जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
चिट्ठी आई है
अंदर कितनी ध्ींगा-मस्ती
आपने श्री जे सी जोशी की स्मृति में पहला शब्द शिखर सम्मान अर्पण का व 'पाखी' के लोकापर्ण का कार्यक्रम रखा, उस समय पिता जी की अस्वस्थयता के कारण आपके कार्यक्रम में सम्मलित न हो सका और उसके बाद भी पत्रिाका की तरपफ ज्यादा ध्यान न दे पाया। अब एक वर्ष पूरा होने के बाद जो कुछ देखा बहुत अच्छा लगा। उस समय मैंने सोचा था-
हर पफन में एक भीड़ सी नजर आती है/बाहर एक लम्बी कतार नजर आती है/जो जितना भीतर ध्ंसा, वही जानता है/अंदर कितनी ध्ींगा मस्ती है।

आपकी पत्रिाका के सितम्बर व अक्टूबर के अंकों के शुरू के पन्ने पढ़कर ऐसा लगा मानो कोई बड़ा अखाड़ा खुल गया है। और यहाँ हर कोई अपनी शक्ति ;वाक्‌ शक्तिद्ध का प्रदर्शन करने में मस्त हैं। और यह जोर आजमाइश प्रफी स्टाइल में हो रही है, जो भी दाँव खेले जा रहे हैं, वे नियमानुसार हैं कि नहीं, इसकी किसी को भी परवाह नहीं है। हमलोगों का बचपन जहाँ गुजरा वहाँ कुम्हार का काम करने वाले अनपढ़ लोग रहते थे। उनकी औरतों की जब आपस में लड़ाई होती थी तो वे एक दूसरे को पूरी तरह नंगा करने में कोई परहेज नहीं करती थीं। उसी क्रम में वे स्वयं भी नग्न हो जाती थीं लेकिन वे पिफर भी दूसरों के कपड़े उद्घाड़ने में व्यस्त रहतीं। आजकल हमारे साहित्यकार एकदम से बिंदास होकर अपनी वाक पटुता दिखाने में मशगूल हैं और उससे किसकी हानि हो रही है ;हिन्दी साहित्यद्ध इसकी उन्हें जरा भी परवाह नहीं हैं।
खैर यह तो सब चलाता ही रहेगा। 'पाखी' का तेज देखकर बहुत अच्छा लगा। आपकी पत्रिाका में विविध्ता बहुत है परन्तु केवल साहित्यिक, कुछ भी गैर साहित्यिक नहीं है! यह निस्संदेह प्रसंशनीय कार्य है। संजीव जी एक बेहद संवेदनशील कथाकार हैं। उन पर केंद्रित अंक निकाल कर आपने पाठकों से एक कथाकार का अंतरंग परिचय करवाया है। सारी सामग्री पढ़ने योग्य है। हाँ! अखाड़ेबाजी भी मजेदार चीज है, आगे भी जारी रहे। कुछ तो क्रिया प्रतिक्रिया के मिलन से नया जीव प्रगट होगा।
अतुल प्रभाकर
;विष्णु प्रभाकर के पुत्राद्ध, दिल्ली

