फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•साहित्याकार शेखर जोशी को प्रथम चंद्रयान पुरस्कार २०१० से सम्मानित किया गया। •काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर केंद्रित विशेषांक गल्पेतर गल्प का ठाठ का लोकार्पण। •मदन कश्यप और शरद दत्त करे मिला शमशेर सम्मान। • कथा यू के का पआनन्द साहित्य सम्मान महेंद्र दवेसर दीपक को 'अपनी अपनी आग' एवं कादम्बरी मेहरा को 'पथ के पफूल' के लिये दिया जा रहा है।
 
 
 
पीढ़ियाँ आमने-सामने
पुरानों को नहीं पढ़ती नई पीढ़ी
 
निर्मला जैन, ममता कालिया, मैत्रोयी पुष्पा, कविता, वंदना राग
पीढ़ियाँ आमने-सामने श्रृंखला के तहत यह दूसरा आयोजन। विषय-'हिन्दी कथा लेखन में स्त्राी'। इस विषय को अलग-अलग पीढ़ियों की लेखिकाओं के जरिए पकड़ने और समझने की कोशिश की गई। पुरुष और महिला कथा लेखन में आयी स्त्राी में मूलभूत अंतर क्या है? क्या है स्त्राी-विमर्श का मतलब? अनैतिकता-अश्लीलता की परिभाषा कैसे बदल गई है। नारीवाद कहाँ आकर नारेवाद में तब्दील हो जाता है।

मौजूदा दौर की क्या हैं नई चुनौतियाँ और उनसे युवा पीढ़ी के मुठभेड़ करने का रचनात्मक तरीका। भारतेन्दु युग की बंग महिला से लेकर जैनेन्द्र कुमार की 'सुनीता' और कृष्णा सोबती की 'मित्राो मरजानी' से गुजरते हुए अब तब मैत्रोयी पुष्पा, चित्राा

मुद्गल से होती हुई युवा पीढ़ी की कथाओं में स्त्राी ने कितनी करवटें ली हैं। इस बातचीत में शरीक हुईं निर्मला जैन, ममता कालिया, मैत्रोयी पुष्पा, कविता, वंदना राग। बातचीत के दौरान पीढ़ियाँ टकराव की मुद्रा में भी दिखीं। एक दूसरे के प्रति गिले-शिकवे भी सामने आए। नई पीढ़ी पर आत्ममुग्धता का आरोप लगाते हुए उसे सुनने के लिए डपटा गया तो पुरानी पीढ़ी को इस बात के लिए कठद्घरे में खड़ा किया गया कि वो बगैर पढ़े नए लोगों के बारे में पफतवे जारी कर देती है। इस बातचीत को हम ज्यों का त्यों दे रहे हैं, जो अनगढ़ता का टच लिए हुए है लेकिन यह अनगढ़ता ही इस बातचीत की विशेषता है। इस नोक-झोंक में पीढ़ियों के बीच पड़ी 'पफांक' में बहुत कुछ देखा समझा जा सकता है।

