मेरे लिए चिन्ता का विषय यही था कि आखिर हिन्दी साहित्य में ऐसी बीमार परंपरा का निर्वाह ही क्यों किया गया। अलका सरावगी को जितनी चर्चा उनके उपन्यास 'कलि-कथाः वाया बाइपास' से मिली, उतनी चर्चा 'एक ब्रेक के बाद' को नहीं मिली। मेरे विचार से कलिकथा से कहीं ज्यादा ता८ागी 'एक ब्रेक के बाद' में है, जहाँ आज का सम्पूर्ण बा८ाारवाद हमारे सामने सिस्कियाँ लेता नजर आता है। विजय और नरेन्द्र नागदेव जैसे उपन्यासकारों पर वाद-विवाद के दरवा८ो नहीं खुलते। इसलिए कि ये रचनाकार बेहद खामोशी से अपने रचना-संसार में गुम रहते हैं। लेकिन इधर हालिया चंद वर्षों में लिखे गये उपन्यासों में 'निमिर का तिमिर' और 'खम्बों पर टिकी खूश्बू' को मैं बेहद महत्वपूर्ण उपन्यासों का दर्जा देता हूँ।
मध्ु कंकरिया ने 'संस्कृति पर सेज' लिखकर बाजारवाद के एक और द्घिनौने चेहरे को प्रस्तुत किया। ये नई सुगबुगाहटें दरअसल हिन्दी की पुरानी परंपराओं को तोड़ती हुई, वर्तमान के नये अनुभवों से सीध साक्षात्कार करती हैं। बात उपन्यासों से इसलिए आरंभ की, कि अरसे बाद हिन्दी साहित्य में परिवर्तन के आसार दिखने लगे हैं, जो एक शुभ संकेत है। वर्ना हमारा आम आलोचक उदय या मोरवाल तक आकर अपनी बेबसी और द्घुटन का शिकार हो जाता था।
दरअसल अभी हाल तक हम अपनी एक छोटी सी दुनिया में साँस ले रहे थे। और इस साहित्य का सारा दारोमदार हमारे उस यथार्थ से था, जहाँ गरीबी थी, शोषित और दमित महिला थी, बलात्कार था। अपराध् सरीखी कहानियाँ दरअसल भय और वुफंठा से कभी आगे नहीं बढ़ सकीं। और हमारा कमजोर आलोचक प्रेमचन्द की परंपरा को तोड़े जाने के हक में कभी नहीं रहा। नतीजे के तौर पर तथाकथित यथार्थवाद ने हिन्दी साहित्य को जो नुकसान पहुँचाया, उसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है।
ग़्ाालिब ने कहा था -
'कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयाँ के लिए'
ग़्ाालिब को हर बार अपने बयान के लिए कुछ और दरकार था। लेकिन यहाँ? वही पुरानी शराब। वही जनवाद का द्घिनौना चेहरा। वही यथार्थ। वही समस्याएँ। वही शिल्प । वही प्रस्तुति। शायद यही कारण था कि अरूंध्ति राय से लेकर अरविंद अडिगा तक को 'ऐक्सेप्ट' करने का जो साहस होना चाहिए था, वह हम में नहीं था। हम इतना कह कर खुश हो जाते थे कि अरूंध्ति का मार्क्सवाद ड्राइंगरूम तक ही सीमित है। या खुशवंत सिंह के शब्दों में, 'अरविंद को गरीबी से बाहर का भी चेहरा देखना चाहिए।' किन्तु केवल इन उपन्यासों का जिव्रफ करें तो यहाँ केवल यथार्थ नहीं है, यहाँ कथाशैली और शिल्प की महारत भी झाँकती है। यथार्थ को केवल वैसे का वैसा क्यों लिख देना चाहिए। उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़ने-तोड़ने का साहस क्यों नहीं होना चाहिए। बस, या तो हमारा आलोचक यह नहीं चाहता था। या हमारा सामान्य हिन्दी लेखक ऐसा करते हुए द्घबराता था। नतीजा, अपनी ही संस्वृफति और यथार्थ से जन्म लेने वाले बासी विफ़स्से सदियों तक हिन्दी का मुवफ़द्दर बने रहे।
यथार्थवाद और बासी विफ़स्से