 
पत्राकारिता पर राजसत्ता का प्रभाव
 

पुण्य प्रसून वाजपेयी का लिखा पढ़ा। समझ में नहीं आता कि वाजपेयी अच्छे लेखक/पत्राकार हैं या पिफर एक अच्छे वकील। उन्होंने लेख में जिस पढ़ी-लिखी युवती का ममता बनर्जी से प्रभावित हो, रिर्पोटर बनने का उल्लेख किया है वह ठीक है। लेकिन वाजपेयी को यह तो मालूम है कि राजनेताओं के कुरते का कोना या नेत्रिायों के पल्लुओं को पकड़कर पत्राकार बनने के शौक का हश्र क्या होता है? पत्राकारिता पर राजसत्ता का प्रभाव यदि है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन? वाजपेयी जिस चैनल में राजनीतिक संपादक है वह छत्तीसगढ़ में भी है। जो २४ द्घंटे में एक बार रमन सरकार का धन द्घोटाला दिखाया। दूसरे दिन चैनल ने ये विज्ञापन दिखाया कि रमन सरकार किसानों की सरकार है और बाद में इसी चैनल के बरसी होने पर मुख्यमंत्राी डॉ. रमन सिंह नाच-गाने के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे, चैनल के मालिक मुख्यमंत्राी डॉ. रमन सिंह का सान्निध्य पा ऐसे हर्षित थे कि जैसे उन्हें ईश्वर के दर्शन हो गए हों।
छत्तीसगढ़ में कल नक्सली अपनी हिंसक गतिविध्यिों को बंद कर दें तब वाजपेयी यह मुहिम चला सकते हैं कि मुख्यमंत्राी डॉ. रमन सिंह ने नक्सलियों को अपने प्रभाव में ले लिया है। वाजपेयी थोड़ा स्मरण करें, मुख्यमंत्राी डॉ. रमन सिंह देश के पहले ऐसे मुख्यमंत्राी है जिन्होंने खुले मंच से कहा था कि पत्राकार गाँव जाएं और वहाँ की समस्याओं को लिखें। राजनेता के आभा मंडल से प्रभावित होने पर उसका दोष राजनेता पर क्यों? प्रभावित होने वाला व्यक्ति प्रभावित होते वक्त ही अपना अस्तित्व खो देता है। वैसे भी पत्राकारिता अपने द्घर को जलाकर चलने की चीज है, राजसत्ता का अनुचर बनकर पत्राकारिता नहीं की जा सकती, नौकरी जरूर की जा सकती है। अच्छा होता, वह भद्र युवती वाजपेयी से प्रभावित हो पत्राकारिता में आने की सोचती तो कहानी या द्घटना कुछ और होती।
संजय वर्मा, रायपुर, छत्तीसगढ़

 
अंतिम आदमी का सपना
 
'पाखी' का नवंबर अंक गोपालगंज से सिवान आते हुए खरीदा। पत्रिाका इतनी अच्छी लगी कि स्टॉल पर जाकर पिछले अंक पूछने से अपने आप को नहीं रोक सका। पर अपफसोस वहाँ सिपर्फ अक्टूबर अंक ही मिल पाया। अच्छी पत्रिाका निकालने के लिए बधई। अक्टूबर का आपका संपादकीय कापफी पसंद आया। शशि थरूर जैसे नेताओं को जब इकोनॉमी क्लास 'कैटल क्लास' लगता है तो समझा जा सकता है कि ट्रेन और बस में चलने वाले लोग 'सुअरबाड़ा' में चलते हैं। अपफसोस तो यही है कि शासक वर्ग बहुसंख्यक आबादी को इसी नजर से देखते है। कहाँ गया गाँध्ी जी का अंतिम आदमी वाला सपना...। नवंबर का संपादकीय थोड़ा कमजोर है। प्रेम भारद्वाज ने इमरोज और अमृता के प्रेम का अच्छा चित्राण किया है। कवि विद्रोही जैसे पात्राों को पूरी संवेदना और गरिमा देकर लिखना पसंद आया। राजीव रंजन गिरि ने सही लिखा है कि समाजवाद विरोध्ी मुक्त व्यवस्था खुद कितनी मुक्त है। इस उन्मुक्तता में किसका हित सध् रहा है। जैसे मध्यकाल का युग-धर्म, र्ध्म था वैसे ही आध्ुनिक काल का र्ध्म राजनीति है। यही राजीनति हाशिए पर ध्केले गए तबके को केंद्र की तरपफ लाने में मददगार साबित हुआ पर इसी राजनीति ने देश को मुक्त अर्थव्यवस्था की मंडी भी बनाया।
राजीव रंजन गिरि ने अपने स्तंभ में युवा रचनाशीलता और अर्ध्कथानक के बहाने आध्ुनिकता पर अच्छी टिप्पणी की है। कुमार विश्वास की भाषा असंयमित लगी, पफूहड़ता की हद तक। अपने प्रिय लेखक श्रीलाल जी के पुरस्कार की खबर जानकर खुशी हुई। आपका चयन बिल्कुल सही है। आपको धन्यवाद और श्रीलाल शुक्ल जी को बधई। श्रीलाल जी पर सूर्यबाला का लेख बहुत सुंदर है। सत्यकाम का भी ठीक है परंतु सुशील सि(ार्थ और साध्ना अग्रवाल के लेख औसत से भी कमजोर हैं। पढ़कर ऐसा लगा कि सुशील सि(ार्थ श्रीलाल शुक्ल के बारे में बताने के बदले अपना उनसे करीबी संबंध् बताकर धक जमाना चाहते हैं। साध्ना अग्रवाल अपने लेख में कुछ नहीं बता पायीं। केवल किताबों का नाम गिनाते रह गई। सुशील सि(ार्थ और साध्ना अग्रवाला के लेखन में दम नहीं लगा। निलय उपाध्याय, मंजरी श्रीवास्तव, नचिकेता की रचनाएँ अच्छी लगीं। अनंत कुमार सिंह ने आजकल की मोबाइली दुनिया की हकीकत को ठीक बयान किया है। कुसुम भट्ट और प्रमोद भार्गव की कहानी भी अच्छी है। परन्तु इस अंक की उपलब्ध्ि विजय की कहानी ही है। पुण्य प्रसून वाजपेयी के लेखन का क्या कहना! नए पत्राकारों में इनके जैसा गंभीर थोड़े से लोग ही हैं। ओम राजा और सांभरिया प्रेमचंद को समझ नहीं पाए हैं।
आलोक ठाकुर, सिवान, बिहार
 
