तबादले और नियुक्ति के मामले में मुख्यमंत्राी की पत्नी की ज्यादा चलती थी। ये बात कुछ हद तक सच भी थी। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी हो जाता था कि मुख्यमंत्राी खुद या किसी और की सलाह से पफैसला ले लेते थे और उनकी पत्नी को बाद में पता चलता था। नेता आखिर नेता होता है। मुख्यमंत्राी की पत्नी भी कई बार ये बात कहती हैं। जाहिर है कि इस तरह की हरकतों से मुख्यमंत्राी की पत्नी बहुत नाराज हो जाती थीं। लेकिन इससे मुख्यमंत्राी को खुशी मिलती थी। कम से कम कुछ वक्त के लिए ही सही, उनको इसका एहसास होता था कि राज्य के मुख्यमंत्राी खुद वे हैं, उनकी पत्नी नहीं। लेकिन इस बार महानिदेशक की नियुक्ति का मामला सिपर्फ मुख्यमंत्राी के अहम् का नहीं था कि वे अपनी पत्नी को औकात बता रहे थे। खुद उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या पफैसला किया जाए।
असल में इस बार मसला पेचीदा था। महानिदेशक के पद के लिए तीन दावेदार थे। तीनों आईपीएस थे और एक ही बैच के। तीनों अपनी-अपनी वजहों से विवादों के द्घेरे में थे। पहले थे मिस्टर सिंह, जो एक स्कूली छात्राा के साथ छेड़खानी के आरोप की वजह से कापफी चर्चा में थे। मिस्टर सिंह राज्य के महिला बैडमिंटन एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे और उन पर ये आरोप था कि उन्होंने लड़की के साथ छेड़छाड़ किया था। लड़की ने शिकायत कर दी और मामला पुलिस के पास पहुँच गया। मिस्टर सिंह को लगा कि इस लड़की की क्या औकात कि उनके छेड़छाड़ की शिकायत करे। मिस्टर सिंह ने पफटाक से अपनी ताकत का इस्तेमाल करके लड़की को स्कूल से निकलवा दिया। दुखी लड़की ने इसके बाद आत्महत्या कर ली और पिफर मामला मीडिया में जोर शोर से उठ गया। मिस्टर सिंह पर प्रॉपर्टी का बिजनेस करने वाले एक बिल्डर का वरदहस्त भी था क्योंकि उसके लिए उन्होंने किसानों की जमीने खाली कराने में बहुत चुस्ती दिखाई थी। कुछ किसान जरूर मारे गए लेकिन जमीन खाली हो गई और उस पर आलीशन मकान बने और बिक भी गए।
महानिदेशक के लिए दूसरे दावेदार थे मिस्टर प्रसाद, जिन पर एक आदिवासी महिला के बलात्कार का मामला कई बरसों से चल रहा था। इसकी वजह से मिस्टर प्रसाद को कुछ दिनों तक पफरार रहना पड़ा था। उसी वजह से निलंबित भी। वैसे चर्चा थी कि पफरार होकर भी वे अपने उसी सरकारी बंगले में रह रहे थे जो सरकार से उनको मिला था। बस सिपर्फ राज्य की पुलिस उनको ढूंढ नहीं पा रही थी। पिफर एक दिन पिछली सरकार के