अपूर्व जोशी :पीढ़ियाँ आमने-सामने के तहत हमने आजादी के बाद की कहानियों पर नैनीताल में चर्चा की थी जिसमें नामवर सिंह, चंदन पाण्डे एवं शैलेय जी थे और संयोग से प्रभाष जोशी भी इस कार्यक्रम में शरीक हुए थे। उसकी आज यह दूसरी कड़ी है जहाँ निर्मला जी, ममता जी, मैत्रोयी जी के साथ वंदना जी एवं कविता जी भी हैं। इनका कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। इस कार्यक्रम की शुरूआत मैं, निर्मला जी से करना चाहता हूँ।
हम ५० के बाद की स्त्राी कथाकारों और उनकी कथाओं में स्त्राी पात्रा में आए बदलाव की बात करेंगे। मैं 'आजाद औरतः कितनी आजाद' में, निर्मला जी! आपकी टिप्पणी पढ़ रहा था। मैं यहाँ से आपकी बात को उठाना चाहता हूँ कि आपने यह किस संदर्भ में कहा। मैं उस अंश को पढ़कर सुनाता हूँ-
लेखन के स्त्राीवादी होने का अर्थ है- जीवन की ऐसी स्थितियों की विडंबना को उजागर कर उनके खिलापफ आवाज उठाना। जाहिर है, हर लेखिका या लेखक की स्वानुभूति के दायरे में ऐसे अनुभवों का होना जरूरी नहीं।
जैनेन्द्र ने किसी समय 'सुनीता' और 'मृणाल' जैसे पात्रा गढ़े थे और यशपाल ने 'दिव्या' के चरित्रा में परकाया प्रवेश किया था। आज भी ये पात्रा उस बहुत-से तथाकथित साहसिक महिला-लेखन की तुलना में बहुत मजबूत दिखाई पड़ते हैं, जो कुछ पफार्मूलों, पफतवों, और स्वनिर्मित रूढ़ियों के सहारे नारीवादी लेखन का परचम उठाए हैं। ऐसा साहित्य नारीवादी से अधिक 'नारेवादी' होने की शर्त पूरा करता है।
अतः मैं बातचीत की शुरूआत यहीं से करना चाहता हूँ कि आप बताएँ कि यह नारीवादी और नारेवादी का माजरा क्या है?
प्रेम भारद्वाज : इस प्रश्न को मैं पूरा करना चाहता हूँ। जैनेन्द्र के उपन्यास सुनीता, त्यागपत्रा से हम कृष्णा सोबती तक आते हैं। यशपाल की दिव्या, आगे मृदुला गर्ग, ममता कालिया और मैत्रोयी पुष्पा तक आते-आते कथा लेखन में स्त्राी कैसे करवट लेती है?
निर्मला जैन : यह जो बार-बार कहा जाता है कि एक ठेठ महिला साहस की कहानियाँ सिपर्फ महिला लिख सकती है, मेरा एतराज इस पर नहीं है। लेकिन साहसिक कहानियाँ केवल महिला ही लिख सकती है इस पर एतराज है। पुरुष भी लिख सकते हैं और पहले पुरुषों ने ही लिखा।
प्रेम भारद्वाज : जैनेन्द्र ने स्त्रिायों पर लिखा है।
निर्मला जैन : हाँ जैनेन्द्र ने लिखी, यशपाल ने भी लिखी है। हाँ! ये बात जरूर है कि उनमें इतनी साहसिकता नहीं थी। लेकिन एक व्यक्तित्व दिया। साहसिक होने से पहचान नहीं होती।
प्रेम भारद्वाज : साहसिकता से आपका क्या अभिप्राय है?
निर्मला जैन : कुछ ऐसी स्थितियाँ, वैसे वो सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ है तो साहसिक उतनी जरूरत नहीं है की स्थितियाँ दोनों ;स्त्राी पुरुषों के लिएद्ध के लिए एक सी होती है। पर यौन संबंधों के संदर्भ में अगर महिला ने खुला चित्राण किया है तो वह साहसिकता होगी क्योंकि आमतौर पर ऐसा नहीं होता है। अगर महिला लेखिका ऐसा करती है तो वह चर्चा का विषय बनता या बनाया जाता है जो कि बहुत गलत है। जैसे मृदुला गर्ग के उपन्यास 'चितकोबरा' का अभी आपने उदाहरण दिया तो मैं उसी से बात शुरू करना चाहूँगी...
प्रेम भारद्वाज : ऐसा चित्राण 'मित्राो मरजानी' में कृष्णा सोबती जी ने भी किया है।
निर्मला जैन : हाँ! मैं 'मित्राो मरजानी' पर भी आऊँगी। लेकिन पहले मृदुला गर्ग की चर्चा 'चितकोबरा'। इसके बारे में मैं पूरा ब्योरा तो नहीं दे पाऊँगी ;बहुत दिन पहले पढ़ा थाद्ध पिफर भी मुझे एतराज इस बात का था कि जिस सिचुएशन को मृदुला ने ;२, ३ पेजद्ध चित्रिात किया वह वर्णन उस स्थिति ;कहानीद्ध की मांग थी या उसे सनसनीखेज बनाने के लिए डाला गया। इसमें कुछ मतभेद हो सकते हैं। मेरे हिसाब से उनके ;मृदुला गर्गद्ध दिमाग में यह था कि कहीं खुली बात करनी चाहिए। वह वर्णन उस स्थिति की मांग नहीं थी। उसे वहाँ डाला गया। नैचुरली आए ऐसी स्थिति पैदा हो जाए तो किसी को कोई आपत्ति नहीं। इसका प्रमाण मैं आपको 'मित्राो मरजानी' से देती हूँ। इसमें कहानी जहाँ तक करवट लेते-लेते पहुँचती है तो स्त्राी-विमर्श का समर्थन करने वालों ने आरोप लगाया ;कृष्णा सोबती परद्ध था कि 'मित्राो मरजानी' को वापस नहीं लौटना चाहिए था। अगर वह नहीं लौटती तब यह स्त्राीवादी कहानी बनती। लेकिन स्थिति की मांग थी कि उस समय, जिस कस्बाई वर्ग से मित्राो आती थी, उस वर्ग में कितनी ही शरीर की मांग हो अंततः उस समय, उस समाज-वर्ग की वह स्त्राी कहीं न कहीं इस कमजोरी के कारण वापस लौटेगी ही। आप जबरदस्ती कृष्णा सोबती से मांग कर रहे हैं कि वह वापस क्यों लौटी। अगर वह वापस लौटी तो इसमें स्त्राीवाद कम हो गया। मुझे एतराज इसी बात का है। देखिए, मुझे आप इस बात के लिए क्षमा करें मैं किसी चिल्लपों में नहीं पड़ती। इसीलिए मैं महिला लेखन पर बहुत कम कलम चलाती हूँ। आक्षेप बहुत कम करती हूँ। अतः मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में किसी का नाम लेकर कुछ नहीं कहना चाहती हूँ।
ममता कालिया : मैं यह मानती हूँ कि कृष्णा सोबती ने 'मित्राो मरजानी' में एक शु( शैली के स्तर पर एक समस्या उठाई है। वही चीज 'ए! लड़की' कहानी में ग्रो करती है।
निर्मला जैन : उस समय के समाज और स्थितियों के साथ 'मित्राो मरजानी' की कहानी वही हो सकती थी।
प्रेम भारद्वाज : 'मित्राो' देह की मांग करती है।
निर्मला जैन : बहुत ही हिम्मत से वह 'देह की मांग' करती है। एसर्ट करती है यही बहुत हिम्मत की बात थी। अब इसके वह आगे नहीं जा सकती थी। 'अन्यथा' में अनुज कुमार ने 'मित्राो मरजानी' की पूरी रचना प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जिक्र किया और यह बताया कि आज के लेखन में जो गड़बड़ी हुई है वह इस कारण कि युवा पीढ़ी को बड़ी बेसब्री है, ओवर नाइट प्रसि(ि वाली जल्दी है। इसमें उनका बहुत कसूर भी नहीं है। जिंदगी भी तो तेज भाग रही है। इसी क्रम में लगता है कि स्त्राी विमर्श से प्रसि(ि मिल सकती है तो वे इसमें कूद पड़ते हैं। लेखन में स्त्राी-विमर्श या साहसिकता मृदुला के समय से शुरू हो गया था। एक कहानी जिसका मैं नाम भूल गई हूँ, उसमें दो व्यक्ति लिफ्रट के अंदर जा रहे हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि लिफ्रट के अंदर संभोग की क्रिया संभव नहीं, लेकिन किया उन्होंने जो कि व्यवहारिक ही नहीं है। लेकिन मृदुला ने ऐसा किया। उसे लगा होगा कि इससे बोल्डनेस आ सकती है। अगर स्थिति की मांग है बड़े शौक से कीजिए। लेकिन ज्यादा अच्छा है कि स्त्रिायों पर होने वाले अत्याचार को सामने लाएँ।
प्रेम भारद्वाज : मृदुला गर्ग की एक कहानी है 'तुक' जिसमें नायिका पति को प्यार करने वाली को बेवकूपफ मानती है। चंद सुविधाएँ जुटाने का जरिया मानती है। यह ७० के दशक की कहानी है। आशय यह कि मृदुला लगातार ऐसा कहती आ रही हैं।
निर्मला जैन : यह लगातार बात करना नहीं है। 'चितकोबरा' के लिए मेरा यह एतराज नहीं है कि उन्होंने ऐसी स्थिति क्यों डाली। मेरा कहना है कि वह सारी परिस्थिति के बीच वह चीज स्वभाविक होती है कि नहीं या जबरदस्ती डाली गयी है। मेरे हिसाब से उस पूरे द्घटनाक्रम में वह स्थिति सहज रूप से नहीं आती है। उसका प्रमाण मैं देती हूँ। चितकोबरा उपन्यास की चर्चा केवल उसी तीन चार पन्नों के कारण से हुई। उस समय कोई यह सोच नहीं सकता था कि कोई युवा महिला लेखिका इतनी साहसिकता से इस तरह की बातें, इतनी खुली-खुली ढंग से लिख सकती है। इसे साहित्य में सेंसनलिज्म पैदा करना कहते हैं। मेरे हिसाब से चर्चा साहस की नहीं होनी चाहिए।
प्रेम भारद्वाज : मृदुला गर्ग की बोल्डनेस यानी साहसिकता के बाद मैत्रोयी जी का नाम आता है। इनके बारे में आपकी क्या साहसिकता या स्त्राी विमर्श को लेकर राय है?
निर्मला जैन : मैत्रोयी का पहला उपन्यास था 'इदन्नमम'। उस पर पहला नुक्ता मैंने लिखा था। महिला लेखन पर कोई लेख था जिसमें एक पैरा में सबसे पहले मैंने नोटिस ली थी। मुझे बहुत प्रभावित किया उपन्यास ने। तीन पीढ़ियों की महिलाएँ जिसमें ग्रांड मदर, मदर और बेटी। कैसे उन तीनों पीढ़ियों की महिलाओं में आने वाले परिवर्तन, उनकी विकास-स्थितियाँ शामिल थीं। इसमें एक विशेष बात थी स्थानीयता की आंच। उस वजह से यह कहानी बहुत ही ताजगी से भरी हुयी थी। आज महिला लेखन में यह बात कम हो गयी है। आज की कहानियाँ ज्यादातर शहरी मध्यवर्ग से आ रही हैं। ये लोग भी खास वर्ग 'मध्यवर्ग' से आती हैं। मैत्रोयी का दूसरा उपन्यास 'चाक' की पांडुलिपि मेरे पास ही आयी थी और मैंने ही अशोक महेश्वरी से इनका कांट्रेक्ट कराया था। क्योंकि वो हिचक रहे थे। उसमें बाकी सब तो ठीक था। इस उपन्यास में दो प्रकरण थे। एक पहलवान है। उसके पुरुषत्व को जागृत करने के लिए एक महिला लाई जाती है और शारीरिक तौर वह बकायदा करती है। दूसरा प्रयोग है उसमें श्रीधर के साथ। वह अंदर है और बाहर ससुर बैठे हुए हैं खटिया पर और अंदर प्रेमलीला चल रही है। मुझे यह अस्वाभाविक लगा क्योंकि जाटों के द्घर में या बृजभूमि में कहीं भी आप इस तरह की स्थिति पैदा करने की हिमाकत कीजिए, पिफर देखिए क्या होता है। गर्दन उतार ली जाएगी। मैंने तो ऐसा नहीं सुना पर मैत्रोयी का कहना था कि ऐसा होता है। तब तो मैं कहूँगी कि यह विशेषों का यथार्थ है, सामान्य वर्ग का नहीं। यूनीक हो सकता है। अलग किस्म का परिवार हो सकता है। पर समाज के हर द्घर में ऐसा नहीं हो सकता है। यह उनकी रिवायत नहीं है। मैत्रोयी को याद होगा कि उसमें एक प्रयोग है जब स्त्रिायाँ यह कहती हैं कि हम चाहे जिसके नाम के बिछुए पैर में डाले द्घूमते रहें। तो ऐसा हो सकता है। पर ससुर बाहर बैठा रहे और अंदर द्घर के यह सब हो जाए। यह नहीं हो सकता।
मैत्रोयी पुष्पा : वह उसका द्घर नहीं है वे कहीं और हैं।
निर्मला जैन : हाँ! ठीक है कि वह उसका द्घर नहीं है। पर ससुर इस पर एतराज न करे वह सह जाए ऐसा नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि यह अस्वाभाविक है।
प्रेम भारद्वाज : अस्वाभाविक परिस्थितियाँ क्या सोच-समझकर डाली गई हैं?
निर्मला जैन : सोच समझकर ही कह लीजिए इसको। मैत्रोयी का उद्देश्य सनसनी पैदा करना नहीं है। कुछ खुला समाज दिखाना हो सकता है।
अपूर्व जोशी : आप कह रही हैं यह सब खुला समाज दिखाने के लिए ही डाला गया हो। लेकिन यह भी तो संभव है कि यह सब इसलिए डाला गया है कि सेंसेशन होगा, चर्चा छोड़ेगी।
कविता : एक लगाव होता है वह सब। एक दूसरे से इतना जुड़े होते हैं कि वह वही उसकी स्वाभाविक परिणति है।
निर्मला जैन : मनुष्य का जीवन बड़ा विचित्रा है। उन्हें पति से बड़ा लगाव होता है। उसके बावजूद कुछ परिस्थितियाँ ऐसी पैदा हो जाती हैं कि इस तरह की बातें हो जाती हैं। मेरी आपत्ति है कि ससुर की जानकारी में यह हो नहीं सकता, उसका खून खौल उठेगा। मेरे हिसाब से समाज के व्यवहारिक स्तर पर यह संभव नहीं है। इससे उपन्यास को कोई पफायदा भी नहीं हुआ होगा। अगर मैत्रोयी यह कहती है तो मैं मान लेती हूँ कि कोई ऐसा समाज हो सकता है जहाँ महिलाएँ जा कर पौरुष जागृत करती हों। पर मेरा जिस समाज या कस्बों से परिचय है, वहाँ ऐसा संभव नहीं। मेरा ससुराल ठेठ गाँव में है, मैं उससे वाकिपफ हूँ।
प्रेम भारद्वाज : उस दौरान चित्राा मुद्गल का 'आवां' उपन्यास आया उसके बारे में भी यही कहा गया।
निर्मला जैन : नहीं, 'आवां' में आई चीजें खटकती नहीं हैं। उसके स्त्राी चरित्राों को लेकर मुझे कोई परेशानी नहीं है। मुझे लगता है हम लगातार उनके यौन प्रसंगों के बारे में बात करके उन्हें सीमित कर रहे हैं। यह बहुत अजीब है।
प्रेम भारद्वाज : अभी क्या स्थिति है? आज के दौर में जो स्त्रिायां लेखन कर रही हैं वहाँ ये चीजें कैसे आ रही हैं? वहाँ क्या बढ़ता है?
निर्मला जैन : अब सेंसेशनल वाला तत्व कम हो गया। समाज अब चौंकता नहीं है क्योंकि वह कापफी पब्लिक हो गया है। आज स्त्रिायों की समस्याएँ दूसरी हैं। आपसे पिफर कहूँगी कि इस बातचीत को महिला प्रसंग पर केंद्रित मत कीजिए। केवल वही नहीं लिख रही हैं जो मेचोर लेखिका हैं वे भी इन प्रसंगों पर लिख रही हैं।
प्रेम भारद्वाज : जैसे?
निर्मला जैन : लता शर्मा गुजरात से हैं उनका एक कहानी संग्रह आया। लता ने मेरे पास भेजा। मैंने कहा कि महिलाओं पर कलम नहीं उठाती क्योंकि उन्हें बर्दाश्त नहीं होता। मेरी किसी से दुश्मनी नहीं है इसी सदभाव के साथ मैं लिखती हूँ। अगर मेरे कुछ कहने से आप कुछ सीख सकते हैं तो अच्छी बात है। नहीं सीख सकते तो ऐसी आलोचना को आप कूड़े में डालिए और आगे बढ़ जाइए। आप नाराज क्यों होते हैं? मैंने उस कहानी संग्रह में देखा कि सारी कहानियाँ यौन संबंधों से संब( हैं। मैंने लता से पूछा कि तुम्हें कोई और विषय नहीं मिला। तो उसने मुझे अपनी परेशानी बतायी कि उसको अपना कहानी संग्रह छापने के लिए प्रकाशक नहीं मिल रहा था। प्रकाशक ने कहा आप हर तरह की कहानियाँ हमें भेज दीजिए हम उसमें से छाट लेंगे। लता शर्मा ने हर तरह की कहानियाँ भेजीं लेकिन प्रकाशक ने उन्हीं कहानियों को छापा जो यौन संबंधों पर थीं। प्रकाशक ने ऐसी कहानियाँ इसलिए छापीं क्योंकि उसकी ऐसी इमेज बना दी गई है। लेकिन लता की मैंने आलोचना इस प्रसंग के लिए नहीं की। मैंने उसकी एक खास कहानी के लिए आलोचना की। उस कहानी का नाम याद नहीं... मगर उस कहानी में एक महिला के साथ चार लोग बलात्कार करते हैं। बारी-बारी से तीन लोग उससे संपर्क कर आते हैं। जब चौथे को कहते हैं तो उसकी मानवीयता जागृत हो जाती है। लेकिन बाकी तीन लोग उसे चढ़ाते हैं। और वह चौथा आदमी भीतर जाकर उस महिला के साथ-साथ खुद के साथ भी मानो बलात्कार करता है। मेरे हिसाब से वह कहानी वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी क्योंकि वह कहानी बलात्कार की नहीं, अलबत्ता पुरुष के भीतर भी इंसान होता है उसकी -कहानी है।
आज की लड़कियों के पास बहुत सी समस्याएँ हैं। अगर आप मुझसे पूछे तो इन सबसे कहीं ज्यादा जटिल पात्रा आ रहे हैं। स्त्राी पुरुष संबंधों में बहुत पफर्क आ गया है। पहले कामकाजी महिलाओं की जो समस्याएँ थी अब उनके ढंग में बदलाव आया है। समस्याएँ वही हैं। उनका बच्चों एवं बाजार से संबंधों का। इस तरह की चीजें अब आ गई है। यौन संबंध पहले पफार्मूले की तरह आता था अब पफार्मूले दूसरे बन गये हैं।
प्रेम भारद्वाज : स्त्राी विमर्श में विवाह एक मुद्दा रहा है। ममता जी की एक कहानी थी 'एक जिनियस की प्रेम कथा'। उसमें नायिका एक संवाद बोलती है कि विवाह प्रेम नामक पिफल्म की वो २१वीं रील है जिसे आप नहीं देखना चाहते हैं, पर देखनी पड़ती है। क्योंकि दाम दिए होते हैं। यह बात कहाँ लेकर जाती है?
ममता कालिया : मुझे लगता है स्त्राी लेखन का संसार बहुत बदल गया है। 'एक जिनियस की प्रेमकथा' को मैंने बाद में 'एक पत्नी के नोट्स' नामक उपन्यास बनाया। देखा जाए तो पुरुष और स्त्राी की दुनिया में चाहे जितना प्रेम हो स्पर्धा भी उतनी ही होती है। मेरी हमेशा कोशिश रही है कि स्त्राी देह को मात्रा उपभोग की वस्तु न माना जाए। बल्कि वो पुरुष समाज में जिस तरह से उनके चक्कर में आती है उसे उस रूप में चित्रिात किया जाए। मैंने उस कहानी की पात्रा को ला कर खड़ा किया जिसका जिक्र आपने ;प्रेम भारद्वाजद्ध किया। यहीं पर अगर पुरुष यह कह रहा है कि विवाह पिफल्म की वह ;२१वींद्ध रील है जिसे कोई नहीं देखना चाहता। तो मुझे लगता है कि पुरुष हमेशा स्त्राी की कीमत पर लोकप्रिय भी रहना चाहता है। स्मार्ट और सपफल भी रहना चाहता है। कहानी में कविता उसे लगातार टक्कर भी दे रही है। इस प्रकार की स्पर्धा स्वाधीनता के बाद भारतीय समाज में बढ़ी है। आज वह पारंपरिक रिश्ते नहीं हैं, जिससे चीं-चीं, मी-मी चलती रहती थी। मुझे लगता है दुनिया उन यौन संबंधों से आगे बढ़ गयी है। भारतीय समाज भी इससे अलग नहीं है। इन्टरव्यू के समय पुरुषों के समकक्ष कितनी भी सुंदर महिला आई हो तो वह उस समय यह नहीं सोचेंगे कि इसके साथ बैठकर हम कॉपफी पियें बल्कि उस समय उनके दिमाग में यह होगा कि हमारा चयन हो जाए, यह रह जाए। तो आज हम समानता की ओर अधिक बढ़े हैं। आज समाज में स्त्राी-पुरुषों में कांटे की टक्कर चल रही है, बराबरी की प्रतियोगिता चल रही है। हमें उसे प्वाइंट आउट करना है। इधर की रचनाओं के बारे में मेरा मानना है कि युवा लेखक एवं लेखिकाओं ने माहौल कापफी बदला है। हमें उस पर अधिक बात करनी चाहिए।
प्रेम भारद्वाज : किस तरह से माहौल बदला है?
ममता कालिया : मैं कहूँगी कि २०वीं शताब्दी के ८वें दशक से लेकर २१वीं शताब्दी के पहले दशक तक महिला लेखन जहाँ तक आ पाया वह अधिक महत्वपूर्ण होना है। और प्रासंगिक भी हमारे लिए होना चाहिए।
प्रेम भारद्वाज : लगभग दस-बीस साल का लेखन।
ममता कालिया : हाँ! बातचीत इसी पर होनी चाहिए। पुरानी रचनाओं को छोड़ देना चाहिए। वह बहुत पुराना हो चुका है।
प्रेम भारद्वाज : इधर की लेखिकाओं और उनके लेखन में रेखांकित करने वाली कौन सी चीज लग रही है आपको?
ममता कालिया : मैं देख रही हूँ कि इधर की लेखिकाओं के विषय चुनाव बहुत सही हो गये हैं। वे केवल रिश्तों की सीमित दुनिया से कहीं आगे की रचनाएँ हैं। अगर जहाँ रचनाएँ हल्की-पफुल्की भी हैं वहाँ पर भी विषय का चुनाव बड़ी कांससली किया गया है। क्योंकि मुझे लगता है प्रेम जी इधर यथार्थ भी बदला है। पहले जैसा इकहरा यथार्थ और समय होता था वह अब बदल गया है, कापफी गतिशील और जटिल हो गया है। उसको पकड़ने की कोशिश में आपको अपना मुहावरा खुद बदलना पड़ता है।