जब भी हम सृजनात्मक या समकालीन विमर्श का जिव्रफ छेडं़ेगे, पिछले तीन दशक के द्घने बादल हमारा रास्ता रोक कर खड़े हो जाएँगे। दरअसल यही वह कट्टरता या अवैज्ञानिकता रही जिसने पत्रिाकाओं की भीड़ तो पैदा की, कहानियों के लिए स्त्राी, मुस्लिम, दलित-विमर्श जैसे आंदोलन भी चलाए लेकिन नती८ाा? पूछा जा सकता है, हम केवल अपनी हाँक रहे थे, या कहीं हमारे साहित्य का भी कोई स्थान रहा था? जहाँ पत्रिाकाएँ अपने मापदंडों पर लेखक या नायक पैदा करती हों । जहाँ पूरी सोची-समझी स्कीम या स्ट्रेटजी के साथ प्रकाशन-जगत के महारथी किसी भी लेखक को ब्रांड बनाने की तैयारी करते हों, वहाँ यह पूछा जाना वाजिब है। उदार परंपराओं से भटकी प्रवृत्तियाँ कल केवल 'अलेखक' ही जन्म देंगी। इनमें कोई मन्टो, कोई कमलेश्वर नहीं होगा क्योंकि प्रायोजित रचना या लेखन की आयु कितनी होती है, यह कोई जग छिपी बात नहीं है।
दरअसल यही हमारी अवैज्ञानिकता रही है कि शिवमूर्ति से संजीव तक केवल एक चिपचिपे यर्थाथवाद को सृजनात्मकता का उत्कर्ष समझ बैठे थे। हिन्दी पिफक्शन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि कथा-साहित्य पर आलोचना हावी रही। और यह आज भी हावी है। यह आलोचना-जगत आज भी अपने टूटे-पफूटे पैमाने में, अच्छे-बुरे साहित्य का अवलोकन करते हुए, अपनी पंद्रहवी शताब्दी के चिंतन के आधर पर किसी को साहित्य सम्राट का दर्जा देता है, या अपनी समीक्षा कसौटी को किसी हिटलर की तरह बयान करता है। दयनीय होती जनवादिता हिन्दी साहित्य में केवल अखबार की एक बासी खबर बन गई थी। दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दी का बेहतर साहित्य जनवाद और यर्थाथ के चंगुल में पफंस कर केवल 'स्लमडॉग मिलेनियर' तक सीमित रह गया था। यहाँ नहीं भूलना चाहिए कि इसके बावजूद स्लमडॉग का पूरा माहौल केवल यर्थाथ पर नहीं, बल्कि एक पफैंटेसी पर भी केन्द्रित था, बच्चे के अमीर बनने के सपने के पीछे वही उत्तर छिपे थे, जो उसे अपनी गरीबी की विरासत में मिले थे। लेकिन हिन्दी की बेजान कथा में केवल यर्थाथवाद का चरित्रा था, या ऐसी पत्राकारिता रूपी कहानी, जिसे हम महीनों पहले किसी अखबार में पढ़ चुके होते थे। इसलिए जब उदय प्रकाश जैसे दो-एक लोग अपनी कहानियों में प्रतीक और पफैंटेसी का मिश्रण प्रस्तुत करने लगते हैं, तो नयेपन की उस आँध्ी में समूची हिन्दी आलोचना बह जाती है ।
'जनवाद का जंगल' एक ही दिशा में चलती हुई कहानियाँ, या जीवन के 'दर्शनशास्त्रा' में उलझी हुई कहानियाँ। मैं अक्सर सोचता हूँ, क्या कहानियों को मापने का कोई अंतरराष्ट्रीय पैमाना है? 'बड़ी कहलाने वाली कहानियाँ' एक कतार से खड़ी होकर इसका भी समाधन दे जाती हैं-'होता नहीं है, हो जाता है'। चेखव से गाल्सवर्दी, काफ्रका से सात्रा की कहानियाँ पढ़ लें। नहीं? ये सब छोटी कहानियाँ हैं? हिन्दी कहानियाँ तो बहुत आगे की हैं। लिखने वाला स्वयं अपनी कहानियों के दर्मियान बैठ जाता है। आलती-पालती मारकर। हटता ही नहीं। अध्कितर कहानियाँ/उपन्यास एक दूसरे का 'एक्सटेंशन' मात्रा हैं। एक-दो अपवाद को छोड़ दिया जाये तो!
एक से संपादक। एक सी विचारधरा। एक तरह से कहानियों को देखने वाली आँखे। 'एकला चलो रे'। एक ही तरह का चिंतन। जनवाद से दलित चेतना और स्त्राी-विमर्श तक। ये सब जैसे विश्व की दूसरी भाषाओं के विषय नहीं रहे। इन सब की जिम्मेदारी हिन्दी साहित्य ने ही तो ली है। आलोचक इन्हीं की बहस छेड़ते हैं। संपादक इन्हीं मुददों पर कहानी माँगते हैं।
ऐसा नहीं है कि इन विषयों को नहीं छूना चाहिए। लेकिन सब मिलकर एक ही तरह से 'गंगा स्नान' करने लगें तो शिकायत पैदा हो जाती है।
यहीं पर लेखक से प्रश्न पूछा जा सकता है-आप क्या लिख रहे हैं?
