| कुछ प्रमुख नक्सलवादी संगठन |
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सी.सी एक पूर्णतः भूमिगत संगठन है जिसकी हिंसक कार्रवाइयां पत्रा-पत्रिाकाओं में चर्चित हुई हैं। संसदीय चुनाव प्रणाली का यह बहिष्कार करता है।
सी. ओ. सी. ;पार्टी यूनिटीद्ध
१९७५ में पार्टी के महादेव मुखर्जी ेक्शन से अलग हुए कुछ लोगों ने १९७९ में पार्टी यूनिटी सी.पी.आई. ;एम. एल.द्ध नामक संगठन बनाया। बाद में यह संगठन एक अन्य ग्रुप के साथ मिलकर यूनिटी आर्गेनाइजेशन, सी.पी.आई. ;एम. एल.द्ध बन गया। १९८१ में इस संगठन ने शर्मा के नेतृत्व वाले सी.ओ.सी. के साथ मिलकर सी.ओ.सी. ;पार्टी यूनिटीद्ध का गठन किया। यह संगठन मुख्यतः बिहार और पश्चिमी बंगाल के हिस्से में सक्रिय है। |
कानू सान्याल की ओ. सी. सी. आर.
जेल से बाहर आने के बाद पुराने नक्सलवादी नेता कानू सान्याल ने नक्सलबाड़ी के संद्घर्ष की अहमियत को नकारने हुए सी.पी.आई. ;एम. एल.द्ध को शुरू से ही अराजकतावादी और आतंकवादी संगठन कहा। बाद में उन्होंने उत्तरी बिहार, उत्तरी बंगाल तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में सक्रिय अपनी शक्तियों को लेकर ओ.सी.सी.आर. नामक एक संगठन का निर्माण किया। पिफलहाल यह अन्य जगहों पर निष्क्रिय है लेकिन पश्चिम बंगाल में प्रभावी है।
सी.सी.सी.पी.आई. ;एम.एल.द्ध
आंध््र, महाराष्ट्र, दिल्ली, पश्चिमी बंगाल तथा उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में सक्रिय यह संगठन 'इफ्रटू' के बैनर तले ट्रेड यूनियन कार्य भी करता है। १९८४ में चन्द्रपुल्ला रेड्डी के नेतृत्व वाली सी.सी.सी.पी.आई. ;एम.एल.द्ध ने आंध््र प्रदेश राज्य कमेटी के सचिव पक्षयला वासुदेव राव अपने साथियों के साथ अलग हो गये। रेड्डी के निध्न के बाद केन्द्रीय कमेटी के सदस्य एस.आर.भाईजी और मणि चक्रवर्ती ने पक्षयला वासुदेव राव से मिलकर एक नयी केन्द्रीय कमेटी का गठन कर लिया। भाईजी को इस नए संगठन का महासचिव चुना गया। पुरानी केन्द्रीय कमेटी के अन्य सदस्यों ने रामचंद्रन को अपना महासचिव चुनकर अपनी एक अलग केन्द्रीय कमेटी बनायी।
पी.सी.सी.सी.पी.आई. ;एम.एल.द्ध
१९७७ में पार्टी की सत्यनारायण सिंह के नेतृत्व वाली केन्द्रीय कमेटी और भास्कर नंदी के नेतृत्व वाली यूनिटी पार्टी कमेटी ने मिलकर पी.सी.सी.सी.पी.आई. ;एम.एल.द्ध का गठन किया। १९७९ में इसका एक हिस्सा चन्द्रपुल्ला रेड्डी के नेतृत्व में अलग हो गया, जिसने १९८० में एक विशेष कांग्रेस आयोजित करके अपना नाम सी.सी., सी.पी.आई. ;एम. एल.द्ध रख दिया। उध्र पी.सी.सी. १९८४ में अपनी प्रस्तावित विशेष कांग्रेस से पहले ही दो भागों में बंट गयी। सत्यनारायण सिंह के नेतृत्व वाले हिस्से ने विशेष कांग्रेस में भाग लेने के बजाय एक राष्ट्रीय सम्मेलन किया। दूसरे हिस्से ने विशेष कांग्रेस के बाद संतोष राणा ने नेतृत्व में अपना काम जारी रखा।
सी.सी.सी.पी.आई. ;एम.एल.द्ध, पीपुल्स वार
चारू मजुमदार के निध्न के बाद सी.पी.आई. ;एम.एल.द्ध की आंध््र प्रदेश राज्य कमेटी कोंडापल्ली सीतारमक्षया के नेतृत्व में स्वतंत्रा रूप से काम करने लगी। १९८० में उन लोगों ने तमिलनाडु राज्य कमेटी के कोदण्डरामन और महाराष्ट्र के कोबाड गाँध्ी के साथ मिलकर सीसी,सी.पी.आई. ;एम.एल.द्ध पीपुल्स वार का गठन किया। यह संगठन मुख्यतः आंध््र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा कर्नाटक के कुछ हिस्सों में काम करता है। इसके हथियारबंद दस्ते 'दलम' के नाम से जाने जाते हैं।
भाकपा ;माले-लिबरेशनद्ध
अन्य सभी नक्सलवादी गुटों से भिन्न चुनावों में हिस्सा लेते हुए ध्ीरे-ध्ीरे अपने आपको एक राजनीतिक पार्टी के रूप में ढालने का काम लिबरेशन ने किया है। इस नक्सली गुट का मुख्य आधार बिहार में है। वैसे हिन्दुस्तान के तकरीबन सभी प्रांतों में इस गुट के समर्थकों की संख्या अन्य सभी से ज्यादा है। १९९२ तक यह पार्टी भूमिगत थी। इससे जुड़े जनसंगठन खुले तौर पर कार्य करते थे। इस गुट ने इंडियन पीपुल्स ंट नामक एक खुला मोर्चा भी बनाया था जो बाद में समाप्त हो गया। इस पार्टी के महासचिव विनोद मिश्र हैं। नाग भूषण पटनायक जैसे पुराने नक्सली भी इस पार्टी में हैं।