कृष्णा सोबती ने 'मित्राो मरजानी' लिखकर खत्म कर दिया। उसके बाद उन्होंने 'ए लड़की!' और 'समय-सरगम' लिखी है तो जाहिर है कि उन्होंने लेखक के तौर पर थोड़ी तरक्की की। वे अपने सीमित सरोकारों से, स्त्राी को देखने के अपने नजरिए से कहीं आगे बढ़ीं। इसी तरह से कई काम अन्य ने भी किया। पहले अलका सरावगी ने बहुत ही साधारण किस्म की कहानियाँ लिखी थीं लेकिन जब उसने उपन्यास लिखा तो उसमें स्वतंत्राता की विसंगतियों को पकड़ने की चेष्टा की। यह बड़ी बात थी। इसी तरह गीतांजली श्री अपनी सारी चिंताओं के बावजूद उपन्यासों में दंगे के साथ-साथ समय को पकड़ने की कोशिश करती है। एक तरपफ सांप्रदायिक दंगों और दूसरी तरपफ अपने समय को पकड़ने की कोशिश करती है जो बहुत ही मुश्किल काम है। जब कोई लेखिका मुश्किल मुद्दों को पकड़ने की कोशिश करती है तो वह अपनी असपफलताओं के बावजूद मेरे लिए महत्वपूर्ण है। आज के दौर में मात्रा एक पात्रा खड़ा कर देना और उसमें लगातार पच्चीकारी करते रहना और आपकी जेब में पड़े हुए चार-पाँच आलोचकों द्वारा वाहवाही करवा लेना कोई महान कार्य नहीं है। मैं इस बात को एक लेखक और पाठक के तौर पर खारिज करती हूँ। और एक समीक्षक के तौर पर भी। आज के बदलाव को मैं ज्यादा महत्वपूर्ण मानती हूँ जहाँ लगातार प्रयोग हो रहे हैं। कविता की कहानी 'मेरी नाप के कपड़े', वंदना राग की 'युटोपिया' और 'जागरण' मैंने बहुत पहले पढ़ी थी।

इनकी कहानियों में पहले चुभन होती उसे इन्होंने बहुत जल्दी छोड़ दिया। और महत्वपूर्ण मुद्दों पर कहानी लिखने लगी। मधु कांकरिया की कहानी 'भरी दुपहर के अंधेरे' बड़ी अच्छी कहानी है, यह धर्म परिवर्तन पर थी। मधु कांकरिया का ही उपन्यास 'पत्ताखोर'। ऐसी चीजें लगातार हमारे सामने आ रही हैं। अल्पना मिश्र की 'छावनी में बेद्घर'। आज की लड़कियों में मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी 'स्वांग' है। इसकी गजब की थीम है। स्वांग करने वालों को आज कोई नहीं पूछता। वे मायनारिटी में आ गये हैं। एक आर्टिस्ट का सोशल स्टेटस क्या है इस पर वह कहानी है। कहानी में कलाकार मर जाता है और अपफसर उसे १०० रुपये निकालकर देता है कि इसके अलावा मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ। इस कहानी में जो अश्लीलता दिखाई गई है वो स्त्राी-पुरुष संबंधों की अश्लीलता से ज्यादा भयावह है। आज का कथा संसार बिलकुल बदल गया है और हम आज पारंपरिक तरीकों से बहस नहीं कर सकते। बदले माहौल को जिन्होंने पहचाना या पहचान रहे हैं वहीं सरवाइव करेंगे बाकी लोग इतिहास की नींव में समा जाएँगे।

निर्मला जैन : इससे पहले कि आप बात आगे बढ़ाएँ मैं एक सवाल आप से करना चाहती हूँ कि आप लोगों को कभी नहीं लगा कि यह भी एक मुद्दा होना चाहिए कि आज की जो तथाकथित नई लेखिकाएँ हैं, इनके बीच से कोई उपन्यास क्यों नहीं आ रहा है।
प्रेम भारद्वाज : हाँ! उपन्यास बहुत कम आ रहे हैं? पुराने लोग भी नहीं लिख पा रहे हैं।
निर्मला जैन : पुराने लोग ही लिख रहे हैं। ममता, मृदुला गर्ग, मैत्रोयी, गीतांजली श्री लिख रही हैं। मृदुला गर्ग का अभी उपन्यास आया 'मिलजुल मन'। कृष्णा सोबती के बाद की, यह बीच की एक खास पीढ़ी है। इस पीढ़ी तक उपन्यास लिखे जा रहे थे। वे तब भी लिख रही थी अब भी लिख रही है। मैं यह जानना चाहती हूँ कि ये नई लड़कियाँ उपन्यास क्यों नहीं लिख रही हैं? मैंने एक दो से यह सवाल पूछा भी। वास्तव में उपन्यास के लिए बहुत ही साधना और धैर्य की जरूरत है।
कविता : नई लेखक-लेखिकाएँ भी उपन्यास लिख रही हैं। नीलाक्षी सिंह का उपन्यास आया है, मनीषा का आया है।
प्रेम भारद्वाज : नीलाक्षी सिंह का 'शु(ि पत्रा' दो साल पहले आया था।

वंदना राग : उपन्यास में केवल महिला लेखन की ही बात नहीं है निर्मला जी! पिछले १० वर्षों में चाहे वह महिला लेखन हो या पुरुष लेखन, उपन्यास कम ही आए हैं। उसके बदले एक नया ट्रेंड लम्बी कहानी लेखन का चला है। इसे एक कम्पेनसेशन तो नहीं मान सकते कि यह उसके बदले में हो रहा है मगर पूरे हिन्दी साहित्य संसार में एक ऐसा माहौल बन गया कि उपन्यासों से ज्यादा कहानियों को तवज्जो मिल रही है। कविता लेखन भी एक तरह से हाशिए पर चली गयी है। मुझे नहीं पता कि यह सही है कि गलत, पर मार्केट उसके साथ एसोसिएट है, जो अपने साथ एक विशिष्ट प्रकार का ग्लैमर लाता है और उसे तवज्जो बहुत ज्यादा मिली है।
निर्मला जैन : मैं वही कहना चाहती थी जो आपने कह दी।
कविता : महुआ माजी ने उपन्यास लिखा, मनीषा कुलश्रेष्ठ लिख रही है। अभी इन्हें लिखते हुए कितना वक्त हुआ है। जुम्मा-जुम्मा आठ दिन हुए हैं।
निर्मला जैन : मैं यह नहीं कहती कि सबकी चर्चा प्रायोजित होती है। नीलाक्षी सिंह की चर्चा प्रायोजित होने वालों में नहीं है। आपको मालूम है कि वह एक कोने में बैठी चुपचाप लिख रही है। एक कहानी लेखिका के रूप में उसकी जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उसकी उतनी चर्चा नहीं हुयी।
प्रेम भारद्वाज : यानी वो ज्यादा डिजर्व करती थी?
निर्मला जैन : किसी पत्रिाका में उसका जीवन वृत्त पढ़ा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। वह एक कोने में पड़ी है उपेक्षित, जो डरते-डरते बहुत धीमी रफ्रतार में आगे आई।
वंदना राग : नहीं! नीलाक्षी उपेक्षित बिलकुल नहीं है। बीएचयू से पढ़ी लिखी है, बैंक में आपिफसर है वह।
निर्मला जैन : नहीं मैं शुरूआत की बात कर रही हूँ।
वंदना राग : उनकी पहली कहानी 'धुंआ कहाँ है।' 'हंस' में छपी थी।
प्रेम भारद्वाज : नई पीढ़ी में नीलाक्षी सर्वाधिक चर्चित लेखिका है। साहित्य अकादमी ने उन्हें विशेष पुरस्कार दिया।
कविता : युवा लेखिकाओं के उपन्यासों की बात कर रही हैं तो महुआ मांजी का उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' कापफी चर्चित रहा।
निर्मला जैन : उन्हें आप अपनी उम्र में मत गिनिये वह गीतांजलिश्री वाली पीढ़ी में आती हैं।
कविता : पर लिखते हुए उन्हें अभी कितना समय हुआ है?
निर्मला जैन : कृष्णा सोबती अगर आज लिख रही है तो आप उन्हें अपने साथ वाली पीढ़ी में रखोगी।
कविता : पर लिखना जब से शुरू किया तभी से मानेंगे।

