके आ, मैं तुझे चाय देती हूँ। समझा न, जा झटपट।''
चला गया तो मैं कुढ़कर भुनभुना ली, ''वाह! यह अच्छी रही। पूरे पचास रुपए किराए के लगाकर इसे मंगवाने के यों ही भाड़ में झोंक दूँ? ऊपर से इसे वापस करने के अलग। हरिगज नहीं। पूरा द्घर मेरे इस प्रयोग का जी भरके मखौल उड़ाएगा। उड़ाएगा क्या, उड़ा रहा है। मैं भी इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं। देखती हूँ, कुछ और तरीके आजमाकर।
''आ गया! शबाश! ले, चाय पी ले पहले। चीनी कम लगे तो और ले ले। रोटी भी दूँ क्या?''
झेंप और संकोच से झुका सिर 'हाँ' में हिल गया।
''रोटी के साथ सब्जी भी दूँ?''
उसने 'ना' में मुंडी हिलाई।
मैंने खुश होकर इसरार किया, ''अरे, तो रूखी रोटी खाएगा?''
''न, मिर्ची के साथ।'' उसने मेरा लाड़, इसरार एक किनारे रखते हुए सपाट जवाब दिया। 'सिपर्फ मिर्ची से?' और तुरंत दिमाग के अंदरूनी तहों की आवाजें पफुसपफसाईं- पफायदेवाला पहलू तो तू हमेशा नजरअंदाज कर जाती है बेवकूपफ! सोच जरा, सिपर्फ मिर्ची-रोटी की खुराक- यानी शहरी छोकरों के पुलाव, बिरयानी और देशी द्घी चुपड़ी रोटियों वाले बराबरी के दावों से पूरी तरह बेखबर- पिफर भी तसल्ली के लिए एक बार और कन्पफर्म कर लिया जाए-
''सब्जी अच्छी नहीं लगती तुझे?''
''न- बस, हम मिर्ची से ही खाते हैं।''
पूरी तसल्ली। अब टिहकोरा देने में हर्ज नहीं, ''अरे वाह! लेकिन तीखा नहीं लगता?''
''न,'' उसने सगर्व कहा, ''मैं तो सरू से ही खाता हूँ। जब इत्ता सा था, अपणी माँ के द्घुटन्नों जित्ता, तब से। हमारे भाजी नईं पकती न तो सरू से मिर्ची खाते हैं। मेरी छोटी बाई भी, वो भी खूब खाती है।''
लेकिन मुझे अभिभूत होते न देख शायद उसे निराशा हुई।
'' 'बाई' आप समजते हो? नईं न? 'बाई' मैं अपणी छोटी भैण को कैता हूँ। इत्ती जरा सी तो है वो। वो भी खाती है मिर्ची-रोटी। तत्ता-तत्ता, सी-सी बोलती जाएगी, रोटी पे मिर्ची गेरती जाएगी। 'तत्ता' आप समजते हो? तीखा-वो तोती है न, तोतली बोलती है मेरी छोटी बाई।''
''वाह! वेरी गुड!'' मैंने पिंड छुड़ाने की गरज से कहा।
लेकिन उधर छोटी बाई का नख-शिख वर्णन चालू हो गया, ''मेरी बाई देखने में तो छोटी है, लेकिन है भौंत शाणी। शाणी आप समजते हो? चालाक- भौंत चालाक है वो। बताऊँ, कैसे। मेरी माँ के माथे की चकमक टिकली उचाड़ के अपने माथे पे धर लेगी और माँ की लूगड़ी लपेटकर लाड़ दिखाएगी। मैं कित्ता भी उससे छुपाकर बाहर निकलना चाहूँगा वो पफौरन समज जाएगी और अपणे इत्ते छोटे-छोटे हाथ पफैला के मेरे कने चढ़ आवेगी और बाहर ले चलने की जिद्द मचाएगी। पिफर मुझे छोड़ेगी थोड़ी... जब मैं याँ आर्या था तब तो सोती थी न वो। नईं तो आप क्या समजते हो, वो मुझे आने थोड़ी देती- कब्भी-कब्भी नहीं। और अभी तो वो रोती जरूर होएगी, मेरे बिना।''
चाय-रोटी खत्म हो चुकी थी। हाथ धोकर वह अकेला खड़ा-खड़ा थोड़ी देर बोलता रहा। मेरे पास न सुनने का वक्त था, न उसे चुप करने का। अचानक उसे जैसे याद आया, ''मैं आपकी रोटी मणवा दूँ?''
मैं विद्रूपता से हँसी, ''तुझे मँणानी आती तो क्या बात थी!''
जैसे उस पर कोई आरोप लगा हो, ''हमारे याँ लुगाइयाँ रोटी मणाती हैं, मरद नईं। हमारी रोटी में इत्ता टाइम भी नईं लगता। मेरी माँ तो भौत जल्दी मणा देती है ये डब्बल, खरी-खरी रोटियाँ। वो तो कटरे से छोटी बाई को लिये-लिये ही लकड़ियाँ भी बीन लाती है। पिफर मैं जब तक बाई को खिलाता, पफुसलाता हूँ वो चट से चूल्हे में लकड़ियाँ जोड़ रोटी तैयार कर देती है। हमारे ऐसी गैस नईं होती। चूल्हे पे मणाती है मेरी माँ रोटियाँ। चूल्हा आप समजते हो?''
''हाँ, जानती हूँऋ लेकिन गैस तू कैसे जानता है?''
''जाणता हूँ। इन ठेकेदारनी की माँ के द्घर में देखी है। मैं तो एक और गैस भी जाणता हूँ। हमारे याँ बारातों में भी सिर पे गैस के हंडे लेके चलते हैं। मैं, भैरों, काड्या, उसकी माँ- सब लेके चलते हैं शादियों में।''
''तू ढो लेता है? वो तो बहुत भारी होता है।''
''पिफर क्या? मेरी माँ तो एक बार चक्कर खा के गिरने वाली थी, तब मैंने ही तो उसके सिर का हंडा अपणे सिर ढोया।''
''और तेरा वाला?''
''तब माँ मुझे नईं ढोने देती थी। मैं तो पिलास्टिक की थैलियाँ और लूगड़े लेकर पिलाव ;पुलावद्ध और रसगुल्ले इकट्ठे करने गया था, लेकिन माँ के चक्कर आया तो झट्ट से उसे संभाल के हंडा भी ढोया और पूरी मजूरी भी ली सेठ के गुमाश्तों से। द्घणा चालाक था वो, आधी मजूरी देता था। मैं चिल्लाया भौत जोर से कि पूरी दे, नईं तो चिल्ला के सबको इकट्ठा कर लूँगा, तो वो डर गया।'' सगर्व हँसा वह।
''और रसगुल्ले-पुलाव?'' मैं चमत्कृत थी।
''वो तो हम सब शादियों में इकट्ठा करते हैं। खूब-खूब पत्तलों से भी और अलग से भी, कित्तों-कित्तों से जा-जाकर मांग लेते हैं। अब इत्ते बड़े जमावड़े में उन्हें काँ याद रैता है- कौन गैस-बत्तीवाला ले गया, कौन नईं।''
''पर तुम लोग इतना खा पाते हो?''
''हाँ, सर्दियों में तो हम सिरपफ रसगुल्ले खाते हैं-दस-दस, पंद्रह-पंद्रह तक। पिलाव तो सुखा भी लेंगे, पर रसगुल्ले जितने बन पड़े, खाते जाते हैंऋ भौत मजा करते हैं हम।''
''लेकिन उन लोगों का कितना नुकसान भी तो करते हो तुम लोग।''
''नुकसान उनका? अरे, भौत हरामी होते हैं वे गुमाश्ते, नौकर। आप जानते हो, वो हंडे-हंडे पिलाव, रसगुल्ले दूसरे दिन बासा करके कुत्ते-सूअरों के आगे डाल देते हैं- और मिनख मांगे तो दुर-दुर करेंगे। उनके सेठों को कुछ खबर नईं होती। द्घणे पैसे वाले होते हैं ये सेठ। मुहरों के पासे डालते हैं ये लोग और किरोड़ों के सट्टे खेले जाते हैं। सट्टा आप जानते हो?''
''नहीं, वो सब मुझे बताने की जरूरत नहीं।'' एकदम से पफनपफना उठी मैं, ''लेकिन तू यह बता, तू जानता है, यहाँ क्यों आया है?''
एक धक्का लगने पर भी पूरे जीवट से संभलते-संभलते बोला, ''ठेकेदारनी ने मेरी माँ को बोला-बुम्मई में द्घणे सेठ रहते हैं, इसे मेरे साथ द्घूमने को भेज दे। सोई मेरी माँ ने भेज दिया।''
मैंने चौंककर देखा--बचाव की इतनी जबरदस्त कोशिश! किसे बचाने के लिए? खुद को? या अपनी माँ को? अंदर एक हूक और एक विद्रूप-दोनों छलका।
''अच्छा, तो तू सचमुच समझता है, तू यहाँ मुंबई द्घूमने ही आया है?''
गरम रेत का एक तूपफान, अंधड़ सा उठा था उसकी आँखों मेंऋ जैसे उसे चारों तरपफ से शिकंजों में कसकर कोई बहुत निर्मम सच कबुलवाया जा रहा हो, इस तरह आँखें उसी तरह जमीन पर गाड़कर बोला, ''नईंऋ समजता हूँ, सब समजता हूँ।''
मैं भी समझ गई हूँ कुछ-कुछ कि कैसे इस गुबरैले से काम निकालना है। बस उसे बतरसी छलाँगें लगाने की पूरी छूट दे दो और बहला-पफुसलाकर काम करवाते जाओ। बीच-बीच में पूछ लो कि भूख लगी हो तो मिर्ची-रोटी खा ले। ले, थोड़ी और मिर्ची बुरक ले।
सपफल हो रहा है मेरा अभियान या शरीपफ किस्म की साजिश। लेकिन अब द्घर में हो रही मिर्ची की खपत पर अंकुश लगाना ही होगा। क्योंकि उसने बाकायदे खुश-खुश हरी मिर्चें तेल में छौंककर उस पर मसाले बुरकने शुरू कर दिए हैं। और वही तेल में छुँकी मिर्ची हर रोटी के साथ चमचे भर- मैं इसे बेवकूपफ बना रही हूँ या यह छोकरा मुझे?
''तुझसे मना किया न, इत्ती मिर्च मत खाया कर- नुकसान करती हैं ज्यादा मिर्चें। समझता नहीं तू।''
''समजता हूँ,'' वह बड़ी बुजुर्गियत से सिर हिलाकर कहता है, ''पिफर इसमें तेल-मसाले भी लगते हैं न आपके, इसलिए।''
मिर्च की झार की-सी ही तेजी से मैं किचेन के बाहर आ जाती हूँऋ लेकिन कह कुछ नहीं सकती थी। हिसाब-किताब लगाने बैठूँ तो मिर्चें पिफर भी मटर-टमाटर से सस्ती ही पड़ेंगी।
''अच्छा, खा चुका हो तो इधर आ, सूखे कपड़े उतारकर तह लगा दे।''
मिर्ची खाकर उसे पफरती आती है। सिसकारता हुआ सूखे कपड़ों का बोझ लाकर पलंग पर डाल देता है और कपड़ों के ढेर में से सबसे ऊपर मेरी गंदुभी भूरी साड़ी की तह लगाते-लगाते वह उसे एकदम छोटी गठरी-सी में तब्दील कर देता है। मैं झिड़कती हूँ, ''अरे ये! ये क्या? साड़ी की गठरी बना रहा है। ऐसे तह लगाते हैं?''