संपादक से पूछा जा सकता है-आप क्या छाप रहे हैं?
आलोचकों से भी-आपकी दृष्टि क्या है?
अभी भी 'कामरेड का कोट' सरीखी कहानियाँ बड़ी कहानी मानी जाती हैं। अखिलेश तद्भव में 'छोटे रास्तों पर सपफर करने वाली कहानियाँ' छाप कर खुश हो जाते हैं। मानवीय संवेदना जैसे अंतरराष्ट्रीय विषय, जनवाद से लबालब भरे टब में कहीं नहीं हैं। क्योंकि इसके लिए जिस सूक्ष्म दृष्टि या तीसरी आँख की जरूरत है वो कम लोगों के पास न८ार आती है।
सोचता हूँ, हिन्दी पाठकों को यदि अलका सरावगी, मधु कांकरिया, उदयप्रकाश जैसे साहित्यकार न मिले होते तो? संकरे मार्ग पर केवल अपनी व्यथा कहने वाली कहानियों का उफंट किस करवट बैठता? कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद्य के यहाँ भी यह दृष्टि है। लेकिन अध्कितर भटकी हुई कहानियाँ लिख रहे हैं। शिल्प और भाषा की कमी को 'आंचलिकता' ने छिपा लिया है। हम अपने राज्य या शहर की भाषा लिख रहे हैं, कहने वाले, कहानी के साथ इंसापफ नहीं, म८ााक करते हैं। और ऐसे म८ााकिया जंतुओं से हिन्दी कहानी सुशोभित रही है। बल्कि यही जंतुगण अंततः राज भी कर रहे हैं। 'कल्पनाशीलता' और 'पंफतासी' को तज कर बेहतरीन कहानी का समीकरण नहीं तैयार हो सकता। अपनी जड़, अपनी ज़मीन से आगे निकलकर, हमें अभी नई ज़मीनों और नई दुनिया की तलाश में निकलना होगा, वर्ना ये संपादक और ग़रीब प्रकाशक आपके साहित्य का 'भूगोल' इतना तंग कर देगें कि हमें खुद अपनी कहानियाँ पढ़ते हुए शर्म महसूस होगी।
ख़त्म होती किस्सागोई का सच/एक दिन गुम हो जायेंगी दास्तानें/न सुनने वाले रहेंगे/और न सुनाने वाले/
देखा जाए तो प्रेमचन्द के बहुत बाद तक यह विफ़स्सागोई ८िांदा थी। हिन्दी एक समृ( और सुन्दर भाषा है। इस भाषा का विफ़स्सागोई और दास्तानों से भी गहरा रिश्ता रहा है। प्राचीन ग्रंथों में रामायण से महाभारत तक इस विफ़स्सागोई की मिसाल दी जा सकती है। स्वयं प्रेमचन्द की पकड़ भाषा पर बहुत अध्कि थी। वे कहानी बुनने की कला से परिचित थे। प्रेमचन्द से सुदर्शन, यशपाल, यहाँ तक कि कमलेश्वर तक इस कला को जीने का अंदाज आता था। क्योंकि ये सभी लोग भाषा की महत्ता और विफ़स्सागोई की परंपरा से भी परिचित थे। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता भाषा पर पकड़ ढीली होती गई। नये रचना-संसार में भाषा पर दर्शन हावी था। कहानी की बुनत में कलात्मकता गुम हो गई थी। आंचलिकता के नाम पर केवल अंधेरा शेष था। ऐसे मे सत्येन कुमार और शैलेश मटियानी सरीखे रचनाकारों की शिद्दत से याद आती है, जो भाषा पर अपनी मजबूत पकड़ रखते थे। सत्येन की कहानियाँ यथार्थ और प्रतीको का सुन्दर मिश्रण थीं। लेकिन अपफसोस इन्हें आलोचकों की बैसाखियाँ नहीं मिल सकीं। हम एक बेहद गुमनामी के दिनों में जी रहे हैं,
