'दलित' शब्द को ऐसी अर्थ व्याप्ति देते हुए यह पुस्तक औपनिवेशिक दासता के शिकार पूरे हिन्दुस्तान को ही एक दलित राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करती है और एक दलित राष्ट्र में जन-जागरण लाने में गाँधी जी की विशिष्ट भूमिका को उजागर करती है। गाँधी के संबंध में श्री भगवान सिंह ने उन तथ्यों को सामने रखा है जिनसे सि( होता है कि उनकी दृष्टि में 'दलित' का दायरा केवल अछूत जातियों तक सीमित न रहकर अत्यंत व्यापक था। भूमिका में पृष्ठ सात पर लेखक का यह कथन गौरतलब है-
जहाँ तक गाँधीजी के चिंतन एवं कर्म का 'दलित' से संबंध का सवाल है, उन्होंने स्वयं इसका व्यापक दायरे में ही अर्थ ग्रहण किया। उन्होंने अनेक बार अपने भाषणों एवं लेखों में इस बात का जिक्र किया है कि जो देश गुलाम है, वहाँ का हर व्यक्ति गुलाम है। और जो गुलाम होगा वह दलित ही कहलाएगा। गाँधीजी ने 'दलित' की वेदना दक्षिण अीका में रंगभेद से उत्पीड़ित भारतीयों तथा 'गिरमिटिया' मजदूरों की जिंदगी में देखी। दलित की वेदना अपने देश के अछूतों में, बाल-विधवाओं में और जिस्मपफरोशी का धन्धा कर पेट पालने के लिए मजबूर 'पतित बहनों' में देखी। दलित की व्यथा उन्हें अंग्रेज निलहे जमींदारों द्वारा सताए जा रहे चम्पारण के किसानों में दिखाई पड़ी। दलित की आह-कराह उन्हें देश के हरेक पफटेहाल, भूख से बेहाल बेरोजगार आदमी में सुनाई पड़ी। दलित की पीड़ा उस हरेक भारतीय में उन्होंने देखी, जिसकी १९३० तक औसत दैनिक आय दो आने से भी कम थी। इससे भी आगे बढ़कर उस पूरे राष्ट्र में उन्होंने दलित की पीड़ा का साक्षात्कार किया जो औपनिवेशिक शासन के जुए तले दिनोंदिन गरीब-कंगाल होता जा रहा था।
गाँधीजी के लिए 'दलित' का दायरा अत्यंत विस्तृत था जिसके अंतर्गत न केवल मनुष्य बल्कि मनुष्येतर प्राणी तक शामिल थे जो भोजन जैसी बुनियादी जरूरत तक से वंचित थे। मनुष्येतर प्राणियों के प्रति गाँधीजी की यह दलित-व्यथा ही थी जो पक्षियों के संबंध में भी उनसे ऐसा उद्गार व्यक्त करवा सकी-''मैंने तो शौकविह्वल मन से ऐसे पंछी भी देखे हैं जो शक्ति के अभाव में लाख प्रोत्साहन और हिम्मत देने पर भी अपने डैने पफड़पफड़ा तक नहीं पाए।'' ;यह उनके लेख 'महान प्रहरी' से उद्धृत है। इसकी विस्तार से चर्चा चौथे अध्याय में की गई है।द्ध उनकी दलित-संवेदनशीलता की ही व्यापकता थी कि वे अछूतों की दयनीय दशा देखकर चीत्कार कर उठते हैं कि 'जब तक अछूतपन नहीं मिटता, स्वराज्य नहीं आ सकता,' तो 'पतित बहनों' की दशा से द्रवित हो 'स्वराज्य' को एक नया अर्थ दे डालते हैं कि ''स्वराज्य का अर्थ पतितों का उ(ार है।''
पुस्तक का नाम 'गाँधी और दलित भारत-जागरण' यही सोचकर रखा गया कि गाँधी जी के भारत के संदर्भ में पूरे कृतित्व को सही रूप से एक शब्दावली में व्यक्त करने के लिए इससे ज्यादा उपयुक्त दूसरी शब्दावली नहीं हो सकती। यों तो गाँधीजी के चिंतन का दायरा व्यक्ति से लेकर विश्व और मनुष्येतर प्राणी तक है, किंतु जहाँ तक अपने देश एवं समाज के संबंध में उनके कार्यों के मूल्यांकन का प्रश्न है, उसे हम इस शीर्षक से अभिहित करके ही न्याय कर सकते हैं।
