फरवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•साहित्याकार शेखर जोशी को प्रथम चंद्रयान पुरस्कार २०१० से सम्मानित किया गया। •काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर केंद्रित विशेषांक गल्पेतर गल्प का ठाठ का लोकार्पण। •मदन कश्यप और शरद दत्त करे मिला शमशेर सम्मान। • कथा यू के का पआनन्द साहित्य सम्मान महेंद्र दवेसर दीपक को 'अपनी अपनी आग' एवं कादम्बरी मेहरा को 'पथ के पफूल' के लिये दिया जा रहा है।
 
 
 
समय समाज
अनसुलझे सवालों ने बनाया माओवादी : पुण्य प्रसून वाजपेयी

ठीक १८ साल बाद जब उसी लड़के की तस्वीर बतौर माओवादी उसी कालेज की दीवार पर चस्पा देखी तो इस बारे में और जानकारी के लिए स्थानीय अखबार देशोन्नति की पफाइलों को देखा और आदिवासी और नक्सलियों की स्टोरी करने वाले रिपोर्टर सुरेश से बातचीत की। मिलिन्द के बारे जानकारी मिली की पिफलहाल वहीं एरिया कमांडर है और चन्द्रपुर से लेकर दांतेवाडा तक के दो दर्जन से ज्यादा दलम उसके साथ काम करते हैं। मिलिन्द के बारे में और जानकारी तो रिपोर्टर से नहीं मिली लेकिन चन्द्रपुर इंजीनियरिंग कालेज के प्रोपफेसर ने इसकी जानकारी जरूर दी कि मिलिन्द और कोई नहीं आलोक ही है। १९९४-९५ में कैंपस इंटरव्यू में ही लार्सन एंड ट्रूबो में नौकरी मिल गयी थी। लेकिन मिलिन्द ने यह नौकरी एक साल में ही छोड़ दी। उसके बाद चन्द्रपुर में होने वाली माईनिंग को लेकर उसने उस दौर में मजदूरों के सवालों को उठाया।


चन्द्रपुर इंजीनियरिंग कालेज की दीवार पर चिपके पुलिसिया पोस्टर ने झटके में माओवादियों को लेकर सरकार के नजरिये और सरकारी सिस्टम को लेकर एक पूरी बहस मेरी आँखों के सामने लाकर खड़ी कर दी। पोस्टर में काले द्घेरे में एक युवक की तस्वीर छपी थी। जिसके ऊपर मोटे काले अक्षर में लिखा था। यह माओवादी है। इसने बाईस पुलिसकर्मियों को बारूदी सुरंग से उड़ाया है। जो इसे पकड़वाने में मदद देगा उसे पचास हजार रुपये ईनाम में दिए जाएँगे। तस्वीर के नीचे लिखा था माओवादी कामरेड मिलिन्द। यह कब से कामरेड हो गया। चेहरा वही लेकिन नाम कुछ और था। इस लड़के का नाम तो मिलिन्द नहीं था। अठारह साल पहले की वह शाम याद आ गयी जिसमें प्रोपफेशनलिज्म और एजुकेशन विषय पर जबरदस्त बहस हुई थी।

दिसंबर १९९१। चन्द्रपुर इंजीनियरिंग कालेज के छात्रा महोत्सव में शामिल होने नागपुर से चन्द्रपुर पहुँचा था। सोचकर गया था कि नक्सलवाद तेजी से आंध्रप्रदेश से सटे विदर्भ के चन्द्रपुर जिले में भी द्घुस चुका है और चन्द्रपुर से सटे छत्तीसगढ़ जो उस वक्त मध्यप्रदेश का हिस्सा था वहाँ भी दस्तक दे रहा था, तो उस पर अखबार के लिए रिपोर्ट भी तैयार हो जाएगी। साथ ही कालेज के छात्रा नक्सलियों को लेकर क्या सोचते-समझते हैं, इस पर रिपोर्ट तैयार होगी। इंजीनियरिंग कालेज पहुँचा तो खासा जोश छात्राों में था। गेट पर ही छात्राों का एक झुंड स्वागत में खड़ा मिल गया। अठारह से बाईस साल के बीच के ही सभी छात्रा थे। सभी ने अपनी पफैक्ल्टी बतायी। नाम बताया। पिफर हम कार्यक्रम में शरीक होने कालेज के कान्ेन्स हाल में चल पड़े। कालेज के अंदर जाते वक्त अचानक एक छात्रा पीछे से आया और मुझसे हाथ मिलाकर बोला भईया आप भी प्रोपफेशनल नहीं है। छात्रा महोत्सव में मैंने ही यह विषय रखवाया है, प्रोपफेशनलिज्म और एजुकेशन। तुम्हारा नाम। वसंत तामतुम्डे। अच्छा विषय है। लेकिन कुछ उलझा हुआ सा लगता है। क्योंकि एजुकेशन तो प्रोपफेशनलिज्म की तरपफ ही ले जाता है। चलिए भईया इसी पर तो चर्चा करनी है। मजा आएगा। उसने 'मजा आएगा' कुछ इस तरह कहा जैसे उसे सब पता था कि क्या होगा। छात्रा महोत्सव के दौरान कालेज के प्रिंसिपल भी मौजूद थे और सभी शिक्षक भी।