प्रेम भारद्वाज : मैत्रोयी जी, अब आप बताइए। आप पिछले बीस सालों में स्त्राी विमर्श एवं कहानियों में देह गाथा को लेकर कापफी चर्चित रही हैं। आपकी जो नायिकायें हैं वो प्यार व समर्पण को एकदम खारिज करती हैं। वो अपनी इच्छाओं का शास्त्रा अलग से लिखती हैं और वो इच्छायें कहीं न कहीं देह से जुड़ी रहती हैं। वह इच्छा शास्त्रा क्या है? एक बात और कि अभी आपने कानपुर में एक कार्यक्रम में कहा कि औरतों को पालतू कुत्ते की वपफादारी रास नहीं आती, पालतू कुत्ता होना पसंद नहीं करती हैं। यह बहुत बोल्ड बयान है।
मैत्रोयी पुष्पा : सबसे पहले तो मैं यह बता दूँ कि जब मैं लेखन में आयी, लेखन में अभी चार साल हुए भी नहीं थे तब तक मेरा 'इदन्नमम' १९९४ में आ गया था। इससे मुझे पहचान मिल गयी। सच मानिये मेरे जैसी स्त्राी जिसने कालेज छोड़ने के २५ साल बाद कैसे कालेज या यूनीवर्सिटी होती है, कैसी समाजिक संस्थायें होती हैं कुछ नहीं देखा था। मैंने सिपर्फ खाना बनाया था और द्घर का काम किया था। स्त्राी विमर्श कहते किसे हैं मैं उसे नहीं जानती थी। मेरा बैकग्राउंड गाँव का था। शहर पर मेरा 'विजन' छोड़कर कोई उपन्यास नहीं है। शहर पर मेरी कलम नहीं चलती है। मेरी कलम वहीं चलती है जहाँ के मेरे अनुभव होते हैं। स्त्राी विमर्श का जो रोग लगा, ये चाहे अच्छी हो या बुरी, मैं सोचती हूँ कि अच्छा ही है कि मैंने स्त्राी के बारे में बात की। जब मैं लिख रही थी तब मैंने देखा कि गाँव की स्त्रिायां कहाँ हैं। मेरे आसपास के चरित्रा थे। पात्रा पर पात्रा आते चले गये।

मेरे 'इदन्नमम' के बारे में विवाद उठा था। सुधीश पचौरी ने इस पर लिखा था 'अधूरी प्रेमकथा', जिसे आज लोग कह रहे हैं कि ठीक है। 'चाक' में मेरे जाट लोगों पर जो अनुभव थे वो यही थे। आप ने कहा कि मैं देह पर अधिक लिखती हूँ। मैंने कहीं पढ़ा था कि गोपियां अगर कृष्ण को छू देंगी तो यह ठीक नहीं है, पर कृष्ण जब गोपियों को छू देंगे तो वे पवित्रा हो जाएँगी। क्या ऐसा होता है? हमारा गाँव जाटो का गाँव है। उपन्यास में मैंने जो लिखा कि हम तो जेब में बिछिया रखे पिफरते हैं, हम जाटिनी हैं। ये मेरा वाक्य नहीं है। ये उसी कलावती चाची का वाक्य है जो पात्रा मैं वहाँ से उठाकर लाई हूँ। मेरा यह पात्रा काल्पनिक बिलकुल नहीं है। मैंने उससे कहा भी कि मैंने तुम्हारा वाक्य लिखा तो इससे दिल्ली में हल्ला मच गया। उन लोगों को बड़ा ताज्जुब लगा। वैसा समाज जब इस तरह के संभ्रांत समाज से मिलेगा तो उसे ताज्जुब तो लगेगा ही। उन लोगों में जब एक्सट्रा मैरिटल अपफेयर हो जाते हैं या विधवा के किसी से संबंध हो जाते हैं तो बच्चा जिसका होता है वो अगर नहीं बता सकती, तो एक पंचायत होती है। उसमें कहते हैं कि तू बांह पकड़ ले जिसकी पकड़नी है। जाटों में ये चलन है। इसलिए वहाँ विधवा स्त्राी बहुत कम होती हैं। वहाँ न स्त्राी की देह है, न पुरुष की इज्जत है। सबसे बड़ी संपत्ति है। संपति से बड़ा न वहाँ चरित्रा है, न स्त्राी की देह। बहरहाल निर्मला जी से मैं बहुत प्रभावित थी। 'चाक' मैंने निर्मला जी को पढ़ने को दी। राजेन्द्र यादव के लेखन से मैं बिलकुल प्रभावित नहीं थी। कमलेश्वर से थी। राजेन्द्र यादव के साथ तो मेरा नाम जोड़ा जाता है। उन्होंने तो कहा था कि उपन्यास मन्नू को दे दो, अर्चना को दे दो, इसे दे दो, मैंने कहा नहीं वह जैसा भी कहेंगी वह अलग बात है। उनमें ग्राम तत्व समझने की समझ है चाहे वे शहर में क्यों न हो?

प्रेम भारद्वाज : आप कह रही हैं कि निर्मला जी से आप बहुत प्रभावित हैं जबकि वो आपके लेखन, खासकर स्त्राी विमर्श वाली बात को ही पूरी तरह से खारिज करती है।
मैत्रोयी पुष्पा : वो अलग बात है
निर्मला जैन : यह गलत बात है। अगर आप इस तरह से आरोप लगाएँगे मुझपर तो मुश्किल होगा।
मैत्रोयी पुष्पा : खैर जो भी बातें हों मगर मैं निर्मला जैन से कापफी प्रभावित हुई कि दिल्ली से पढ़ी-पली एक स्त्राी गाँवों के बारे में इतना कुछ जानती है। भले ही निर्मला जी शहर में रहती हैं, मगर उनमें ग्रामीण तत्व है।
प्रेम भारद्वाज : 'दि सेकेंड सेक्स' की लेखिका सिमोन दि बऊआर लिखती है कि औरत की पहली लड़ाई अर्थ की दुनिया से है। आपके यहाँ अर्थ गौण है देह की प्रधानता है।
मैत्रोयी पुष्पा : अर्थ के लिए तो तब निकलेगी जब देह को निकलने दिया जाएगा। अगर कभी भी हमें रोका जाता है तो हमारे शरीर का वास्ता देकर। तुम यहाँ जाओगी। इतना वहाँ जाओगी। तुम इसकी बात सुनोगी, उसकी बात नहीं सुनोगी। इसे देखोगी, उसे नहीं।
प्रेम भारद्वाज : लेकिन आपकी कहानियाँ विवाह संस्था पर लगातार प्रहार करती रही हैं। अभी कानपुर में आप ने कहा कि हम औरतें कुत्ते वाली वपफादारी नहीं करते। क्या इस तरह के बयान से परिवार संस्थाएँ टूटेंगी नहीं?

मैत्रोयी पुष्पा : देखिए, मैं पन्नाधाय की बात कर रही थी। पन्नाधाय ने वपफादारी दिखाते हुए अपना बेटा मरवा दिया। राजा का बेटा बचा लिया। वहाँ कमल मुसद्दी आयीं और बोली कि मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ। बोली कि उसने अपना राष्ट्र बचाने के लिए अपना बेटा मरवा दिया। मैंने कहा कि नहीं, राष्ट्र के लिए नहीं, राजा को बचाने के लिए उन्होंने अपना बेटा मरवा दिया। उसने राजशाही को बचाया। अब इतना बदलाव तो आना ही चाहिए। मैं ऐसी वपफादारी से इंकार करती हूँ।
प्रेम भारद्वाज : ऐसे में विवाह संस्था का क्या होगा?
मैत्रोयी पुष्पा : विवाह संस्था में जो अरेंज मैरिज है वह तो एडजस्टमेंट ही है। हमारे यहाँ के आदर्श विवाह में बताया जाता है कि ये आदमी आज से तुम्हारा पति है और आज से तुम इसे प्रेम करो। लेकिन हमलोग ऐसा नहीं कर पाए यह ईमानदारी की बात है। हम उनके साथ रहे, तमाम समझौते किए, उनका भला चाहा। लेकिन जो हमारे प्यारे-दुलारे थे उन्हें भी नहीं भूल पाए। जिस दिन शादी होती है तो क्या उस दिन हम सब भूल जाएँ। क्या सचमुच ऐसा हो पाता है? हम उनको कितनी जगह दे पाएँगे, यह अलग बात है। मैं मानती हूँ कि हमारे पतियों से जो संबंधित रही हैं, जिन्होंने हमसे पहले उन्हें चाहा, उन्हें छोड़ने की बात न मैंने सोची, न वे सोच पाएँगी। चाहे जितने बंधन मुझ पर लगे हों पर मैंने सापफ बताया कि ये मेरे मित्रा रहे हैं।

प्रेम भारद्वाज : इसके बाद विवाह संस्था बच कहाँ जाती है?
मैत्रोयी पुष्पा : मुझे देखिए। क्या मैं इसका उदाहरण नहीं हूँ?
निर्मला जैन : क्या आप मान रहे हैं कि विवाह संस्था बची हुई है? मैत्रोयी ने जो हाल बताया वह अरेंज मैरिज का कहा। आप प्रेमविवाह का हाल देखिए। समझौता है, वही २१वीं रील। यही सच्चाई है। ये जो समझौते किये जाते हैं इसके कई कारण होते हैं। समाज में आपकी इमेज, बच्चे। सबसे बड़ी वजह हैं बच्चे। कई दंपत्ति एक छत के नीचे अजनबियों की तरह वर्षों गुजार देते हैं बच्चों के लिए।
वो जो प्यार में पागल होते थे कभी। शादी के बाद पता लग जाता है न ये कामदेव हैं, न मैं उर्वशी। हाड़ मांस के इंसान हैं-सामान्य। कहते हैं न शादी क्या होती है-नून, तेल, लकड़ी। शादी का मतलब है नून, तेल, लकड़ी। जितनी सुरक्षा मिली है, उतना ही समझौता करती हैं स्त्रिायाँ। पुरुष भी इसी तरह से करते हैं कि स्त्राी ने द्घर संभाल लिया है तो ठीक है।
प्रेम भारद्वाज : कहीं ऐसा तो नहीं कि इससे कोई बेहतर विकल्प नहीं है इसलिए विवाह संस्था बनाया हुआ है?
निर्मला जैन : नहीं विकल्प वाली बात नहीं... ये समाज की एक व्यवस्था है। मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि ये एक संस्था है... कुल मिलाकर आप ये देखिए न जहाँ विवाह नाम की संस्थाएँ टूट गईं वहीं समाज का क्या हुआ-हर कोई अपनी जगह असुरक्षित है।
अपूर्व जोशी : एक बात बताइए निर्मला जी! कि देह मुक्ति की बात चली और अभी अर्थ मुक्ति का प्रसंग उठा... नारीवादी आंदोलन के बावजूद आज २००९ तक महिलाओं की जो छवि उभरकर आयी है वह 'कांटा लगा' वाली है। वहाँ तक पहुँचने पर आप उसे कैसे परिभाषित करेगी?
वंदना राग : बात कांटा लगा से भी आज आगे बढ़ गई है।
निर्मला जैन : इस पर मूल निर्णय देना समय के इस बिन्दु पर मुश्किल है। दरअसल, इसके क्या नतीजे होंगे, थोड़ा वक्त और बीतने दीजिए तब समझ में आएगा। जिंदगी की अपनी एक गति होती है। समय की अवधारणा बहुत विचित्रा है। हम अलग-अलग लोग एक ही समय में कई समय में जीते हैं। हमारे भीतर एक धर्मप्राण व्यक्ति है, हमारे भीतर सारे रिश्तेदारियों के परिभाषित व्यक्तित्व हैं, व्यावसायिक व्यक्ति भी हैं। आप एक यथार्थ में नहीं, अलग-अलग यथार्थों में एक ही समय में जी रहे हैं। समय एक ही है जब जमीन पर बैलगाड़ी भी चलती और आसमान में जेट उड़ते हैं। दोनों सच्चाई है। यथार्थ आप चाहे जिसे कहें।
अपूर्व जोशी : आपने यह अच्छी बात कही। नई लेखिकाओं के बारे में शुरूआत में आपने कहा था कि उनका लेखन एक शगल होती है।
निर्मला जैन : नहीं! यह नहीं कहा।
वंदना राग : इन्होंने कहा कि शगल नहीं है।

