साहित्य की दूरी का आधार बन जाएगी। और आश्चर्य नहीं कि बाद के दिनों में जब भी साहित्य और सिनेमा को करीब लाने की कोशिश हुई, एक नये विवाद के साथ उसका अन्त हुआ, चाहे वह प्रकाश झा-शैवाल का विवाद हो या बासु चटर्जी-शिवमूर्ति का, अभी-अभी 'मोहन दास' के विवाद ठंडे भी नहीं पड़े थे कि 'थ्री इडियट्स' का विवाद गर्म हो गया।
कतई यह संयोग नहीं कि अध्किांश विवादों में मामला पैसे या रॉयल्टी को लेकर नहीं बल्कि 'क्रेडिट' या कथानक में पफेर बदल को लेकर होता है। वास्तव में सत्यजीत रे ;विभूति भूषण बन्दोपाध्यायद्ध, बासु भट्टाचार्य ;पफणीश्वर नाथ रेणुद्ध, गुलजार ;कमलेश्वरद्ध की तरह लेखकों को विश्वास में लेकर काम करने की जरूरत हिन्दी सिनेमा ने कभी समझी ही नहीं, और सच यह भी है कि लेखकों ने भी इस नयी कला विध को गंभीरता से समझने की कोशिश नहीं की।
सत्यजीत रे कहते थे किसी कृति का चुनाव मैं पिफल्मांकन के लिए करता हूँ तो उसे पढ़ने के बाद शून्य से पटकथा लेखन की शुरूआत करता हूँ। वर्ष की सबसे बड़ी मानी जाने वाली पिफल्म 'थ्री इडियट्स' के निर्माता विध्ु विनोद चोपड़ा और निर्देशक राजकुमार हिरानी भी कमोबेश यही कहते लगते हैं जब वे 'थ्री इडियट्स' और 'पफाइव प्वाइंट समवन' के अंतर को दृश्यवार गणना कर स्पष्ट करते हैं। निश्चय ही उन्होंने भी एक कुशल पिफल्मकार की तरह अपनी पिफल्म की शुरूआत 'शून्य' से ही की होगी। सिनेमा विध की यह अनिवार्यता भी है। वहाँ 'साहित्य' को साकार नहीं किया जा सकता, साहित्य की भावनाओं को साकार किया जाता है। साहित्य और सिनेमा दोनों ही विधओं के व्याकरण नितान्त अलग होते हैं। एक में शब्द मुखर होता है, एक में दृश्य। मोटे अर्थो में कह सकते हैं सिनेमा साहित्य का एक 'अनुदित' रूप होता है। बेहतर अनुवाद की तरह यह 'अनुवाद' भी जितना ही सिनेमाई भाषा के अनुकूल होता है, उतना ही श्रेष्ठ माना जाता है। लेकिन अनुवाद कितना ही बेहतर क्यों न हो, मूल कृति का महत्व कम नहीं हो जाता। नोबल पुरस्कार भले ही डब्ल्यु बी यीट्स के अनुवाद पर मिला हो, 'गीतांजली' रविन्द्र नाथ टैगोर की कृति के रूप में ही याद की जाती है। सत्यजीत रे ने अपनी पिफल्मों की शुरूआत 'शून्य' से जरूर की, लेकिन विभूति भूषण वन्दोपाध्याय या रविन्द्रनाथ ठाकुर को अपनी पिफल्मों की क्रेडिट में वे अपने से उफंचा स्थान देते रहे। यह कोई बड़प्पन नहीं, एक रचनात्मक ईमानदारी का भी तकाजा है। विशाल भारद्वाज को कतई जरूरत नहीं थी कि वे 'मकबूल' और 'ओंकारा' के लिए दर्शकों को शेक्सपीयर की याद दिलाएँ। ऐसी बात नहीं कि शेक्सपीयर के उल्लेख से उनकी पिफल्मों को कोई व्यवसायिक लाभ हुआ हो, लेकिन उन्होंने एक रचनात्मक ईमानदारी का निर्वाह किया।
वास्तव में एक रचनाकार मन ही 'क्रेडिट' का महत्व समझ सकता है। और आज सिनेमा की मुख्यधरा में कोई रचनाकार हैं भी यह मानने की सहज इच्छा नहीं होती। जब शाहरूख खान कहते हैं कि मुझे जितने पैसे मिलते हैं, उतने ही अभिनय में इमोशन मैं डालता हूँ तो हिन्दी सिनेमा में व्यवसायिकता की पराकाष्ठा समझी जा सकती है। ऐसी व्यवसायिक बिरादरी का प्रतिनिध्त्वि कर रहे विध्ु विनोद चोपड़ा जब पूरी बेशर्मी से कहते हैं कि चेतन भगत ने दस लाख रुपये में अपनी कृति 'पफाइव प्वाइंट समवन' के राइट्स उन्हें बेच दिए, और अब उन्हें सवाल उठाने का कोई हक नहीं है कि 'क्रेडिट' में उनका नाम कहाँ जा रहा है, तो क्या आश्चर्य! चेतन भगत को समझना चाहिए था कि वे उस इंडस्ट्री को अपनी कृति का अध्किार सौंप रहे हैं जहाँ लेखकों की औकात 'मुंशी जी' से ज्यादा नहीं। आज हिन्दी सिनेमा के लिए किसी कृति का महत्व बस इतना भर है कि वह कितना मुनापफा ला सकती है, उसे कतई पफर्क नहीं पड़ता कि सौंदर्य बोध् की कसौटी पर उनकी कृति कितनी खरी उतरती है। ऐसे में शायद चेतन भगत की अपेक्षा ही गलत थी कि सत्यजीत रे की तरह उनकी कृति को भी विध्ु विनोद चोपड़ा यथोचित सम्मान देंगे। सवाल यह भी है कि दस लाख रुपये देने के बाद सम्मान दें भी क्यों? वह भी तब जब कॅान्ट्रैक्ट पर बकायदा लेखक ने सहमति दी हो कि उनका नाम 'रोलिंग क्रेडिट' यानि पिफल्म खत्म होने के बाद गुजरती नामावली में ही दिया जाएगा।
