फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•साहित्याकार शेखर जोशी को प्रथम चंद्रयान पुरस्कार २०१० से सम्मानित किया गया। •काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर केंद्रित विशेषांक गल्पेतर गल्प का ठाठ का लोकार्पण। •मदन कश्यप और शरद दत्त करे मिला शमशेर सम्मान। • कथा यू के का पआनन्द साहित्य सम्मान महेंद्र दवेसर दीपक को 'अपनी अपनी आग' एवं कादम्बरी मेहरा को 'पथ के पफूल' के लिये दिया जा रहा है।
 
 
 
मीडिया विमर्श
चिंता भविष्य की, संकट विश्वसनीयता का द हिमांशु शेखर

अखबारों के अंत की भविष्यवाणी करने वाली पिफलिप मेयर की किताब २००४ में आई थी। सही मायने में देखा जाए तो पूरी दुनिया में अखबारों के भविष्य को लेकर चिंता का माहौल बनाने में इस किताब ने प्रमुख भूमिका निभाई। पर इस चिंता के बावजूद २००४ से लेकर २००९ के बीच पूरी दुनिया में अखबारों के प्रसार संख्या में ९ पफीसदी की बढ़ोतरी हुई। याद रखना होगा कि इस पाँच साल के दौरान इंटरनेट का प्रसार कापफी तेजी से बढ़ा है। इस दौरान अखबारों को लेकर संशय का माहौल भी बना।

आज हर तरपफ अखबारों के भविष्य को लेकर चिंता जताई जा रही है। पश्चिमी देशों से यह आवाज आ रही है कि अखबारों के दिन लद गए। वहीं भारत में भी अलग-अलग मंचों पर अखबारों के भविष्य को लेकर चर्चा हो रही है। देश के पत्राकारिता शिक्षण संस्थानों में अखबारों के भविष्य पर परिचर्चाओं का आयोजन हो रहा है।
दरअसल, चिंता सिपर्फ अखबारों की उम्र को लेकर ही नहीं जताई जा रही है बल्कि मुद्रित माध्यम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि आने वाले कुछ सालों में छपे हुए समाचार माध्यम लुप्त हो जाएँगे। पश्चिमी देशों में तो बाकायदा कई किताबें भी इस मसले पर लिखी गईं। ऐसी ही एक किताब लिखी है पिफलिप मेयर ने। इन्होंने अपनी किताब दि वैनिशिंग न्यूज पेपर्स में पूरे तार्किक तरीके से गणना करके यह नतीजा निकाला है कि २०४० में अमेरिका में आखिरी बार किसी अखबार की प्रति प्रकाशित होगी। यानी २०४० में अमेरिका का प्रिंट मीडिया खत्म हो जाएगा।

प्रिंट मीडिया के लिए सबसे बड़ा खतरा नई मीडिया को बताया जा रहा है। नई मीडिया का मतलब इंटरनेट। बजाहिर, इंटरनेट दिनोंदिन लोगों के करीब आता जा रहा है। यही वजह है कि दुनिया के कई प्रमुख अखबारी संस्थान अपने इंटरनेट संस्करण को ज्यादा तवज्जो देने लगे हैं। इंटरनेट के जरिए पैसा उगाहने के रास्ते दुनिया के कई प्रमुख अखबार संस्थान तलाश रहे हैं। विज्ञापन के अलावा पाठकों से भी पैसा वसूलने के मॉडल पर कई अखबार काम करने लगे हैं।
ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या सचमुच इंटरनेट से अखबारों को खतरा है? इस सवाल का जवाब कुछ आंकड़ों के साथ तलाशने में सहूलियत होगी। २००८ का साल पूरी दुनिया के लिए आर्थिक मंदी का साल रहा है। इस मंदी की वजह से दुनिया के तकरीबन हर देश के ज्यादातर मीडिया संस्थानों में छंटनी हुई। पर इस दौरान अखबारों का प्रसार नहीं द्घटा बल्कि इसमें बढ़ोतरी हुई। जी हाँ, २००८ में पूरी दुनिया में अखबारों के प्रसार में १.३ पफीसदी की वृ(ि हुई।