अपूर्व जोशी : अच्छा! नहीं कहा। खैर, जब हम नैनीताल में नामवर जी से बात कर रहे थे तब चंदन पाण्डे की कहानियों को लेकर एक बात उठी थी संयुक्त परिवार को लेकर। जिन्होंने संयुक्त परिवार नहीं देखा या जिन परिस्थितियों से आप गुजरी हैं उन परिस्थितियों से वंदना या कविता नहीं गुजरीं। वह उस पर लिख कैसे सकती हैं। तो क्या इस कारण से उनके लेखन को खारिज किया जा सकता है? जैसे अब लेखन में संयुक्त परिवारों या ग्रामीण जीवन की बातें नहीं आ रही हैं, यह एक यथार्थ है। इसकी अच्छाई बुराई के बारे में नयी पीढ़ी लिख भी नहीं सकती। बार-बार यह प्रश्न उठाए जाते हैं कि लेखन में परिवार कहाँ है? गाँव कहाँ है? अगर वंदना जी मध्यवर्ग में पैदा हुई हैं तो वे यहीं की जटिलताओं की, परेशानी की बात करेंगी। वे मैत्रोयी जी की परिस्थिति की बात नहीं कर सकतीं।
निर्मल जैन : मैं यह शिकायत नहीं कर रही कि ऐसी चीजों पर वंदना राग या कविता क्यों नहीं लिख रही हैं। मेरा कहना है कि कुल मिलाकर जो द्घेरा बनता है उसमें ये चीजें गायब हैं। जैसे मैत्रोयी जी कस्बे से आई हुई हैं। यहाँ आकर अपने आपको डेवलप करती हैं। इस बात पर सोचा जाना चाहिए कि उन जगहों से लेखिकाएँ क्यों नहीं आ रही हैं।
वंदना राग : इस तथ्य को मैं बताना चाहती हूँ उन तबकों से लेखिकाएँ इसलिए नहीं आ रही हैं क्योंकि समाज में जैसे-जैसे परिवर्तन हुए तो सारी लेखिकाएँ पढ़ लिखकर एक जगह पहुँच चुकी हैं। अभी मैं अपने स्कूल के वार्षिक समारोह में गई थी तो आप मानेगी नहीं कि उसमें मैं अकेली हाउसवाइपफ थी, लेखिका कर्म तो उसके साथ जुड़ गया है। मेरे जनरेशन की शायद कोई महिला होगी जो इस समय द्घर में बैठी होगी। जबकि हमारे बैकड्राप में ऐसा नहीं है कि मैं किसी बहुत बड़े शहर से आयी हूँ। मेरी सभी सहेलियाँ छोटी जगहों से आयी थीं। लेकिन २० सालों में समाज बेहद बदल चुका है। किसी छोटे-छोटे शहरों से निकली लड़किया थीं।
कविता : आज गाँव भी कितना बदल गया। वहाँ आज सारी सुविधाएँ हैं।
मैत्रोयी पुष्पा : इतना भी नहीं बदला है, संस्कार वही हैं।
वंदना राग : नहीं, संस्कार भी बदले हैं।
कविता : माँ-बाप भी बदल रहे हैं। कापफी खुलापन आ रहा है।
वंदना राग : बिहार के गाँव से ही हम आते हैं। वहाँ के गाँवों से लड़कियों को दिल्ली पढ़ने भेजा जा रहा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली आधी लड़कियाँ ऐसी जगहों से हैं। यथार्थ इस तरह से परिवर्तित हुआ है कि वो लेखिकाएँ गाँव में रहकर नहीं लिख रही हैं। उनका एक तरह से विस्थापन हो गया है। जिस तरह से पुरुष लेखकों का हो गया है।
निर्मला जैन : इस पर एक सवाल उठता है कि क्या लेखक अपने तात्कालिक अनुभवों पर ही लिखने की सामर्थ्य रखता है।
वंदना राग : नहीं होता है।

निर्मला जैन : आप ;वंदना रागद्ध बचपन से निकलीं यहाँ तक पहुँच पायीं। आप ;वंदना रागद्ध से मेरा मतलब आप जैसी वर्किंग वुमन। आपने बचपन में कुछ देखा, युवावस्था में कुछ देखा। वहाँ से ट्रांसपफारमेशन देखा। तो क्या आपके अंदर कुछ ऐसी चीजें नहीं हैं जो आपके अवचेतन मन में, संस्कार में, स्मृति में हों? क्या उनकी कोई सार्थकता नहीं है।
वंदना राग : है, क्यों नहीं है और वैसी कहानियाँ भी हैं। गीतांजलीश्री का पहला उपन्यास 'माई', वह तो उसी प्रकार की कस्बाई मनःस्थिति व पात्राों को लेकर लिखा गया है।
निर्मला जैन : पिफर गीतांजलीश्री पर पहुँच गयी?
वंदना राग : एक गीतांजलिश्री ही नहीं। नीलाक्षी को ही लेते। 'एक था बुझवन' में उन्होंने पूरी तरह से गाँव की बात लिखी। अल्पना की कहानियों में भी है पहाड़ और गाँव। कविता की कहानियों में गाँव है। मनीषा कुलश्रेष्ठ के लेखन में भी जनजातियों का वर्णन है। 'कुरजा' या 'कठपुतलियाँ' कहानी में जनजातियों का वर्णन है।
निर्मला जैन : मैं कहना यह चाह रही थी कि एक अनुभव जो आज आपको हुआ वह आपके अवचेतन मन में पड़ा रहेगा। कुछ समय बाद वह आपको परेशान कर रहा है और किसी मूमेंट में जब ऐसी द्घटना होती है तो वह याद आ जाता है। जब आप टाइम डामेंशन का अतिक्रमण करते हैं तब बड़ी अच्छी रचनाएँ आती हैं। इसलिए वापस लौटते हैं 'मित्राो मरजानी' पर। कृष्णा सोबती ने बताया कि मित्राो की तरह किसी औरत को कभी देखा था। उसकी वह इमेज सालों मन में पड़ी रही। बीसियों साल बाद कहीं बराबर के एक द्घर में सास बहू में झगड़ा हो रहा था, तो बहू सास से डांटकर कह रही थी कि तू इस नकारा बेटे को वैद्य के पास ले जा। इसका कुछ इलाज कर। तो पच्चीस साल पहले की वह औरत और यह वाक्य तुरंत खट से जुड़ गया। एक स्मृति कोष होता है व्यक्तियों में।
ममता कालिया : चाहे लेखक हो या लेखिका उसके लिए यह स्मृतिकोष बहुत जरूरी है।

वंदना राग : नहीं हम भी अपनी स्मृतिकोष में यादों को संजोए हुए हैं। अब बीस साल बाद जब रचनाएँ आएँगी, आकलन होगा तब पता चलेगा न।
प्रेम भारद्वाज : खासकर युवा पीढ़ी पर यह आरोप लगता रहा है कि उनके अनुभव का संसार बहुत छोटा है। कहानियों में प्रेम, लिव-इन-रिलेशनशिप है, सांप्रदायिकता, किराए की कोख आदि विषय के अलावा हाश्िाए पर पड़े समाज या छोटी संवेदनाओं से जुड़े मुद्दे नहीं आ पा रहे।
वंदना राग : ऐसा बिल्कुल नहीं है। क्योंकि हम युवा लेखिकाओं की बात कर रहे हैं। इसलिए आप भी कोई चार पाँच लेखिकाओं के नाम उठा लीजिए ३० से ४५ साल वर्ग में। मुझे नहीं लगता कि उनके विषयों में केवल स्त्राी विषय या उन्हीं पर कहानियाँ होती हैं। क्योंकि समाज में अब यह मुद्दा नहीं रहा। आज जब हम इस बदलते हुए यथार्थ की बात कर रहे हैं कि गाँवों से लड़कियों को पढ़ने भेजा जा रहा है तो लेखिकाएँ भी उस टाइम स्पैन में ट्रैवल कर रही हैं। ऐसा नहीं कि वह नहीं जा रही हैं। उनके ऊपर ऐसी बंदिशें भी नहीं हो सकतीं।
कविता : बंदिशे दूसरे तरह की हैं। वंदना जी जिसे आप लड़कियों की जिंदगी में आया बदलाव बता रही हैं, मुझे वह भी ऊपर-ऊपर दिखता है। समाज के एक बड़े हिस्से में अब भी बहुत हदतक यह शादी के बाजार की तैयारी है। तुम पढ़ने तो बाहर जा सकती हो, लेकिन शादी अपनी मर्जी से नहीं करोगी। लड़का तो हम ही चुनेंगे तुम्हारे लिए।

ममता कालिया : महुआ मांजी की कहानी 'रोल मॉडल' या चित्राा मुद्गल का उपन्यास 'आवां' क्या है? एक कस्बे से आयी हुयी लड़की धीरे-धीरे कहा पहुँच जाती है। वह स्त्राी विमर्श की सारी लड़ाई लड़ती है। और अंत में एक पिछड़े जाति के लड़के से शादी करती है।
प्रेम भारद्वाज : इन १० सालों के दौरान युवा पीढ़ी ने आंदोलनों को लेकर, या आदिवासी महिला या संद्घर्षों को लेकर बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं। उसे मैं सुनना चाहता हूँ, मुझे उनके नाम याद नहीं आ रहे हैं, वो आई हैं तो बहुत कम संख्या में।
निर्मला जैन : पहले आप बताएँ कि आप संद्घर्ष को परिभाषित कैसे करते हैं। स्त्राी द्घर के भीतर रह कर जो संद्घर्ष कर रही है वह भी तो एक संद्घर्ष है।
ममता कालिया : वह दोहरा संद्घर्ष करती है।
प्रेम भारद्वाज : हाँ संद्घर्ष का यह पक्ष तो है पर दूसरा संद्घर्ष का पक्ष कम दिखाई देता है।
वंदना राग : दूसरा पक्ष कैसा?
प्रेम भारद्वाज : कोई आंदोलनों, आदिवासी महिला, जीवन संद्घर्ष...
वंदना राग : समाज में कोई आंदोलन ही नहीं चल रहे हैं तो कहानियाँ किस पर आएँगी।
प्रेम भारद्वाज : नहीं, ऐसा नहीं है, आंदोलन है। आप आदिवासी इलाको में चले जाइए तो वहाँ बहुत सा संद्घर्ष देखने को मिलेगा। पर देखा यह जा रहा है कि पूरा लेखन एक स्टीरियो टाइप हो रहा है।
वंदना राग : मैं नहीं मानती कि लेखन स्टीरियो टाइप हुआ है। अगर आप १० साल के लेखन की बात कर रहे हैं जिस दौरान हुए सामाजिक आंदोलन तथा संद्घर्ष कथा में नहीं दिखलाई पड़ रहे हैं तो इसका कारण समाज का बदला हुआ ढांचा है। जैसे-जैसे समाज का ढांचा बदलेगा उसके संद्घर्ष भी बदलेंगे। मान लीजिए कोई लड़की जो कस्बे से दिल्ली जैसे शहर में आती है, रोजमर्रा के जीवन में अपने आपको एडजस्ट करना है यही उसका संद्घर्ष है। उसके साथ परिवार भी संलग्न है। चूंकि समाज का एक हिस्सा है। मैं मानती हूँ कि जो बड़े संद्घर्ष परिवारों और लड़कियों के बीच हो गया है वह किसी तरह देह से अलग अपने आप को समाज में स्थापित करना है।
निर्मला जैन : यह सारा कुछ बाजार से संचालित है।