वस्तुतः गाँधीजी के लिए, जैसा कि हम आगे के विवेचन में देख सकेंगे, पूरा भारत ही दलित था, जिसके दो पक्ष थे-पहला आंतरिक दलन और दूसरा बाहरी दलन। आंतरिक दलन के शिकार वे बेशुमार जन थे जिन्हें 'अछूत' बनाकर पशु से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य किया गया था। साथ ही 'स्त्राी' जाति थी जो शिक्षा एवं सामाजिक समानता के अधिकारों से वंचित तो थी ही, इसके अतिक्ति बाल-विवाह, बाल-विधवा, वेश्या, देवदासी जैसी कुप्रथाओं के कारण भी दलित बनी हुई थी। इसे ही डॉ. पूरनचन्द्र जोशी जैसे समाजशास्त्राी 'आंतरिक उपनिवेशवाद' की संज्ञा देते हैं जिसकी शिकार मुख्य रूप से अछूत जाति एवं स्त्राी जाति थी। पुस्तक ने इस रूप में दलित शब्द के साथ स्थूल रूप में जुड़ती चली सत्ता राजनीति को एक तरपफ रखते हुए गाँधी द्वारा महसूस किए गये अर्थ को प्रमुखता से रेखांकित किया है।
'दलित' शब्द के अर्थ को व्यापक संदर्भ प्रदान करते हुए श्री भगवान सिंह ने गुलाम भारत के दलित होने के चार आयाम माने हैं और उन्हीं चारों पर अपना यह विवेचन केंद्रित किया है। अछूत जातियों और स्त्रिायों के सवाल को लेखक ने भारत के आंतरिक उपनिवेशवाद के रूप मेंऋ तो भाषा, शिक्षा पर विदेशी नियंत्राण तथा राजनीतिक दासता को बाह्य उपनिवेशवाद के रूप में रेखांकित कर समाजशास्त्राीय दृष्टि से बहुत उपयुक्त विभाजन किया है। प्रथम अध्याय में लेखक ने कापफी विस्तार से गाँधी द्वारा पूरे देश में अस्पृश्यता-निवारण के लिए किए गए कार्यों का विवेचन करते हुए इस दुष्प्रचार का प्रत्याख्यान किया है कि गाँधी आज के संदर्भ में दलित कहे जाने वालों की समस्याओं के प्रति कहीं से भी उदासीन थे।
गाँधी के साथ डॉ. अम्बेडकर के मतभेदों को भी बहुत शालीनतापूर्वक रखते हुए लेखक ने उस ऐतिहासिक सच को सामने रखा है कि कैसे अम्बेडकर अंततः गाँधीजी के विरोधी न होकर उनके पूरक बने और मुख्य राष्ट्रीय धारा से जुड़ गए। आज कतिपय दलित एवं वामपंथी लेखक मार्क्स एवं अम्बेडकर के मेल की बात कर रहे हैं, यह पुस्तक हमें इस सत्य का एहसास कराती है कि भारत के लिए आज भी गाँधी और अम्बेडकर की पारस्परिक पूरकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। वैसे यह लग सकता है कि पुस्तक में अम्बेडकर के पक्ष को बहुत विस्तार से नहीं रखा गया है लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि पुस्तक दलित-भारत में जागरण लाने में गाँधी की भूमिका उजागर करने के लिए लिखी गई है।
आज के स्त्राी-मुक्ति विमर्श के परिदृश्य में गाँधीजी की चर्चा गायब सी है। वास्तविकता है कि गाँधी ने स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करने के साथ-साथ भारतीय समाज में स्त्रिायों की पराधीन स्थिति, सती-प्रथा, बाल-विवाह, असमानता आदि को दूर करने पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया। स्वाधीनता आंदोलन में भी उन्होंने बगैर लिंगभेद के बड़ी संख्या में स्त्रिायों को शामिल किया और इस प्रकार उन्होंने पूरे देश में नारी जागरुकता