साहित्य का बँटवारा
 

'पाखी' नवंबर ०९ अंक पढ़कर मुझे ऐसा क्यों लगता है कि आने वाले कल में कहीं शब्दों का बंटवारा न होने लगे। जलनिध्ि हमारा शब्द, नीरनिध्ि उनका शब्द पिफर उन्होंने हमारे शब्द का उनके साहित्य में क्यों प्रयोग किया। आज साहित्य दो भागों में विभक्त है, कल सौ में भी हो सकता है। यह श्रीवास्तव साहित्य वह सक्सेना साहित्य। बोले हमारा सक्सेनाओं में रोटी बेटी का व्यवहार तो है मगर हमारे साहित्य अलग-अलग हैं। पूछा क्या है उनके साहित्य में? बोले-हम आमतौर पर उनके लेखन से कोई मतलब नहीं रखते, वह उनकी दुनिया है। जो चाहे करें, जैसा चाहें लिखें, वे अपनी दुनिया में जिसे चाहे नवाजें, जिसे चाहे गरियायें, हम उनकी दुनिया से दूर ही रहना चाहते हैं ;पेज ५५द्ध। आप विद्वान साहित्यकारों से हम कम पढ़े लिखे पाठक, जो मिलता है पढ़ लेते हैं, 'जात न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान'। हमने तो आप साहित्यकारों के लेखों में ही पढ़ा है कि 'मानव मात्रा का सामूहिक कल्याण ही साहित्य का परम लक्ष्य होना चाहिए' या कि 'साहित्य पवित्रा हो उसका आधर सुंदर व सत्य हो, ऐसा साहित्यकार का उद्देश्य हो' और यह भी कि 'साहित्य शब्दपति है और शब्द ब्रह्म है तो ऐसा साहित्य दबा, कुचला, चीथा हुआ, टूटा हुआ टुकड़ों में परिवर्तित कैसे हो सकता है ;पेज ५८द्ध।' पान पत्ता ग्रीन वेजीटेबल है या नहीं या चाय खाद्य पदार्थ है या नहीं, इस बावत मुकदमे हाइकोर्ट सुप्रीमकोर्ट तक जा सकते हैं और न्यायालय देश-विदेश के निर्णय के आधर पर शब्द और वाक्य का इंटरप्रिटेशन कर सकते हैं किन्तु जिस शब्द का अर्थ सुस्पष्ट है, शब्द स्वयं ही अपना अर्थ स्पष्ट कर रहा है वहाँ उस शब्द के अर्थ के लिए मौलिस वर्थ के मराठी-हिन्दी शब्दकोष या अमरीकी इतिहासकार जिलियर के शब्द के अवलम्बन की जरूरत नहीं होना चाहिए। मैंने आप लोगों के लेखों में ही पढ़ा है हिन्दी साहित्य में आलोचकों की कमी है और जो आलोचक हैं वे परिश्रम कम करते हैं। परन्तु उक्त अंक पढ़ कर मुझे तो आलोचकों की कमी महसूस नहीं हुई। यथा- नाम लेते वे जिस पिपासा से आत्ममुग्ध् हुए, उनकी जिह्वा बार-बार होंठों पर आ जाती थी। उनके होंठ संध्ि तक गीले थे, ८४ वर्षीय बुजुर्ग की यह मुग्ध्ता' ;पेज ६०द्ध 'नये साहित्यकारों को' 'यह उखड़े हुए लोग हैं।' और मुंशी प्रेमचंद '५४-५५ वर्ष के वृ( को यह भान नहीं कि रात में मुर्दा जलाया नहीं जाता, कपफन लिख बैठे ;पेज ६०द्ध' की मानसिक तबियत में आती गिरावट ...तरस आता है... की समझ पर तथा ईश्वर को नहीं मानते इसलिए ईश्वर उनके पूरे परिवार पर कहर बरपाता रहता है... में इतनी भी शक्ति नहीं है कि जिन्दादिली दिखाएं और सूरज को उगने से रोक दें... की कहानियाँ पफूलों को खिलने से रोक दें तो जानँू केवल शब्दों की जुगाली भर कर लेने से कोई लेखक नहीं बनता। अपने आप को ज्यादा जीनियस साबित करना चाहते है... की सोच अ।ैर विचारात्मक अभिव्यक्ति पर रोष भी होता है और हंसी भी आती है ;पेज ५ व ६द्ध और भी... साहित्य में खलनायक, पथभ्रष्ट, यौनिकता के सरताज तथा मान्यता प्राप्त स्त्राी बिगाडू पुरुष है ;पेज ५३द्ध पढ़कर मुझे नहीं लगता कि हिन्दी साहित्य में आलोचकों की कमी है। हम कम पढ़े लिखे पाठक, हमने किसी पत्रिाका में प्रकाशित कहानी का मूल्यांकन इस रूप में नहीं किया कि पत्रिाका में प्रथम छपी कहानी श्रेष्ठ होगी और अंतिम श्रेष्ठ नहीं होगी क्योंकि हम यही समझते हैं कि पत्रिाका ग्रेडेशन लिस्ट नहीं होती। इच्छा यही है साहित्य काल में विभाजित हो यथा रीतिकाल, भक्तिकाल, वीरगाथाकाल आदि इत्यादि परन्तु साहित्य साहित्य ही रहे और साहित्यकार केवल साहित्यकार।
बृजमोहन श्रीवास्तव, गुना, म.प्र.