जहाँ परिणाम और नतीजा सुनाने की कुंजी अन्ततः उन्हीं आलोचकों के पास है, जिन्हें विफ़स्सागोई की हसीन परंपरा से कोई मतलब नहीं, जिन्हें केवल मरियल यथार्थ की सवारी चाहिए। वफ़सूरवार हिन्दी वाले हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य को 'प्रयोगशाला' से बाहर रखा। नतीजा, जिन लोगों को साहित्य में नायक बनाया गया, वो भाषा को लेकर किसी खलनायक से कम नहीं थे। आप पफणीश्वर नाथ रेणु को पढ़ जाइए। मैला आँचल या उनकी छोटी-छोटी कहानियाँ। एक पूफहड़ भाषा आपका इस्तेकबाल करती है। रेणु ने यथार्थ में पफंटासी का मिश्रण ८ारूर मिलाया, ;तीसरी कसम मुझे समूची पंफटासी लगती हैद्ध परन्तु भाषा की पूफहड़ता ने आंचलिकता के नाम पर हिन्दी में एक पूफहड़ बा८ाार के दरवा८ो खोल दिए। पिफर आया कमलेश्वर का 'अकहानी' का युग। जहाँ भाषा महत्वपूर्ण नहीं थी। कंटेंट महत्वपूर्ण था। मधुकर सिंह, मिथिलेश्वर से लेकर ऐसे-ऐसे कहानीकारों का आगमन हुआ जहाँ जनवाद और प्रगतिशील का सड़ा हुआ मृत शरीर था, जिस पर हजारों कीड़े लग चुके थे। हिन्दी साहित्यकार स्लमडॉग मिलेनियर का तो विरोध् करते हैं पर वे भूल जाते हैं कि वे सदियों से गरीबी का यही कवच पहने हुए हैं। आज तक वे अपने सड़े हुए प्रयोगों में केवल भारत की गरीबी और बलात्कार के बेहुदा दृश्य ही डालते रहे हैं। संजीव से शिवमूर्ति तक यही गरीबी भारतीय हिन्दी साहित्य का सच रहा है। ऐसे में हिन्दी कहानियाँ, किसी भी अंतरराष्ट्रीय मापदंडों की कसौटी पर पूरी नहीं उतरतीं। क्योंकि शिल्प की सतह पर ये कहानियाँ आज भी प्रेमचंद की परंपरा से जुड़ी हैं और कंटेंट की सतह पर यथार्थवाद के उसी मरियल चेहरे से, जो कहानी कम पत्राकारिता अध्कि लगता हैं।
शायद इसीलिए एक बार राजकमल प्रकाशन के सर्वेसर्वा अशोक माहेश्वरी ने आरोप लगया था कि नया साहित्य के मुकाबले अनुवाद अध्कि बिकता है। आज भी मन्टो और इस्मत की कहानियों के पाठक मौजूद हैं। आज भी हिन्दी से कहीं अध्कि लोकप्रिय अंग्रेजी भाषाओं के अनुवाद रहे हैं। हिन्दी कथा-आलोचना का इस पूरी एक शताब्दी में सब से बड़ा दुर्भाग्य रहा, ऐसे पाठक वर्ग तैयार करना जो एक सीमित आकाश या गरीब भारत से बाहर नहीं देख सके। नतीजे में साहित्यकारों द्वारा वही साहित्य रचा गया, जहाँ पुरानी शैली में एक दुर्भाग्यपूर्ण कहानी हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। इन्हीं कहानियों पर सर धुनने वाले आलोचक थे। और मिथ्या, यह भाषा और शिल्प के आधर पर बेहद कमजोर भगवान दास मोरवाल सरीखे लागों को नायक बनाने की तैयारी। दरअसल पाठकों वेफ समक्ष इमानदाराना किस्सागोई को ले जाने वेफ लिए इस साहित्यिक प्रदूषण से लड़ना भी जरूरी है, जहाँ अच्छा साहित्कार खो जाता है, और पैसा और पद वेफ बल पर वुफछ असाहित्यकारों को नायक बना दिया जाता है।
