जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
अदबी हयात
स्त्रीत्व की छवियों का प्रत्याख्यान द राजीव रंजन गिरि

हिन्दी साहित्य का 'स्त्राीवादी' उपकरणों से मूल्यांकन होना बाकी है। इसी मूल्यांकन के सिलसिले में स्त्राीवादी आलोचना की सै(ांतिकी बनेगी और विकसित होगी। पिफलहाल, स्त्राीवादी आलोचकों की संख्या ऊँगली पर गिनी जा सकती है। इनकी आलोचना ने 'पाठ' को नए ढंग से देखा, परखा और विश्लेषित किया है। पाठ के भीतर अदीठ रहे मूल्यों और संरचनात्मक राजनीति को उजागर भी किया है। स्त्राीवादी आँख से परखने पर कई 'महान' और 'महान' बनने को आतुर रचनाकारों की सीमाएँ उजागर होंगी। वर्तमान में


सक्रिय कई रचनाकारों, जिनकी रचनाओं पर खूब ढोल पीटा जाता है, की रचनाओं में मौजूद 'सेक्सुअल पॉलिटिक्स' का विश्लेषण होने पर जादुई जादू का ढाँचा दरक जाएगा। संभव है, इस विश्लेषण से पता चले कि मौजूदा समाज की मानसिक बुनावट में व्याप्त पितृसत्ता के विभिन्न पहलुओं का पोषण करने वाले सूत्राों की मौजूदगी, इन रचनाकारों की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण है। केट मिलेट ने हेनरी मिलर, नार्मन मेलर, डी.एच.लारेंस, नोबोकोव, ज्यॉ जेने आदि रचनाकारों के साहित्य में अंतर्निहित जेण्डर-जनित भेदों को 'सेक्सुअल पॉलिटिक्स' शीर्षक से प्रकाशित किताब में व्याख्यायित कर उजागर किया था। हिन्दी में ऐसी स्त्राीवादी आलोचना भी आवश्यक है।

जिन कुछेक स्त्राीवादी आलोचकों ने इस दिशा में खास काम किया है, रोहिणी अग्रवाल उनमें एक हैं। आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा से प्रकाशित उनकी दो किताबें 'इतिवृत्त की संरचना और स्वरूप' तथा 'समकालीन कथा साहित्यः सरहदें और सरोकार' रोहिणी अग्रवाल के एक स्त्राीवादी आलोचक होने का परिणाम है और प्रमाण भी। अर्चना वर्मा और बलवंत कौर के अतिथि संपादन में 'हंस' ;नवंबर २००९द्ध प्रभा खेतान की स्मृति में 'स्त्राी विमर्शः अगला दौर' विशेषांक प्रकाशित हुआ है। इसमें रोहिणी अग्रवाल की एक रचना 'किले में समंदर' छपी है। पफैंटेसी में लिखी गयी यह सुंदर और विचारोत्तेजक रचना विधाओं के बंटवारे की हदबंदी को तोड़ती है। किसी खास विधा की जद में समाने से इंकार करने वाली यह रचना कई विधाओं में आवाजाही करती है। रोहिणी अग्रवाल के आलोचनात्मक लेखन की एक बड़ी खूबी-सृजनात्मक भाषा, जिसकी वजह से उनकी आलोचना ठस्स, नीरस और उबाऊ न होकर पठनीय होती है-यहाँ भी कायम है।

