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इतना ख़तरा चलो उठाएँ हम
अपने भीतर तो सुगबुगाएँ हम।
कोई तरकीब सोचिए, कैसे
धुंध से रोशनी में आएँ हम।
अपने मन में बसा लें गौरक्षया
और एक द्घोसला बनाएँ हम।
ख़ून में भी दरार पड़ने लगी
दोस्ती किस तरह बचाएँ हम।
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बपर्फ़ दिल में उतर न जाय कहीं
सोच में आग तो जलाएँ हम।
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दंड को यातना लिख दिया
यार, हमने ये क्या लिख दिया।
मील के पत्थरों के लिए
जख़्म का रास्ता लिख दिया।
धर्म की, न्याय की पीठ पर
वक़्त ने कर्बला लिख दिया।
बात जब कोई चुभने लगी
हमने एक कहकहा लिख दिया।
८िान्दगी का लिपफापफा लिया
आँधियों का पता लिख दिया।
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भूख के दृश्य जब भी आते हैं
हम बहुत देर तिलमिलाते हैं।
सच अगर टूटता-सा लगता है
सोच के तार झनझनाते हैं।
मुस्कराने की व्यर्थ कोशिश में
अब तो बस होठ थरथराते हैं।
जाल में हैं कबूतरों के दिन
मुक्ति के पंख पफड़पफड़ाते हैं।
हर तरपफ अंधकार है, पिफर भी
आस के दीप टिमटिमाते हैं।
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काम भाषण से चलता नहीं
मुल्क़ उनसे संभलता नहीं।
कुछ अंधेरे हैं द्घेरे हुए
सूर्य का रथ निकलता नहीं।
हम बहुत चाहते हैं मगर
रुख़ हवा का बदलता नहीं।
उनसे पफरियाद क्या कीजिए
कोई पत्थर पिद्घलता नहीं।
यह तो सहने की हद हो गयी
ख़ून अब भी उबलता नहीं।
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कोई रास्ता इस तरह का निकालो
मेरी आँख में रोशनी है, बचा लो।
सवालों की ईंटों की हद हो गयी है
जवाबों के पत्थर उठालो, उठा लो।
यहाँ क़ैद हैं कल के अनमोल सपने
लहू की जमानत पे इनको छुड़ा लो।
उपफनता समुंदर नहीं ध्यान देगा
मेरी बात मानो तो तरकश संभालो।
मेरे शब्द तकलीपफ में साथ देंगे
कभी देके आवा८ा, तुम आजमा लो।
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