;वह कठिन सवाल जिसे आज भी भारतीय किसान कहा जाता हैद्ध
खाँटी सिधाई की सारी हदें कैसे पार कर जाते हो बाबा?
यकीन नहीं होता,
क्या तुम्हें अपने जन्म-जन्मान्तर के तिरस्कार की हूक नहीं उठती?
क्या हार खाई हुई निगाहें
तिरछा होना वाकई भूल गई हैं?
या कि तुम्हारी जुबान सिपर्फ झुकने की भाषा जानती है?
खुद को गौर से देखो बाबा!
चेहरे की चमड़ी ऐंठ-वैंठ कर
कैसी पीली पपड़ी रह गयी है,
तुम्हारे बदन पर जवानी की रंगत न जाने कब आयी,
कब बिला गयी,
तुम्हें कुछ पता कहाँ चला?
जबकि यह तय है
इसी कद-काठी ने कभी हित-दुश्मन सबके लिए
अपनी सूखी नसों से कतरा-कतरा खून निचोड़ा है
आज खोखले हो चुके इसी हाथ-पैर ने कभी
अनगिनत वर्षों तक अनथक
अपने सिवाय सबकी खिदमत की है
इसी निःशेष ढाँचे ने कभी
तकलीपफों के दरिया को
हलाहल विष की तरह पी जाने का चमत्कार दिखाया है
इसमें न जाने कितने ग़मों का इतिहास दपफ़न है,
आत्मा पर कल्पनातीत चोट सहने की तो कोई सीमा ही नहीं,
दुत्कार की मार बर्दाश्त कर लेना
जैसे तुम्हारी आनुवंशिक आदत ही पड़ चुकी हो
वैसे यह भी सबको पता है कि
अपनी अड़ियल हिम्मत से
मुश्किल को भी मुश्किल में डाल देने वाले
तुम इस पृथ्वी की आवश्यक तकदीर हो।
देखना चाहता हूँ कि
तुम्हारी भी आँखों में खुद की कीमत आँकने की चमक
लौट आयी है,
तुम्हारे भी ललाट पर
तनी हुई रेखाएँ बनती हैं
तुम्हारा यह दीन मस्तक
अपने वजूद की आन्तरिक गरिमा से
ऊपर उठता है,
सैकड़ों बेड़ियों में जकड़े हुए तुम्हारे श्रमजयी पाँव
एक टाँग पर खड़े होना ही नहीं जानते,
जंजीरें झटक कर तोड़ देना भी जानते हैं,
तुम्हारी साँस दर-साँस पर
शैतानी आत्माओं का सख्त पहरा है
जिनकी वहशी आवाजों में
तुम्हारा जीवन निगल जाने की पागल इच्छा नृत्य करती है
दिन-प्रतिदिन अपनी आत्मद्घाती उपेक्षा
तनिक भी न सहना तुम कब सीखोगे?
कब सीखोगे?
अपनी एक-एक पराजय के ख़िलापफ
चट्टान की तरह खड़े हो जाना,
समय के न्याय पर यकीन रक्खो बाबा!
तुम्हारे सत्य से अपने झूठ को टकराने का
ऐतिहासिक पफैसला उन्हें भी पता है।