''नहीं, मैं तो मटियाला तीतर बना रहा हूँ। 'मटियाला तीतर' जानते हो आप? नईं न? बिलकुल आपकी जिस ;इसद्ध साड़ी सरीखा रंग होता है विसका ;उसकाद्ध। वो जंगल-बगानों में जब जमीन पर चलता है तो आप पता थोड़ी पा सकते कि मटियाला तीतर क्याँ पे है? लेकिन हम तो भई रोज देखते हैं। पफट्ट से पफत्तर पफेंककर सिकार कर लेते हैं। एक बार मैंने पफत्तर मारा, यूँ छुपकरऋ लेकिन भौत चौकन्ना था वो तीतर, पफौरन पफड़पफड़ा के जोर से उड़ा और अपणी माँ के पंखों में जा छुपा।''
मैं हँसी- ''तुझे कैसे मालूम कि वो उसकी माँ थी?''
''कैसे नहीं मालूम? और कौन उसे अपणे पंखों में छुपाता झप्प से? आप बोलो तो!''
''हाँ-हाँ, ठीक हैऋ लेकिन वापस तह भी तो लगाता चल।''
दो-चार कपड़े ठीक-ठाक तह लगे कि अचानक मनोज की सपफेद सितारों वाली नीली शर्ट दिख गई। बस पिफर क्या, जंगली पहाड़ियों के बीच से झरने पफूट पड़े हों-
''ओह् होह- जे तो मेरी बड्डी लीली पतंग मिल गई, 'पतंग' समजते हो आप? हमारे याँ नरे आसमान में उड़ती हैं, चाँददार बेलदार कलीदार।'' उस आसमानी चेहरे के बीचोबीच चमकती आँखें-पतंगों में चिपके चाँद-तारों-सी- ''तो ये मेरी चाँददार पतंग उड़ी ऐई...युयो...'' उसने मनोज की शर्ट उछाल दी, ''मैं ऐसी ई अपनी बड्डी लीली ;नीलीद्ध पतंग बेरी के नीचे ढाँप के आया हूँ। चाँद- तारोंवाली। डाँट के तो आया हूँ चंदणे को कि खबरदार! जो मेरी पतंग छुई होगी, मैं बुम्मई द्घूम के वापस आऊँगा तो उड़ाऊँगा। खैर, उड़ाएगा तो वो वैसे भ्ाी नईं। आप पूछोगे क्यों? तो उसे उड़ाना आता ही कहाँ है इत्ता ऊपर! छोटा है न मुझसे चाँनू। माँ के द्घुटनों से थोड़ा ऊँचाऋ वैसे नाम तो उसका चंदन है, लेकिन बुलाते सब लाड़ से उसे चानू, चाण्या, चन्नी हैं। लाड़ का नाम समजते हो आप? हमारे में सब लाड़ के नाम से बुलाते हैं और लाड़ के नाम कोई एक-दो होते हैं? अरे, भौतेरे होते हैं भौतेरे- एक-दो जैसी कोई गिनती नईं जितने। मेरी माँ मुझे भी उतने ई लाड़ के नामों से बुलाती हैं, बताऊँ?''
चिहुँक सी जाती हूँ मैंऋ जैसे चुन्नटदार द्घाद्घरेवाली इसकी माँ लाड़ के अनंत नामों से इसे पुकारती बदहवास चली आ रही है। नहीं, खींचना है इसे, जल्दी से- जल्दी, पास न जाने पाए,लाड़ से लबालब इस पारावार के-
''तू तो पतंग की बात कर रहा था न।''
''हाँ... हाँ,'' वह भटककर लौटता है जैसे, ''हाँ, तो मैं कै रहा था, कि चाण्या उड़ा थोड़ी सके पतंग, उसके हाथ भी कित्ते छोटे-छोटे हैं। मैं पतंग में काणा बाँधता हूँ तो वो पकड़ता है बस्स, उड़ाता तो मैं हूँ। और जब गोता खिला के दूसरी पतंग काटता हूँ तो वो खूब जोर से ताली बजाकर नाचता है- हरी- हारी की बोई, चाँद- तारे की बोई- काण्या रे, कट गई तेरी रंग-रंगीली बेलदारी...
''आपके बुम्मई में पतंग नईं उड़ती क्या? हमारे ह्याँ तो नरी ;निरीद्ध उड़ती हैं-हरी, दुरंगी, तिरंगी। नरे आसमान में...
''ओय! मैं भी कैसा बोड़ा हूँ। ह्याँ बुम्मई में आसमान ही नईं दिखता तो पतंगें क्याँ से उड़ेंगी? आपके कमरे की खिड़की से ए-इत्ता ही तो आसमान दिखता है, अब उसमें पतंगें क्या उड़ेंगी? गोता खा के गिर नईं जाएँगी? है कि नईं? अच्छा, 'गोता खाना' क्या होता है, समजते हो आप? जैसे बालक लोग धूल- मिट्टी में कलामंडी खाते हैं न, वैसे ई पतंग आसमान में। 'कलामंडी' समजते हो आप? मैं खा के दिखाऊँ?''
''शट हिम अप, मम्मी प्लीज!'' मनोज अपने कमरे से निकलकर अंग्रेजी में झल्लाता है, ''पूरे आधे द्घंटे से इसका टेप चालू है। आप इसे चुप नहीं करा सकती थीं? मैं इंतजार करता रहा कि अब चुप होता है, अब चुप होता हैऋ पर बस, आगे एक शब्द न बोलने पाए तुम्हारा यह पालतू।'' वह उलटे पैरों वापस लौट गया है।
''मनोज भाई सा'ब मेरे ऊपर भौत नाराज हो रहे थे न?''
''न, नहीं।''
''नहीं, हो रहे थे, मैं क्या समजता नईं? तभी तो अंग्रेजी में बोल रहे थे।''
''हाँ-हाँ, तू अंग्रेजी-पफारसी सबकुछ पढ़ा है न जो समझेगा।'' मनोज वाली झल्लाहट अब मुझपर तारी थी।
अपमानित-सी आँखों में पिफर वही चुनौती, ''पढ़ा नहीं हूँ तो क्या, लेकिन समजता तो सब हूँ। बताऊँ? वो कै रहे थे, इसे चुप करो जल्दी।''
''ठीक है, जब समझता है तो झटपट चुप हो जा।'' मैंने झेंपकर कहा और लमहे भर को सोचने लगी कि इसे किधर, किस काम में लगाऊँ कि थोड़ी देर शांति रहे द्घर में। हाँ, ठीक- ''सुन, इधर आ। ये ब्रासो की शीशी और कपड़ा ले और खूब रगड़- रगड़कर जरा पॉलिश तो मार इन स्टैचू८ा पर।''
''टैंचू क्या?''
''अरे मूरत, मूरत, ये इधर पीतल की मूरतें रखी हैं न, इन परऋ लेकिन खबरदार, आवाज नहीं जरा भी। देखूँ, कितनी बढ़िया चमकाता है तू!''
बहुत देर तक आवाज सचमुच नहीं आईऋ लेकिन जब लौट के देखा तो एक बड़ी पीतल की मूर्ति को कुहनी के सहारे कमर से लगा, मटकता-मटकता द्घूमता हुआ इधर-से-उधर उसे पुचकारता जा रहा है।
''ये क्या कर रहा है?'' बिपफरी मैं।
''अपनी छोटी बाई को बाहर डोलाने ले जा र्या हूँ।'' कहकर वह पूरी अल्हड़ता से खी-खी-खी-खी हँसने लगा- ''इत्ती सी ही तो है मेरी बाई, तोती बाई, चंदा-चंदा है उसका नामऋ लेकिन सब लाड़ से बाई, बीच्चुड़ी, गूजरी कैते हैं। जो कोई बुला ले, 'चंदा बाई गूजरी' तो केसी किलकिल कत्ती भागती है और यूँ हाथों में मुँह छुपाके शरमाती हैऋ लेकिन बौत चालाक है वो। 'चालाक' आप समजते हो, हुशियार- हुशियार।''
अब तक सिर से पाँव तक आग लग चुकी थी। पूरे गुस्से में आपे से बाहर होकर चीखी- ''शटअप! चालाक तो तू नंबर एक है। ज्यादा होशियारी दिखाने की कोशिश मत कर तू, समझा? एक काम कहो तो दस तरह के चोंचले दिखाकर बरगलाने की कोशिश करता है... सोचता है, सीधे-सादे लोग हैं। आराम से मुफ्रत की रोटियाँ तोड़ो और इन्हें बेवकूपफ बनाते रहो, क्यों? नहीं तो क्या तुझे इतना मालूम नहीं कि ये पीतल की मूरत है, तेरी बाई, बीचुड़ी नहीं?''
वह सन्न, पफर्श पर मूरत से सटा बैठा रहा आँखें जमीन पर गड़ाए।
''अब और ज्यादा मक्कड़ मत साध, उठाकर रख मूरत कोने के रैक पर, और चल किचेन में भाजी काट, कर चुका तू पॉलिश।'' मैं पैर पटककर दुबारा चीखी।
वह सिर झुकाए किचेन में आकर खड़ा हो गया। चाकू, बींस और ट्रे देकर एक कोने में बिठा दिया, बतौर सजा, इस तरह बारीक-बारीक, खूब बारीक काटना है।
अचानक पलटी तो खून की धार के बीच उँगलियों को कस के दबाए अपराधी-सा सन्न, चुप्प खड़ा था।
हे भगवान्! मैं बदहवास द्घबराकर चीखी, ''कहाँ, कैसे काटा हाथ? दिखा, चल जल्दी बाथरूम में, इधर ला हाथऋ डिटॉल, रुई, पट्टी, मलहम- बस पानी में हाथ मत डालना। जाने किस जनम का बदला ठेकेदारनी ने मुझसे लिया जो यह बला मेरे गले में ला डाली। अच्छा, द्घबरा मत, अभी दर्द कम हो जाएगा। हे भगवान्! कापफी काट लिया है। देखती हूँ, यों ही खून नहीं कम होता तो डॉक्टर के पास भेजती हूँ।'' लेकिन दर्द का अंदाज कोई लगा ही नहीं सकता था- आँखें वैसी ही मटियाली जमीन में धँसी-सी, होंठ एक- दूसरे से भिंचे।
लेकिन कहीं अवाक् और भौंचक भी, अपराध- बोध के साथ।
सिपर्फ आखिर में एक बार वह दृष्टि उठी- मेरी तरपफऋ मुझमें जाने क्या टकटोरने, तलाशने और पिफर वापस।
उपफ! कैसी है यह दृष्टि- जिस पर न दया दिखाई जा सकती है, न गुस्सा हो कर पफटकारा जा सकता है, न एहसान का बोझ ही डाला जा सकता है। एक तरपफ से सारे हथियारों को भोथरा करती हुई। हथियार तो मैंने डाल दिए उसके सामने। कुछ इसी तरह उसे पास बुलाकर बोली थी-
''देबू! देख, एक बात तू पहले अच्छी तरह समझ ले। रखने वाली तो मैं तुझे हरगिज नहीं। तू, मेरी माँ या ठेकेदारनी चाहेंगी तो भी मैं तुझे रखूँगी नहींऋ क्योंकि मेरे द्घर का काम तू सीख-समझ सकता ही नहीं। मुझे तो सीखे, समझदार बड़े लड़के की जरूरत है। रही अब तुझे भेजने की बात, तो अकेले तो तू न जा पाएगा, न मैं तुझे भेजूँगी हीऋ सैकड़ों मील दूरऋ तो इससे अच्छा है कि जब तक तुझे रहना है, कायदे से, समझदारी से रह, समझा! जैसे ही कोई तेरे देश जाने वाला मिलेगा, तुझे उसके साथ कर दूँगीऋ लेकिन तब तक तुझे होशियारी से काम सीखना और करना है- तभी जाएगा तू अपने द्घर।''
उसने जमीन में गड़ी अपनी दृष्टि उठाई और मेरी आँखों में टाँक दी। आँखें नहीं जैसे तराजू के दो पलड़े, मेरे दिए भरोसे की सही-सही नाप- जोख कर रहे थे।
उस दिन से कदमों की तेजी बढ़ गई, आँखों की चमक भी। अब वह पीछे की बालकनी पर गरदन टिकाए खड़ा भी होता तो आँखों में उदासी नहीं, इस छोर से उस छोर उम्मीद की एक डोर खिंची होती। वह सरपट झाड़न से कुरसी- मेज-सोपफे-पलंग पोंछने- झटकारने लगा, कारपेट पर ब्रुश मारने लगा, और उसके बाद ब्रुश एक तरपफ पफेंककर पफटापफट कलामंडियाँ खा लेता- एक, दो तीन, चार पाँच- तार पर नाचते नटों की तरह...