इस रचना की किरदार हैं-माँ दुर्गा, यम से पति का प्राण लौटानेवाली सावित्राी, यशोदा, 'सीमंतनी उपदेश' की रचनाकार 'एक अज्ञात हिन्दू महिला' जिसे रोहिणी अग्रवाल ने निम्मो नाम दिया है, रख्माबाई, शिवरानी देवी, रमाबाई, निरक्षर दादी पूनम उपर्फ पुन्नी, बिट्टी और इन सबको सूत्राों में जोड़नेवाली लेखिका स्वयं। इन किरदारों के आपसी वाद-संवाद का सुंदर और सार्थक नतीजा है-किले में समंदर। यह शीर्षक, 'किले में समंदर' देखकर एकबारगी जेहन में सवाल उठता है कि क्या समंदर की किलेबंदी हो सकती है? पूरी रचना पढ़कर पता चलता है शीर्षक की सार्थकता। ये सभी किले में कैद समंदर ही तो हैं। जाहिर है, पितृसत्ता के इस किले को देर-सबेर ढहना है।
'किले में समंदर' की सभी किरदार अपना-अपना पक्ष लेकर उपस्थित हैं। इनका अपना पक्ष, जाहिर है यह रोहिणी अग्रवाल द्वारा सृजित पक्ष है, समाज में मौजूद प्रदत्त पक्ष का प्रत्याख्यान करता है। पूरे तर्क, विवेक और संवेदना से सृजित यह पक्ष विश्वसनीय है। निरक्षर दादी के नाम की जानकारी नहीं। जैसे 'सीमंतनी उपदेश' की महान लेखिका आज तक अज्ञात बनी हुयी हैं। किसी को नाम से बेदखल करना वर्चस्वकारी सत्ता की चरम क्रूरता है। यह अहिंसक हिंसा इस तरीके से काम करती है कि इसका अहसास तक नहीं हो पाता।

''ओ!!! दादी, तुम्हारा नाम पूनम है? मुझे तो पता ही नहीं था। औरतों के नाम खुद औरतों को याद नहीं रहते। उनसे नामछीन लिए जाते हैं ताकि कोई अलग पहचान न बना सके। नामविहीन व्यक्ति चेहराविहीन हो जाता है पहले, पिफर भावहीन, विचारहीन, व्यक्तित्वहीन। औरत की पहली लड़ाई अपना नाम पाने की होनी चाहिए। पद नहीं, विशेषण नहीं, नाम! अलख जगाता, धूनी रमाता नाम!''
इसी प्रकार, सावित्राी पितृसत्ता द्वारा गढ़ी छवि को तोड़ती हुई कहती हैं-''मैं... सावित्राी... सत्यवान की परिणीता। यम से लौटा लाई पति के प्राण, राज्य, सुख, स्वत्व, संतान, भविष्य! मैं अकेली। पिफर भी कहलाई अबला, पर निर्भर! मेरी अपराजेय जिजीविषा, संद्घर्ष-संकल्प व्यूह रचना और रण लड़ने की कूटनीति-सब अलक्षित! बना दी गयी पतिव्रता पत्नी! सतीत्व का चरम! पुरुष को मौत के मुँह से लौटा लाने की जुर्रत करती स्त्राी को उन्मुक्त कैसे छोड़ दे समाज? वह हस्तक्षेप कर व्यवस्था को पलटेगी। इसलिए मैं पुरस्कृत की गयी-सतीत्व में कैद करके।''

