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सुरेश सेन निशान्त
हम चले आये हैं
अपना द्घर अपनी धरती छोड़
धरती देर तक निहारती रही
हमें टुकर-टुकर
नहीं हिलाये उसने हाथ
नहीं रोई वह दहाड़ मार कर
बस पड़ी रही
जैसे रोई हो
बेसुध नग्न
हमारी माँ जैसी
कोई औरत। |
अब हम कभी भी नहीं
ढाँप पाएँगे उसकी देह
हरी भरी पफसलों से।
अब हम कभी नहीं लौट पाएँगे
उसकी गोदी में
त्यौहार मनाने।
उसकी याद आएगी खूब
हम रोएँगे
वे हमें चुप कराने के लिए
वे हमारी देह थपथपाएँगे
झूठे सांत्वना भरे शब्दों से
विस्थापन की ऐवज में दिए
पैसों से।
हम चले आए हैं
कुछ तितलियाँ
कुछ पंछी
कुछ मवेशी भी चले आए
हमारे संग हमारी ही तरह उदास
रोते सिसकते।
वहीं रह गए
धरती की देह का श्रृंगार
वे हरे भरे पेड़
वो निर्मल जल वाली नदी
वे बड़े-बड़े पत्थर
जिन्हें ईश्वर की तरह
पूजते थे हम।
सीमेंट के लिए
बारूद के धमाकों से
वे हर दिन तोड़ेंगे हमारे ईश्वर को
हर दिन तोड़ेंगे हमारे पहाड़ को
हर दिन रौदेंगे
हमारी हरी भरी आत्मा
इस धरती को।
बदहवासी में निकल जाएँगे हमारी तरह
किसी दूजी दिशा को
बाद्घ मोर और खरगोश भी
किसी भीड़ भरी जगह पे
पत्थरों से छलनी पड़ी
मिलेगी उनकी मृत देहें।
हम किसी पहाड़ पर
बांसुरी बजाते हुए नहीं
किन्हीं खेतों में हल चलाते हुए नहीं
हम किसी ट्रक पर से
सीमेंट चढ़ाते या उतारते हुए मिलेंगे
ओस की बूदों से नहीं
सीमेंट की धूल से
भरी पड़ी होगी हमारी देहें
हम खांस रहे होंगे
डॉक्टर हमारी मृत्यु का कारण
तपेदिक बतलाएगा
एक दिन।
दोस्त से मिलना
पुनर्जन्म की तरह था
इतने दिनों बाद
दोस्त से मिलना।
पुराने कुएँ की भींड पर बैठ
चखना पुराने मीठे जल के स्वाद जैसा।
धरती की गहराइयों से चुनना
चोटी पर खिलने वाले अलभ्य
सुगन्धित पफूलों की गंध।
पत्तियों की रौशनाई से
लिखना प्रवासी पंछियों को चिट्ठियां।
किसी विस्मृत हुई नदी के पुल पर
खड़े होकर निहारते रहना
उसका बहता हुआ निर्मल जल
तैरती रंगीन मछलियां।
इतने दिनों बाद
दोस्त से मिलना
जैसे नए कपड़े पहन के
माँ के संग उड़ते हुए
मेले में जाना
रंगीन पतंग सा
आसमान में उड़ते हुए
सूरज से दोस्त सा बतियाते जाना।
इतने दिनों बाद
दोस्त से मिलना।
तस्वीर में माँ
उसकी देह पर नहीं दिख रहे हैं
मार के नीले निशान
जलती लकड़ी सा
नहीं बरस रहे हैं
उसकी जुबान से अंगार
नहीं कोस रही
ईश्वर या अपनी किस्मत को।
सारे जख्मों को सीकर
उसके ओंठों पर पफैली यह
दिलकश हँसी।
जैसे अभी-अभी
खुशियों भरी बारिश में
भीगकर आई हो वह।
मुस्कुरा रही है
उस वृक्ष की भी एक-एक पत्ती
जिसके नीचे खड़ी है वह
पफोटू खिंचवाने।
सुखों और खुशियों से भरी
कहीं यह कोई
और ही दुनिया तो नहीं
जहाँ खड़ी है एक औरत
मेरी माँ जैसी।
पहाड़
तस्वीर में तुम
कितने अच्छे लगते हो पहाड़
हजारों दुखों से दूर
शांत बपर्फ से ढके हुए।
देह को बपर्फ सी सुइयां चुभोता
गरीब आदमी का
एक भी दुख नहीं दिखता।
यहीं कहीं
इसी तरह के पहाड़ पर
करते होंगे शिव भी वास
यहीं कहीं गुजारते होंगे
देवता भी अपने पफुर्सत के क्षण।
तस्वीर में तुम
कितने अच्छे लगते हो पहाड़
शांत बपर्फ से ढके हुए।
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