''डिसगस्ंिटग!'' मनोज चिढ़ा-चिढ़ा सा बुदबुदाता।
''जितनी धूल झाड़ता नहीं, उससे ज्यादा तो अपने गंदे पैरों से झाड़ देता है- तुम्हें क्या मालूम, ममा, वह झाड़ने-झूड़ने के बाद सोपफे-सेटीज पर आराम भी पफरमाता है एकदम पापा स्टाइल में... अच्छा है, उसे वह सब भी करने की खुली छूट मिली हुई है जो हम बच्चों को भी नहीं थी। यहाँ से वहाँ धपाधप करते हुए भागना, कुलाँचें भरना, कालीन पर कलाबाजियाँ दिखाना और सोपफे, सेटी पर पसर जाना, उसे भला क्यों बोलेगा कोई कुछ?''
मनोज पूरा सही नहीं था। यह भी जानती हूँ कि इन दिनों उसके अंदर एक विद्वेष का मनोविज्ञान द्घुन- सा लगा था। लेकिन था तो मेरा बेटा, मेरा स्वार्थ। जाहिर है कि इस बेटे के मनोविज्ञान की निगरानी ही मेरा धर्म था- यह धर्म कभी- कभी कितना संकीर्ण होता है!
''क्यों? तुम खुद क्यों नहीं? उसे लेकर तुम्हें मेरे पास शिकायत करने की जरूरत नहीं। द्घर का सरवेंट सबका सरवेंट है। तुम खुद ठीक करो बेटे उसे, खुद सिखाओ, इसके लिए मेरे परमीशन की जरूरत नहीं है तुम्हें।''
बेटे का अहं तुष्ट। छूट और अधिकार-पत्रा पाकर पफौरन नए-नए निरंकुश हुक्मनामे जारी हो गए- ''एई देबू! खबरदार जो कभी सोपफे या सेटी पर बैठा तो।.. तू कायदे से खड़ा नहीं हो सकता क्या?... हमेशा दीवार से अपनी पीठ या सिर टिकाए रहता है। सारी दीवार का पेंट गंदा करता है।
इधर-उधर नीचे बैठ। खबरदार जो कॉरपेट पर बैठा या लेटा होगा।''
''तुझे खड़े होने तक की भी तमीज नहीं? ऐं। हमेशा झूलता क्यों रहता है- कमर कूल्हे हिलाता। सीधा खड़ा हो।''
''ये ठीक हमारे एकदम सिर पर क्यों हर समय खड़ा रहता है, ऐं? उधर जा पीछे बालकनी मेंऋ जब बुलाएँ तभी आना, लेकिन पफौरन।''
''ये हें-हें-हें क्या होती है? हमेशा मम्मी के पीछे-पीछे भूरे बिलौटे-सा...''
''ये लो, वापस उछलकर कारपेट पर, खबरदार!''
उसकी आँखों में कुछ भक् से जल उठाऋ जैसे बेवजह अपमानित होते चले जाने के प्रतिकार सा-
''आप क्या हमेशा ही खड़े रह सकते हो, मनोज भाई सा'ब? पूरा दिन? ...आप मुझे कुरसी पर भी बैठने को मना बोलते हो, गलीचे पर भी, पिफर मैं क्याँ बैठा करूँ?''
''क्यों? तेरे झोंपड़े में सोपफे-कारपेट बिछे रहते थे न?''
मनोज चीखता हुआ अपने कमरे में चला गया, लेकिन मैंने किचेन से झाँककर देखा, उन मटियाली आँखों में सारा ब्रह्मांड डोल उठा था, मिट्टी के लोंदे की तरह चकनाचूर हो जाने के लिए। मैंने जैसे द्घबराकर ही उसे बहलाते हुए, सारे द्घटित से अनजान बनते हुए बुलाया-
''अरे देबू! तू वहाँ क्या कर रहा है? आ, इधर किचेन में। जरा मेरी मदद तो कर।''
उसने दहकते हुए अंगारों पर जैसे राख डाल दी हो और चुपचाप हाथ बाँधे आकर खड़ा हो गया। आँखों में झाँकता, झोंपड़े में कश्मीरी कारपेट और सोपफे का विद्रूप अपमान और बेइज्जती से भरपूर एक हिंस्र वार...
''आ, इधर आ, जि सापफ करते हैं दोनों मिलकर। आज मैं तेरे साथ करती हूँ, पिफर तो तू अकेले ही जि सापफ कर लिया करेगा। काम बहोत जल्दी सीखता है तू, होशियार है न।''
उस पर मेरी चापलूसी का कोई असर नहीं। सिपर्फ कहे मुताबिक सब्जियों, पफलों के थैले निकाल- निकालकर अलग रखने लगता है। पानी, शरबत की बोतलें, अंडे, मक्खन के पैकेट और बपर्फ के ट्रे।
''ले, बपर्फ खाएगा? खा ले जितनी मन चाहे उतनी।'' मैंने उसे ठंडा करने की गरज से पुचकारा।
उसने सीधे से गरदन मटका 'नहीं' की।
''अरे! बपर्फ नहीं खाता तू?''
''खाते हैं, खूब खाते हैं हम।'' सीना पफुलाकर गरूर से भरी आवाज।
मैंने विस्मय से देखा- ''कहाँ से?''
''ठेलों सेऋ बपर्फ की ये बड़ी सिल्लियों से। हमारे द्घर के सामने पल्ली तरपफ ही तो बपर्फ की पफैक्टरी हैगीऋ ठेलों-के-ठेलों बपर्फ लद-लद के जाती है बाजार की तरपफ। हम सारे बालक छुप-छुप के पीछे से एक-दो बल्ली काट के इससे भौत ज्यादा, मन चएँ जितनी, बपर्फ गिरा लेवें और खा-खा के मन भर जाए तो एक-दूसरे की कमीजों से भी डार-डार के खूब मजे करें।''
हरियाती स्मृतियाँ और अपनी प्रभुसत्ता का दर्प भरा बखान...
''आप ये सिपर्फ सादे शरबतों की बोतलें रखते हो? वो लाल, पीली, सोडेवाली छोटी बोतलें नईं?''
''सोडा कहाँ लाल-पीला होता है?''
''होता है। जैसे मैं निपट अज्ञानी होऊँ- नरे रंगों की बोतलें होती हैं उसकी।''
''ओ... थम्सअप, गोल्ड स्पॉट?''
''हाँ, वोई। मुझे नाम बोलने को नईं आता। वो खूब तड़कदार होती है। पिओ तो पूरे पेट में छनछनी सी उतर जाए।''
''अच्छा, तो तू थम्सअप, गोल्ड स्पॉट पीता था? और पैसे? पैसे कौन देता था?''
''कोई नईं? अपणे पैसों की। मैं डुंगर पे जाके ढुलाई नईं करता था! पफत्तरों की गिट्टियाँ नईं तोड़ता था! मैं तो अपणे पैसों से अपणी छोटी बाई को मलाई बरपफ भी खरीद देता था और चाण्या को दाल-चक्की भी।''
पिफर वही स्मृति के डेले-डेले-सा उतराता दर्द।
''और... द्घर में नहीं देता था पैसे?''
उसने मेरी ओर ऐसी दृष्टि डाली जैसे मैं जान-बूझकर उसे नीचा दिखाने की कोशिश कर रही हूँ और वह इस बात को अच्छी तरह समझ रहा है।
''एक बात बताओ आप, क्या मनोज भाई सा'ब से पैसे लेते हो आप? या उलटे उन्हें देते हो?''
इतने दुस्साहस की कल्पना मैंने सचमुच नहीं की थी। इसलिए शायद जवाब भी तैयार न था मेरा। वह भी जानता था यह। परदादा के-से अंदाज में मुझे इशारा सा करता बोला, ''आप समजोगे नईं, मैं क्यों माँ को पैसे देना चाहता हूँ, पर पिफर भी देता नईं।''
''क्यों?''
''वो ई तो,'' वह उसी अंदाज में एक दार्शनिक हँसी हँसा, ''आप समजोगे नईं न हमारे लोगों की बातें- मैं माँ को पैसे देता भी तो क्या, उससे सारे पैसे तो बा'सा झपट लेता न! 'बा'सा' आप समजते हो? हम अपणे बाप को बा'सा कैते हैं। वो ई मेरी माँ से सारे पैसे हड़प लेता है।''
खुलासा जानने की मेरी कुटिल मंशा- ''तो इसमें क्या? माँ के पास हो या बाप के पास?''
''ओये!'' विद्रुप से उसके होंठ टेढ़े हो आए--''इसमें कुछ नईं? मैं आपसे पूछूँ कि अगर सा'ब आपसे सारे पैसे छीन लें और दीदी और मनोज भाई सा'ब को खाने के लिए कुछ न रहे तो ये क्या अच्छी बात है?'' लेकिन इसी के साथ जल्दी से जोड़ देता है, ''लेकिन याँ तो सा'ब उलटे पैसे देते हैं न? मेरा बा'सा देता तो कुछ नईं- उलटे और सारे झपट लेता है।''
''क्या करता है पैसों का?''
''चिलम पफूँकता है सारे दिन। दम लगाता है और चंग बजाता है। 'चंग' आप समजते हो? जैसे शरगम पिक्चर में कपूर बजाता है न-डपफली बा((ले... उसी सरीखी होती हैं।''
''अरे, तू आँषि कपूर को जानता है?''
''क्यों नईं जानता? मैं तो अमिताच्चन, मिटठुन, जैकी सरापफ, जीतेंदर और शतरू को भी जानता हूँ।''
''वाह! अच्छा, होते कौन हैं ये सारे तेरे?'' मैंने मखौल की।
उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा- ''होते कौण हैं? आप नईं जाणते? हीरो होते हैं, हीरो- भौत बाँके हीरो। आपणे इनकी पिक्चरें नईं देखीं? शोले, शरगम, क्रिश्मा कुदरत का, खून- पसीना, खुद्दार- द्घणे नेक माणस होते हैं ये। भौत दम होता है इनको। जभी तो ये गद्दारों को इत्ती मार लगाते हैं।''
''अरे वाह! और गद्दार?''