संयोग से चन्द्रपुर के डीएम को भी आमंत्रिात किया गया था। लेकिन डीएम महोदय आखिर में पहुँचे जिसका मलाल उन्हें उस वक्त तो रहा ही मेरे ख्याल से आज भी होगा। खैर एजुकेशन के तौर तरीकों को लेकर छात्राों के सवाल खुद ब खुद प्रोपफेशनलिज्म से जुड़ते चले गये और जब समूची बहस इस दिशा में जा रही थी कि शिक्षा का मतलब ही छात्राों को प्रोपफेशनली ढालना हो चुका है और जिसका मतलब एक अदद नौकरी पर जा टिका है तो मैंने देखा वसंत ताम्तुबडे ने मंच पर आकर सवाल किया कि प्रोपफेशनलिज्म का जिंदगी से कुछ भी लेना देना नहीं होता और शिक्षा का मतलब जिंदगी है। और मुझे लगता है कि हम जीवन से अमानवीय परिस्थितियों की दिशा में बढ़ रहे हैं, जिसे प्रोपफेशनलिज्म कहकर हम साथी बेहद खुश हो रहे हैं। पिफर उसने सीधे प्रिंसिपल को संबोधित करते हुए कहा कि आपने कालेज के हर पफैक्ल्टी में एक डिजार्टेशन तैयार करने का प्रावधान कर रखा है, और खास बात यह है कि इस डिजार्टेशन को लेकर सेलेबस में सापफ लिखा गया है कि विषय और शोध अगर आम जिंदगी से जुड़ा हो और उसमें बदलते समाज के बिंब भी हों तो ज्यादा अच्छा रहेगा।

मैंने विषय लिया 'चेजिंग लाइपफस्टाइल आपफ ट्राइबल्स, विद् स्पेशल रेपफरेन्स आपफ प्रोबलम आपफ नक्सलाइट ;आदिवासियों के जीने के बदलते तरीके, नक्सल समस्या के मद्देनजरद्ध। लेकिन मुझे कहा गया कि आदिवासी और नक्सल को एक साथ न जोड़े। डीएम साहब यहाँ आए नहीं हैं, अगर होते तो उनसे पूछता कि नक्सल शब्द में इतना आतंक क्यों भर दिया गया है। क्योंकि इस मुद्दे पर कोई चर्चा करने तक से प्रोपफेसर द्घबराते हैं। ऐसे में आदिवासियों के सवाल भी हाशिए पर होते जा रहे हैं। कोई आदिवासियों के मुश्किल जीवन को लेकर चर्चा नहीं करना चाहता। उन्होंने नक्सलाइट के नाम पर इतना आतंक क्यों पैदा कर दिया है कि हमारे प्रोपफेसर भी इस विषय पर खामोश रहना चाहते हैं। जबकि वह जानते हैं कि उनके इर्द-गिर्द की परिस्थितियाँ बदल रही हैं। मेरे ख्याल से डीएम से लेकर प्रोपफेसर तक प्रोपफेशनल हो चुके हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि मुझे भी इन विषयों को छोड़कर प्रोपफेशनल होना है या पिफर जिस समाज में हमें कालेज से निकलकर काम करना है उस समाज को जानना भी एजुकेशन है।