 
पत्राों का जवाब
 

सृजन की उड़ान 'पाखी' का अक्टूबर ०९ अंक तीन बार पढ़ा, अब तक के सभी अंक कई-कई बार पढ़ चुका हूँ, कुछेक रचनाओं को छोड़कर। हिन्दी में हाथ तंग है, पंजाबी-अंग्रजी में माहिर हूँ। मगर साहित्य का गम्भीर पाठक/लेखक हूँ। बताना चाहता हूँ कि पहले सिपर्फ पंजाबी-अंग्रेजी में ही पढ़ता लिखता था पर 'पाखी' ने हिन्दी में रुचि पैदा कर दी है। आप पत्राों के जवाब भी दें चाहे वह छोटे ही क्यों न हो, तो अध्कि अच्छा होगा। अगर आवश्यकता हो तो पत्राों को ज्यादा स्पेस दे दें। क्योंकि पत्राों के द्वारा पहले के पढ़े हुए के साथ आपका तथा दूसरों के विचारों का मुकाबला होता है। और पढ़ने समझने की रुचि बनती है। अनंत कुमार सिंह की कहानी 'कॉल-मिस कॉल' व्यंग्य लगी, पर प्रमोद भार्गव की कहानी 'कहानी विधयक विद्याध्र शर्मा की' बहुत ज्ञानवर्ध्क लगी, जीवनी मार्का कहानी। कुसुम भट्ट की 'नदी तुम...' में नारी जाति की दुखद स्थिति का करूणामय वर्णन है, पर विजय की 'वौ सुरीली' यादगार कहानी है। आशा तनेजा की लद्घुकथा 'रहमदिली का सच' के बारे में कहना चाहूँगा कि नब्बे प्रतिशत लद्घुकथाएँ एक आर्दश स्थापित कर उसे तोड़ती नजर आती हैं उसी के द्वारा। इसलिए कुछ नया कहो। मैंने पंजाबी की लद्घुकथाओं की सौ से ज्यादा पुस्तकों का समीक्षात्मक मूल्यांकन किया है और यही देखा है। ये पफार्मूला बहुत द्घिसा पिटा है। पिफर भी शैली दाद के काबिल है।
प्रो. एच. एस. डिम्पल, जगराँव, पंजाब