कार्यकाल में उनका निलंबन इसलिए वापस ले लिया गया कि तत्कालीन मुख्यमंत्राी उनको एक योग्य और काबिल पुलिस अपफसर मानते थे। बलात्कारवाला मुकदमा चल रहा था लकिन मिस्टर प्रसाद आईजी बने हुए थे। उनके बारे में सब लोग यही कहते थे कि उनकी पहुँच मुख्यमंत्राी के किचन तक है। यानी मुख्यमंत्राी की पत्नी उनकी बहुत बड़ी पैरोकार थीं।
तीसरे दावेदार थे मिस्टर वर्मा जो एक पत्राकार की हत्या के आरोप नामजद थे। वे भी कुछ महीने जेल में रह चुके थे लेकिन पिफलहाल जमानत पर थे। जब तक वे जेल में रहे वे भी निलंबित रहे लेकिन जमानत मिलने के बाद उनका भी निलंबन रद्द कर दिया गया और वे पिफर से आईजी बन गए। हत्या का मुकदमा चल रहा था लेकिन उनकी कुर्सी बरकरार थी। वे महानिदेशक पद के बड़े ही सशक्त दावेदार थे। इसकी वजह ये भी थी कि उनकी पत्नी भी आईएएस थी और चर्चा थी कि आईएएस लॉबी उनके लिए लॉबिंग कर रही है।
मुख्यमंत्राी इसी वजह से पसोपेश में थे कि क्या किया जाए। चुनाव करीब आ रहा था इसलिए मुख्यमंत्राी किसी विवाद का पिटारा नहीं खोलना चाहते थे। लेकिन चुनाव के लिए पैसे चाहिए थे और पैसे का बहुत बड़ा स्रोत वो बिल्डर था जिसका वरदहस्त मिस्टर सिंह पर था। दूसरी तरपफ आईएएस लॉबी थी, तीसरी तरपफ उनकी पत्नी थी। आखिर क्या करें, ये सवाल उनके भीतर उमड़ द्घुमड़ रहा था। ये भी था कि आने वाले चुनाव में भरोसेमंद महानिदेशक कापफी मदद कर सकता था। इसलिए महानिदेशक चुनने का मसला राजनैतिक भी था। इसी उधेड़बुन में पफंसे मुख्यमंत्राी ने सलाह मशविरे के लिए राज्य के लिए मुख्य सचिव को बुलाया। मुख्य सचिव द्घाद्घ था लेकिन मुख्यमंत्राी के बड़े भरोसे का आदमी था और कई बार पहले भी कई मुश्किलों में उनकी मदद कर चुका था।
मुख्यमंत्राी और मुख्य सचिव के बीच कुछ इस तरह का संवाद हुआ-
'नसस्कार, कैसे हो?'
'ठीक हूँ, सर। कहिए कैसे याद किया?'
'भाई वो महानिदेशक वाली पफाईल तीन चार दिनों से अटकी पड़ी है। किसको बनाया जाए। आपने तो किसी का नाम नहीं सुझाया।'
आवाज में बिना किसी उतारचढ़ाव के मुख्य सचिव ने कहा-'सर, वो ऐसा है कि किसी के साथ बेइंसापफी नहीं होनी चाहिए। चूंकि तीनों एक ही कैडर के हैं, इसलिए तीनों का बराबरी का दावा है। और सर, ये तो आप जानते ही हैं कि तीनों की आजकल बड़ी चर्चा हो रही है। आई मीन, मीडिया में..'
मुख्यमंत्राी ने लंबी सांस लेते हुए कहा-'हाँ हाँ वो तो है, लेकिन पफाईल तो निपटानी है... थोड़ा कोर्ट वगैरह का देखना पड़ता है। है कि नहीं...'