का एक अभियान सा चलाया। इसी के परिणाम स्वरूप स्वतंत्रा भारत के संविधान में स्त्रिायों को पुरुषों के समक्ष समस्त राजनीतिक अधिकार प्रदान किए गये। भारत की स्त्रिायों को अपने राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए यूरोप या अमेरिका की स्त्रिायों की तरह अलग से आंदोलन नहीं चलाना पड़ा। इसका श्रेय भी गाँधी को ही दिया जाएगा। पुस्तक के दूसरे अध्याय 'स्त्राी जागरण' के अंतर्गत गाँधी के इन्हीं कार्यों का विस्तार से जिक्र कर लेखक ने उनके कार्यों और विचारों को संप्रति स्त्राी विमर्शवादियों के लिए जरूरी सा बना दिया है।
तीसरे अध्याय में गाँधी जी द्वारा समस्त देशी भाषाओं के उत्थान के साथ-साथ राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के राष्ट्रव्यापी प्रचार का जिक्र करते हुए उनकी इस सोच को सामने रखा है कि भाषा एवं शिक्षा के स्तर पर भी गाँधी की दृष्टि में भारत एक उत्पीड़ित राष्ट्र था, जिसकी पीठ पर विदेशी भाषा एवं शिक्षा का दुर्वह भार पड़ा हुआ था।
चौथे अध्याय में भारत में राजनीतिक जागरुकता पफैलाने में गाँधी के विशेष योगदान की चर्चा है। राजनीतिक जागरुकता का यह अभियान गाँधी के महान जीवन का ऐतिहासिक संदेश कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में उन्होंने जिन गतिविधियों को दर्शाया है, आज की राजनीति उनसे बहुत कुछ चाहे तो सीख सकती है। इस अध्याय में मुख्यतः उन द्घटनाओं पर रोशनी डाली गई है जिनके कारण भारतीय स्वतंत्राता-संग्राम में गाँधी की भूमिका अन्य नेताओं की तुलना में अधिक राष्ट्रव्यापी एवं महत्वपूर्ण हो सकी। गाँधी की राष्ट्रीय राजनीति को यहाँ बहुत ही सही परिपे्रक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है।
कुल मिलाकर यह पुस्तक गाँधी के संबंध में बरसों से प्रचारित की जा रही कई मिथ्या धारणाओं से हमें मुक्ति दिलाती है और बहुत ही वस्तुनिष्ठ ढंग एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जागृति पफैलाने में उनके विराट योगदान का अभिज्ञान अपने पाठकों को कराती है। इसके साथ ही एक और विशिष्टता इस पुस्तक की यह कि गाँधी के कामों एवं विचारों का उनके समकालीन हिन्दी साहित्यकारों पर पड़े रचनात्मक प्रभाव को भी यह अत्यंत तार्किक ढंग से रेखांकित करती है। कतिपय प्रगतिवादी एवं दलित समीक्षकों द्वारा हिन्दी रचनाकारों पर मार्क्सवाद या अम्बेडकरवाद का प्रभाव अतिउत्साहजनक शैली में चस्पां कर दिया गया है। पुस्तक उसे दरकिनार कर गाँधी के साथ उनकी सहधर्मिता को सामने रखती है।
अंग्रेजी में तो गाँधी के विभिन्न पत्राों का विवेचन करने वाली कापफी पुस्तकें उपलब्ध हैं, लेकिन हिन्दी में गाँधी के अस्पृश्यता निवारण, स्त्राी जागरण, भाषा एवं शिक्षा तथा स्वराज्य जागरण से जुड़े कार्यों का विवेचन कर उनके संबंध में कायम की गई अनेक भ्रातियों से मुक्त करने वाली कदाचित यह पहली पुस्तक है। इसके अध्ययन से निस्संदेह हिन्दी के पाठकों को गाँधी को समझने की सही दृष्टि मिलेगी।
भारतीय भाषा परिषद
३६ ए शेक्सपियर सरणी, कोलकाता ७०००१७
मो. ९४३२६६७०७७
. |