 
लाजवाब है संस्मरण
 

सम्मानित कथाकार संजीव पर केंद्रित 'पाखी' सितंबर ०९ अंक बोकारो बुक स्टॉल से खरीद कर पढ़ा। मन में दुविध थी कि पता नहीं संजीव पर कैसा अंक होगा। चूंकि मैं एक मुलाकात में संजीव भाई को जितना जान पाया हूँ उससे बढ़कर अंक में पाना चाहता था, मिला भी। संजीव भाई से मैं पहली बार तब मिला था जब वह हमारे आग्रह पर मेरे गृह प्रखंड नावाडीह में पधरे थे। अवसर था मेरी पुस्तक 'बहेलियों के बीच' का विमोचन कार्यक्रम। तब ही जाना था कि प्रेमचंद के उत्तराध्किार के रूप में संजीव भाई का नाम क्यों कथाजगत में बार-बार आता है। जो नहीं जान पाया था, उसे आपने उन पर विशेषांक निकालकर पूरी कर दी। अंक में जिस तरह कहानियों के साथ संस्मरण पिरोये हैं वह लाजवाब है। विशेषांक तो 'हंस' व 'नया ज्ञानोदय' ने भी निकाले पर सभी में खेमेवादियों का बोलबाला रहा। आज तक किसी ने भी संजीव को समझने का प्रयास नहीं किया वो काम 'पाखी' ने करके न केवल संजीव भाई का मान बढ़ाया है बल्कि एक यह संदेश भी देने का प्रयास है कि 'पाखी' अच्छी चीजों को परखने का काम आगे भी करेगी।
श्यामल बिहारी महतो, बोकारो, झारखण्ड

 
खो गया है गजलों में गीत
 
मई २००९ से मैं आपका पाठक हूँ। इस अंक में भालचंद्र जोशी की कहानी 'पल पल परलय' पंचायती राज व्यवस्था और सरकारी मशीनरी की कार्यशैली का भंडापफोड़ करती है। जोशी जी का भाषा पर बहुत अध्किार है। विषयवस्तु अनुसार उनकी भाषा अपना रूप बदल लेती है। इस कहानी और उनकी अन्य कहानियों यथा 'किला समय', 'चरसा' आदि को पढ़ते पाठक उनकी इस सि(हस्तता को महसूस करता है। दिनेश कर्नाटक की कहानी 'उत्तरायणी मेले की एक रात' पाठक को परंपराओं से जोड़ती है। अहमद सगीर 'मसीहाई' में एक नये विषय को छूते हैं। इस तरह के विषयों पर कहानियाँ कम लोग लिखते हैं। साम्राज्यवादियों की बंदूक किसी का लिहा८ा नहीं करती। कविताएँ अच्छी हैं। ग़८ालें और अच्छी हो सकती हैं। गीत को जगह मिल रही है। यह अच्छा संकेत है।
कुँअर उदयसिंह 'अनुज', खरगोन, म.प्र.
 