''गद्दार भी नरे होते हैं- पिराण, पिरेम चोपड़ा, सकती कपूर और भी जने कित्ते। भौत खराब माणस होते हैं वो। बिलकुल मेरे बा'सा जैसे। आपने देखा नईं बिसवाली पिक्चर में पिराण को, जिसमें वो धोखे का साधू बणता है दाढ़ी और बाल यूँ बढ़ा के और आँखें चिलम के धुएँ में यूँ झपका के-बस वैसे ई दिखता है मेरा 'बा'सा' और बिसवाली पिक्चर में जब पिराण 'हिरोणी' को बाँध के टाँग देता है तो अमिाताच्चन और शतरू नरे गद्दारों को मार भगाते हैं। धरमिंदर और मिट्ठुन भी- द्घणे सूरमे हैं ये सारे- के- सारे। मेरा बा'सा और मनोज भाई सा'ब जैसे दसियों भी आ जाएँ जिनके सामने न, तो ये हुमक के ऐसी पटकनी देंगे कि पलटी खा के चित हो जाएँ। बोल नईं सकेगा मेरा बा'सा इनके सामने तो।''
चौंककर जैसे मैं खुद पलटी खा के जमीन पर आ गिरी, जैसे उसने मनोज से अपना बदला चुका लिया हो और अब आँखों से अंगार छिटकाता अपने बा'सा की तरपफ बढ़ रहा हो।
जल्दी से बीचोबीच कूदती हुई मैं कहती हूँ, ''अरे, रुक-रुक, तूने हीरोणी के बारे में तो बताया ही नहीं।''
जैसे कोई दैवी बला ही आकर बा'सा को उसके हाथों से बचा ले गई हो। एक प्रलय क्षण टल गया हो। ठंडा होता हुआ तटस्थ से स्वर में बोला, ''वो सब लुगाइयाँ होती हैं। पर उनमें भी कोई-कोई भौत शाणी, हुशियार होती हैं। आप चक्कू देख के डर जाओगे न, लेकिन वो चक्कू भी द्घोप करके चला देती हैं। अपने द्घाद्घरे में खोंस के रखती हैंऋ लेकिन अब भई हीरो की बराबरी वो थोड़ी कर सकती है... आपको मालूम है? अंधड़, पानी, जंगल, दरिया, चएँ कितने भी जोखम में गद्दारों के अड्डे हों, ये धावा बोल के उन्हें मार भगाते हैं और अपणे मुलुक की चौकसी भी कत्ते हैं।''
''किसने बताया तुझे यह?''
''लो, काण्या, भौंर्या, देसराज सभी कैते हैं।''
''बेवकूपफ हैं सब-के-सब! ये पिक्चरों के हीरो मुलुक थोड़ी चलाते हैं।''
''मालूम है,'' वो हार कहाँ मानता है- ''मुलुक तो इंद्रा गाँधी चलाती थी। वो ई मुलुक की राणी थीऋ लेकिन गद्दारों ने उसे गोली मार दी।''
और अब?
वह उसी रौ में- ''और उसके बेटे को हवाई जहाज से धक्का देके गिरा दिया गद्दारों ने।''
''कहाँ? उसका बेटा तो अभी आया था टी.वी. में, देखा नहीं तूने?'' मैंने जाँचना चाहा।
''आणे को तो इंद्रा गाँधी भी आती है टी.वी. में, पर वो कोई जिंदा थोड़ी ही हैं।''
''अरे...''
''जाणता हूँ मैं। आप ऐसा मत समझो, मैं ये बातें नईं जाणता। वो उसका दूसरा बेटा है जो मुलुक चला र्या है।''
बेल बजती है। वह कुलाँचें मारता हुआ दरवाजे तक दौड़ जाता है- दरवाजा खोलना अब उसे बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि बाहरी दुनिया से उसका वही एकमात्रा संपर्क का क्षण होता है। बाकी समय के लिए उसे बाहर जाने की सख्त मनाही है, तमाम-तमाम भयानक-से-भयानक द्घटनाओं और सिहरा देने वाली धमकियों के साथ। इसलिए वह बस दरवाजा खोलकर जल्दी से कुछ देर बाहर खड़े रहकर खुली, ताजा हवा को महसूसना सा चाहता है, अन्यथा हवा भी जैसे उसे सबसे बाद सबकी उतारी- पतारी बासी सी ही मिलती है। इसलिए जब तक बाहरवाला अंदर आता है, वह ढेर सारी ता८ाा हवा भर लेता है, तब तक अंदर से एक-दो बार टोका जा चुका होता है।
''दी ( दी (.. दीदी आ गई!'' वह किसी पिफल्मी गाने की धुन की तरह दो-तीन बार पफुदक-पफुदककर नाचता हुआ दुहराता है। मीता उसके सिर पर ठुनकी देती हुई मुसकराकर अपने कमरे में चली जाती है। वह मेरे पास आकर चहकते हुए कहता है, ''मैं दीदी के लिए रोटियाँ मणाऊँ? दीदी! आ, रोटी खा ले। इसका मतलब आप समजते हो? दीदी आ, खाना खा ले। हम खाने को 'रोटी खाना' कैते हैं। हमारे खाने में होती भी रोटियाँ-ही-रोटियाँ हैं। मिर्ची तो ऊपर से गेरते हैं। आप लोग बोलते हो, आओ चाय पी लोऋ लेकिन चाय के साथ तो बिस्कुट, केक, भुजिया सब होते हैं। हम बोलते हैं- रोटी खाणी है तो आ जा।'' वह हूबहू नकल उतारकर हँसता है।
''आज मैं सारी रोटियाँ मणाऊँगा, आप देखना अपणी भी, आपकी भी।''
रात उसने सचमुच खूब संभाल-संभालकर अच्छी रोटियाँ सेंकीं। पहली रोटी पफूलने के साथ ही चिमटा लेकर किचेन के बाहर जाकर चीखा-
''दी(दी! जल्दी आ, जल्दी! भौत जल्दी। मैंने अपणी माँ सरीखी रोटियाँ मणाई हैं। आ, नईं तो पिचक जाएँगी।''
मीता सचमुच स्टडी से निकलकर आई और उसके अधद्घुटे सिर पर धौल जमाती चली गई।
वह उस लाड़ से ढंपा एक-एक रोटी के गोल-गोल द्घूमने, सिंकने और पफूलने की रनिंग कमेंट्री देता रहा।
''पफूल गई, दीदी, ये पचिकीवाली भी कुप्पे की तरह... उर्रे, ये तो पेंडुकी की तरें लुढ़क ली। अबके इस्सवाली को भी कुप्पा मणाता हूँ... ढप्प से- ओ री-ओ, मेरी माँ! आके देख तो, मैंने लुगाइयों सरीखी कित्ती रोटियाँ सेंक धरी हैं! लेकिन मैं भी कित्ता बौड़ा हूँ... मेरी माँ ह्याँ आके देखेगी तो क्या मुझे रोटियाँ मणाने देगी! उर्रे, वो तो झप्प से मुझे चुल्हे के पास देखते ई चीमटा हाथों से ले उठा देगी- ओय लालो, तू परे हट चूल्हे के पास से- कईं जल-बर गया तो क्याँ जाऊँगी मैं। भूखा है न- जब्बी माँ के कने आया तो उधर परे बैठ। अब्भी रोटी देती तुझे... अपनी माँ की हूबहू तसवीर उतारने की कोशिश- वो उधर कोने की तरपफ है न हमारा चूल्हा तो वो रई मेरी माँ... और वो लाल कचरे का डिब्बा, तो समज लो चूल्हा। लप्प- लप्प निकलती आग और दप्प-दप्प सी चूल्हे के पास दपती माँ। अरे वा, सिंक गई रोटी- मेरी माँ के चूल्हेवाली। अब मैं, छोटी बाई, चंदण्या- सब टूट पड़ेंगे रोटियों पे कि बा'सा जोर से हाँक मारता है, माँ चीमटा छोड़ भागी-भागी जावेगी। उसकी चिलम में आग, टिक्की धर के उसे सांत कर देगी नईं तो वो कित्ता- कित्ता पफसाद मचा देगा, मालूम? उसकी आँखें भी लाल-लाल चिलम-सी भभकने लगेंगी और वो बवेला मचा देगा। अगल- बगलवालों का जमावड़ा हो जाएगा तो वो क्या अच्छा दीखेगा! नईं न! इसलिए माँ बा'सा के भभकते ही हम बालकों को समेटकर एक तरपफ हो जाती है।
''जब मैं आने को था तब भी मेरा बाप चिलम पीकर एक कोने में धुत्त पड़ा हुआ था। बुझी हुई चिलम की तरह ही। और मैं ठेकेदारनी के साथ इत्ती दूर आ गया, उसे क्या पता!''
''क्या आज मनोज भाई सा'ब की बरस-डे है? हाँ-हाँ, जाणता हूँ। मैंने नरी पिक्चरों में देखी हैं, बरस-डे मणती। जीतेंदर, मिट्ठुन और कई-कई हीरोणियों की भी। नाम याद नईं।''
सुबह से द्घंटी- पर-द्घंटी, पफोन- पर- पफोन और शाम को ढेर- के- ढेर यार, दोस्त, कजिंस और दोस्तों के दोस्त -मीट माई कजिन, मीट माई ेंड- लड़के- लड़कियों की मिली- जुली चीख- पुकार, हँसी ठहाके- अरे, कहाँ गया वो- दैट चैप- बुला न यार उसे! ओय, इधर तो आ तू- जिबह के बकरे की तरह गले में पड़ी रस्सी-सा खिंचता वह आ खड़ा होता है। हाँ, क्या बोलता है तू? हीरोणी? वाउ! अच्छा, तू खूब पिक्चर देखता है न- चल, जरा डांस कर तो। मिट्ठुन की तरह करेगा कि जीतेंदर की तरह। अरे, म्यूजिक लगा न, यार! टिनी डोंट बी पफनी... छोड़ भी एनपफ यार, छोड़ उसे- द्घुटे सिर पर हलकी सी चपत- इंटरेस्ंिटग यार! ॉम व्हेयर यू गॉट इट? ओ.के., जा। ठहर, ये गिलासें और प्लेटें लेता जा। ये ट्रे भी। समोसे और बेपफर्स भी ले आ। केक, पेस्ट्री, समोसे, बेपफर्स से लदी प्लेटें सज गईं। सब-के-सब टूटे पड़ रहे हैं, हो-हल्ला, शोर शराबे के साथ। बीचोबीच डोंगे-पर-डोंगे पहुँचाता और खाली प्लेटें समेटता वह। यहाँ से वहाँ एक पैर से दौड़ता। धीरे-धीरे थकता सा जाता। जैसे किसी को याद पड़ता है और मुसे, चूरे समोसे, बेपफर्स की प्लेट उसे थमा दी जाती है। उसके टूटे हैंडलवाले मग्गे में चाय भी।
चाय की हर द्घूंट उसके गले में बहुत देर तक अटक-अटककर हलक से उतरी है। वह वापस थके पैरों अपनी पीछे की बालकनी के उसी सूने कोने पर अकेला खड़ा है। सामने एक के बाद एक- दूसरे पर अंटे-से फ्रलैट और उनकी गोल-गोल सी खिड़कियाँ... उन खिड़कियों के पीछे से दिखते कटोरे भर समंदर में अपनी आँखें डुबो देता है।
पिफर समंदर सूख जाता है। अब सिपर्फ रेत-ही-रेत। यहाँ से वहाँ तूपफानों के अंधड़ उठाती, शिवाले से डुंगर तक, ढूह-की-ढूह बिछती चली जाती रेत और बीचोबीच भागता, छुपता तीतरों पर पफत्तर से निशाने साधता, कबूतरों पर गुलेलें सटकारता वह... लौटता है तो माँ रोज की तरह गालियाँ क्यों नहीं देती? उलटे उसके आगे रोटियाँ रखकर उड़ी-उड़ी आँखों से पूछती है, 'लालो तू बुम्बई द्घूमणे जाएगा?' 'हाँ-हाँ' वह उचककर नाच उठता है चंदण्या को अंगूठा दिखाकर, छोटी बाई के सामने हाथ चमकाकर।
लेकिन बाद में सचमुच अपने कपड़े रखे जाते देखकर सहम जाता है। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था। यह सब तो बस हँसने-चिढ़ाने की बातें थीं। इस तरह सलूके सहेजकर तो कभी नहीं रखे गए। बहुत हुआ तो डुंगर पार मामे के द्घर। और ये एक जोड़ी नई भूरी जर्सी और पैंट।
उसके हाथ की गुलेल निढाल सी छूटकर गिर गई थी। मन की हदस छुपाता माँ से पूछा था।
माँ ने पनियाई आँखें छुपाकर कहा था, 'जा, बुम्बई सैर द्घूम आ, ठेकेदारनी के साथ।'
अनजाने हदसकर माँ की कलाई पकड़ ली थी, 'और तू! तू भी चलेगी क्या द्घूमणे?'
