| ढाई आखर के आसरे : निविड़ शिवपुत्रा |
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वक्त की रंगत चाहे जैसी हो, दौर चाहे कोई भी हो, प्रेम एक कठिन प्रतिपाद्य है- जीवन के लिए भी और कविता के लिए भी। पिफर हम जिस हिंसक और निर्मम दौर से गुजर रहे हैं उसमें प्रेम-कविताओं की प्रस्तावना कैसे क्रांतिकारी साहस की मांग करेगी, समझा जा सकता है। सुधीर सक्सेना का नया कविता- संग्रह ''रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी'' सबसे पहले तो इस साहसिकता के चलते ही ध्यान खींचता है। संग्रह में कुल बासठ कविताएँ हैं। छोटी- छोटी, कुछ तो बहुत ही छोटी। केन्द्र में हैं ढाई आखर यानी प्रेम। |
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अब प्रेम की अति सांकरी गली के सपफर पर कोई योजनाब( तरीके से तो निकला नहीं जाता। सो, अनायासता इन कविताओं की सबसे बड़ी ताकत है। भूमिका में अनामिका इसी तथ्य को लक्ष्य करती हुई कहती हैं, ''सुधीर सक्सेना की ये कविताएँ नन्हीं-नन्हीं साँसों की तरह आपमें आती-जाती हैं।'' लेकिन यहाँ मामला 'पफूल्स रश' वाला भी नहीं है। प्यार करने और प्यार में पड़ने के तमाम जोखिमों से कवि अच्छी तरह वाकिपफ है। तभी तो 'विरह प्रेम की जाग्रत गति है और सुषुप्ति मिलन है' के पुनर्पाठ से ही संकलन खुलता है। पहली कविता 'नियति' को देखिए-मैंने तुम्हें चाहा/तुम धरती हो गयीं/तुमने मुझे चाहा/मैं आकाश हो गया/और पिफर/हम कभी नहीं मिले। प्रेम की नियति 'मिलना' नहीं 'मिल जाना' है-हम दो नहीं थे/तब हम थे। लेकिन 'मिलन' अभीष्ट भी तो नहीं है। ज्यादा ८ारूरी है संवेदना- समुद्र का बचा रहना। इसी 'समुद्र में नहाकर/होती है धरती/और उजली/और नमकीन।' और ऐसे ही स्थलों पर निज की चौहद्दियाँ टूटती हैं, ये प्रेम-कविताएँ महज वैयक्तिक उच्छवास नहीं रह जातीं, सुधीर त्रिालोचन के साथ खड़े न८ार आते हैं-मुझे जगत-जीवन का प्रेमी, बना रहा है प्यार तुम्हारा। यहीं आकर ये नन्हीं- नन्हीं कविताएँ अपनी सार्थकता भी सि( करती हैं।
प्रेम के दैहिक, दैविक, भौतिक आयामों को खोलती और समेटती ये कविताएँ अपनी त्वरा और व्याप्ति से प्रभावित करती हैं। खासियत यह कि संगीत और चित्राकला जैसी भगिनी कलाओं के साथ इन कविताओं का सार्थक संवाद निरंतर सुनाई पड़ता है। न८ाीर के तौर पर अनुराधा आँषि की पेंटिंग्स देखते हुए लिखी गईं 'न्यूड्स' श्रृंखला की कविताएँ देखी जा सकती हैं- 'चित्रा में स्त्राी देह के बाहर आकर निहारती है/अपनी देह' और 'चित्रा में स्त्राी है धरती की ओट में जाने को व्यग्र' और 'निर्वसना स्त्राी/हवेली में/गवाक्ष के पीछे/टांग आयी है/कपड़ों के साथ ही अलगनी पर/अपना चेहरा।'
आकार में छोटी होती हुई भी सुधीर सक्सेना की कविताएँ अगर पुरअसर हैं तो अपनी अनुभूति की सांद्रता की बदौलत। होमियोपैथी ड्रॉप्स की तरह ये कविताएँ अल्पमात्राा और लोअर पोटेन्सी में ज्यादा कारगर साबित होती हैं। यहाँ न तो बांग देकर सोयी मानवता को जगाने का उपक्रम है और न ही पैनिक क्रिएट कर ध्यान खींचने की कोशिश। बांसुरी की सुरीली तान से समय की विकटता को कम करने की निश्छल निवेदन है, रात के अंधेरे को चांदनी का स्पर्श देकर नीम रोशनी बख्शने का विनम्र प्रस्ताव है।
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