प्रेम भारद्वाज : इसी के बरक्स हम देखते हैं कि पिछले दो दशकों से भूमंडलीकरण और बाजारवाद का दौर आया है। इसका दावा है कि उसने स्त्रिायों को 'पावर वुमन' बना दिया। सवाल है उसने स्त्रिायों को क्या दिया है।
वंदना राग : बेशक औरतों को भूमंडलीकरण ने एक हद तक स्वतंत्राता दी है। वह हर जगह नौकरी कर सकती है, पहचान बना सकती है। उसे अब कहीं भी हीन दृष्टि से नहीं देखा जाता है।
निर्मला जैन : उसे टारगेट वहीं बनाया जाता है जहाँ वह प्रतिस्पर्धा में खड़ी होती है। अगर वह प्रतिस्पर्धा में खड़ी होगी तो सबसे पहले उसके पुराने संस्कार जागृत होंगे और उसके करैक्टर को कैल्कुलेट करेंगे। तब वहाँ आ जाता है दकियानूसी।
प्रेम भारद्वाज : बात बाजार की चल रही है तो बाजार का संबंध विज्ञापन से है। विज्ञापन के मास्टर माइंड एंड गुरु प्रलृाद कक्कड हैं। उनका कहना है कि वे औरत की देह का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि वह पुरुषों की अपेक्षा सौंदर्य शास्त्राीय लिहाज से ज्यादा आकर्षित करती है।
इस कथन के परिप्रेक्ष्य में देखें तो क्या बाजार स्त्राी का शोषण नहीं कर रहा है।
वंदना राग : बिल्कुल नहीं कर रहा, अगर ऐसी बात है तो विज्ञापन में पुरुषों को भी निर्वस्त्रा दिखाया गया है, उनका भी शोषण हो रहा है।
निर्मला जैन : बलात्कार को तब बलात्कार मानते हैं जब तक संबंध उसकी मरजी से न बने हो। अगर उसकी मरजी में किया गया हो तो पिफर वह बलात्कार नहीं होगा। मेरा सवाल ये है कि विज्ञापन जिन महिलाओं का किया जाता है वह उनकी मर्जी के बगैर नहीं किया जाता। अगर औरतें तय कर लें कि वे विज्ञापन का मॉडल नहीं बनेंगी पिफर देखें कैसे कोई उनका शोषण कर लेता है।
वंदना राग : निर्मला जी, इसमें एक बात और है। दरअसल अब मोरल्टी का इश्यू बदल चुका है, क्योंकि स्थितियाँ पहले वाली नहीं रही हैं। इसलिए देह दिखाने जैसी बात से पफर्क नहीं पड़ता। हर मनुष्य के अंदर वही है। सेंसेशेनल जैसी चीजें रहती है। लेकिन वही उसका एजेंडा नहीं रहता है। इसके पीछे उसका मकसद पैसा कमाना रहता है।
अपूर्व जोशी : और आगे बढ़ना भी।
प्रेम भारद्वाज : अगर मोरल्टी एक मुद्दा नहीं रहा है तो ऐसे में अनैतिकता को आज के दौर में कैसे परिभाषित करेंगे? अश्लीलता की क्या परिभाषा होगी?
मैत्रोयी पुष्पा : पहले जो नैतिकता थी अब वह नहीं है। अब औरत ने अपने मापदण्ड बनाकर तय कर लिया है कि क्या होना चाहिए, क्या नहीं।

प्रेम भारद्वाज : हमें एक परिभाषा चाहिए।
मैत्रोयी पुष्पा : परिभाषा कोई नहीं है। जब औरत इतना आगे आ गई है तो वह खुद अपनी नीतियाँ बनाएगी, क्योंकि पहले की नीतियों में उसे नहीं पूछा गया था।
प्रेम भारद्वाज : तो पिफर अनैतिक क्या है?
मैत्रोयी पुष्पा : अनैतिकता तो आप लोग ढूँढ़ते हैं। अनैतिक बलात्कार है, जिसमें उसकी मर्जी नहीं होती। औरत की इच्छा के विरु( कुछ भी करना अनैतिक है।
वंदना राग : बलपूर्वक किसी पर अपनी मर्जी थोपना है अनैतिकता। चाहे वो धन कमाना हो, गुंडई करना हो, बलात्कार करना हो, सारी चीजें अनैतिकता हैं।
प्रेम भारद्वाज : यानी कि किसी की इच्छा के बगैर कोई काम करना अनैतिकता है।
मैत्रोयी पुष्पा : अश्लीलता तो आँखों में समाई रहती है। एक नंगे चित्रा को देखने में अश्लीलता नहीं दिखती। क्योंकि वहाँ कलात्मकता होती है। वह समझ में नहीं आती। अगर कुछ लिख दीजिए तो दुनिया भर में आ जाएगा। सवाल यह है कि आपकी आँख क्या देखती है। मैंने अपने उपन्यास में गाँव की राजनीति, वहाँ के माहौल, गाँव में क्या हो रहा है सारा लिखा। किसी का ध्यान उसमें नहीं गया। उनकी निगाहें वहाँ खासतौर से स्त्राी यौन संबंधों पर ही गईं। वहाँ की समस्याएँ किसी ने नहीं देखी कि वहाँ औरतें कैसे जूझ रही थीं, क्या करती थीं... वगैरह।
निर्मला जैन : मैंने इस संदर्भ में इनसे यह सवाल पूछा था कि गाँव की एक औरत यूनियन बना सकती है, गाँव में ऐसा हो सकता है। 'इदन्नमम' में यह प्रसंग है। तो इन्होंने कहा-हाँ ऐसा हो सकता है। मुझे लगता है इसका अंत ही गड़बड़ है।
मैत्रोयी पुष्पा : आपको लगा होगा। निर्मला जी पिफर भी मैं कहती हूँ कि जो मैंने देखा वही लिखा। सब आँखों देखी था। अब प्रमाण क्या दूँ। अशोक वाजपेयी और मैनेजर पांडे मेरे साथ उरई गये थे तब मैंने उन्हें वहाँ के पात्राों को दिखाया था, जो मेरी रचनाओं में आए हैं।
प्रेम भारद्वाज : बाजारवाद ने किस तरह नारियों को बदला है।
मैत्रोयी पुष्पा : उनके पास वे सुविधाएँ आयी हैं जो पहले नहीं थीं। ममता जी ने लिखा है- 'बोलने वाली औरत'। जाहिर है मोबाइल और पफोन से वह बोल ही रही है।
निर्मला जैन : उनके हाथ में पैसे के रूप में भूमंडलीकरण ने एक ताकत दी है।
वंदना राग : मोबाइल भी एक बहुत बड़ा पफोर्स है।

ममता कालिया : दिक्कत यही है सबसे बड़ी कि शक्ति के इतने बड़े बिंदु आज के बदले हुए समाज में उसे मिले हैं। उतने ही बड़े बिंदु उसे अशक्त करने के लिए लगे हैं। पाश्विक हिंसा बढ़ी है। जब हम महिला लेखन पर बातचीत कर रहे हैं तो यह भी चिंता का विषय है कि इतनी हिंसा आज क्यों है। वहाँ भी हिंसा है जहाँ वह अपने आपको स्त्राी नहीं मानती। आई आई एम की एक लड़की जो विनर अवार्ड पाती उसकी हत्या उस दिन हो जाती है जिस दिन उसे अवार्ड मिल रहा होता है। यह हिंसा केवल सेक्स के कारण नहीं है।
अपूर्व जोशी : यह स्पर्धा के कारण है।
निर्मला जैन : स्त्राी के साथ दिक्कत बॉयलाजिकल है। उसके संस्कार में सीता-सावित्राी वाला सिंड्रोम बसा हुआ है। लोग सोचते हैं कि बलात्कारी चाहे ५० का बलात्कार कर ले उसका कुछ नहीं बिगड़ता। जिसका बलात्कार हो गया उसकी दुनिया उजड़ गई।
कविता : एक सर्वे आया था जिसमें ५० प्रतिशत पुरुष कह रहे थे कि हमें वर्जिनिटी से कोई मतलब नहीं है।
वंदना राग : वर्जिनिटी अब इश्यू नहीं रहा।
निर्मला जैन : सोच का बदलाव लोगों के कहने से नहीं आता, कर्म से आता है। उस आदमी को जब बीबी चुननी हो तब वह किसी बलात्कारी से शादी करे तब बात होती है। ठीक है कि सोच में पफर्क आया है। आज भी सारे खुलेपन, प्रगतिशीलता और चिंताओं के बावजूद कोई बलात्कार पीड़िता से शादी कर भी लिया तो साल दो साल बाद वह उस बात को एक अस्त्रा की तरह इस्तेमाल करेगा। उसे उसकी औकात बताता रहेगा कि मैंने तुम्हारे साथ ऐसा किया। तुम इस लायक नहीं थी। भारत तो छोड़िए बाहर के देशों में बुरा हाल है। आप यू. के. चले जाइए, अमेरिका में देखिए। जापान तो भयंकर कंजरवेटिव है। उसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं।
कविता : मेरे प्रिय कवि राजेश जोशी की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं-'बारूदी पंखों वाली चिड़िया उड़ना सीख, उड़ने से पहला लड़ना सीख' मुझे लगता है कि पूरा स्त्राी लेखन इसी उड़ने और उड़ने के हक के लिए लड़ने का उपक्रम है।
प्रेम भारद्वाज : कविता जी! आप अपने से पहले की पीढ़ी और आज की पीढ़ी के लेखन में आयी स्त्राी में क्या अंतर महसूस करती है।
कविता : बहुत ज्यादा तो नहीं मगर कुछ में पफर्क है। जैनेन्द्र के समय की जो कहानियाँ हैं उनमें विचलन जैसा कुछ होता था कि ऐसा चुनाव करें या न करें। चाहे मन्नू भंडारी की कहानी हो या उषा प्रियंवदा की कहानियाँ, वहाँ एक द्वन्द्व चलता रहता है। अब लेखिकाएँ निर्द्वंद्व होकर चुनती हैं। बोल्डनेस बढ़ी है। विचारधारा परिपक्व हुई है। वह अपनी अस्मिता का सवाल उठाती है। शुरू की कहानियों के बारे में बता रही हूँ। राजेन्द्र बाला द्घोष थीं जो बंग महिला नाम से लिखती थीं। अब वह नाम बदलकर क्यों लिखती थीं? शायद उनके ऊपर दबाव था। वे स्त्राी चरित्राों पर कहानियाँ लिख रही थीं। उनके जो भी स्त्राी चरित्रा थे वे सधे हुए थे। वे उन्हें इंसान के तौर पर देखती थीं। उस समय अगर पुरुष लिख रहे थे तो सती, विधवा की बेटी, वेश्या की बेटी जैसी सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण वाली रचनाएँ कर रहे थे। उसके बाद जैनेन्द्र लिखते हैं-'पत्नी' जो स्त्राीवादी कहानी है। वह बहुत अच्छी कहानी है। स्त्राी में विद्रोह उठता है, मगर उस विद्रोह को दबा लेती है। मैत्रोयी की गोमा हँसती है, ममता जी की 'बोलने वाली औरत' है। सब अपने मुखर अंदाज में स्त्राी की परेशानियों-दिक्कतों को सामने लाती हैं। वहीं पुरुषों ने सहानुभूतिपूर्ण लिखा। जब नयी कहानी का दौर आया तो इसमें बहुत सी नयी चीजों को उठाया गया। जैसी जिंदगी थी वैसा ही उन्होंने लिखा। तब जब राजेन्द्र यादव लिखते हैं तो 'एक कमजोर लड़की की कहानी' 'जहाँ लक्ष्मी कैद है' वे स्त्रिायों की कुमति-विमति दिखाते हैं। वहीं मन्नू भंडारी लिखती हैं-'यही सच है'। इसमें एक लड़की की कहानी है जो बाहर रहती है। उसका कश्मकश है। यह आगे जाने की बात है। हर पीढ़ी में यही हुआ है। उदय प्रकाश की पीढ़ी हो या संजीव की। संजीव जी के यहाँ मामला छायावादी है। 'सागर सीमांत' में स्त्राी की बहुत बोल्ड करेक्टर है लेकिन वह भी कहती है कि अंधकार में छोड़कर जाओ। यह क्या है? वही गीतांजलीश्री लिखती हैं, मैत्रोयी जी या ममता जी लिखती हैं तब उनका संद्घर्ष कहानी में आता है।

