जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कविताएं
चैतन्य त्रिवेदी
प्रतीति

कुछ तो
झंडों में जा के मर गए
तो कुछ
लिबास में
ठहरने की गुजारिश करने लगे
और कोई कोई
अपने पफटे की जलील अर्थों को
छुपाते हुए
सभ्यता में गश खाने लगे
वे शब्द


जिन्हें अब तक अपनी धमक से
पहचान बना लेना थी
अपनी आवाज को
इस आजादी में
इधर-उधर बंद होठों पर
ढूँढ़ते हुए
सांसत में पफंसी जान लिए
कबूतर में बदल
राजा शिबि के करीब ठहर जाते हैं
सत्ता के हिस्से के गोश्त में
अपनी नयी अस्मिता कायम कर
ऐसा समझने लग जाते हैं पिफर
हमने सभ्यता को पिफर कोई
अलग हट
दे दिए नए अर्थ।

 
यह वक्त
 

लोगों यह वक्त
जिंदगी के खुश लम्हों का
पीछा करते हुए
यह पहचानने का वक्त है
कि आँखें खुशी से छलक आयी हैं
या किसी दुःख के भरोसे
थामे हुए है समन्दर
वक्त को नहीं मालूम शायद
वह जिस तरह मारना चाहता है
जीना सीख लिया है लोगों ने उस तरह से
आप उन्हें अब
हर उस द्घटना में शामिल कर सकते हैं
जिसकी कंपकपी में रूह की जरूरत पड़ती है
यकीन रखिए
शहर के जो कसाई पत्थरों पर धार तेज करते देखे गए हैं
उधर धड़कनें छुपाए रखने का चलन
पहले से ही है
अब वे इतना भर चाहते हैं
जड़ दे ताले कोई पफरिश्ता बनकर
उन्हीं दरवाजों से सारे मौसम
मातम मनाते निकले
जिनसे जलसों के हंगामे आने का वादा
हर पन्द्रह अगस्त को लहराया जाता रहा है।

 
आभास का सच
 
खत्म हो चुकी कविताएँ
पैवस्त हो रही हैं चुप्पियाँ
धीरे-धीरे शुरू होता है
जिंदगी में शामिल होने का संताप
जिस जगह पैर छुटते जान पड़े
वह अपनी ही डबडबाई आँखों का मंजर
रूमाल में छुपाए एक भीगी दुनिया
बादलों को थमा दी जाती है
रास्ता लंबा है और
मौत के पत्थर हर मील पर,
अब यहाँ हादसों की खबरें
बेचैनी से कोई नहीं सुनता
हर एक अपनी मौत की अपफवाह पर
यकीन कर चुप-सा खड़ा है
कल ही पफूलों की हँसी तलाशते बियाबान,
होंठों पर ठहर चुके हैं
देर रात के शोर थम जाने की जगह पर
दम तोड़ते शहर की आवाज में शामिल
द्घरों के दरवाजे बंद होते हैं
मुझे तो पड़ा रहने दो
किसी शव की बंद नब्ज के भीतर
जैसे ठहरा रहता है खून
अपने पानी हो जाने की बारी आने तक।
 
नमक से मिलते हैं
 
जब हम
नमक से मिलते हैं
कुछ-कुछ ईमान से भी
सामना हो जाता है।
लगता है उसके खारेपन में
अपने आईने से मिलते हैं
और थोड़ा-थोड़ा खून में भी
शामिल होते हैं।
जब हम नमक से मिलते हैं
तब लगता है
हम इतिहास में भी
शामिल होने लगते हैं
शुरू-शुरू में ईमान से
मिलने का जमाना
रह-रह याद आता है नमक में
नमक से मिलते वक्त
हम ईमान में द्घुल जाते तो
इतिहास में शामिल होने से
खून को रोक सकते थे।
 
 
 
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