वसंत के इस सवाल ने अचानक कुछ छात्राों के तेवर बदल दिए। मैकेनिकल पफैकल्टी के आलोक आर्य ने चन्द्रपुर के औद्योगिक विकास और ''्‌यूमन इंडेक्स के द्घेरे में प्रोपफेशनलिज्म और एजुकेशन का सवाल खड़ा किया। चन्द्रपुर के दस टाप उद्योगों के बारे में सिलसिलेवार तरीके उसने जानकारी दी। संयोग से सभी उद्योगपति देश के भी टाप टेन में थे। पिफर उसने उन गाँवों के बारे में जानकारी रखी जहाँ उद्योग लगे थे। ग्रामीण आदिवासियों की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों का जिक्र कर आलोक ने विकास को प्रोपफेशनलिज्म से जोड़ते हुए आखिर में यह प्रूव किया कि अंधी दौड़ में विकास का मतलब मुनापफा है और समूचा तंत्रा इसी विकास को प्रोपफेशनलिज्म मान रहा है। जबकि करीब चालीस हजार से ज्यादा मुपफलिस-पिछड़े ग्रामीण आदिवासियों का सवाल, जिनके पास दो जून की रोटी नहीं है वह शिक्षा के दायरे में भी नहीं हैं और उनके लिए कोई लकीर खींचने का मतलब है इंजीनियरिंग कालेज में तीन लाख रुपये पफीस पर पानी पफेरना। क्योंकि इससे कैंपस इंटरव्यू में नौकरी नहीं मिलेगी।
उस दिन बहस में कुछ ज्यादा ही तीखे-तल्ख कमेंट प्रिंसिपल की तरपफ से भी आए। जिन्होंने कालेज की बंदिशों को इशारों में समझाया। यह कालेज कांग्रेस के नेता का है। लेकिन छात्राों के सवालों ने इस दिशा में अंगुली उठा दी कि मुद्दों को न प्रोपफेशनल चादर से ढका जा सकता है और न ही प्रशासन-पुलिस की मुश्किलों को आतंक का जामा पहनाकर खामोश रहने से मुद्दे दब जाते हैं। लेकिन इस छात्रा महोत्सव के करीब सवा साल बाद यानी १९९३ में एक दिन अचानक एक छात्रा नागपुर में मेरे अखबार के दफ्रतर में पहुँचा और मिलते ही कहा आपने मुझे पहचाना नहीं, मैं चन्द्रपुर इंजीनियरिंग कालेज का छात्रा हूँ। लेकिन उसे देखते ही मैंने कहा, मुझे आपके सवाल याद हैं, जो आपने उस महोत्सव के दौरान उठाए थे। हाँ भईया, मैकेनिकल का आलोक आर्य। बताइए नागपुर में क्या काम है। मुझे आपसे कोई काम नहीं है। मैं सिपर्फ एंटी नक्सल कमिशनर से मिलना चाहता हूँ। मुझे भी याद आया कि करीब एक साल पहले ही नागपुर में कमिश्नर रैंक के आईएएस अधिकारी की नियुक्ति नक्सल गतिविधियों को रोकने और इस मुद्दे को सामाजिक-आर्थिक तरीके से समझते हुए रिपोर्ट तैयार करने के लिए हुई है। मैंने पूछा काम क्या है। उसने कहा आज ही मिलवा दीजिए तो अच्छा होगा। नहीं तो कल कालेज में क्लास छूट जाएगा। अगले महीने पफाइनल भी है। लेकिन मुझे भी जानकारी होनी चाहिए, मैं उन्हें क्या कहूँगा। मैं उन्हें चन्द्रपुर की परिस्थितियों से वाकिपफ कराना चाहता हूँ।

हम कालेज के थर्ड ईयर के छात्राों ने चन्द्रपुर की तीन तहसीलों के सामाजिक-आर्थिक परिवेश का जो आंकलन अपने रिसर्च के लिए किया है उसमें आदिवासियों की कल्याण योजनाओं की हकीकत मैं बताना चाहता हूँ। क्यों कल्याण योजनाओं को लेकर आपकी रिसर्च में क्या है। कुछ नहीं हमेशा की तरह कोई योजना लागू नहीं हुई है। करीब एक हजार करोड़ बीते छह साल में पुलिस-प्रशासन के पास चले गये। लेकिन नयी परिस्थितियाँ इसलिए ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि पचास से ज्यादा वह आदिवासी पुलिस पफाइल में नक्सली करार दिए जा चुके हें जिनके गाँव में हमने बाकायदा दस दिनों तक काम किए। उनकी पूरी प्रोपफाइल हमारे पास है। सवाल है जो हमारे डिजार्टेशन में ग्रामीण आदिवासी हैं वह पुलिस पफाइल में नक्सली हैं। मैं कमिशनर को बताना चाहता हूँ कि यह परिस्थितियां किस खतरनाक समाज का निर्माण कर रही हैं। मुझे याद है सारी जानकारी एंटी नक्सल कमिश्नर को आलोक आर्य ने बताई थी करीब तीन द्घंटे तक आलोक ने अपना रिसर्च पेपर भी अधिकारियों को सौंपा था। जिसके कुछ हिस्से और नक्सल बताकर बंद किए गए आदिवासियों की पफेरहिस्त भी हमने अखबार में छापी। लेकिन ठीक १८ साल बाद जब उसी लड़के की तस्वीर बतौर माओवादी उसी कालेज की दीवार पर चस्पा देखी तो इस बारे में और जानकारी के लिए स्थानीय अखबार देशोन्नति की पफाइलों को देखा और आदिवासी और नक्सलियों की स्टोरी करने वाले रिपोर्टर सुरेश से बातचीत की।