स्त्राीत्व की प्रदत्त छवियों से मुक्ति की राहें तलाशती इन किरदारों को बखूबी पता है कि ''स्त्राी की भरपूर ठोस लौिकक स्वतः स्पफूर्त्त इयत्ता को क्षरित कर किन्हीं महिमामंडित दैवीय अमूर्तनों में बाँधने की क्रमिक प्रक्रिया है स्त्राीत्व की रचना। खंडों में विभाजित स्त्राी अपूर्ण, निर्भर और अडोल रहेऋ हृदय, बु(,ि गति और कर्मठता को जोड़कर किसी एक दिशा की ओर प्रयाण न कर सके। स्त्राी की तेजस वैयक्तिक अस्मिता की हत्या कर स्त्राीत्व उसे लैंगिक इकाई बनाता है-पुरुष की परिक्रमा में जीवन पाती लैंगिक इकाई। मातृत्व, सतीत्व, गृहिणीत्व-स्त्राीत्व की संरचनाएँ। स्त्राी को छलती प्रवंचनाएँ।''
रोहिणी अग्रवाल द्वारा रचित इस आख्यान की सबसे बड़ी खासियत है-एक तरपफ अपने पुरखों का पक्ष रखना और दूसरी तरपफ नयी पीढ़ी की प्रतिनिधि 'बिट्टी' के माइंडसेट को पूरी संवेदनशीलता के साथ समझना। माँ-बेटी जो आरंभ में स्थिति का विस्तार न लगकर विलोम प्रतीत होती हैं, अंत में विस्तार बन जाती हैं। एक साथ सबको आख्यान में पिरोकर रोहिणी अग्रवाल ने स्त्राीवाद का मजबूत पक्ष पेश किया हैऋ साथ ही स्त्राीत्व की पितृसत्ता द्वारा निर्मित और प्रचारित-प्रसारित छवियों का प्रत्याख्यान भी।
इक्कीसवीं सदी में प्रेमचंद के पात्रा

लखनऊ से तिमाही छपनेवाली पत्रिाका 'लमही' के कहानी विशेषांक ;अक्टूबर-दिसंबर २००९द्ध में राकेश कुमार सिंह की 'कहानी खत्म नहीं होती' शीर्षक कहानी छपी है। यह कहानी प्रेमचंद की कहानियों से कुछ पात्राों को लेकर रची गयी है। पंडित अलोपीदीन, माधो, द्घीसू सरीखे पात्रा मौजूदा दौर में कैसे होंगे? लोकतांत्रिाक चेतना ने इस दौरान जो बदलाव लाए हैं, ऐसे में पंडित आलोपीदीन जैसे शातिर चरित्राों ने भी अपने को बदला है। 'नमक का दारोगा' में ईमानदार बंशीधर को न्यायालय में पराजित कर पंडित अलोपीदीन ने अपने कारोबार का प्रबंधक बनाने की इच्छा प्रगट कर अपनी धूर्तता का प्रमाण दिया था। इसका पूरा विस्तार और विकास राकेश कुमार सिंह की कहानी में हुआ है। पंडित अलोपीदीन द्घीसू के दरवाजे पर आते हैं और 'द्घीसू... ए द्घीसू भाई...' कहकर बुलाते हैं। यह आज का समय है। बदला हुआ समय। इस बदले हुए दौर का अहसास द्घीसू को नहीं है। इसलिए द्घीसू अचकचा जाता है। अलोपीदीन कहता है ''अंगोछा-मुरेठा क्यों खोजते हो भाई? अब तो तुम्हारे मुकुट पहनने के सुदिन आ गये हैं। पंवलग्गी की भी जरूरत नहीं अब। श्र(ा से हाथ भी उठा दो तो वही बहुत है।''
द्घीसू-माधव के जमाने और आज के दौर का अंतर बताते हुए राकेश कुमार सिंह ने लिखा है ''जब बाप-बेटे टुन्न हुए थे तब नमक पर भी दारोगा नियुक्त थे। आँखें खुली तो पेप्सी, कोक चिप्स-पिज्जा का दौर...। तेरह राज्यों का सूखा झेलते भारत के खेतों में 'बिन पानी सब सून' का हाहाकार और खेतों की मेड़ों पर 'मिनरल वाटर' की नाचती बोतलों के संग... ये दिल मांगे मोर का शोर...। बाजार में चहुँ ओर बेचो-खरीदो की चीखें थीं। पश्चिमी सौंदर्यान्वेषियों द्वारा आविष्कृत महान भारतीय नारी सौंदर्य गरीब-दुखियों-लाचारों के लिए काम करने के वायदे को बिसरा कर अब बाजार की दीवारों पर 'दिलवर... दिलवर' करता नग्न-अर्धनग्न नाच रहा था।''

