जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
ब्लॉगनामा
विवादों के ब्लॉग : प्रतिभा कुशवाहा

वर्ष २००३ से शुरू हुआ हिन्दी ब्लॉगिंग का सपफर इस वर्ष माकूल जमीन पकड़ने में कामयाब हुआ। हिन्दी ब्लॉगर ने विभिन्न मसलों पर चाहे वह सामाजिक, साहित्यिक, राजनीतिक हो या पिफर बेहद निजी सुख-दुख, सभी पर तुरत-पफुरत प्रतिक्रिया देकर अपनी उपस्थिति का बराबर एहसास दिलाता रहा। कुछ वाद-विवाद, सुलह-सुबहे, क्रिया-प्रतिक्रिया तथा



आरोप-प्रत्यारोप के कारण २००९ की हिन्दी ब्लॉगिंग खासी चर्चित रहीं। इन चर्चाओं में टीवी पत्राकार रवीश कुमार ने पुरानी मगर महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया। उन्होंने अपने ब्लॉग 'कस्बा' पर लिखा, 'लेखक, गीतकार क्या साहित्यकार नहीं?' क्या वे साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों के अध्किारी नहीं? प्रसून जोशी जैसे गीतकारों पर नामवर सिंह जैसे आलोचक क्यों नहीं लिखते, आदि प्रश्नों ने इस पुरानी बहस को साइबर वर्ल्ड में छेड़ दिया।
हिन्दी ब्लॉग जगत में सबसे अध्कि विवादों में छाने वाला विवाद साहित्यकार उदय प्रकाश का योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार ग्रहण प्रकरण रहा। कबाड़खाना ब्लॉग के अनिल यादव की टिप्पणी के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया। इस प्रकरण ने आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा दौर चलाया कि स्वयं उदय प्रकाश को अपने ब्लॉग पर सपफाईनामा प्रकाशित करना पड़ा। इसी तरह का दूसरा प्रकरण दिवंगत वरिष्ठ पत्राकार एवं संपादक प्रभाष जोशी के मामले में हुआ जब उन्हें रविवार डॉट कॉम पर अपने एक साक्षात्कार में ब्राह्मणवादिता, सती प्रथा आदि मुद्दों पर की गई टिप्पणियों के लिए महिला ब्लॉगरों समेत कई तबकों के ब्लॉगरों के कोप का शिकार बनना पड़ा। सितंबर में 'हिन्दी की आध्ुनिकता : एक पुनर्विचार' ;सितंबर २३ से २९द्ध विषय पर शिमला में आयोजित कार्यशाला में दलित लेखिका विमल थोरात ने अपने एक संस्मरण के माध्यम से आलोचक नामवर सिंह पर दलित साहित्य को इग्नू के पाठ्यक्रम में न आने देने तथा एमपिफल के दौरान प्रवेश में बाध डालने का आरोप मढ़ दिया। जो ब्लॉगरों के माध्यम से होता हुआ मीडिया में भी छा गया। नामवर सिंह की चुप्पी के बाद यह आरोप पफुस्सा पटाखा साबित हुआ।
हमेशा से विवादित रहने वाले साहित्यिक पुरस्कार भी ब्लॉगरों को ब्लॉगिंग के नये विषय उपलब्ध् कराते रहे। इसमें प्रमुख रूप से भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार संदेह के द्घेरे में आना रहा। उर्वर प्रदेश-३ की भूमिका में कवि विष्णु खरे ने उन कवियों की कविताई पर ही प्रश्न उठा डाले जो उक्त पुरस्कार से सम्मानित थे। यह सनसनीखेज पर्चा 'सबद' पर आते ही मोहल्ला लाइव पर तुरंत प्रकाशित हुआ। जिसका शोर ब्लॉगिंग पर कापफी दिनों तक जारी रहा। पुरस्कारों के संदर्भ में दूसरा महत्वपूर्ण मामला रहा जिसके चलते 'वसुध' के प्रधन संपादक ने 'कबीर चेतना' पुरस्कार लौटा दिया। प्रगतिशील वसुधा ने गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान से पफोर्ड पफाउंडेशन की राशि से प्रदत्त कबीर चेतना पुरस्कार स्वीकार करने के आरोप लगाते हुए कहानीकार ज्ञानरंजन केे प्रलेस से इस्तीपफे को लेकर मोहल्ला सहित महत्वपूर्ण ब्लॉगों पर प्रतिक्रिया देखी गई। जनवादी लेखक संद्घ ;जलेसद्ध के कवि विजय शंकर चतुर्वेदी को संगठन से निकाले जाने की खबर भी ब्लॉग पर जमी रही। जलेस ने विजय शंकर पर पारिवारिक दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था जो उनकी कथनी और करनी के विरु( था। हमेशा से विवादों में रहने वाली ज्ञानपीठ के लेखकों के रॉयल्टी का मामला भी ब्लॉग में खूब उछाला गया। रॉयल्टी स्टेटमेंट की सूचना छुपाने का जो मामला मोहल्ला ब्लॉग में उठाया गया उसे ज्ञानपीठ के आजीवन ट्रस्टी आलोक जैन ने गंभीरता से लिया।
अक्टूबर में हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी अचानक बंद कर दी गई, तो हिन्दी ब्लॉग जगत सकते में आ गया। बंद करने की वजह के बारे में एग्रीगेटर संचालकों ने कुछ स्पष्ट वजहों का खुलासा नहीं किया। पर कथिततौर पर इस बंद प्रकरण के पीछे ब्लॉगवाणी पर पक्षपात और मनमर्जी के आरोपों का लगना था जिससे परेशान संचालकों ने इस एग्रीगेटर को बंद करने में ही समझदारी समझी। पर दो दिन बाद ही तमाम आग्रहों और मनुहार के बाद ब्लॉगवाणी एग्रीगेटर चलने लगा और ब्लॉगरों ने चैन की सांस ली। पर इस एग्रीगेटर बंद प्रकरण ने हिन्दी एग्रीगेटर की उपयोगिता, भविष्य और ब्लॉगरों के पास इससे जुडे़ विकल्पों की तलाश पर प्रश्न खड़े कर दिये।
अक्टूबर के अंत में इलाहाबाद में 'चिट्ठाकारी की दुनिया' विषय पर जो संगोष्ठि का विशाल आयोजन हुआ और जिसके मुख्य अतिथि गैर ब्लॉगर वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह बनाये गये, कापफी हंगामाखेज रहा। इसमें ब्लॉगरों का गुस्सा ब्लॉगरों के आमंत्राण पर भेदभाव, 'अपराध्ी' ब्लॉगरों की उपस्थिति, 'हिन्दूवादी' ब्लॉगरों से दूरी और महिला ब्लॉगरों की अनुपस्थिति जैसे आरोपों के साथ निकला। वर्ष के अंत में मोहल्ला ब्लॉग पर वरिष्ठ पत्राकार राजकिशोर ने अपनी याेग्य बेटी के लिए योग्य वर की तलाश में बायोडाटा ही पोस्ट कर दिया। यह ;प्रगतिशीलद्ध बायोडाटा महत्वपूर्ण ब्लॉगरों की टिप्पणियाँ पाने में कामयाब रहा। इस तरह तमाम बहसों और विवादों के बीच वर्ष का अंत आते-आते निजी चिट्ठाकरिता सार्वजनिक चीरहरण का केंद्र बनकर रह गयी।

 
 
 
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