निर्मला जैन : एक पफैसला लेने का आत्मविश्वास होता है।
कविता : आज के पुरुषों के लिए स्त्राी तो महत्वाकांक्षी है।
वंदना राग : कविता, मुझे इसमें लगता है कि आज के पुरुष जो लिख रहे हैं उनका परसेप्सन सबसे ज्यादा खतरनाक है और डूबियस भी। आज की जो लेखिकाएँ एक कस्बे से निकलकर शहरों में पहुँच गयी हैं। पुरुष लेखक कस्बों से निकलकर महानगरों में आये हैं। यह मानना पड़ेगा कि मानसिकता के स्तर पर स्त्रिायों ने छलांगें लगाई हैं। वो कापफी आगे निकल गई हैं। वे आज सांप्रदायिकता से लेकर बाजारवाद पर अपनी कहानियाँ कह रही हैं और वो पुरुष के मुँह से भी कहानी कहती हैं, बखूबी कहती हैं। अब पुरुष क्या कर रहे हैं? बहुत कम पुरुष लेखक हैं जो स्त्राी पर बढ़िया लिख रहे हैं। इस वक्त एक मात्रा चंदन का नाम याद आता है जो स्त्राी को एक रियल स्त्राी की दृष्टि से देखता है। उसमें यह बात है। उसकी 'नकार' कहानी उठाइए।
कविता : 'नकार' तो नहीं। हाँ! 'परिन्दे' है। उसमें भी स्त्राी पक्ष है।
वंदना राग : हाँ! इसमें भी है। 'रेखाचित्रा' में, धोखे की भूमिका कहानी में भी स्त्राी है, स्त्राी के हाव-भाव हैं। बहुत ही बारीकी है उसकी कहानियों में। 'नकार' में एक बहुत ही खूबसूरत बात है जो मैंने उससे भी नहीं कही है। लेकिन मैं यहाँ कहना चाहती हूँ कि कहानी की नायिका जब अपनी माँ से मिलने जा रही है तो अपनी साड़ी में पाँच या छह प्लेट लगाती है। यह एक बहुत ही बारीक बात है। एक स्त्राी होने के नाते मुझे नहीं पता रहता कि मैं अपनी साड़ी में पाँच या छः प्लेट लगा रही हँू। वह बड़ी सहिष्णुता के साथ लिखता है। उसमें एक स्त्राी की माँ से मिलने की जो बेटी की तड़प को वह लिखता है मुझे लगता है कि युवा लेखक ने पहली बार इस बात को डिपिक्ट किया है।
इसके अलावा जो अन्य लेखक आये हैं-मुहम्मद आरिपफ, राकेश मिश्र वे एक अच्छे लेखकों की श्रेणी में आएँगे। लेकिन इनके साथ समस्या तब आती है जब ये स्त्राीवादी कहानी लिखते हैं। तब ये पूरी तरह से गड़बड़ा जाते हैं।
प्रेम भारद्वाज : मो. आरिपफ की कहानी 'पफूलों का बाड़ा' कहीं न कहीं भ्रूण हत्या को जस्टीपफाई करती है।
वंदना राग : आरिपफ का इंटेशन बिल्कुल वैसा नहीं है। इसलिए मैं कह रही हूँ कि आरिपफ बहुत अच्छे कथाकार हैं। मेरे प्रिय कथाकार में भी आरिपफ हैं। ये सारे कथाकार बैकवर्ड नहीं हैं। ना ही इनकी शिक्षादीक्षा ही ऐसी है। स्त्राी जाति के प्रति सहिष्णुता भी है। पर स्त्रिायों के साथ अपनी स्थिति को और संबंधों को लेकर पूर्णतः कन्फ्रयूज हैं।
प्रेम भारद्वाज : कहीं न कही पुरानी सोच है।

वंदना राग : नहीं, पुरानी सोच नहीं है। इस मुहाने पर आकर वह सोच नहीं पा रहे हैं कि आप अगर स्त्राी को प्रोग्रेसिव या खिलंदड़ी दिखाते हैं तो उसे डिवोच न दिखाए। पहले जैसा था कि खिलंदड़ी स्त्राी यानी व्याभिचारिणी स्त्राी मानी जाती है। पर आज जब उनका साबका खिलंदड़ी व्याभिचारिणी स्त्राी से नहीं होता है तो जब वे कहानी में इसको लाते हैं तो वे इस द्घालमेल को प्रस्तुत नहीं कर पाते हैं।
ममता कालिया : 'पफूलों का बाड़ा' में जब वो बात करते हैं तो नार्मल नहीं रह पाते हैं, कितना गंदा लगता है, यह एक डर्टी कहानी है। इनकी 'लू' और 'मौसम' अच्छी कहानी थी।
कविता : मैं थोड़ा आप लोगों को पीछे ले जा रही हूँ जब स्त्राी-पुरुष लेखन की बात चल रही है। उसे थोड़ा मैं सापफ कर देना चाहती हूँ कि स्त्राी लेखन क्यों? मुझे लगता है कि स्त्राी एवं पुरुषों की दृष्टि में जो संवेदना होती है उसमें पफर्क होता है। और जैसे ही दृष्टि और संवेदना में पफर्क होगा लेखन में अपने आप पफर्क आ जाएगा। अब जैसे मासिक धर्म की बात करें तो मासिक धर्म को पुरुषवादी व्यवस्था ने एक शर्म का विषय बना दिया। मासिक धर्म एक ऐसा बॉयोलाजिकल प्रॉसेस है जिससे स्त्राी होने का अस्तित्व जुड़ा होता है तो उसे आपने शर्म बना दिया। और आज कथाकारों ने उसे खेल बना दिया है।
वंदना राग : सेंससनलिज्म!
कविता : स्त्राी पात्राों को लेकर आज की कहानियों की असंवेदनशीलता को रेखांकित करने के लिए मैं इधर आई कुछ ऐसी कहानियों का उल्लेख करना चाहती है जिसमें मासिक धर्म आया है। ये कहानियाँ हैं मो. आरिपफ की 'चोर सिपाही', उमाशंकर चौधरी की 'शेक्सपीयर क्या तुम उससे मिलोगे, आशुतोष भारद्वाज की 'बेविकल्प'। इसे पढ़कर आप कह सकते हैं कि इसे कोई स्त्राी नहीं लिख सकती थी। एक कहानी में एक पुरुष मासिक धर्म में पैड के लिए क्या मंगवा रहा है? वह कम उम्र के लड़के से 'साइकिल के पफोम' मंगवा रहा है। यह अवैज्ञानिक है। यहीं पर आप चित्राा मुद्गल को याद करिए। मुझे कहानी याद नहीं आ रही। उसमें एक स्त्राी के मासिक धर्म को उठाया गया है तो वह पूरी संवेदना से उसे उठाती हैं। यही दृष्टिगत पफर्क है। मुझे लगता है कि यहीं पर स्त्राी लेखन अलग हो जाता है।
निर्मला जैन : इसका संबंध रचना प्रक्रिया से है।

कविता : कृष्णा सोबती की कहानी 'ए लड़की' कोई पुरुष लिख ही नहीं सकता था। माँ-बेटी के संबंध पर है ये कहानी।
वंदना राग : नहीं, पुरुष भी लिख सकता है।
निर्मला जैन : मैं रचना प्रक्रिया की बात कर रही हूँ। यदि आप तय करके लिखते हैं कि हमें ऐसे विषय पर ऐसी कहानी लिखनी है तब आप उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए चीजों को बनाएँगे। इसलिए मुझे लगता है कि सबसे अच्छी कहानियाँ वे होती हैं जिसका आदि और अंत पहले से तय होता ही नहीं है। आपके मन में कभी कोई एक चीज आई और आपने उसे उठा लिया। उसके बाद रचना के तर्क उसे अपने आप चलाते हैं। और जब आप उसे चलाते हैं तो उसके बीच में आपका सेल्पफ लगातार हस्तक्षेप करता रहता है। आपका संस्कार, आपका स्त्राी के प्रति दृष्टिकोण, आपकी जानकारियाँ, ये तमाम चीजें अनजाने में उस रचना में काम करने लगती हैं। इससे कभी-कभी वह सहायक हो जाती है तो एक बड़ी ही खूबसूरत रचना आती है। कभी-कभी वह बाधक भी हो जाती है। जब ये बाधक हो जाती है तो यहाँ कला की असपफलता है। शायद अच्छे इरादे से उठाई गई कहानी इंटरवेशन के कारण पफेल हो जाती है। ठीक ही कहा है राकेश जी ने कि स्त्राी और पुरुष की संवेदना अलग-अलग है। इसलिए लोगों को ताज्जुब होता है कि इस मासिक धर्म पर इतना बवेला मचा है। प्रभा खेतान की 'छिन्नमस्ता' में मुझे एतराज था। उसने इसे एक बहुत बड़ा इश्यू बना दिया। पर लोगों ने कहा कि बड़ा क्रांतिकारी है। मैंने उसे पढ़ा तो देखा कि बड़ी डिटेल में लड़की के मासिक धर्म की चर्चा की थी।
प्रेम भारद्वाज : यानी मामला रचना प्रक्रिया का है।
वंदना राग : चूंकि स्त्रिायां तो पुरुष बनकर कहानियाँ लिख लेती हैं। बिल्कुल ठीक-ठीक चीजें पकड़ लेती हैं वह।
मैत्रोयी पुष्पा : हमेशा नहीं पकड़ पाती।
प्रेम भारद्वाज : आजकल यह पफैशन है कि मुझे स्त्राीवादी कथाकार नहीं कहलाना है। इसके कारण आप लोग लिंग बदलकर कहानियाँ लिखते हैं। वंदना जी, आप पर यह आपकी कहानियों को पढ़कर ऐसा लगता है कि स्त्राीवादी ठप्पा से बचने के लिए आप पुरुष बनकर कहानियाँ लिखती हैं?