आप इन्हें हिन्दी में ब्रांड बना सकते हैं, लेकिन जहाँ शिल्प ही नहीं हो, भाषा ही नहीं हो या पिफर कंटेंट के नाम पर कहीं कोई प्रतीक, कोई नया डाइमेंशन न हो, आप की कहानी एक बेहद सीमित भूगोल तक, टुंड्रा-प्रदेश में लुप्त हो जाती है। ऐसा साहित्य सीमित भारतीय परिवेश से आगे नहीं जाता। पिफर आया दलित-विमर्श। दलित-विमर्श के नाम पर बाल्मीकि से लेकर सूरजपाल चौहान तक ने जिन कहानियों का निर्वाह किया, यह भारतीय हिन्दी साहित्य का सबसे अपफसोसनाक दृश्य कहा जा सकता है। ये केवल एक दयनीय आपबीती थी। और प्रेमचन्द से भी कहीं पहले का शिल्प। न भाषा, न प्रयोग, न कला, न दृष्टि। ऐसा आभास होता था, जैसे कहानी ने अब जन्म लेना शुरू किया हो। पूफहड़ भाषा के प्रयोग ने हिन्दी के समूचे साहित्य को एक बड़े बा८ाार में जाने से रोक रखा है तो ये जिम्मेदारी किसकी है? यहाँ उन थोड़े बहुत अपवादों का जिव्रफ जरूरी नहीं, जिन्होंने बेहतर शिल्प और भाषा के साथ स्वयं को बचाने की कोशिश की। जो आंचलिकता की दुहाइयाँ दे रहे थे दरअसल उनके पास भाषा कभी थी ही नहीं। इसलिए उनका समूचा कथासाहित्य केवल यथार्थवाद की एक बासी रिर्पोट ही लगता था।
हिन्दी को इस भयानक संकट से निकालने की आवश्कता है। इन मुद्दों पर अध्कि से अध्कि संवाद की जरूरत है। आज एक ओर जहाँ हिन्दी को विश्व की दूसरी बड़ी भाषाओं के तौर पर महत्व दिया जा रहा है, वहाँ इसके साहित्य को मरे हुए 'वाद' के चक्करों से बाहर निकलकर वुफछ नया रचना ही होगा। हाँ, सुखद यह है कि बहुत से युवा रचनाकार वाद और इ८म के लिबास को पफेंक कर बेहतर शिल्प, बेहतर भाषा के साथ साहित्य में कदम रख रहे हैं। उनका स्वागत। लेकिन संकट अपनी जगह है। पूंजीवाद और उदार अर्थव्यवस्था की दौड़ में एक यु( भाषा की सतह पर भी है, जिसे हिन्दी वालों को समझना होगा।
प्रेम की डगर
कहानी की पूरी प्रव्रिफया मेरे लिए एक ऐसे आधुनिक चिंतन से जुड़ी है, जहाँ मैं केवल यथार्थ की चीख नहीं सुनता। आध्ुनिक इसलिए कि कहानी केवल अतीत या इतिहास के खण्डहरों में पनाह नहीं लेती, वर्तमान की स्थितियों से भी जुड़कर नये चिंतन का मार्ग खोलती है। वहीं समय-समय पर अपना हस्तक्षेप भी दर्ज कराती है। लेकिन पिछले कई दशक से हिन्दी कहानी के मूल चिन्तन में यथार्थ का ऐसा भयानक या वीभत्स चेहरा दिखाई दे रहा था, जिसने नई कहानी की संभावनाओं को ही समाप्त कर दिया था। एक तसल्ली दी गई कि कहानियों के लिए भाषा की कोई जरूरत नहीं। उदय प्रकाश को अपवाद मान लें, तो भयानक यथार्थ को समर्पित समूची कहानियों के चेहरे एक जैसे थे । स्पष्ट है, पत्राकारितारूपी इन कहानियों में सत्य की गुहार तो सुनने को मिलती थी, लेकिन कोई ऐसा बड़ा पफलक नहीं, कि इन पर चिन्तन के दरवा८ो देर-सबेर खुले रह सकें। एक बुरा परिणाम यह था कि इन कहानियों ने अपने ही जैसा एक बड़ा पाठक वर्ग बना लिया था। और पाठक किसी भी नई रोशनी या यथार्थ से हटकर कुछ भी पढ़ने को सक्षम नहीं रह गया था। प्रेम और देह से गुजरती कहानियों पर उसकी असाधरण टिप्पणी के कारण थे, कि जलियांवाला बाग से गुजरात और जलते नन्दी ग्राम के सत्य के बीच मुर्दा स्त्राी का नग्न यथार्थ क्यों दिखा रहे हो?