मिलिन्द के बारे जानकारी मिली की पिफलहाल वहीं एरिया कमांडर है अौर चन्द्रपुर से लेकर दांतेवाडा तक के दो दर्जन से ज्यादा दलम उसके साथ काम करते हैं। मिलिन्द के बारे में और जानकारी तो रिपोर्टर से नहीं मिली लेकिन चन्द्रपुर इंजीनियरिंग कालेज के प्रोपफेसर ने इसकी जानकारी जरूर दी कि मिलिन्द और कोई नहीं आलोक ही है। १९९४-९५ में कैंपस इंटरव्यू में ही लार्सन एंड ट्रूबो में नौकरी मिल गयी थी। लेकिन मिलिन्द ने यह नौकरी एक साल में ही छोड़ दी। उसके बाद चन्द्रपुर में होने वाली माईनिंग को लेकर उसने उस दौर में मजदूरों के सवालों को उठाया। उसी दौर में नक्सली संगठन पीपुल्सवार के संपर्क में आया और मजदूरों को लेकर 'महाराष्ट्र कामगार किसान-मजदूर संगठन' के बैनर तले काम करना भी शुरू किया। लेकिन १९९७ से लेकर २००७ तक यानी करीब दस साल तक आलोक क्या करता रहा इसकी जानकारी कभी किसी को मिली नहीं। लेकिन आलोक से मिलिन्द बनने को लेकर चन्द्रपुर इंजीनियरिंग कालेज के परिसर में किस्सागोई जरूर जारी रही। जिस दौर में नंदीग्राम में माओवादियों की गतिविधियाँ सामने आयीं उसी दौर में कई बड़े बारूदी सुरंग से पुलिस पर हमले भी हुए और उनके पीछे मिलिन्द का नाम ही आया। लेकिन सितंबर २००९ में जब २२ पुलिसकर्मियों की मौत चन्द्रपुर-गढ़चिरोली की सीमा पर हुई तो पहली बार पुलिस ने पोस्टर निकाला और मिलिन्द को पकड़ने वाले को ५० हजार ईनाम देने का एलान किया।

जानकारी यह भी मिली की आलोक के बैच के दो और छात्रा भी मिलिन्द के साथ हैं। मेरे दिमाग में वसंत ताम्तुमडे का चेहरा रेंग गया। हालांकि उसकी किसी ने पुष्टी नहीं की लेकिन १९९०-९४ के बैच को लेकर कालेज के प्रोपफेसरों ने भी माना। उस वक्त छात्राों ने जो सवाल खड़े किए थे उसके जवाब तो आजतक नहीं मिले लेकिन वह समस्या इस रूप में बड़ी हो सकती है इसका अंदेशा छात्राों ने जरूर जाहिर किया था। यह अलग सवाल है कि किसी ने यह नहीं सोचा था कि कालेज के छात्रा ही निकलकर इस धारा में बह जाएँगे। मैकेनिकल का छात्रा बतौर माओवादी किस तरह का आदिवासियों के मुद्दों को लेकर प्रयोग या हिंसा को अंजाम दे रहा है, यह भी स्थानीय लोगों से बातचीत में सामने आया। खासकर आदिवासी युवक-युवतियों को बड़ी तादाद में इस पूरे इलाके में अपने साथ माओवादियों ने जोड़ा है। उसमें भी युवतियों को हाथ में अधिकतर दलम की कमान है। महाराष्ट्र पुलिस के मुताबिक महिलाओं की भूमिका महाराष्ट्र- छत्तीसगढ़ सीमा के दलमों में सबसे ज्यादा बढ़ी है। करीब अस्सी पफीसदी दलम की कमान महिलाओं के हाथ में है। क्योंकि यहाँ धारणा यही है कि आदिवासी समुदायों में महिलाओं की जो स्थिति है उसमें उनके सामने संकट गाँव में रहने के दौरान ज्यादा है। क्योंकि नयी आदिवासी पीढ़ी से लेकर क्षेत्रा में तैनात पुलिस कांस्टेबल से लेकर बड़े अधिकारियों की हवस का शिकार आदिवासी लड़कियाँ होती हैं। और माओवादियों ने उनके हाथ में बंदूक थमा दी है। ऐसे में करीब नौ सौ से लेकर दो हजार तक ऐसी लड़कियाँ माओवादियों के साथ बंदूक थामे हुए हैं जो अपनी सुरक्षा के साथ-साथ अपने बुजुर्ग माँ-बाप की सुरक्षा भी बंदूक तले देख रही हैं। इससे इन क्षेत्राों में अपराध भी कम हुए हैं। आदिवासी लड़के भी माओवादियों के साथ इसलिए जुड़ रहे हैं क्योंकि उनके सामने जीने का कोई दूसरा चेहरा नहीं है।