अखबारों के अंत की भविष्यवाणी करने वाली पिफलिप मेयर की किताब २००४ में आई थी। सही मायने में देखा जाए तो पूरी दुनिया में अखबारों के भविष्य को लेकर चिंता का माहौल बनाने में इस किताब ने प्रमुख भूमिका निभाई। पर इस चिंता के बावजूद २००४ से लेकर २००९ के बीच पूरी दुनिया में अखबारों के प्रसार संख्या में ९ पफीसदी की बढ़ोतरी हुई। याद रखना होगा कि इस पाँच साल के दौरान इंटरनेट का प्रसार कापफी तेजी से बढ़ा है। इस दौरान अखबारों को लेकर संशय का माहौल भी बना। इसके बावजूद अगर अखबारों का प्रसार द्घटने के बावजूद बढ़ता है तो सापफ है कि कम से कम अखबारों को इंटरनेट से खतरे की बात सही नहीं है।
भारत के संदर्भ में तो यह बात और भी सतही मालूम पड़ती है। भारत में अभी भी अखबारों का प्रसार उतना नहीं हुआ है जितना होना चाहिए। बेशक शहरों में कई-कई अखबार मौजूद हैं लेकिन गाँवों तक अभी भी अखबार नहीं पहुँचा है। पिछले कुछ सालों में जिस तरह से सड़कों का विस्तार हुआ है उसी तरह से अखबारों का प्रसार भी बढ़ा है। सही मायने में देखा जाए तो सड़क और अखबार में बड़ा गहरा रिश्ता है। क्योंकि जहाँ-जहाँ सड़क जाती है, वहाँ-वहाँ परिवहन व्यवस्था दुरुस्त होने की वजह से अखबार भी आसानी से पहुँच जाते हैं। इसलिए अगर सड़क हर गाँव तक पहुँचेगी तो साथ-साथ अखबार भी वहाँ पहुँचेंगे। यानी अखबारों के लिए अभी गाँवों में विस्तार की भरपूर संभावना है।

संभव है कि देश के बड़े शहरों में आने वाले सालों में अखबारों के प्रसार में थोड़ी कमी आए। क्योंकि इन बड़े शहरों में लोग बेहद तेजी के साथ इंटरनेट से जुड़ते जा रहे हैं। पर अखबारों के लिए बड़े शहरों से दूर संभावनाओं से भरा कापफी बड़ा मैदान उनकी बाट जोह रहा है। भारत के अखबारों की बेहतर सेहत और भविष्य की पुष्टि आंकड़े भी कर रहे हैं। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा अखबारी बाजार बन गया है। भारत में हर रोज औसतन अखबारों की १०.७ करोड़ प्रतियँं बिक रही हैं। जाहिर है कि अखबार पढ़ने वालों की संख्या प्रसार से कम से कम तीन गुना तो होगी ही।
इसके बावजूद अगर अखबारों के भविष्य को लेकर चिंता जताई जा रही है तो इस पर बेहद संजीदगी के साथ विचार करने की जरूरत महसूस होती है। दरअसल, भारतीय अखबारों को ही क्या बल्कि पूरी दुनिया के अखबारों के लिए इंटरनेट बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। अखबारों के लिए आज अपनी साख को बनाए रखना बेहद मुश्किल हो गया है। भारत के संदर्भ में तो यह बात और भी सही मालूम पड़ती है।
यही वजह है कि नई दिल्ली के बहादुर शाह जपफर मार्ग पर मैले-कुचैले कपड़े में लिपटा हुआ एक इंसान अखबारों वालों को गरियाते हुए चाय पी रहे पत्राकारों के बीच से गुजर जाता है और पत्राकारों की निगाह एक-दूसरे से मिलती जरूर है लेकिन वे कुछ बोल नहीं पाते हैं। मालूम हो कि बहादुर शाह जपफर मार्ग पर ही देश के कई प्रमुख अखबारों के कार्यालय हैं। अखबारों की गिरती साख का अंदाजा उस वक्त भी होता है जब झारखंड के पलामू जिले में रेलगाड़ी से कोयला उतरवाकर उसकी कालाबाजारी करने वाला अपराधी भी बड़े गर्व के साथ यह कहता है कि ५०० रुपये में उसने स्थानीय पत्राकारों को मैनेज कर रखा है।