क्या कहानी बिना स्त्राी के भी हो सकती है? बिना देह के? बिना प्रेम के? लेकिन प्रेमचंदी परंपरा के निर्वाह में कभी भी हमारे बौ(कि साहित्यकारों ने प्रेम और देह के सत्य को न जानने की कोशिश की, न समझने की। परिणामस्वरूप जितने उदासीन वे स्वयं थे, उतनी ही उदासीन रही उनकी कहानी। केवल एक मकड़ी के 'झोल' भरे अंध्कार में गुम।
द्घृणा शेष थी/या शेष थीं हत्याएँ/या वो जद्घन्य अपराध। जिन्हें होना शेष था/हर बार साहित्य की परिधि में द्घूमती थीं/वही कहानियाँ/जो चित्कार करती थीं/ या डसती थीं/नहीं जानता/ प्रेम से क्यों डरती थीं कहानियाँ/
ऐसा नहीं है कि यथार्थवाद पर आधरित रचनाएँ मुझे सिरे से वफ़बूल नहीं। या प्रेम पर आधरित रचनाएँ ही बड़़ी हो सकती हैं। अलेक्जेन्डर सोलेनेस्टीन से कफ्रका या जार्ज अर्विल तक यथार्थवाद कभी सपाट बयानिया ;दंततंजपवदद्ध या कभी ंिदजेंल में साँस लेता रहा है । हिन्दी में यथार्थवाद के प्रयोग कुछ इतने अध्कि हुए हैं कि कहानियाँ एक जंग लगे जनवादी संदूक से आगे का सपफर करती ही नहीं थीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सिरे से अच्छी कहानियाँ लिखी ही नहीं गई। लेकिन कुछ एक अच्छी कहानियों के बीच संख्या ऐसी कहानियों की अध्कि थी जिनमें एक पैफशन८ादा जनवाद या यथार्थवाद थोपा जाता था। हाँ, इस बीच प्रेम का राग कहानियों में अलापने वालों को सिरे से नकार दिया जाता था। या, इनके लिए शायद साहित्य में कोई जगह ही नहीं थी।
सन् २००९ तक आते-आते देश-विदेश की राजनीति एक ऐसे 'ग्लोबल-वार्मिंग' से टकरा रही थी, जहाँ केवल भय रह गया था। भय अथवा असुरक्षा की भावना। भूकंप, सुनामी, पर्यावरण की सुरक्षा, पैफलता प्रदूषण, पानी की समस्या, भूमंडलीकरण। दूसरी ओर विश्व का इतिहास आतंकवाद की ऐसी गाथाएँ लिख रहा था, जहाँ चंगेज और हिटलर भी भोलेभाले और मासूम लगते हैं। भयभीत करने वाले, डॉयनासोर की 'डिस्कवरी' करने वाली दुनिया का चेहरा एक ऐसी अग्नि-परीक्षा में परिवर्तित हो गया था, जहाँ न कोई सुरक्षा नियम था और न ही स्वयं को सुरक्षित ठहराने वाली कोई प्रणाली। बुश से ओबामा तक केवल अर्थव्यवस्था के ग्रापफ बदले थे, आतंक का भूगोल अपनी जगह था। जहाँ न्यूक्लीयर बमों और मिसाइल से लेकर केवल एक दहशत८ादा माहौल बचा था। शायद इसीलिए प्रेम की शिददत पहले से कहीं ज्यादा महसूस हो रही थी।
'भयानक खतरों में द्घिरे हुए लोग/अनजानी मृत्यु से जूझते लोग/जब आप अपने गिलास में स्काच उंड़ेल लेते हैं, लोग मर रहे हैं/जब आप अपनी टाई की नॉट बाँध्ते हैं/लोग मर रहे हैं/'
जीवन जैसे 'जो८पफ ब्राडस्की' की कविता बन गया था। मौत। असुरक्षा। भय। प्रेम कहीं नहीं था। प्रेम शायद छिप गया था। बहुत गहरे में। या अंध्कार में। प्रेम शब्दों से भी दूर चला गया था। कहानियों से भी। उपन्यासों से भी। इसका एक कारण और भी था, कि लोग प्रेम नहीं कर रहे थे। प्रेम के इसी अभाव में केवल एक उबाउफ साहित्य हमारे हिस्से में आ रहा था, जिसे हमारे समय का दुर्भाग्य भी कहा जा सकता है।
स्नोवा, प्रेम और चिन्तन