हिन्दी जगत के शोध्-प्रणाली की हकीकत
 

'पाखी' का मैं नियमित पाठक हूँ। 'पाखी' का जुलाई ०९ का अंक पहले जैसा पठनीय है। इसको आज ही पढ़ना शुरू किया अभी केवल संपादकीय, अदबी हयात, हाशिए पर हपर्फ तथा समय समाज ही पढ़ा है। इस अंक में प्रेम भारद्वाज ने 'माँ ने कहा था' शीर्षक से माँ के बारे में बहुत ही रोचक टिप्पणी लिखी है। इसमें भारद्वाज ने आज के बाजारवाद का प्रभाव माँ के रिश्तों पर कैसे पड़ा है? कैसे प्रभावित किया है? इसको बखूबी रेखांकित किया है। इस चकाचौंध् भरे बाजार में बने रहने के लिए बेबुनियाद के रिश्ते को हम रोज बना तथा तोड़ रहे हैं। इनकी रचना ने कितने दिनों बाद माँ की याद दिला दी। अदबी हयात ने पहले की तरह ही इस बार भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाया है। राजीव रंजन गिरि ने 'प्रेमचंद रचनावली में दूसरों की रचनाएँ' शीर्षक से पाठकों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी दी है। प्रेमचंद की ग्रंथावली में होती आयी भूल को बहुत ही सरल तथा बिना किसी को खेद पहुँचाए बताने की कोशिश की है। जिसे आज तक हम प्रेमचंद की रचना समझते थे वह किसी दूसरे की रचना है और प्रेमचंद ग्रंथावली को संकलित करने वाले विद्वान भी इससे महरूम रहे। प्रेमचंद की रचनावली कई बार कई प्रकाशनों से छपती रही लेकिन सबने गलती की। इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया तथा इसे प्रेमचंद के नाम दूसरे की रचनाएँ छपवाते रहे। यह इन रचनाओं के रचनाकारों के साथ भी बहुत बड़ा अन्याय है जिनकी रचनाएँ उनके नाम नहीं बल्कि कथा सम्राट प्रेमचंद के नाम छपती रही। यह हिन्दी जगत के शोध्-प्रणाली की हकीकत को दर्शाती है। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने 'लाल के खिलापफ लाल की नई लकीर' शीर्षक से पश्चिमी बंगाल में उपजी इस विकराल समस्या के मूल कारण को बताया है। कामरेड किसान तथा उनकी बातचीत बहुत अच्छी लगी।
अनिल कुमार, दिल्ली
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पाठकों को कोई मलाल नहीं
 
अक्टूबर ०९ 'पाखी' में 'पाखी महोत्सव' पर पूरी सामग्री देकर पाठकों को अमूर्त उपस्थिति का एहसास दिलाया। यह महोत्सव अपनी पूरी गुणवत्ता के साथ साहित्यिक संस्कृति को गढ़ती है। उपस्थित सभी वक्ताओं के विचार, ऊर्जा और स्पफूर्ति से भरे पड़े हैं। खासकर विषयक संगोष्ठी पर प्रस्तुत विचार, नई दृष्टि और नई चेतना से लबरेज हैं। नामवर सिंह संजीव के कृतित्व पर अपना वैचारिक मानक नहीं दे पाए, जिसका उन्हें पश्चाताप है। लेकिन पाठकों को ऐसा कोई मलाल नहीं है। वे उनकी प्रकाशित रचनाओं का आस्वाद भरपूर लेते हैं और ले रहे हैं।
विनोद अनुपम का यह कहना कि 'लेखक भी अपनी सार्वजनिक छवि के प्रति सचेत हो।' माना संजीव भी यथार्थ से भरी सादगी और सरलता का जामा पहने हुए थे लेकिन उन्हें कोई ग्लैमर में रहना है, यह कोई शर्त नहीं है। हालांकि संजीव भाई को भी इस बात का मलाल रहा है कि 'चित्रा भी ऐसा दिया कि संभवतः मैं तमतमाया हुआ हूँ। विदू्रप चित्रा के साथ मुझे यह अंक स्वीकारना पड़ रहा है।' क्यों भाई संजीव? आप तो बौ(कि दुनिया के किरदार हैं, कोई पिफल्मी दुनिया के नहीं। आखिर प्रेमचंद जैसी महान हस्तियां, किस ग्लैमर में रहते थे?
अरुण अभिषेक, पूर्णिया, बिहार
 