'मैं? मैं क्यों चलूँगी? तेरी छोटी बाई को कौन देखेगा?'
'मैं... मैं देखूँगा न!'
'न- अबी सिरपफ तू जाएगा द्घूमणे।'
'इकला?'
'न, ठेकेदारनी के साथ उसकी भेंण के द्घर के भौत मालदार लोग हैं। तुझे द्घणा अच्छा खिलाएँगे, पहराएँगे। और बुम्मई द्घुमाएँगे। याँ तो रूखी रोटी-मिर्ची...'
वह कुछ नहीं सुन रहा था। पूरी देह में एक सनसनी सी उतर रही थी। माँ के पास हिरककर बोला, 'झूठ बोलती है तू- मुझे चाकरी करने भेज रही है।'
माँ की आँखों में उड़ती हुई रेत को सोख ले, ऐसा एक समंदर उमड़ा था। वह ओट हो ली।
स्टेशन तक कमली आई थी। माँ के दिए पराँठे और दाल-चिक्की लेकर और ढेर-ढेर सी सीखें देकर समझाती-बुझाती रही। ठेकेदारनी ने रेवड़ियाँ और अमरूद खरीद दिए। गाड़ी बहुत तेज सीटी मारकर पफुपफकारी थी। वह एक बार चिहुँका, पिफर वैसा ही हकबका बैठा रहा। कुछ सोचने-समझने से परे माँ के पराँठो की पोटली दोनों हाथों में थामे, कस कर।
ट्रेन धड़धड़ाती भागती रही। वह वैसा ही गुमसुम बैठा रहा। सिपर्फ जब किसी स्टेशन पर रुकने के बाद चलने से पहले गाड़ी जोर की सीटी मारती तो वह चिहुँक जाता। लगता जैसे इसी गाड़ी के आगे-पीछे माँ उसका नाम पुकारती बदहवास भागी आ रही है।
अब वह गाड़ी से उतर भी आया और यहाँ है। लेकिन माँ को क्या मालूम, वह शायद उसी गाड़ी के पीछे भागी जा रही होगी- पफटे आँचल के पाल संभाले, डगमगाती हुई डोंगी-सी माँ!
अंधेरा द्घिर आया है- द्घिर आया होगा झोंपड़े में भी उसके। कालिख उगलती ढिबरी धुंधुआने लगी होगी। बा'सा पिफर हुँकारा होगा। अच्छा, अगर बा'सा इत्ती चिलमें नईं पफँूकता होता तो माँ उसे इत्ती-इत्ती दूर अकेले नईं भेजती न!
रुँधी-रुँधी साँसों में माँ पिफर सिसकी क्या? कटोरे भर समंदर आँखों में डबडबा आया था चारों ओर से- उसमें माँ की आँखें पिफर डोंगियों-सी उतराने लगी थीं।
काए को भेजा? काए को? कित्ती-कित्ती दूर? जैसे माँ कलेजे का पूरा लहू निचोड़े दे रही है, हिलक हिलक के-हाँ, काए को भेजा? डुंगर से पोखर तक छलाँगें लगाता, यहाँ से वहाँ बगीचियों में अमरूद, बेर और कच्ची कैरियाँ तोड़ता, रुक्ख-भुक्ख धूल सने बालोंवाले देव्या को, कलामंडियाँ खा-खा के राहगीरों से पैसे उगाह के उसे भी तो देता था। खरबूजे और ककड़ियाँ भी तो... जो लदी ट्रकों से गिराकर द्घर ले भागता था- तू तो सिरपफ पफुसलाने-धमकाने के लिए कहती थी न, पिफर सचमुच भेज कैसे दिया, बोल?
''अरे, तू यहाँ इस अंधेरे में क्या कर रहा है?''
वह तब तक खड़े-खड़े थक वहीं कोने में टिका सा बैठ गया, अंदर कुछ सहम सा भी गया। उस शोर-शराबे से अलग वह कब का यहाँ अकेले चुपचाप बैठा है, ''इधर आ, बाहर, रोशनी में। बाहर बालकनी में तो अंधेरा है।''
''बता, क्या बात है?''
वह वैसा ही खाली-खाली आँखें लिये खड़ा रहा, पिफर एकदम बोला- जाँचता सा- ''आप मुझे मेरे द्घर वापस भेज दोगे न?''
''ले, ये भी कोई पूछने की बात है। मैंने तो तुमसे पहले ही कहा न, जैसे ही कोई तेरी तरपफ जाने वाला मिलेगा न, मैं तुझे उसके साथ कर दूँगी। मैंने ठेकेदारनी से भी कह रखा है, लेकिन कोई मिले तब तो।''
''अच्छा,'' वह पिफर रुकता है, ''लेकिन मेरे किराए के पैसे?''
''मैं...मैं दूँगी न।''
''हाँ, बस किराए के, और कोई पैसे मैं आपसे नईं लूँगा।''
''वाह! क्यों नहीं लेगा?'' मैं हँसी, ''और जो तेरी माँ वहाँ पूछेगी?''
''नहीं।'' मेरी बात अधूरे ही काटकर सधी आवाज में बोला, ''मेरी माँ पैसों के लिए नईं पूछेंगी।''
''पिफर भी, हम तुमसे मुफ्रत में काम थोड़ी करवाएँगे। और अब तो तू काम भी सीख गया है।'' मैंने अपनी तरपफ से तारीपफ की।
''तो भी मैं अपणी राजी ;खुशीद्ध से काम करूँगा। पैसे नईं लूँगा काम के- नौकरी के।''
''ऐं!'' चौंककर रुक गई, ''ओह! तो यह बात है! अरे, नौकरी की, काम की बात कौन करता है? हम तुझे नौकर मानते ही नहींऋ पर मदद तो करता है न तू हमारी इतनी।''
वह थोड़ी देर रुकता है- ''हाँ, तो मदद की मैं मने नहीं कर रहा, लेकिन बे-पैसे की मदद करूँगा।''
जैसे दिमाग में कोई पवन चक्की-सी चल रही हो। लेकिन उसके या मेरे? ...अंधाधुंध अंधड़ -छोड़ो भी, इससे इस वक्त पफरियाना ठीक नहीं- जो बोले, हाँ कर दो। कर दी। वह तब तक भी वैसा ही खड़ा रहा, जैसे किसी बात पे बात बिठाता सा द्घनद्घोर उधेड़बुन के बीच सही-की-सही, गलत-की-गलत बिठाता सा। पिफर जैसे कृतसंकल्प-
''अच्छा!'' चुप्पी टूटी, किसी अतल गहराई से आवाज आई, ''अगर मैं आपसे काम के कोई पैसे नहीं लूँगा तब तो और तरै से रहूँगा न?''
''मतलब?'' मैं चौंकी।
''अपणी मरजी से उठ-बैठ सकूँगा- किसी की धौंस पर नईं।''
तत्क्षण बिजली-सी कौंधी। विस्मित, अवाक् रह गई।
''ओह! तू मनोज के झिड़कने की बात कर रहा है न। वह तो तूने देखा नहीं, दीदी को भी कितना चिढ़ाता-तंग करता है।''
''नईं,'' उसकी सधी आवाज- ''वो और बात है।''
''अच्छा, ठीक है, मैं आज ही मनोज को समझा दूँगी। तू पैर अच्छी तरह सापफ कर कारपेट पर कलामंडियाँ खा लिया कर-बस।''
उसकी आँखों से लगा, मैंने उसकी बहुत नाजुक, सूक्ष्म सी बात को निहायत भोथरा बना दिया हो।
एकदम तिलमिलाकर बोला, ''नईं, आप मनोज भ्ााई सा'ब से कुछ मत कहना। मैं कलामंडियों की बात थोड़ी कर रहा हूँ।''
''पिफर तू चाहता क्या है?''
वह पिफक् से हँसा- एक उदास मारक हँसी, अंदर तक बेधती हुई- ''चाहने से क्या होता है, भई! चाहने से मैं कोई आपके द्घर का थोड़ी बण सकता हूँ।''
''वाह! क्यों नहीं?'' मैं अपनी हकलाहट पर काबू पाती जल्दी से बोली, ''मैं तो तुझे द्घर का ही समझती हूँ।''
''ओय-ओय!'' वह खुलखुलाकर हँसा- भाषा उसकी, आवाज उसकी आत्मा की-'' द्घर का समजते हो? ये आप सच बोल रहे हो क्या? आप गुस्सा नईं होना, मैं तो आपको समजाने के लिए कै र्या हूँ- द्घर का हूँ तो पिफर मैं अलग 'कीचण' में, उस टूटे मग्गे में चाय क्यों पीता हूँ? अब आप बोलो तो!''
विद्रूप इतना निश्छल भी हो सकता है! बोल क्या सकती थी मैं! सिपर्फ उठीऋ जैसे किसी ललकार पर और किचेन में उसका मग बदलकर नया रखती हुई एक हठवादी लहजे में बोली, ''ये ले, और आज से तू हमारे साथ चाय पीना!''
कहने को तो कह गई एक झोंके में, लेकिन कहने के तुरंत बाद से एक सिहरन डाँवाँडोल करने लगी ऊपर से नीचे तक। जैसे महान् बनने का, दिखने का ढोंग भी इतना आसान नहीं।
और वह ठीक सामने खड़ा विस्मित अविश्वास के बीच मानो कह रहा था- सिपर्फ टूटे मग्गे को साबुत मग्गे में बदल देने मात्रा से कोई द्घर का हो सकता क्या?