केवल एक वर्ष। और एक वर्ष के अंतराल में स्नोवा एक मिथक बन गई। दहशत और आतंक के द्घने बादलों के बीच 'मुझे मेरे द्घर तक छोड़ आइए' संभवतः पहली कहानी थी, जहाँ अहमद पफ़राज की कविता भी थी। ग़ालिब और मीर का दर्शन भी। हिन्दी की स्तरीय भाषा का सटीक इस्तेमाल। वहीं उर्दू अल्पफ़ा८ा की 'आमे८िाश' ने इस पूरी प्रेम कहानी को न केवल नया चेहरा दिया था, बल्कि नई भाषा भी। वो भाषा जो समकालीनों में किसी के पास नहीं थी। प्रेम का वो नशा, वो जादू जो चमत्कृत करने के लिए कापफी था। असुरक्षा और भय के माहौल में जन्मी इस प्रेम कहानी का एक-एक शब्द प्रेम से सराबोर था। वो प्रेम जो गुम हो गया था। जिसे साहित्यकारों ने केवल आत्मा ही नहीं, देह से भी निष्कासित कर दिया था। बाहर से आई एक विदेशी रचनाकार प्रेम के उसी सत्य को जी गई थी, या अमरता का पाठ पढ़ा गई थी, जिसे शायद लोगबाग अरसे से भूल बैठे थे। लेकिन मामला यहीं तक होता तो कहानियाँ नहीं बनतीं। पिफर आ गये सैन्नी अशेष, जया जादवानी और भी कई लोग। यह भी कहा गया कि कुछ कहानियाँ जया जादवानी के सहयोग से लिखी गईं। पिफर यह भी कहा गया कि इस पर्दे में सैन्नी अशेष ही हैं ।
कैसा पर्दा है कि चिल्मन से लगे बैठे हैं/सापफ छिपते ही नहीं , सामने आते भी नहीं/
लेकिन एक बात थी, स्नोवा के यहाँ केवल प्रेम नहीं था, किस्सागोई की वही इबारत जिन्दा थी, जिसे ढँूढ़ने का प्रयास मैं एक लम्बे अर्से से कर रहा था। मुझे, एक कथाकार के तौर पर इस बात की चिंता नहीं थी कि ब्रार्डो जैसी कहानियों के पर्दे में कौन है? क्योंकि वाद-विवाद से अध्कि महत्वपूर्ण रचना होती है। वास्तविकता की जिज्ञासा मुझे हववहसम तक ले गई। और वहाँ एक बेहद डरावना सत्य सामने था। १९८४ में एक कार दुर्द्घटना में स्नोवा बॉर्नो नाम की एक महिला की मृत्यु की खबर वहाँ मौजूद थी। अनायास मुझे याद आया। एक बार स्नोवा का एक मेल मुझे प्राप्त हुआ था, जिसमें उसने एक संक्षिप्त सा मैसेज भेजा था-'मैं आत्मा हूँ। मैं कुछ भी कर सकती हूँ।'
रहस्य को और गहरा करने में मेरा विश्वास नहीं। स्नोवा से जुड़ा केवल एक सच मुझे आश्वस्त करता है। उसकी कहानियों का प्रेम और किस्सागोई का अंदाज मुझे पसन्द है। पिफर मैं इस पोस्टमार्टम में क्यूँ पडूँ कि वो जीवित है। आत्मा है या उसके नाम पर कोई और लिख रहा है।
आप कथा से किस्सागोई को अलग नहीं कर सकते। हाँ, किस्सागोई को बदलते समय के अनुसार नये परिवेश में ढाल सकते हैं। खालिद हुसैनी से ओरहान पामुक तक किस्सागोई की कला मौजूद है, तो हम इसे लेकर भाग क्यों रहे हैं। जवाब स्पष्ट है, किस्सागोई के लिए भाषा भी चाहिए। भाषा के अभाव में कहानी केवल प्रेतात्मा की तरह भटकती रहती है।
स्नोवा की पीढ़ी या युवा कहानीकारों के बारे में सोचता हूँ तो लगता है, यहाँ किस्सागोई की पुरानी रिवायत अभी जिन्दा है। लेकिन 'भयानकता' के साथ रातों-रात स्टार बनाने वाली राजनीति इन युवा लेखकों को हाशिए पर ला देगी, यह एहसास भी सताता है। जब हम नया साहित्य कहते हैं, इसका सामान्य अर्थ होता है, आज का साहित्य। समकालीन साहित्य। जिसमें युवा, नवलेखन से लेकर सभी तरह की आयु के लोग हो सकते हैं। लेकिन अचानक युवा और नवलेखन की एक आँध्ी चल पड़ी। मैं आरंभ से ही युवा साहित्यकारों और उनकी साहित्यिक उफर्जा को पंसद करता आया हूँ। लेकिन अब यह सिलसिला साहित्यिक राजनीति का एक हिस्सा न८ार आने लगा है। इस आँध्ी में युवा सामने नहीं आएँगे, बल्कि बिखर जाएगें। कुछ के गुम होने के समाचार भी आने लगे हैं। पहली बार जब ज्ञानोदय ने युवा साहित्य पर विशेषांक निकाला था, तो इन युवाओं में नई शक्ति, कहने की नई कला का एहसास हुआ था। मुझे इन युवाओं के पास 'इ८म' से जुड़ाव न८ार नहीं आया। शायद वे जनवाद या प्रगतिशील, तमाम विचारधराओं का परित्याग कर, स्वछंद रूप से अपने नये साहित्य का निर्माण कर रहे थे।