समाज तक अपनी बात पहुँचे
 
'पाखी' के प्रकाशन से अब तक इसका नियमित पाठक रहा हूँ, पत्रिाका में प्रकाशित कहानियों, लेखों, स्तंभों, कविताओं, आदि के आकर्षण में अब तक बंध हुआ हूँ। पत्रिाका में प्रकाशित रचना सामग्री निश्चित ही ज्ञानवर्ध्क व रुचिकर है और आप इसमें निरंतरता बनाए हुए हैं। पत्रा कहीं उलझ न जाए इसलिए पहले अपना परिचय देता चलूँ। मैं उत्तर प्रदेश के बदायूँ जैसे छोटे जिले में रहने वाला 'पाखी' का एक बड़ा प्रशंसक हूँ। पिछले लगभग पंद्रह वर्षों से विशाल 'गापिफल' नाम से साहित्य के क्षेत्रा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए संद्घर्ष कर रहा हूँ क्योंकि इस पथ की बाधओं के रूप में काव्य मंचों की दूषित राजनीति, मठाध्ीशों द्वारा नये व प्रतिभशाली रचनाकारों के अस्तित्व को कुचलने की विकृत मानसिकता, उनकी प्रतिभा को स्वीकार न करने की भीष्म-प्रतिज्ञाएँ आदि कई नकारात्मक विश्लेषण आज भी पहले की तरह उपस्थित हैं।
मैं भी इन्ही कड़वी सच्चाइयों के बीच अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संद्घर्ष कर रहा हूँ। इसलिए उपलब्ध्यिों के नाम पर कुछ अध्कि प्राप्त नहीं कर पाया हूँ। मैं पिफर भी ये सोचकर संतुष्ट हूँ कि मेरे रचे एक-एक अक्षर में स्वाभिमान की सुगंध् है। मैंने कभी भी माता सरस्वती के इस वरदान को लज्जित नहीं होने दिया साहित्य के इन मठाध्ीशों के सामने। अपने अंतर्मन के ये उद्गार मैंने आपके सामने क्यूँ प्रकट किए ये मुझे पता नहीं, शायद मेरा भावावेश इसके लिए उत्तरदायी है या कहूँ एक द्घुटन थी जिसको एक खुली हुई खिड़की दीखी और वह मन के बंद कमरे से बाहर निकल गई। मैं चाहता हूँ कि हम जिस समाज के लिए लिख रहे हैं उस तक अपनी बात पहुँचा सके पर हमारी भावनाओं को राजनीतिवश दबा दिया जाता है। 'पाखी' निश्चित ही नये व प्रतिभाशाली रचनाकारों के लिए एक संभावना है, उपलब्ध्ि है और मैं इस उपलब्ध्ि का एक अंग बनकर स्वयं को ध्न्य करना चाहता हूँ। मेरी दबी हुई भावनाएँ 'पाखी' के माध्यम से उड़ान भरेंगी, उन्हें स्वर मिलेगा और स्वर वहाँ पहुँचेंगे जहाँ इनकी आवश्यकता है।
विशाल 'गापिफल', बदायूँ, उ.प्र.
 

यह अक्षम्य है

 
अगस्त ०९ अंक में आपके संपादकीय से सहमति व्यक्त करते हुए इतना जरूर कहूँगा कि उदय प्रकाश जैसे स्थापित प्रगतिशील लेखक के लिए यह अक्षम्य तो है ही कि जनवादी-प्रगतिशील और वामपंथी मूलभूत एवं ठोस अवधरणाओं को दरकिनार कर मात्रा संबंधों को निर्वाह करें। वे बच्चे तो कतई नहीं हैं। तब यह भी साहित्य समाज को गौर करना चाहिए कि उन्होंने गलती स्वीकार की, बिमल से ही सही। हाँ! यह आश्चर्य जनक है कि उन्होंने 'अपने कठिन परिश्रम, कुछ सहृदय मित्राों के साथ', 'मेरे पास जो भी है वह ईश्वर की देने है' तक स्वीकार गए। दिनकर जैसे कवि- जिन्होंने सैकड़ों हुंकार भरा, व्यवस्था पर चोट की और कह डाला 'कुर्सी खाली करो कि जनता आती है' या उर्वशी में 'मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं' और अंत में 'हारे को हरिनाम।' माना जो भी हो अब यह प्रकरण बंद कर दिया जाना ही श्रेयस्कर है उदय प्रकाश को गहन चिंतन करने के लिए। अगस्त के अंक में डॉ. नामवर सिंह के कई महत्वपूर्ण विचार पठनीय एवं विचारणीय हैं। चंदन पांडेय कहानी के विषय में क्या नया कह पाए?
'पाखी' को अब अनंत साध्ूवाद जो इसने संजीव पर केंद्रित अंक निकाला। 'सारिका' में मैंने उनकी कई कहानियाँ पढ़ी थी। तभी मैंने अपने कथाकार मित्राों से कहा था- 'संजीव एक युग बनेंगे।' दुख इस बात का है कि जो सम्मान और स्थान संजीव को इसके पहले मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। कथा आलोचकों ने भी जिस वृत्तिवाद का परिचय देकर संजीव को कुछ अन्य कहानीकारों से बहुत पीछे छोड़ दिया था। 'पाखी' ने उस सम्मान तक पहुँचाने का भागीरथ प्रयास किया। वस्तुतः अब बड़े आलोचकों की आँखें खुल जानी चाहिए। इनकी कहानियों में सभी प्रकार के न्याय, यथार्थ, हर गलत के प्रति आक्रोश और लक्ष्य की ओर बढ़ने हेतु साहसिक कदम बढ़ाने की सबल, अकूत ताकत दिखती है।
लालसा लाल तरंग, आजमगढ़, उ.प्र.
 