लेकिन पिफर भी एक साबुत मग के साथ जुड़ जाना एक नया दर्जा पा लेने जैसा तो था ही। रह-रहकर एक उछाह आता और विलीन होता उसके चेहरे से। वह विस्मित अविश्वास अभी तक मौजूद था वहीं-का-वहीं लगातार अपने आपसे पूछता हुआ-इनकी बात पर कितना विश्वास किया जाए, कितना नहीं।
शायद उसकी वह मुखमुद्रा ही मेरे लिए चुनौती बन गई थी। यह चुनौती मुझपर लगातार हावी रही और शाम की चाय पर मैं सारी उद्विग्नता और अस्थिरता पर मुस्तैदी से काबू पाती एकाएक जोर से ऐलान कर गई-
''देबू! तू भी अपनी चाय यहीं लेकर आ- हमारे साथ पी।''
झन्न्... जैसे कोई काँसे का बरतन जमीन पर गिरकर बड़ी देर तक सन्नाटे से झन्नाता रहा हो। तीनों चेहरे सन्नाटे में खिंचे बैठे रहे। थोड़ी हैरत, थोड़ी खीझऋ लेकिन जब 'पिता' ने अपने मनोभाव जब्त कर लिए तो बच्चे भी चुप। या उनके पास सिवा इसके और कोई चारा भी न था।
वह हाथों में ट्रे पकड़े दाखिल हुआ। पहली बार, झुकी आँखों से हठवादिता के बदले कृतज्ञ उत्पफुल्लता- पूरी जिम्मेदारी और मनोयोग से ट्रे से निकाल-निकालकर हमारे सामने प्लेटें, प्याले सजाने लगा। मैंने हैरत से देखा, प्याले और नाश्ते की प्लेटें सिपर्फ हमारे जितनी लाया था। वापस वही सस्पेंस- कि वह अंदर गया तथा अपने नए मग में चाय और नाश्ता लिए लौट आया। चारों तरपफ की रुकी हुई साँसों के बीच, खुद भी एक क्षण की दुविध में सोचा और तुरंत निर्णय लेकर कोनेवाले स्टूल पर बैठ गया एक भोली, तृप्त मुसकान के साथऋ जैसे कह रहा हो-देखो, उतना बौड़ा नहीं हूँ-तुमने मुझे जो दर्जा दिया, उसका सही इस्तेमाल जानता हूँ।
मेरी ही नहीं, बाकी तीनों की भी रुकी हुई साँसें जैसे चालू हो गईं। गृहस्वामी उसकी इस समझदारी से ज्यादा ही अभिभूत हुए। उससे दो-चार बातें भी कीं और मुसकराकर 'शाब्बास' कहते हुए उठ गए।
मनोज सेमेस्टर के द्घटाटोप से निपटने स्टडी में। मीता मुझसे कॉलेज इलेक्शन की हंगामे भरी वारदातें बताने लगी और वह-
अभी तक 'सा'ब' के उठ जाने के बाद भी उनकी खाली कुरसी की ओर सम्मोहित दृष्टि से टकटकी बाँध्े ताके जा रहा था। पकड़ में आने पर भी मलाल नहीं, उसी सम्मोहन में रचा-पगा सा-
''सा'ब कितने अच्छे हैं न! जब वो मुझे शब्बास कै के नैक सा हँस दिए थे तो कित्ते अच्छे दीख रहे थे, आपणे देखा?''
हाँ, मैंने देखा। और भी बहुत कुछ। उसकी आँखों में झूलते ढेर सारे अबोध् सपनों को, जो क्षण भर में उछाह भरी पेंगों के साथ ऊपर उठते ओर दूसरे क्षण कचोट ओर हूक के साथ हलकोरते हुए नीचे आ जाते। एक झोंके में ऊपर उठती और दूसरे में नीचे। पेंगे दोनों खतरनाक थीं।
मैं उसे झूले से नीचे उतारती हुई बोली, ''हाँ-हाँ, अभी अच्छे लग रहे हैं न सा'ब तुझे, लेकिन जब गुस्से में होते हैं न तो मीता, मनोज किसी की हिम्मत नहीं पड़ती उनके सामने जाने की।''
''हो.....हो.....उसे आप गुस्से होना कैते हो, वो तो कुछ भी नहींऋ मेरे बा'सा को गुस्से में ध्ुँध्ुआते हुए देखो आप, तब समजोगे-कैसा-कैसा तैस-नैस करता है वो.....कित्ता चीखता-चिल्लाता है! कमली डर के मारे कोने मे छुप जाती है और मेरी माँ हम तीनों को समेटकर दुबक जाती है थर-थर काँपती हुई। अब सिरपफ चंदण्या और छोटी बाई को लेकर दुबकती होगी मेरी माँ.....अब मैं तो इत्ती दूर हूँ- मेरा कुछ नई कर सकता मेरा बासा।''
वाह! मस्तिष्क में जैसे कोई विजय-दुंदुभी सी बजी। मेरी दूरदृष्टि ने आखिर कीर्तिमान स्थापित कर ही लिया। वह रम रहा है इस द्घर की सुख-सुविधओं के बीच। सपफल हो चुका मेरा अभियान।.......
नहा-धेकर बाल सँवार, हथेली पर लगे हुए तेल से हाथ-पैर 'चिकणे' कर वह मेरे ड्रेसिंग टेबल के शीशे में अपने को पूरा निहारकर मटियाले तीतर-सा ही नाच उठता है-''हो-हो-हो! मैं कित्ता-कित्ता चीकणा हो गया, दीदी! कित्ता चिट्टा दीखने लग गिया हूँ। अब जो मैं गाम गया तो काण्या, नाट्या और पफत्ते कोई नईं पैचान पाएँगे मुझे-इत्ता समज लो।''
''हुर्रे! आज तो सा'ब ;टूर सेद्ध वापस आने वाले हैं न जाणता हूँ मैं, दीदीऋ मंतर से नईं, ईलम के जोर से- नईं सच्चम-सच आपकी मम्मी बोलती थीं। मैं तो आज सा'ब के टेबल खूब चीकणी पोंछूँगा और उनके सारे जूतों में पोलिश मारके यूँ चमकाऊँगा। जब सा'ब आके देखेंगे तो कैसे हँसके कहेंगे, 'शाब्बाश!' '' और कमेंट्री के साथ-साथ गाना भी-''ओह हो-आज तो सा'ब आएँगे, मेरे लिए चिज्जी लाएँगे!''
सुनते ही मैं चौंककर किचेन से बाहर निकल आई- ''देबू! सा'ब बाहर जरूरी मीटिंगों में जाते हैं। उन्हें किसी के लिए कुछ खरीदने, लाने का टाइम नहीं होता, समझा!''
''समजता हूँ मैं, सब समजता हूँ। पर आप देखणा, जब दीदी और मनोज भाई सा'ब की लिस्टवाली चीजें लाएँगे तो मेरे लिए भी कुछ-न-कुछ जरूर लाएँगे वो-आप देख लेना। सा'ब मुझे द्घणा प्यार कत्ते हैं।''
सकते में आ गई मैं यह उन्मुक्त उछाह और विश्वास देखकर। अब? अस्थिरता ने तब तक चैन नहीं लेने दिया जब तक सा'ब के आने के साथ ही मैंने चुपके से मँगाकर रखा हुआ पैकेट उनके हाथों में थमाकर इशारा नहीं कर दिया। मेरी ओर हैरानी से देखते हुए उन्होंने पैकेट उसे बुलाकर थमा दिया।
रंग-बिरंगी चमचमाती टॉपिफयोंवाला पैकेट थामते हुए निमौड़ियों-सी आँखों में पफुलझड़ियाँ-सी छूट गईं। हर कमरे में हर को दिखाकर नाचता पिफरा-''देख-देख, मैं न कैता था-सा'ब लाएँगे। जरूर से लाएँगे दीदी, लो, ये तुम्हारी, ये मनोज भाई सा'ब की - और ये आपकी मम्मी की।''
'' 'आपकी मम्मी' क्या मतलब? सिपर्फ मम्मी कहना तुझे अच्छा नईं लगता?''
''अच्छा तो लगता है, लेकिन कैने से वो मेरी मम्मी थोड़ी हो जाएँगी, भई। मेरी मम्मी तो बहुत दूर है डुंगर पार-गंदी-पफंदी, लुगड़ी-पफगड़ी समेटती, काट्या, नाँद्या और पफत्तेराम को बुला-बुलाकर पूछती होगी, कैसे? बताऊँ?- ओय नाँद्या। मेरे लाला को देखी क्या?......हमारे में ऐसे ई बोलते हैं......हुर्रे, होय-मैं चंदण्या और अपणी छोटी बाई का हिस्सा रखना तो भूली गया।'' यादों से सिंझी, अंदर पसरती जाती उदासी का बँटवारा भी जैसे साथ-साथ होता चलता।
लेकिन दूसरी तरपफ द्घर का हर व्यक्ति मेरी इस पफँसी हुई स्थिति का जायजा ले रहा था। दृष्टियों में उभरा विदू्रप और होंठों के कोनों में उतर आई हँसी मुझसे अकसर पूछती।
अब? इसके बाद?
क्या होगा इसका अंत?
कितनी छूट और मिलेगी उसे?
लेकिन सारी आशंकाएँ अर्थहीन निकलीं। उलटे एक बेहतर तब्दीली हर समय की उठा-पटक और कलामंडी पर और ज्यादा अंकुश वह खुद-ब-खुद लगाने लगा, अपने पद की गरिमा निबाहता सा। कभी-कभी भूल-भाल कर दो-चार छलाँगें लगा भी लेता तो बाद में खुद ही शरमा लेता। बाकी समय मुस्तैद उतना नहीं, पर पफुरतीला। और सा'ब के सामने तो जिस तरह खुशी से गमकते हुए प्लेटें, डोंगे सजाता, पफूली नरम चपातियाँ परोसता, देखने ही बनताऋ जैसे किसी दिव्य, अनिर्वचनीय सुख की अनुभूति हो रही है उसे।
कभी कुछ उल्टा-सीध भी हो जाता तो मेरी डाँट ;सिपर्फ मेरीद्धसिर झुकाकर सुन लेता। और बाद में मुझे खुश करने के लिए बालों में खूब सारा तेल चिपोड़, सँवारकर मुसकराता हुआ सामने आ खड़ा होता कि देखो, सापफ-सुथरा दीखता हूँ न? तुम्हारा कहा मानता हूँ?
मतलब अब पूरी तरह मेरे जादुई करिश्मे की गिरफ्रत में!
परेशानी सिपर्फ एक। लेकिन खासी विकट। काम निपटा चुकने के बाद अपने बचे हुए खाली समय में वह हर कहीं मेरे पीछे-पीछे दुमछल्ले-सा उचकता पिफरता। सिपर्फ वही नहीं, उसके साथ-साथ उन्हीं सवालों और दलीलों के बेहिसाब सिलसिले भी-
''आप मेरे हिस्से का मतीरा भी दीदी को दे देना, हम तो भौतेरा मतीरा खाते हैं अपणे नाम में।''
'' 'मतीरा'! मतीरा क्या होता है?'
''आप मतीरे को क्या कहते हैं?''
''ब(ूु! मुझे क्या मालूम, तू मतीरा किसे कहता है!''
'' वो ई जो वड्डा हरा, लाल और अंदर काले-काले बीज.......''
''ओह, तरबूज। क्यों, तू क्यों नहीं खाएगा?''
''अरे, हमने तो खूब खाए हैं- ये बड़े-बड़े, नेहर पार से उठा लाते थे हम सब छुपके-छुपके। काण्या चक्कू मार के निकालता और जब तक चौकीदार भँवराजी संटी पफटकारता दौड़ता, हम खिलखिलाते उसे अँगूठा दिखाते ले भागते और पल्ली की तरपफ के चौगान पे पफोड़-पफाड़ खूब खाते इत्ता-इत्ता।''
''मतलब चोरी?''
''चोरी कैसे?'' आपे से उखड़ गया वह, ''हम कोई चुरा के थोड़ी लाते हैं-हम तो उसकी आँखों के सामणे उठा के भागते हैं और वो कोई उसकी चीज होती है! बड़े ठेकेदारों की होती है और वो तो इत्ता दान-ध्रम कत्ते हैं तो एक-दो मतीरों से उनका क्या बिगड़ जाएगा? और चोरी मानो तो असल में वो चौकीदार खुद्दी करता है, दस-दस मतीरों की! आप क्या जानो, सारे चौकीदार कत्ते हैं। बड्डे चोर हैं वो।''
''नहीं! ये भी चोरी है।''
''कैसे चोरी है? '' वह अपमानित सा बहस पर अड़ जाता,''सच्ची पूछो तो मतीरे ना चौकीदार के हैं ना ठेकेदार के! वो मतीरे बणा सकते हैं क्या? बोलो तो!''
