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खुशबू चली हवा के द्घर से
रोए से कचनार
जैसे बढ़ते पाँव विदा के
मन के पफाँक हजार
आशीषों में हाथ उठे हैं
अड़हुल के, जूही के
खेतों के मेड़ों पर बादल
आते हैं पफूही से
दोनों पाँव महावर भर के
चलती दो पग चार
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महपफा के झालर में उड़ते
रंग नहाये द्वार
टहनी की आँखें भर आईं
लहर ने मुँह पोंछे
बाग की नयी हरियाली भी
मन बना अंगोछे
भीतर ही भीतर दरके
नेह नयन अंकवार
दालानों की आहट में अब
गूंज रहे सुर-तार
सर्द पूस में
बहुत दिनों के बाद
आँख में उतरी पुरवाई
दिन डूबे थे सन्नाटे में
गेहूँ बिका बहुत द्घाटे में
सरसों की आशा थी बाकी
वह भी जहाँ-तहाँ बाँटे में
सहज हँसी के साथ
धूप थोड़ी मुड़ आई
लगभग संग हुईं कुछ बातें
नमक और चीनी दिन-रातें
सुजनी गाँती, ढेर अंगोछे
सर्द पूस हम मिल-जुल काटें
पफसलों वाले प्यार,
पफाड़ देते मन की काई
कोड़े हुए खेत में कल के
बीज ललाये खड़ी पफसल के
छोटी मड़ई की आँखों से
खुशियाँ झरतीं छलक-छलक के
केवल मीठे बोल
कि मैली धोती उजलाई
मौन नदी का
गीत नहीं गूंजा कोयल का
बहुत दिनों से
आधा से अब तो ज्यादा
पफागुन बीत गया
पीले टुसियाये कनेर का
मधु द्घट रीत गया
कंपा नहीं मन भी पोखर का
बहुत दिनों से
चिड़िया भी लेकर न उड़ी है
नये नीड़ का तिनका
गुलमोहर का नेह नदी से
बीच किनारे चिनका
पनप रहा है मौन नदी का
बहुत दिनों से
जुआ उठाये दोनों कन्धे
दिन पिफर मलिन हुआ
कभी न झुकनेवाली आँखों
का दुख गहन हुआ
जगा नहीं 'पफेकू' मुन्शी का
बहुत दिनों से |