इनमें अनेक नाम थे। ज्य़ादातर कहानीकार अनुभवों की चक्की से गुजरते हुए, मंझी हुई शैली में अपनी कहानियाँ लिख रहे थे। लगा था, यहाँ से बहुत कुछ नया आने की सम्भावनाएँ हैं। ज्ञानोदय के विशेषांक के बाद 'नव-लेखन' पर विशेषांकों की एक परंपरा ही आरंभ हो गई। कथाव्रफम, परिकथा, प्रगतिशील वसुध के दो अंक। परिकथा का प्रत्येक दूसरा अंक युवाओं की रचनाओं पर आधरित है। ज्ञानोदय ने ४७-४८ वर्षीय मो. आरिपफ को भी युवा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दरअसल पत्रिाकाएँ युवाओं को सामने लाने में एक महत्वपूर्ण बात सिरे से भूल गईं कि युवा होना दरअसल उम्र की कसौटी नहीं, बल्कि विचार है। युवा होना एक व्रफांति है। साहित्य के बुजुर्ग युवा अगर कहानी को नये संदर्भों में देखते और लिखते हैं तो यही असल युवा होने का एहसास है। युवा शब्द दरअसल हमारी आज की उस मानसिकता से जुड़ा है जहाँ विज्ञान, साइबर व्रफाइम, उपनिवेशवाद संस्कृति और ग्लोबलाइजेशन में, हम नये परिप्रेक्ष्य में अपने साहित्य को देख और परख रहे हैं। इसलिए नयी कहानी की रोशनी में कुछेक लेखक प्रेमचन्द को रिजेक्ट करते हैं और बेहद निराशा से भरी कहानी लिखने वाला काफ्रका या जादुई मिथक में नये शब्दों को रचने वाला मार्खीज हमारा साहित्य-नायक बन जाता है। और इस परंपरा को जीते हुए एक नहीं ह८ाारों उदय प्रकाश पैदा हो जाते हैं, जिन्हें सम्मान देने के लिए 'अखिलेशों' या 'ज्ञानरंजनों' की कमी नहीं होती।
यदि आप युवा होने को केवल आयु से जोड़कर देखते हैं तो यहाँ एक बेहद अपफसोसनाक बात हमारे सामने आती है। यानी बहुत से युवा अपना लेखन या अपनी शैली भूलकर वो लिखना चाहते हैं, जो उनसे संपादकगण लिखवाना चाहते हैं। नतीजा, एक-दो कहानी या कविता में चमत्कार करने वाली भाषा और शैली के बाद जो दूसरी रचनाएँ सामने आती हैं, वो उसी शैली उसी भाषा, यहाँ तक कि उसी कंटेंट तक सीमित हो जाती हैं। इसीलिए युवा-आन्दोलन के व्रफम में सबसे गंभीर बात यह है कि जिस तेजी से युवा आ रहे हैं, उसी तेजी से कुछ युवा अचानक गायब भी हो जा रहे हैं । यह समय युवाओं के शोषण या दोहन का नहीं, एक संतुलन या सांमजस्य रखकर उनकी कसौटी को तय करना भी है। एक या दो अच्छी किताबें आने के बाद उनका ठहर जाना या उनकी साहित्यिक ऊर्जा का खो जाना भी एक त्राासदी है। युवाओं की भीड़ में उन्हें न भूलें जिन्होंने अपना समूचा जीवन साहित्य के नाम किया है और सच पूछें तो जिनका लेखन आज भी चमत्वृफत किए जाने वाले युवा-आन्दोलन से कहीं ज्य़ादा हैं ।
विफ़स्सागोई की वापसी
बहुत अंध्ेरा है, लेकिन नई युवा सोच के साथ यह एहसास शेष है कि विफ़स्सागोई की वापसी होगी। क्योंकि योगेन्द्र आहुजा से चन्दन पाण्डेय, नीलाक्षी से सोनी सिंह, उफषा ओझा से पंखुरी सिन्हा तक विफ़स्सागोई की पुरानी परंपरा अभी जीवित है। यहाँ शब्द भी है, शिल्प भी और कला भी।
दरअसल हम किस्सागोई और दास्तानों में पनाह लेने वाले लोग हैं। हम किस्सागोई की परंपरा से कभी अलग हो ही नहीं सकते।
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