''बिल्कुल, वे ही तो मेहनत करके उगाते हैं।''
'' हाँ-हाँ, जरूर वे उगाते हैं! अच्छा, अगर भगवान् उन्हें बीज न दे तो वे चएँ कित्ती-कित्ती मेहनत करें, मतीरे या खरबूजे, खीरे कुछ भी उगा सकते हैं क्या? जंगल में इत्ते-इत्ते खट्टे-मीठे कंद-मूल उगते हैं तो उन्हें कौन उगाता है? भगवान् ही तो! भगवान् ने ही तो जैसे सूरज-चाँद बनाए, मिनख-जानवर बनाए वैसे ही सब बनाए, तो हम भगवान् की चीज खाते हैं.....और.....और भूख लगने पर खाते हैं।''
''माँग के, खरीद के लो।''
'' वाह वा, आप क्या समजते हो, माँगने से हमें मिल जाएँगे? माँगने से तो वो हमपे संटी पफटकार के चढ़ बैठेगा-और पैसे क्याँ हैं हमारे पास? हमारे माँ-बापों के पास नहीं तो हमारे पास क्याँ से आएँ? और भूख लगने पर तो अपना दाना-चुग्गा पक्शी और जिनावार भी जुटाते हैं-नईं? तो वो क्या चोरी कत्ते हैं?''
उसकी ऐसी ही बहसों से चित होने के डर से बहला-पफुसलाकर कुछ रंगीन पेंसिलें और कागज थमाकर बिठा दिया जाता है उसे बालकनी के कोने में। वह उन कागजों पर ढोर-डंगर, कुआँ-बावड़ी, मिट्ठू, तीतर उकेरता रहता है। इन सबके अतिरिक्त सारे कागजों पर एक चित्रा उभयनिष्ठ होता। एक गोल, लंबोतरा चेहरा, बड़ी-बड़ी कौड़ाई आँखें और हरी-लाल लाइनें खींच-खींचकर उकेरी लूगड़ी। हाथों में बड़े-बड़े चूड़े। यही चेहरा वह हर कागज पर कहीं-न-कहीं उकेरता-माँ-माँ-और माँ......
इस माँ की जैसी शक्ल उससे बनती, उस पर वह खुद ही खुलखुलाकर देर तक हँसता रहता।
और यही सिलसिला अब तक बरकरार था। बड़ी मुश्किल से इतना सुधर हो पाया था कि अब एक-दो पेज आड़ी-तिरछी गिनतियों से भरकर तब 'पक्शी', ढोर और 'माँ' उकेरना शुरू करता। ये अमरूदों पे मिट्ठू बैठाऋ ठैर तेरी ठोर और लाल कद्दूँ। ये शिवाले पै मल्लू-खों-खों-क्या कान खुजाएगा? ले खुजा, हाथ ऊपर सिर तक खँचा दिए गए। ये माँ चूल्हे में मुँह झोंक रई। ये चूल्हा, ये लाल-लाल जलती लकड़ियाँ, ध्ुआँ, धुंध और अंत में थककर वापस मेरे पास हिरक आता। मैं उसके देखते ही परेशान हो जाती।
''अरे, लिख चुका? देखँू तो? शाब्बाश! जा, एक पेज और-आज डुंगर तो बनाया ही नहीं।''
वह उदास वापस चला जाता। और दूसरी-तीसरी बार बेमन से खिंच-खांचाकर पिफर से हाजिर हो जाता। मैं दुबारा परेशान हो सामने पफैले कागजों को देखती और जल्दी-से -जल्दी उसे रपफा-दपफा करने का उपाय सोचने लगती-
''छिह! इतना गंदा इस बार। अच्छा जा, एक और झेडेवाला शिवाला, एक और मिट्ठू, एक और माँ तो बना के ला।''
वह जाकर मिनटों में पिफर वापस।
''ओह....अरे, कोटर की मैना नहीं बनाई आज?''
''बनाई न-जे क्या बैठी।''
''और माँ का चूल्हा?''
''रोटी मणा के खिला चुकी माँ सबको।'' खुलखुल हँसी।
''और सिर पे द्घड़ा रख बावड़ी जाती माँ।''
''आज माँ थक गई, नईं जाती बावड़ी।''
''लेकिन शिवाले के झंडे में गोटे-किनारी कुछ नईं।''
उसने मेरी आँखों में सीध्म-सीध् पैठकर पूछा, ''आप मुझे पफुसला रै हो न, नन्हे बालकों की तरह!''
गुबरैले चेहरे की मुसकान में एक भोला रहस्योद्द्घाटन। हाँ, यह ठीक रहा जो उसने खुद ही समझ लियाऋ अब उसे सीध्े-सीध्े बताकर हटाया जा सकता है-
''क्या करूँ, देख, मुझे इतना पढ़ना-लिखना रहता है और तू बीच-बीच में तंग करता है।''
''जे आप दिन भर क्या लिखते-बाँचते रैते हो?''
''कैसे बताऊँ? तू पढ़ता-लिखता होता तो न समझता।''
''आप बताओ तो सई, पिफर मैं आपको तंग नईं किया करूँगा।''
सूझ कौंध्ी। ठीक तो। लगे हाथों इसे क्यों न कुछ अत्यावश्यक और उपयोगी डोजेज दे दी जाएँ। नीति, ज्ञान, आधार, विचार और चिंतनहीन इस अज्ञानी के दिमाग में ज्ञान की तेज रोशनी पफैलाई जाए। ;विद्वत्ता का सिक्का, महानता का डंका!द्ध
''अच्छा तो सुन, मैं लिखती-बाँचती रहती हूँ कि चाहे कुछ हो जाए, पर इनसान को झूठ कभी नहीं बोलना चाहिए और न छुपा के कोई कामऋ क्योंकि भगवान् ऊपर से बराबर देखता रहता है, और सबसे बड़ा पाप!''
''हो-हो-हो-हो!'' खलबलाकर हँसा वह।
मैं विस्मित!
''बस्स! ये ई बातें? ये तो हमारा हीरालाल भी बाँच लेता है। ये सब लिखने-बाँचने में क्या बड़ा रखा है, पिफर तो आप पफोकट मे पैसा ध्रा लेते हो किताबवालों से।''
औंध्े मुँह गिरी मैं। पर सँभलकर उठी जैसे ध्ूल झाड़ते-झाड़ते।
''मतलब, हीरालाल पढ़ता-बाँचता है न?''
'' हुर्रे, उसका बाप तो उसे सरू से कान खैंच के डुंगरवाले इस्कूल पे बिठा के आता है और शाम के बखत अपणी दुकान की गद्दी पे भी बिठाता है।''
''तो देख, एक वो भी तो लड़का है- पढ़-लिखकर होशियार हो जाएगा वो जल्दी ही।''
'' तो कोई अपने कने होशियार हो जाएगा? उसके बाप को देखा आपणे? द्घणा नेक माणस है। मारता है तो क्या, बूट्टे और सलूके भी तो खरीदता है। हाट-मेले से मलाई-बरपफ और रेंगनेवाला स्याँप भी। मेरे बा'सा जैसा......''
''लेकिन तू यह क्यों नहीं समझता कि स्कूल जाएगा तो भला तेरा ही होगा, पढ़-लिखकर दुनिया-जहान की अच्छी-अच्छी बातें सीखेगा।''
हुँकारकर उठता है वह मुझे बीच में टोककर,''क्या कई आपने? अच्छी-अच्छी बातें? वो इस्कूल का बाहिरा मास्टर सिखाएगा मुझे? जरूर! उसे खुद की अक्ल तो है नहीं इत्ती सी भी, वह मुझे क्या सिखाएगा! अक्ल होती तो क्या वो मुझे अपने लात से पटकनी देकर मेरे कान की नसें इत्ती जोर से चिटकाता! बोलो तो! ये मास्टर का काम है कि कसाई का? नन्हे बालक, छोरों को ऐसा करना चाहिए क्या मास्टर को? यूँ ध्क्का, नईं जी, पटका था मुझे यूँ किलास के बाहेर पफत्तर पे, और कान सिरपफ उमेठे नईं थे- यूँ पटपटा दी थीं दोनों कानों की नसें। और मैं 'पफाट' ;पाठद्ध याद नईं कर पाया तो क्या इसमें मेरी गलती थी?...... अब आप अगर मनोज भाई सा'ब को डेढ़ कोस दूर गाँजा लाने को भेजेंगे तो क्या वो थक नईं जाएँगे?....और जो मैं अपणे बाप को चरश-गाँजा लाने के वास्ते 'मणे' करता तो वाई मुझे जिंदा छोड़ता क्या? आप कुछ नईं जानते! वो मुझे वो ई पटक के पफट्टे से ध्ुन डालता-क्या समजोगे आप! कुछ नईं!
''और हीरालाल का बाप दम भी नईं लगाता और डुंगरवाले मास्टर को इस्कूल में जिंस मसाले भी मुफ्रत पोंचाता है-तो हीरालाल को मास्टर क्यों मारेगा, भाई?
''और जो आप बोलते हो न कि पढ़-लिख के अक्ल बढ़ती तो कुच्छ नईं बढ़ती। बढ़ती होती तो शिवाले की बावड़ी पे डोलता आदमी अपना बटुआ गिर जाने पे बिगर पूछे यूँ ही मुझे दबोच के थप्पड़-पे-थप्पड़, द्घूँसे-पे-द्घूँसा जड़ने लगता? कि निकाल मेरा बटुआ, और जो मैंने कई मैं क्या जानूँ, भाई तो और दो द्घूँसे मेरी नाक पे...... और जाणते हो आप, वई नैंक सी दूरी पै उसका बटुआ पड़ा मिल गया तो भूसे-सा मुँह बना के टुच्च करके डरता-डरता खिसक लिया। आप क्या समजते हो- मैं डुंगरवाले मास्टर और उस मिलख के बच्चे को एक मिलट में हचक के बावड़ी में द्घोप सकता था, एकदम शतरू की तरह- भौत दम है मेरे मेंऋ लेकिन मेरी माँ आ गई थी न। उसने कया- लालो, तू पीछे जा। और भौत लड़ी उस आदमी से और डुंगरवाले मास्टर से भी मेरी माँ।''
पिफर से वही माँ- वही लूगड़ी, द्घाद्घरेवाली, सारा अग-जग समेटती माँ- चली आ रही है, इंद्र के सिंहासन सहित। सारा ब्रह्मांड डाँवाडोल हो रहा है और मेरे अंदर अनजाने ईर्ष्या की तीखी धर भी उठती है-अपनी इस प्रतिद्वंद्विनी के प्रति-हाँ, अनायास कब हो आई मेरी प्रतिद्वंद्विनी वह!
सबकुछ मेरी दूरदृष्टि ने संभव बना दिया है, सिपर्फ इस माँ से नहीं निपट पाई। हर्ज क्या है? अब जरा सापफ-सापफ बात करके देखा जाए-
''सुन! तुझे यहाँ बिलकुल अच्छा नहीं लगता?''
''नईं, वो बात नईं'' वह थोड़ा झिझकता है-''मुझे अच्छा तो लगता है, पर अपणे द्घर की याद आती है, सब समय।''
''और जब तू यहाँ से जाएगा तो यहाँ की याद भी आएगी क्या?''
''हाँ, आएगी, भौत आएगी-आपकी, दीदी की, सा'ब की।'' रुककर-''सबकी..... सच्च-मुच्च बोलूँ तो मैं अब याँ भी रैना चाहता हूँ और अपणे द्घर भीऋ पर ये तो कैसे हो सकता है न!''