वंदना राग : नहीं, नहीं यह आरोप बिलकुल गलत है।
प्रेम भारद्वाज : नहीं, आप बताएँ। आपकी 'शहादत और अतिक्रमण' कहानी बहुत अच्छी है। उस कहानी की स्त्राी में जब वंदना प्रवेश करती है तो बड़ी ही खूबसूरती से संवेदना को उभारती है। हालिया प्रकाशित कहानी 'सिनेमा के बहाने' में 'मैं' पुरुष है। अगर यह 'मैं' स्त्राी होता तो पात्रा के अनुभव ज्यादा प्रमाणिक तथा विश्वसनीय बनकर उभरते।
वंदना राग : यह आरोप बिलकुल बेबुनियाद है कि मैं स्त्राी लेखक न कहलाने के डर से 'मैं' बनकर लिखती हूँ। मैंने कुछ कहानियाँ जो लिखी हैं वह स्त्राी पर आधारित रही हैं। लेकिन मैं यह भी मानकर चलती हूँ कि मुझे केवल स्त्राी होकर कहानियाँ नहीं लिखनी हैं। कई विषय ही ऐसे होते हैं। अगर मुझे सांप्रदायिकता का विषय ठीक लगता है। मैंने 'यूटोपिया' में जिक्र किया। मुझे लगा कि वह इश्यू इतना महत्वपूर्ण है कि उसमें स्त्राी-पुरुष की बात ही नहीं आती। उसमें एक कम्युनिटी की बात ही आती है।
निर्मला जैन :वंदना, जैसे ही आपने यह सोचा कि मुझे स्त्राी होकर यह नहीं लिखना है तो वैसे ही आधी बात गड़बड़ हो गई। क्योंकि स्त्राी तो आप हैं। वैसे मैं राजेन्द्र यादव से सहमत नहीं होती हूँ पर उनकी इस बात से सहमत हूँ बाई बर्थ आप स्त्राी तो हैं ही तो मैं उनकी इस बात का समर्थन करती हूँ।
प्रेम भारद्वाज : हाँ, राजेन्द्र यादव की यह बात भी सही लगती है कि लेखक होना आपका चयन है, स्त्राी होना नहीं।
कविता : 'यूटोपिया' मुझे बहुत अच्छी कहानी लगती है पर इसका जो अंत है वो मुझे पसंद नहीं है। इसमें जिसे वह बचपन से प्यार करता है वह उसे इतनी बर्बरता से मार देता है।
निर्मला जैन : ऐसे एक-एक कहानियों पर चर्चा संभव नहीं है। एक बात कहना चाहती हूँ। वैसे भी बड़ों की बात कोई नहीं मानता। यह पफर्क आया है इन लोगों ;मैत्रोयी पुष्पा एवं ममता कालियाद्ध की पीढ़ी से आप लोगों ;वंदना राग एवं कविताद्ध की पीढ़ी में। मैंने भरे समाज में मृदुला गर्ग के उपन्यास की भाषा को उदाहरण दे देकर चिथड़े उड़ा दिए थे। मृदुला वहीं थी। उसका चेहरा जरा सा नहीं उतरा उसने वहीं से कहा कि आगे मैं स्त्राी पर उपन्यास लिखूँगी तो मैं इस बात का ध्यान रखूँगी। मैं सोचूँगी इस बात पर अगर उन्होंने कहा कि आप ;वंदनाद्ध पुरुष बनकर लिखती हैं तो डोंट ट्राय टू जस्टीपफाई। बात को स्वीकार करो। और अपनी कहानी को दुबारा जाकर पढ़ो और देखो कि क्या ये सही है। आप लोग बहुत विकास करेंगे।
प्रेम भारद्वाज : मुझे भी लगता है कि इस कहानी का अंत स्वाभाविक नहीं है। दो युगल पे्रमी में इतना प्रेम है पिफर भी वह अंत में इतना वहशी हो जाता है? प्रेम में डूबा व्यक्ति इतना वहशी नहीं हो सकता है। अगर वो है तो उसके सूत्रा पहले से ही कहानी में दिखने चाहिए थे।
वंदना राग : उसके लिए तर्क है कि जब कम्युनिटी आइडेंटिटी आप पर हावी होती है, चाहे वह जैसी भी कम्युनिटी हो, आइडेंटिटी हो, वह प्रेम जैसी कोमल भावना को याद रख ही नहीं पाता। ये तो मेरी अपनी कहानी की बात है इस पर हम बहस न करें। इस पर मैं आपको अलग से क्लेरीपिफकेशन दूँगी। और क्यों दूँगी। यह जो आप कह रहे हैं कि मैं पुरुष बनकर लिखती हूँ या मैं जानबूझ कर पुरुष की आइडेंटिटी एजूम करती हूँ। ऐसा है नहीं। कुछ ऐसा हो जाता है कि जैसा विषय की मांग होती है आदमी वैसा ही लिखता है। उससे कोई पफर्क नहीं पड़ता।
मैत्रोयी पुष्पा : सुनो, मेरी बात, वंदना! अभी हमारी बात सुनो। इस पीढ़ी में यही दिक्कत आ रही है। जैसा निर्मला जी भी कह रही हैं कि पुरानी पीढ़ी को सुना नहीं जा रहा है।

कविता : सुनना क्यों नहीं चाहती, हम आपकी बात सुनने को तैयार हैं।
अपूर्व जोशी : मैं केवल महिला लेखकों की बात नहीं कर रहा, मैं लड़कों की भी बात कह रहा हूँ। युवा लेखकों में आक्रमकता के साथ आत्ममुग्धता की बात आ गई है। नये लेखक पुराने लेखकों को सीधे तौर पर खारिज करने की बात करते हैं।
कविता : नहीं, अपूर्व जी, क्या हम लोग अनपढ़ हैं? हम लोग सीखते नहीं हैं?
वंदना : ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैत्रोयी जी मैंने आप की एक-एक चीज पढ़ी। निर्मला जी 'हंस' में मैंने दिल्ली वाला संस्मरण पढ़ा है। ऐसा नहीं है कि हम अपनी पुरानी पीढ़ी को नहीं सुनते हैं।
निर्मला जैन : यह समस्या अभी पैदा नहीं हुयी है। यह बात ६०-७० दशक के बीच की है। हम लेखक लोग नियमित रूप से बैठक करते थे। किसी भी मुद्दे पर बहस करते थे। और बहस के बाद जब उठते थे तब सभी का सद्भाव ज्यों का त्यों। उस बैठक में एक दिन सर्वेश्वर दयाल सक्सेना बोले कि क्या आप यूनीवर्सिटी में पीढ़ी पैदा कर रही हैं। मैंने पूछा क्या हुआ? वे बोले कि जब हम इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में थे तो बच्चन जी हमारे सीनियर थे। जब हम चार-छ कविताएँ लिखते थे तो हमें डर लगता था उसे दिखाने में कि बच्चन जी क्या कहेंगे? चले आए कविता लेकर, क्या समझते हैं अपने आपको। हमारी साँस गले में अटकी रहती थी। और इस बात के लिए भी हम तैयार रहते थे कि अब बौछार होगी। आजकल आप के यूनीवर्सिटी के लड़के आए दिन चले आते हैं आठ-दस कविताएँ लेकर। उसके बाद बोले कि दो कौड़ी की कविताएँ। उसके बावजूद वह कहता है कि मेरा लोकार्पण होना चाहिए, प्रकाशक बताइए, इसके लिए यह कर दीजिए, वह कर दीजिए। इस बात से हम दुखी हो गये हैं। आप समझाइए इनको।

अपूर्व जोशी : इसी पर मैं भी एक बात बताना चाहता हूँ। ये बात काशीनाथ जी ने कही। नाम नहीं लूँगा बस संदर्भ बता रहा हूँ।
मैं बड़े संकोच के साथ अपनी कहानी के विषय में पूछ रहा था। तब उन्होंने बताया कि जब हमारा समय था तब ऐसा नहीं होता था। आज हमने कहानी लिखी और दूसरे दिन तब के दिग्गज से उसके बारे में राय पूछा। हम नामवर जैसे दिग्गजों से कहें कि अब आप हम पर टिप्पणी करो। वे आगे बोले कि जब दौर आया कि हिन्दी हाशिए पर जा रही है, कहानी और कविता सिमट रही है तो हमें लगा कि नई पीढ़ी को उत्साहित किया जाए और जो लिख रहे हैं उसे अच्छा बताया जाए। काशीनाथ जी बोले कि उसका जो हश्र हुआ कि ये लड़के-लड़कियाँ सर पर चढ़ गये हैं और अब वक्त आ गया है इनको खारिज करने का। वे बोले कि इन्होंने एक दो कहानियाँ लिखीं और सुबह से काशीनाथ को पफोन करने लगेंगे कि आपने कहानी पढ़ी कि नहीं। नहीं पढ़ी तो भिजवा दूँ। अगर मिल गयी तो अब बताइए कि कैसी थी। अगर आपने खारिज कर दी तो आप पूरी तरह से खारिज हो गये। काशीनाथ ही खारिज हो गए।
कविता : हमलोगों को लगता है कि जो आगे की पीढ़ी आ रही है वह बिल्कुल नहीं पढ़ेगी और बगैर पढ़े ही खारिज कर देते हैं।
वंदना राग : अगर इसे सामाजिक विश्लेषण के साथ देखा जाए तो हम पाएँगे हमारे यहाँ जो हमारे बड़ों के साथ संबंध हैं उनमें बदलाव आया है। पहले से अधिक खुलापन आया है। आज जैसे बहुत से संपादक या सीनियर हैं जिनसे हमारा संबंध पहले की तरह आतंक वाला नहीं रहा। एक तरह से दोस्ताना संबंध विकसित हुआ है। अगर ऐसा हुआ है तो अपेक्षा दोनों ओर से हो रही है। अगर हमसे किसी ने कहा कि अच्छा लिख रही हो तो हमें दिखाना, तो हम बड़ी सहजता से दिखाते हैं।
ममता कालिया : यहाँ लेखक और संपादक को अलग करना मुश्किल है।
वंदना राग : इस तरह के संकोच से कुछ लोग खामियाजा भी भुगत रहे हैं। उन्हें वास्तव में पता नहीं लग पाता है कि उनकी रचना के बारे में क्या प्रतिक्रिया है। इसलिए सभी को एक ही छड़ी से नहीं हांका जा सकता है।
निर्मला जैन : नयी पीढ़ी की शिकायत है कि हम उन्हें नहीं पढ़ते हैं। तो भई, हम लोग भी इंसान हैं, हमारी भी क्षमताएँ हैं, हमारे समय पर भी कुछ पाबंदियां हैं। अगर मैं नई पीढ़ी से पूछूँ कि पुराना साहित्य कितना पढ़ा है।
प्रेम भारद्वाज : क्लासिक को छोड़कर।

निर्मला जैन : आप यह कैसे उम्मीद करती हैं कि एक या दो आलोचक जितना लिखा जा रहा है सब पढ़ लें। ये संभव नहीं है। अगर एक व्यक्ति की कोई रचना मुझे अच्छी मिल जाती है तो मैं कोशिश करती हूँ कि उस लेखक की जो भी नयी रचना आए मैं पढूँ।
ममता कालिया : आज यह सबको मानना पड़ेगा कि आलोचक पीछे छूट गया है और रचना, आलोचना से आगे बढ़ गयी है।
प्रेम भारद्वाज : आलोचना तो पीछे चलने वाली विधा ही है। हाँ, यह बात है कि कहानीकार बनने की महत्वाकांक्षा है और आत्ममुग्धता भी हैं। ऐसा निश्चित तौर पर है। लेकिन इसी समय कहानीकार बनाने की महत्वाकांक्षा भी लोगों के भीतर है... यह द्विवेदी के दौर से ही चला आ रहा है।
ममता कालिया : आर्थर कैल्सियर ने जिस-जिस से प्यार किया पहले उसे लेखिका बनाया पिफर उससे प्रेम किया।
निर्मला जैन : अपूर्व जी! जो बात काशीनाथ सिंह ने आपसे कही वह एकतरपफा नहीं है। अगर काशीनाथ सिंह मुझसे कहें तो मैं कहूँ कि और पट्ठे तैयार करो। आप क्यों चाहते हैं कि है कि पाँच आदमी आगे पीछे रहें? मेरे ऊपर कोई इस तरह के आक्षेप नहीं लगा सकता।
प्रेम भारद्वाज : आप डाँट देती हैं।
निर्मला जैन : अरे नहीं, मैं बड़े प्यार से पेश आती हूँ। अगर किसी की रचना अच्छी लगती है तो मैं उसे बुलाकर बताती हूँ। उसकी प्रशंसा करती हूँ।
प्रेम भारद्वाज : मुझे बहुत अच्छा लगा कि निर्मला जी ने दूसरे पक्ष की बात कही कि ऐसा होता है। एक बात मैं यहाँ कहना चाहता हूँ कि जब 'पाखी' ने संजीव पर विशेषांक निकाला तो उस पर नामवर सिंह की टिप्पणी थी कि कुछ बात है कि मैं चुप हूँ। यानी उन्हें पता है कि संजीव में कुछ कमियां हैं जिन्हें मैं नहीं कहना चाहता इसलिए मैं तो चुप हूँ। लेकिन लोकार्पण के समय कहते हैं कि अपफसोस है कि मैंने संजीव को नहीं पढ़ा। क्या यह महज अंतरविरोध है।
निर्मला जैन : उनके बारे में बहुत सी बातें मशहूर हैं। उनके बारे में बात न करें।
वंदना राग : जो ये मूल्य निर्धारण है कि हमने तुम्हें बहुत चढ़ाया है अब हम तुम्हें गिराएँगे। खुदा बनने की तमन्ना है।
प्रेम भारद्वाज : यह भी अपने किस्म की महंतई है।
निर्मला जैन : किसने कहा था कि आप नामवर सिंह को बुलाओ... आप उन्हें बुलाते ही क्यों हैं... और बुलाओ नामवर जी को। बुलायेंगे भी और रोयेंगे भी...
मैत्रोयी पुष्पा : कुल मिलाकर बात यह है कि कोई न किसी को बना सकता है और न गिरा सकता है। रचना अपने आप बोलती है। पाठक तय करते हैं कि आप कहाँ हैं। वह चाहे स्त्राी विमर्श का मामला हो या कोई अन्य।

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)