पंडित अलोपीदीन ने चालाकी से बंशीधर को अपना प्रबंधक बनाया था। वैसे ही लोकतंत्रा ने जो ताकत दलितों को दी है, उसे भी हथियाने की कोशिश कर रहा है। माधो को उम्मीदवार बनाकर, अपना पैसा खर्च कर, दलित एकजुटता में सेंध मारने की उसकी चालाक कोशिश सपफल नहीं हो पाती है। 'दूध का दाम' कहानी का मंगल अब वयस्क हो गया है। 'ठाकुर का कुँआ' की गंगी और 'द्घासवाली' की मुलिया भी विकसित होकर राकेश कुमार सिंह की इस कहानी में चन्तरवा के रूप में मौजूद है। चन्तरवा पंडित अलोपीदीन की चालाकी को कामयाब नहीं होने देती है। चन्तरवा ने अब अलोपीदीन को डाँटने की क्षमता विकसित कर ली है। नये जमाने की यह पात्रा किसी झाँसे में नहीं आने वाली है। यह अलोपीदीन की चालबाजी को समझती है और सत्ता तक पहुँचने का गुर भी जानती है।
युवा कविता का चेहरा
तिमाही पत्रिाक 'संबोधन' ;कमर मेवाड़ी, पोस्ट कटरौली, राजसमंद-३१३३२४, राज.द्ध के 'समकालीन युवा कविता अंक' में ३१ कवियों की कविताएँ शामिल हैं। 'संबोधन' के इस अंक में, हालांकि कई युवा कवि शामिल नहीं हो पाएँ हैं, हिन्दी की युवा कविता के विस्तार और व्याप्ति का अंदाजा इससे लगता है। इस विशेषांक के अतिथि संपादक कवि असद जैदी ने आश्वस्त करने वाली इन रचनाओं को पेश करते हुए कहा कि समकालीन हिन्दी कविता को लेकर करीब १५-२० साल से कई सवाल कभी बा-आवाजे बुलंद तो कभी स्वगत या बुदबुदाते हुए पूछे जा रहे हैं, जिनमें मुख्य चिंता यह है कि कविता कुछ रुक सी गई है। क्या यह एक अवरोध है या आराम का एक वक्पफा? क्या यह शक्ति अर्जन 'कनसालिडेशन' के उपलब्ध संसाधनों के बेहतर नियोजन और मानकीकरण- स्तरीयकरण का दौर है? ऐसा दौर जिसमें एक पूरी परंपरा की अनुभव संपदा परिपक्वता और सांद्रता अर्जित करती है? या यह किसी ऐतिहासिक कार्य सूची के त्याग और खामोश पलायन का दौर है? क्या ऐसा हो सकता है कि कविता जैसी अराजक विधा में स्वतः पर नजर आती शांति और नर्मल्सी अपने भीतर आगामी हलचल या बड़े युगीन परिवर्तन को छुपाए हुए है जिस पर गौरो- पिफक्र की दरकार है? क्या आज के दौर की कविता सिपर्फ प्रतीक्षा की कविता है? प्रतीक्षा की कविता भी बेकली की कविता होती है, पूछने की बात यह है कि वह बेकली कहाँ अवस्थित है और वह कैसी है कि आज की कविता अपने आज के यर्थात को जागरूक ढंग से देख और आंक रही है और लिहाजा प्रतिपक्ष बना रही है, या एक अस्तित्वगत प्रवाह है जिसमें सब लोग बहे जा रहे हैं। इस अंक के कवि अपनी रचनाओं के साथ परेशानाकुल सवालों का अपनी-अपनी तरह से जवाब देते हैं।
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;लेखक उभरते हुए युवा आलोचक हैंद्ध
बी-५/३०२, यमुना विहार दिल्ली, मो. ९८६८१७५६०१ तंरममअण्तंदरंदण्हपतप/हउंपसण्बवउ

 
 
 
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