हो सकता है..... हो सकता है..... एक दूसरी ही अदृश्य दुंदुभी बज रही थी मेरे कानों मेंऋ देखा! तुमने असंभव को संभव कर दिखाया। अब तो वह करीब-करीब पूरा ही इस सम्मोहन में बँध् चुका है। द्वंद्व की रस्साकशी में विजय तुम्हारे हाथ है।
मन लग गया है तभी तो काम भी ठीक-ठीक समय पर करने लगा है। अच्छी सुस्वादु चीजों का लालची नहीं, पर शौकीन तो हो ही चला है। बेहतर जीवन की लालसा और महत्वाकांक्षाएँ अब उसे यहाँ से हटने नहीं देंगी। उस चीख-पुकार, अभाव, लथाड़ों और नशे से पफुँकती आँखों के प्रति वितृष्णा और विद्रोह तो पहले से ही था, अब तक उदासीनता और विराग भी पनप रहा है।
सो बस थोड़ी सी सूझ-बूझ और चतुराई और कुछ खास नहीं। जरा दिन में एक-दो बार पुचकार के दो-तीन रुके-पड़े काम भी करवा लिये। प्यास, भूख की टोह ले ली। 'थक गया हो तो रहने दो।' जाकर पक्शी, डुंगर बनाने की रिआयत दे दी। बस जरा सी चतुराई और समझदारी से एक बड़ी समस्या का समाधन हो गया है। बाकी समस्याओं से मेरा सरोकार नहीं, वह जाने और उसका काम। जब पुराने कपड़ों के गट्ठर, स्टोर का जंक निकलता है, वह हुलस-हुलसकर उनमें से जरी लगी ॉकें, दीपक खाए कोट और प्लास्टिक के अध्टूटे रंग-बिरंगे खिलौने बटोरने लगता है कि ये चाण्या के लिए, ये छोटी बाई के लिए-इन्हें देखकर वो भोत राजी होएगी। बच्चों की पुरानी पड़ी किताबों से काट-काटकर रखी मिट्ठू, बंदर, चीते, भालू की तसवीर भी।
मैं निश्ंिचत हूँ, मन लग गया है इसका। अब बीच की दोपहर, अपनी जरूरत पड़ने के लिए बाहर भी भेज देती हूँ कि द्घंटे-आध् द्घंटे अपनी बिल्ंिडग के आस-पास चक्कर काटकर लौट आया करे। वह लौट भी आता है, क्योंकि अकेले-अकेले अजनबी की तरह चक्कर मारकर वह खुद ही द्घबराकर और ज्यादा उदास हो जाता है।
बाहर की उदासी वह ड्रेसिंग टेबल पोंछ, साहब के जूतों पर पॉलिश मार,किचेन की शीशियाँ धे-रगड़कर छाँट लेता है। और सबसे बढ़कर दोपहर तीन बजे मेरी चाय के साथ अपना मग लिये बातों का पिटारा खोलकर बैठ जाता है।
रोटियाँ पफटापफट, हलकी-पफुलकीऋ सब्जियों में स्वाद, मेहमान चटखारे लेते हैं- वाह! इस छुटंके ने बनाई है? अरे,मुझे भी मँगवा दिजिए न एकाध् ऐसा! जैसे कोई नई तरह की मशीन हो!
आज भी खासी बड़ी पार्टी निपटाई उसने। सुबह से नई-नई चमचमाती क्रॉकरी चम्मच और ढेर-ढेर समोसे, मिठाइयों के पैकेट, सब्जियाँ-सारा सामान देख-देखकर ही वह खुशी से उमगा पड़ रहा था। सुबह से रात तक एक पैर से दौड़़ता रहा-वह भी हँसता, उल्लसित और उत्साहितऋ जैसे कोई मेला, तमाशा या पिक्चर सिपर्फ देख नहीं रहा हो, उसमें एक अहम रोल भी कर रहा होऋ हर मेहमान खुले दिल से उसकी तारीपफ कर रहा था।
रात तक वह मेरे मना करने पर भी प्लेटें धेता, समेटता रहा। जितना मना करो उतना और काम। आज द्घर के सभी सदस्यों ने मेरी दूरदर्शिता का लोहा मान लिया था। मैं खुश थी, बेहद! तभी पफोन की द्घंटी बजी। मैं चौंकी। ठेकेदारनी थी, ''हैलो जी, अभी-अभी ठेकेदार साहब साइट से लौटे तो उन्होंने बताया कि कल सुबह एक आदमी सवाई माधेपूर तक जाने वाला है और वहाँ से दो ही एक स्टेशन तो है इस छोकरे का गाँव। सो वह किसी से भी कहकर पहुँचा सकता है। तो आप अगर कल सुबह उसे भिजवा दें तो.....''
मैं नीचे से ऊपर तक लड़खड़ा सी गई। वही लड़खड़ाहट शायद आवाज की हकलाहट तक में उतर आईं। जवाब देने से पहले चौकन्नी हो चारों तरपफ देखा-वह सोने चला गया था।
''हैलो, कल ही? इतनी जल्दी? लेकिन हमें काम का प्रॉबल्म हो जाएगा।''
''क्यों, क्या कुछ काम करना सीख गया क्या?''
''हाँ.....नहीं..... कुछ खास तो नहींऋ पर यू नो, समथिंग इज बेटर दैन नथिंग।''
''तो पिफर क्या कहती हैं?''
''देखिए, सही तो यह है कि..... '' मैं वाक्य पूरा करने से पहले चौकन्नी हो, पिफर पलटी-पिफर भी इतमीनान न आया तो अंगे्रजी में बालने लगी, ''हाँ, तो सच्ची बात तो ये है कि अभी ही तो उसने जरा-जरा काम सीखा है।''
''हाँ, और क्या, इन्हें सिखाना भी तो खासा सिरदर्द है, और सीखने भर क बाद जहाँ इन्हें रोटी लगी, लपक लेते हैं कहीं और। अरे, मैं तो खूब भुगती हूँ ऐसों-ऐसों को! तो पिफर ठीक है, रख लीजिए।''
''लेकिन.....'' मैं हिचकी।
''अजी, लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, उसकी माँ को कहला दूँगी कि मजे में है।''
''हाँ, और सुनिए, कुछ रुपए भी मैं सुबह......''
''अजी, मैं भेज देती हूँ, आपसे ले लूँगी पिफर। हम-आप कहाँ भागे जाते हैं। तो सौ रुपए भेज दूँ?''
''हाँ, ठीक रहेगाऋ लेकिन कहीं उसे.....''
''छोड़िए भी, उसका कौन यहाँ बैठा है उसे बताने के लिए कि कौन कब उसके गाँव-देस जा रहा है। आप बेपिफक्र रहें, उसे कानोकान खबर न होने पाएगी।''
''और पिफर देखिए, हम तो अच्छी तरह रख रहे हैं- बिल्कुल अपने बच्चे की तरह। उसका मन भी लग गया है।''
''हाँ-हाँ, मैं क्या जानती नहीं, सब कहला दूँगी। और सबसे बढ़कर सौ रुपए पाकर तो उसकी लुगड़ी-पफुगड़ी माँ निहाल हो जाएगी। पैसे मिलते रहे तो सारी उम्र ये अपनी औलाद का नाम न लें। पैदा ही इसलिए करते हैं,मुझसे पूछिए। मैंने दुनिया देखी है। अच्छा, तो आप थकी होंगी, आराम करिए। गुड नाइट!''
पफोन रखने के बाद मैंने पिफर चारों तरपफ चौकन्नी निगाह डाली। सारा वार्तालाप अंग्रेजी में और भी आस-पास कहीं उसका पता न था। रसोई से बरतनों के खड़कने की आवाज कभी की बंद हो चुकी थी। यों भी मेरे साथ रहने तक काम करता है, अकेला होते ही ऊबकर भाग खड़ा होता है।
सारा द्घर सोया पड़ा था दिन भर के शोर-शराबे के बाद। मैं चोर कदमों से अपने बिस्तर की ओर बढ़ ली।
एक सही और समझदारी भरा निर्णय। ठेकेदारनी भी तो कह रही थी। ठेकेदारनी क्या, कोई भी समझदार आदमी यही सलाह देगा। मेरे क्या, खुद उसके लिहाज से भी। गाँव में क्या मिलेगा उसे? वही गर्हित नारकीय जीवन, जिसने उसे हद दर्जे का उद्दंड और विद्रोही बनने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। यहाँ न आया होता तो ताज्जुब नहीं अगर चंद दिनों के बाद चोरी, पॉकेटमारी के किसी गिरोह के चंगुल में पफँसकर हवालात में होता। खुद ही बताता था, गाँजा लाते समय कैसे वह पुलिस, सिपाही की आँखों में ध्ूल झोंक, पैंतरे बदल भाग खड़ा होता था। कितनी मेहनत और ध्ीरज से मैंने गर्हित जीवन को सुधारा, सँवारा है। सब उसी के लिए तो!
और पिफर भेजने को मना थोड़ी किया है मैंने! सिपर्फ कुछ और दिन-महीने......;?द्ध जरा यहाँ की जिंदगी पूरी तरह रास आ जाए और पिफर अभी अगले महीने दो-दो बड़ी पार्टियाँ...... उसे भी तो अच्छा लगता है अब पार्टियों में।
लेकिन यह सब मैं बता-समझा किसे रही हूँ? चुपचाप मिली हुई राहत को लपेटकर चैन की नींद सोती क्यों नहीं?
नींद कब आई, पता नहीं।
सुबह, उजास की पहली किरण के साथ राहत की एक भरपूर अँगड़ाई ली ही थी कि द्घंटी बजी-दूध्वाले की।
अब देबू उठा- आँखें मलता, उनींदा-सा। बोतलें समेटीं, दरवाजा खोला। लेकिन द्घंटी पिफर जोर से बजी जैसे चिड़चिड़ाकर।
झपटे से उठती हूँ। जल्दी से दूध् की बोतलें लेकर किचेन में रखने के बाद खीझी हुई पिछली बालकनीपर जाती हूँ-'देबू! देवा!!' अचानक चौंककर थमी, खड़ी रह जाती हूँ। कहाँ? कहीं कोई नहीं-सिपर्फ खाली, छूटी हुई सी बालकनी। आस-पास पफड़पफड़ाते मोर, तीतर और डुंगर,बावड़ीवाले रंगीन कागज-हरे, नीले, फ्रयूज बिजली के लट्टू, पुरानी प्लास्टिक की डिबिया और दो-चार पफटी तसवीरें......
मैं बालकनी पर टिककर सामने देखती हूँ-खिड़कियों के पफ्रेम के पीछे छोर-उछोर हहराता समंदर।
दूर एक ध्ुँध्ला सा दिखता'पक्शी' मटमैले ध्ब्बे सा बीचोबीच छलाँग लगा गया है समंदर में.......
सिहर जाती हूँ मैं-यह सोचकर कि इस देहरी से बाहर पहला कदम रखने और दरवाजा खोलने से पहले, लाल-पीली थिगलियोंवाला थैला लटकाए क्या वह अचानक मुड़ा होगा मेरी तरपफ-आँखों में पीड़ा का एक पूरा ब्रह्मांड लिये.....
पीड़ा- पाए हुए छल की, विश्वासद्घात की। इतने छोटे जीवन में मिला इतना बड़ा छल?....बरदाश्त नहीं कर पाया शायद वह। मुड़ते हुए उसने कहा होगा, 'मुझे मालूम पड़ गया। नहीं स्वतंत्रा करोगी तुम मुझे अब कभी। भरोसा गया तुम पर से। इसलिए स्वयं अपनी मुक्ति का संकल्प लिए, कूदता हूँ विश्व के जीवन समर के इस अथाह महासागर में आज!...... सोचना मत, लहरों के थपेड़ों का अभ्यस्त हूँ मैं। अंदाज है मुझे। नहीं था तो सिपर्फ तुम्हारे छल का!......'
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