लेकिन सवाल यहाँ अध्किारों की लड़ाई का है जो विधु विनोद चोपड़ा और चेतन भगत के बीच सड़कों पर चल रही है। आमिर खान अभिजात जोशी को आगे कर बताते हैं कि इस आदमी ने पूरे दो साल मेहनत कर पिफल्म लिखी और चेतन इसके अध्किार छीनना चाहते हैं। राजकुमार हिरानी कहते हैं, चेतन की तो किताब पहले ही लिखी हुई थी, उसपर मेहनत तो हमने की, पिफर उनका क्रेडिट कहाँ बन जाता है? एक-एक कर आरंभ से अंत तक दृश्यों की गिनती कर बताते हैं कि उन्होंने और अभिजात जोशी ने ये सारे दृश्य क्रियेट किये हैं, जो 'पफाइव प्वाइंट समवन' में हैं ही नहीं, इसीलिए जितना भर क्रेडिट चेतन भगत को दिया गया, बहुत है। तकनीकी रूप से ये बातें सही भी हैं, लेकिन सही यह भी है कि सिनेमा के अनुकूल कुछ या कई दृश्य भर सृजित कर लेने से मूल लेखक का दावा समाप्त नहीं हो सकता। विध के अनुकूल संशोध्न, संवर्(न तो पटकथा लेखक और निर्देशक हमेशा से करते रहे हैं, यह उनका अध्किार होता है और दायित्व भी। संजय लीला भंसाली ने तो एकदम नए 'देवदास' की रचना की थी, लेकिन कृति तो वह शरतचंद्र की रही। डेनी बोएल ने विकास स्वरूप के 'क्यू एड ए' को 'स्लमडॉग मिलयेनर' के रूप में एक नई पहचान दी, लेकिन विकास स्वरूप को महत्व देने में उन्होंने कोई कोताही नहीं की। यह एक सामान्य नैतिकता ही नहीं, काम का एक प्रोपफेशनलिज्म भी है, हिन्दी सिनेमा जिसका मतलब कार्य कुशलता नहीं, स्वार्थ समझती है। और लेखकों, खास कर हिन्दी लेखकों ने तो यह सीखा ही नहीं। चेतन भगत ने तो रॉयल्टी ले भी ली, हिन्दी लेखकों से तो पिफल्मकारों से यथोचित मानदेय भी निकालना संभव नहीं हो पाता। पिफल्मकार उन्हें अपनी शर्तों पर झुकाते चले जाते हैं और वे झुकते चले जाते है। और जब तक उनका 'अहम्' जगता है, तब तक देर हो चुकी होती है।
आमिर खान कहते हैं चेतन भगत ये विवाद पब्लिसिटी के लिए कर रहे हैं। हो सकता है। पब्लिसिटी किसे अच्छी नहीं लगती? लेकिन सच यह भी है कि आमिर खान से भले ही कम हो, लेकिन युवाओं के बीच चेतन भगत की लोकप्रियता राजकुमार हिरानी या विध्ु विनोद चोपड़ा से कतई कम नहीं हो सकती। हो सकता है कानूनी रूप से विध्ु विनोद चोपड़ा की स्थिति मजबूत हो, जिस कारण चेतन भगत को अध्किारों की इस लड़ाई में कदम पीछे खींचने पड़े हों। लेकिन इस शुरूआत ने हिन्दी सिनेमा के लेखकों की 'औकात' को तो लोगों के सामने जाहिर कर ही दिया। आखिर कोई तो कारण है कि कहानी के लिए बिसूरती हिन्दी सिनेमा से कोई भी साहित्यकार जुड़ना नहीं चाहता। 'रोलिंग क्रेडिट' में शामिल होने के कॉन्ट्रैक्ट पर कोई निर्माता लेखक को तभी दस्तखत करवा सकता है जब उसकी नजर में उसकी औकात 'स्पॉट ब्वॉय' से अध्कि न हो। चेतन भगत के पीछे हटने के बावजूद हिन्दी पिफल्मकारों और लेखकों के लिए यह मुद्दा समाप्त नहीं होना चाहिए, अन्यथा ना तो पिफर कभी किसी गुलजार को कमलेश्वर मिल सकेंगे न ही जरूरत पड़ने पर आमिर खान को के पी सक्सेना।
;लेखक पिफल्म समीक्षा के लिए राष्ट्रीय पिफल्म पुरस्कार से सम्मानित हैंद्ध
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