मुख्य सचिव अपनी बात तौलते हुए बोला-'येस सर। हमें थोड़ी सावधानी दिखानी होगी। असल में सर तीनों बड़े ही काबिल अपफसर हैं। योग्य हैं। देश के लिए और राज्य के लिए कापफी कुछ काम किया है। इसलिए हमें सर ये भी देखना है कि तीनों में किसी के साथ बेइंसापफी नहीं हो।'
'हाँ हाँ, वो तो है। लेकिन ये तो बताइए कि करना क्या है।' मुख्यमंत्राी चाहते थे कि मुख्य सचिव साधे सीधे अपनी राय दे।
लेकिन मुख्य सचिव पुराना अपफसर था और कई मंत्रिायों- मुख्यमंत्रिायों को देख चुका था। वो ये भी नहीं चाहता था कि किसी एक का नाम ले ले बाकी दो उससे खपफा हो जाएँ और बाद में न जाने इस बात का कैसा बदला लें। आखिर मुख्य सचिव को भी छह महीने में रिटायर होना था और महानिदेशक का दावा रखने वाले तीनों अपफसरों की नौकरी तीन तीन साल बची हुई थी। दरअसल भीतर ही भीतर मुख्यमंत्राी को भी इसी बात का डर था कि पता नहीं आगे चुनाव में क्या हो और कोई बड़ा पुलिस अपफसर नाराज हो जाए तो क्या करें। आखिर एक की बीबी आईएएस थी, ये भी ध्यान में रखना था।
मुख्य सचिव ज्यादा देर तक चुप नहीं रह सकता था। मुख्यमंत्राी की बात का जवाब देना जरूरी था। इसलिए सावधानी से बोला- 'सर हम एक काम कर सकते हैं जिससे किसी के साथ बेइंसापफी नहीं हो।' 'बताइए'- मुख्यमंत्राी ने मुख्य सचिव की आँखों में देखते हुए कहा।
'सर, हम ऐसा कर सकते हैं कि राज्य में महानिदेशक स्तर के तीन पद बना दें। जैसे कि सर राज्य में मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का पद खाली है। इस पर अमूमन रिटायर्ड जज बैठ जाते हैं। लेकिन सोचिए सर, एक रिटायर जज किस काम का। और सर, मानवाधिकार ऐसा मामला है जिसके बारे में कापफी तहकीकात करनी पड़ती हैं। ये काम तो कोई पुलिस अपफसर ही कर सकता है। इसलिए सर, मेरा सुझाव है कि एक दावेदार को मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बना दिया जाए।'
'और दूसरों का क्या करें'- मुख्यमंत्राी की आवाज में चिंता भी थी और आश्वस्ति भी।
'सर दूसरे को राज्य पुलिस सुधार आयोग का अध्यक्ष बना दिया जाए। इस पद के वेतन भत्ते भी महानिदेशक के स्तर के हों। वैसे भी सर, कोई भी सुधार स्थायी सुधार नहीं होता जब तक कि वो भीतर से न हो। इसलिए किसी पुलिस वाले को ही इसका अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। वही भीतर से सुधार करने की ताकत रखता है।'
'गुड, वेरी गुड'- मुख्यमंत्राी का आत्म विश्वास लौट आया था। 'तो किसे कौन सा पद दिया जाए।'
'सर। मेरा सुझाव है कि मिस्टर सिंह को महानिदेशक बनवा दिया जाए।' मुख्य सचिव ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा-'यों उनके ऊपर आरोप भी छोटा सा है सर, लड़की से छेड़छाड़ का मामला है। वैसे भी वे बहुत काबिल और योग्य अपफसर हैं सर। इसलिए मुझे लगता है कि इस पद के लिए सबसे सही आदमी वही है। और मिस्टर प्रसाद को मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष और मिस्टर वर्मा को पुलिस सुधार आयोग का अध्यक्ष।'
'ये दोनों नाराज तो नहीं होंगे'- मुख्यमंत्राी के मन में थोड़ी सी चिंता बची हुई थी।
'डोंट, वरी सर, मैं समझा दूँगा। मैं बता दूँगा कि आप दोनों पर संगीन आरोप हैं। इसलिए पिफर से गिरफ्रतारी हो सकती है। सर, गिरफ्रतारी की बात सुनकर बड़े-बड़े अपफसर डर जाते हैं। और सिंह को समझा दूँगा सर, कि दोनों पर निगाह रखे और ज्यादा इधर-उधर करें तो पुराने केस खुलवा दे।' -मुख्य सचिव की आँखों में चमक थी।
'बस, अब एक ही चिंता है। मीडिया हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ जाएगा।' -मुख्यमंत्राी ने सामने रखे पानी के गिलास को पीते हुए कहा। 'ज्यादा मत सोचिए सर, मीडिया में किसी एक स्कैंडल की अधिक से अधिक एक हफ्रते चर्चा होती है। बाद में कोई नया स्कैंडल सामने आ जाता है।'
'सो तो है'- मुख्यमंत्राी ने मुख्य सचिव की हाँ में हाँ मिलाया।
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;साहित्य, रंगमंच और पिफल्मों पर नियमित लेखन। कहानी और व्यंग्य लेखन भी। पिछले २५ सालों से हिन्दी पत्राकारिता। आजकल स्टार न्यूज से संब(।द्ध
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