टार्नेडो मेरी नजर में
 

सुध जी ने इस कहानी को रेत की ध्रातल पर रखे हुए नाजुक रिश्तों के इस कोण को शब्दों में बांध्कर एक पहलू नयी पीढ़ी के सामने रखा है। सोच की आजादी का, जो पूरी तरह से वक्त की बहती ध्रा के अनुकूल है। उनकी अपने समीक्षात्मक निगाह इस दौर से गुजरते कई पथिकों की गवाह रही है जो इस राह से गुजरे है। कलमबंद किए अहसास को एक दिशा बख़्शने के लिए बांध।
देवी नांगरानी, यूएसए

कहानी 'टार्नेडो' भारतीय एवं पाश्चात्य मूल्यों के मध्य एक पारदर्शी रेखा खींचती हुई पाठकों को दोनों संस्कृतियों से परिचित कराती है। बचपन से यौवन की दहलीज को पार करती हुई मासूम क्रिस्टी के मन में वंदना और सोनल के बीच माँ-बेटी के पावन रिश्ते को देखकर कई प्रश्न उठते हैं कि मेरा और मेरी माँ के बीच ऐसा रिश्ता क्यों नहीं हैं? जेनिपफर चाहे अपने मूल्यों के अनुसार वंदना को एबनार्मल बताती है किन्तु भारतीय परिवेश में अध्किांश समय बिताने वाली क्रिस्टी जीवन की सही दिशा की ओर ही अपने पाँव बढ़ाती हैं। अंत में वह अपने संरक्षक परिवार को भी अपनी सूझबूझ से कानूनी जाल में पफंसने से बचाती है। इस कहानी में बड़ी सहजता से किसी भी संस्कृति के जीवन मूल्यों को अच्छा या बुना न कह के द्घटनाओं के द्वारा उनको उजागर किया है। पूरे कथानक में एक अविरल प्रवाह है जो पाठक की उत्सुकता को बनाए रखता है। परिपक्व भाषा में लिखे छोटे-छोटे संवाद कथानक में रोचकता लाते हैं। सुध जी, कभी स्त्राी पात्राों को माध्यम बनाकर लिखी गई शिवानी की कहानियाँ पढ़कर जो आत्मतृप्ति हुई थी आज 'टार्नेडो' पढ़कर कुछ वैसा ही अहसास हुआ।
शशि पाध, यूएसए

'पाखी' के अगस्त एवं सितंबर अंक पढ़े। संजीव पर केन्द्रित अंक के खंड तीनः पत्रा एवं संस्मरण से गुजरना एक भयानक अनुभव है। बहुत भयानक! संजीव की कृतियों की सूची में उनका एक कथा संग्रह छूट रहा है- 'गुपफा का आदमी', भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। 'पाखी' की उड़ान संतुलित है, उर्ध्वागामी है। इतने कम समय में इसे जरूरी पत्रिाका बना दिया है।
राकेश कुमार सिंह, आरा, बिहार

हिन्दी साहित्यिक गतिविध्यिों के साथ-साथ उत्तम कहानियाँ-कविताएँ 'पाखी' की विशिष्टता हैं। मेरी विनम्र सोच के मुताबिक आपकी पत्रिाका 'नया ज्ञनोदय', 'हंस', 'संबोध्न' और 'समकालीन भारतीय साहित्य' जैसी पत्रिाकाओं के साथ खड़े रहने को सक्षम हैं। दिन-ब-दिन संभ्रांत साहित्य के साथ-साथ दलित साहित्य की अच्छी खासी नोक-झोक 'पाखी' में दी जाती है। 'पाखी' के स्वस्थ संपादन के लिए मेरी हार्दिक बधाई।
रमण वाद्घेला, गाँध्ीनगर, गुजरात

 
 
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