समूचे इलाके में रोजगार है नहीं। जो उद्योग काम कर रहे हैं चाहे वह पेपर मिल हों या सिमेंट पफैक्टरी या कोयला खनन, सभी में मजदूरों को दूसरे क्षेत्राों से लाने की परंपरा शुरू हो चुकी है। क्योंकि अकुशल मजदूरों का काम ठेके पर नीलाम होता है। कमोबेश सारे ठेकेदार दूसरे प्रांतों के हैं तो मजदूर भी दूसरे प्रांतों से लाए जाते हैं। जिससे किसी तरह से मजदूरी को लेकर कोई कानूनी अडचन न आए या किसी तरह का कोई आंदोलन न खड़ा हो जाए। हर नौ-दस महीनों के बाद मजदूरों को भी बदल दिया जाता है। ऐसे वातावरण में आदिवासी युवकों को अपने साथ जोड़ने की पहल दो-तरपफा हुई है। एक तो सीधे बंदूक उठाकर जंगल जाने को तैयार हैं और दूसरे गाँव में रहकर ही स्वावलंबन की परिस्थितियों को आगे बढ़ाने में लगे हैं। खास कर खेती और बंबू के जरिए कुटिर उद्योग का चलन इन क्षेत्राों में शुरू किया गया है। जिसका पैसा बैंकों से नहीं तेंदू पत्ता को खरीदने वाले ठेकेदार देता है। क्योंकि इन ठेकेदारों पर दलम की बंदूक सटी होती है। इसी तरह से आदिवासी जंगल-पदार्थों से जो कुछ भी बाजार में बिकने लायक बनाते हैं उसके लिए धन का प्रबंध इसी स्तर पर उद्योगों से लेकर ठेकेदारों तक से माओवादी ही करते हैं।

चन्द्रपुर कालेज के प्रो. रानाडे और एडवोकेट सालवे के मुताबिक करीब चालीस हजार आदिवासी ग्रमीणों की रोजी रोटी इससे चलती है। चन्द्रपुर के एडवोकेट सालवे के मुताबिक माओवादी को लेकर पुलिस और अर्(सैनिक बलों की नयी पहल ने एक मुश्किल जरूर खड़ी कर दी है कि माओवादी अपने साथ किसी भी आदिवासी को साथ लेने से पहले जो स्थानीय मुद्दों से दो-चार करवाते थे और एक लंबी ट्रेनिंग होती थी, उस पर रोक लग गयी है। क्योंकि पुलिस ऐसे किसी भी संगठन को अब काम करने की न तो इजाजत देती है और कोई किसी भी स्तर पर मानवाधिकार से लेकर मजदूरी या रोजगार का सवाल उठाता भी है तो पहले ही राउंड में वह माओवादी करार देकर जेल में बंद कर दिया जाता है। ऐसे में बिना कोई ट्रेनिंग ही बंदूक उठाने की आदिवासी पहल ने बड़ी तादाद में हिंसा को भी बढ़ावा दिया है और खासे आदिवासी मारे भी जा रहे हैं। और पूरा इलाके उसी माओवादी कामरेड मिलिन्द ताम्तुबड़े के इलाके में आता है जहाँ उसे पकड़वाने का ईनाम पचास हजार रुपये है।

;लेखक सामाजिक सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्राकार हैं। वर्तमान में 'जी न्यूज' चैनल के राजनीतिक संपादक।द्ध २०३, पत्राकार परिसर, सेक्टर-५, वसुंधरा, गाजियाबाद, उ.प्र.
चनदलंचतेंनद/हउंपसण्बवउ

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)