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पाणिनी आनन्द
बस एक बार
बस एक बार, वो सब कुछ कहो,
जो तुम्हारी न८ारों में सच है, पर जुबान पर नहीं आया।
बस एक बार, उनका नाम तो लो
जिनके नाखूनों की खरोचों और दाँतों निशानों ने
तुम्हारी तकदीर की लकीरें बदल दी हैं।
बसएकबार। |
बस एक बार,
आओ, उस द्घर में चलें,
उस दहलीज को चूमें,
जहाँ छोटी मुनिया रहती थी।
एक ही साँस में अपनी सारी बातें कहती थी।
बस एक बार,
चलो आवेदन पिफर से करें।
कि हक की लड़ाई लड़ने वाली पफ़ौज के
हम ईमानदार सिपाही हो सकते हैं।
बस, एक बार ही सही,
पर उस रोटी को तो देखें
जिसे सुअर भी नहीं खाते, पर
इंसानों की एक नस्ल उसी पर जिंदा है।
उन द्घावों को खुला छोड़ दें
जिन्हें लकड़ी का ठूंठ समझ
रो८ा कुल्हाड़ियों से काटा जाता रहा है
जिनके टुकड़े,
भुना हुआ गोश्त बन जाते हैं।
बस एक बार,
उन लावारिस लाशों का पता तो पूछें
जिन्होंने कभी बंदूक नहीं उठाई
पर गोलियों का निशाना बने,
आतंकवादी की मौत मारे गए
चलो
बस एक बार
उन कुर्तों, नेकरों, पतलूनों, टोपियों में
अपने दिलों के द्घावों का रिसता खून
पोंछ आएँ
और उन सबको सिलसिलेवार
पूरी तरह नंगा होने दें।
आओ,
बस एक बार,
पिफर से वो इंकलाब दोहराएँ
कि जिसके बाद कुछ अपने पिफर से साथ हो लें
आओ,
अपनी दहकती हुई आँखों से आसमान लाल कर दें
रात की रंगत बदल दें
एक नई सुबह रौशन कर दें
बस, एक बार।
बेबसी
लकड़ी के चूलों पर
बेधार कुल्हाड़े से,
वार करते करते
हकीकत की साँस पफूलने लगती है।
बीड़ी का धुंआ और पसीने का ८ाायका
मजबूर जिंदगी की चारपाई के
चरमराते पायों को
क़तरा क़तरा
दीमक की तरह चाटता चला जाता है।
खुरदरे, बेजान, छाले पड़े हाथों में,
रोटी और प्या८ा की जगह
दवाइयों के पर्चे और कर्ज की रसीदें
उसे खाने को दौड़ती हैं।
परदेस में कमाने गया लड़का
सुनते हैं,
अधबने मकान के छज्जे सहित
ख़त्म हो गया है।
बेबसी इस क़दर हावी है
कि ग़रीबी बेहया हो गई है।
लड़की वक्त से पहले जवान
और वो
वक्त से पहले बूढ़ा हो चला है। |