दरअसल, अब तो हालत यह हो गई है कि हर कदम पर पत्राकारिता की गिरती साख का अहसास होता है। भारत के अखबारों के लिए पैसे लेकर खबर प्रकाशित करना यानी पेड न्यूज एक बड़े संकट के तौर पर सामने आया है। वैसे पैसे लेकर खबर छापने की कुप्रथा नई नहीं है लेकिन बीते लोकसभा चुनाव के दौरान इस वायरस से देश के बहुत कम अखबार बच पाए। सही मायने में अखबारों के लिए सबसे बड़ा खतरा तो पेड न्यूज है। क्योंकि अगर लोगों को यह मालूम हो गया कि वे जिस अखबार को खबर के लिए पैसे देकर खरीदते हैं उसमें छपने वाली खबर के बदले में पैसा लिया जाता है और वह खबर नहीं बल्कि विज्ञापन है तो वह अखबार खरीदना बंद कर देगा। क्योंकि प्रभाष जोशी के शब्दों में कहें तो कोई भी पाठक अखबार विज्ञापन के लिए नहीं बल्कि खबर के लिए खरीदता है।
देश के कई बड़े पत्राकार पेड न्यूज को पूरी मीडिया के साथ-साथ पूरे लोकतंत्रा के लिए खतरनाक मानते हैं। भारतीय पत्राकारिता में बीजी वर्गीज एक बड़ा नाम है। वे कहते हैं, 'पेड न्यूज से सबसे बड़ा खतरा तो यह है कि पत्राकारिता कहीं अपनी विश्वसनीयता न खो दे। इसके अलावा जब मीडिया संस्थान पैसे लेकर खबर छापने लगेंगे तो पिफर पत्राकारिता की बुनियादी शर्त निष्पक्षता को बचाए नहीं रखा जा सकता है। लोगों को यह मालूम नहीं है कि जो खबर वे पढ़ रहे हैं, उसे पैसे लेकर प्रकाशित किया गया। पर जिस दिन उन्हें यह पता चलेगा उस दिन से उनका छपे हुए शब्दों पर से विश्वास उठ जाएगा।' जाहिर है कि जब ऐसा होगा तो उसी दिन से अखबारों की उलटी गिनती शुरू हो जाएगी।

कुछ ऐसी ही राय वरिष्ठ पत्राकार परांजॉय गुहा ठाकुरता की भी है। मालूम हो कि प्रेस परिषद की तरपफ से पेड न्यूज मामले की जांच के लिए बनाई गई समिति का नेतृत्व परांजॉय कर रहे हैं। वे कहते हैं, 'पहले यह समझना होगा कि अखबार किसी दूसरे उत्पाद की तरह नहीं है और न ही पत्राकारिता किसी दूसरी सेवा की तरह है। पत्राकारिता की बुनियाद विश्वसनीयता है। पेड न्यूज की बात सामने आने के बाद पाठकों के मन में संदेह पैदा हो गया है। इसका असर पूरी लोकतांत्रिाक व्यवस्था पर पड़ेगा। क्योंकि अगर मीडिया पैसे लेकर खबर प्रकाशित या प्रसारित करने लगे तो वह स्वाधीन नहीं रहेगी और ऐसे में लोकतंत्रा को बचाया नहीं जा सकेगा।'
इस बारे में एडीटर्स गिल्ड और सीएनएन-आईबीएन के प्रमुख राजदीप सरदेसाई कहते हैं, 'एक पत्राकार के तौर पर हमारा काम जांच करना और भ्रष्टाचार को उजागर करना है न कि खुद ऐसा करना। पेड न्यूज पत्राकारिता के बुनियादी सि(ांत यानी विश्वसनीयता को चोट पहुँच रही है। अगर पत्राकार खुद अपने पेशे को सापफ नहीं रख पाएँगे तो आखिर लोकतंत्रा के दूसरे खंभों के खिलापफ कार्रवाई की मांग करने का हमारे पास क्या कोई नैतिक अधिकार बचेगा?'

मनोज मिट्टा भी अंग्रेजी पत्राकारिता का एक बड़ा नाम है। वे देश के एक बड़े अंग्रेजी दैनिक में बड़े ओहदे पर हैं और मीडिया के मसलों पर बातचीत के लिए पफाउंडेशन पफॉर मीडिया प्रोपफेशनल्स भी चलाते हैं। मिट्टा इसके निदेशक हैं।
पेड न्यूज के मसले पर वे कहते हैं, 'पैसे लेकर खबर छापने से पत्राकारिता की विश्वसनीयता को धक्का पहुँच रहा है। वे कहते हैं कि ऐसा करने से मीडिया संस्थानों को तात्कालिक तौर पर कुछ आर्थिक लाभ तो हो सकता है लेकिन दीर्द्घकालिक तौर पर देखें तो इससे मीडिया की विश्वसनीयता को भारी नुकसान होगा।'
दूसरे वरिष्ठ पत्राकारों की राय भी कमोबेश ऐसी ही है। यानी अखबारों के लिए खतरा कोई नया माध्यम नहीं है बल्कि खुद के द्वारा पैदा की गई परिस्थितियाँ हैं। इसलिए अगर अखबारों को बचाना है तो इसके लिए पैसे लेकर खबर छापने जैसी प्रवृत्ति को समाप्त करना होगा और हर हाल में अपनी साख को बचाए रखना होगा। अगर साख ही नहीं रही तो पिफर अखबारों को मरने से कोई नहीं बचा सकता।
अअअ
; लेखक उभरते हुए युवा टिप्पणीकार हैंद्ध
एस-२४ बी, तृतीय तल
पाण्डव नगर, नई दिल्ली, मो. ०९८९१३२३३८७

 
 
 
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