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| जनता का आंदोलन है यह : जी. एन. साईबाबा ;मार्क्सवादी विचारकद्ध |
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सरकार नक्सलियों से निपटने के लिए सैनिक कार्रवाई करने का मन बना रही है। सेना और अर्(सैनिक बल लगाकर अपनी ही जनता के खिलापफ यु( का माहौल तैयार किया जा रहा है। सत्ता प्रतिष्ठान के दलाल बु(जिीवी इसके लिए वातावरण बना रहे हैं। नक्सली आंदोलन राजनीतिक आंदोलन है। इसका समाधान राजनीतिक तरीके से ही निकल सकता है। सेना और पुलिस के बल पर इसे रोका नहीं जा सकता है।
नक्सल आंदोलन जनता का और जनता के लिए आंदोलन है। सरकारी साजिश और दमन इसे नहीं रोक सकती है। जब तक देश की ८० प्रतिशत आबादी को उसका हक और सम्मान से जीने का अवसर नहीं मिल जाता है। अब एक अपफवाह पफैलायी जा रही है कि नक्सली विकास विरोधी हैं। जबकि सच्चाई यह है कि नक्सली विकास और प्रगति के समर्थक हैं। नक्सलियों का विकास का मॉडल आम जनता के लिए है। सरकार का विकास पूंजीपतियों, कुलीन वर्ग और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में है। सरकार २ प्रतिशत लोगों के आगे नहीं सोच पाती है। नक्सलियों का मॉडल और सरकारी विकास मॉडल अलग-अलग हैं।
नक्सलियों पर इसका आरोप लगाया जाता है कि वे हिंसा में विश्वास करते हैं। लोगों को मारते हैं। सच बात तो यह है कि नक्सली न तो मरने में विश्वास करते हैं और न ही मारने में। नक्सली, नेता, अधिकारी, पूंजीपतियों किसी को मारना नहीं चाहते। पुलिसकर्मियों की हत्या का जो आरोप लगता है वह आत्मरक्षा में उठाया गया कदम है।
इस देश की सरकार नक्सलियों को मारने के लिए गरीब पुलिसकर्मियों को भेजती है। बड़ी चालाकी से सरकार आम जनता को आम जनता के खिलापफ खड़ा कर देती है। पश्चिम बंगाल में नक्सलियों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे ममता बनर्जी के हाथ खेल रहे थे। यह सरासर गलत है। बंगाल में तीस साल से ज्यादा समय से सीपीएम की सरकार है। सीपीएम के कार्यकाल में जनता को दबाया गया। अब जनता जाग चुकी है।
नक्सलियों की वजह से तृणमूल कांग्रेस का कुछ पफायदा हो सकता है। इसका कारण यह है कि नक्सली चुनाव में भाग नहीं लेते हैं। देश की समस्या का समाधान चुनाव नहीं है। संसद में जाने से लोग जनता के दुश्मन हो जाते हैं। इसका विकल्प संसद नहीं बल्कि जनवादी व्यवस्था का निर्माण है। इस व्यवस्था का अंग बनकर इसे नहीं बदला जा सकता है। |
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| आतंकवाद नहीं है नक्सलवाद : प्रो. इम्तियाज अहमद ;समाजशास्त्राीद्ध |
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नक्सलवाद आतंकवाद नहीं है। हमने ये पफैसला किया कि लोकतांत्रिाक समाज बनाएँगे। सबको बराबर अधिकार मिलेगा। रोजगार, शिक्षा, और स्वास्थ्य की गारंटी होगी। आजादी के इतने सालों बाद भी हम वह समाज नहीं बना सके जिसका वादा और भरोसा हमने किया है। आज देखने में आता है कि हमारा लोकतंत्रा लंगड़ा है। इस आधे-अधूरे लोकतंत्रा को अलग-अलग प्रजातंत्राीकरण करना चाहते हैं। नक्सलवादी भी एक राजनीतिक विचारधारा में विश्वास करते हैं। वे भी समाज का प्रजातंत्राीकरण कर रहे हैं। उनकी विचारधारा और तरीके से असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन उनको खारिज नहीं किया जा सकता।
नक्सलवादियों की तरपफ से हिंसा होती है। लेकिन उनकी हिंसा 'टारगेटेड वाइलेंस' है। वे उन्हीं को अपना निशाना बनाते हैं जो विकास की मलाई का बंदर बाँट करने में लगे हैं।
जिन राज्यों को विकास की दौड़ में पिछड़ने की बात की जा रही है। उसका कारण नक्सली नहीं है। इन राज्यों में लोकतंत्रा के नाम पर सामंतवादी व्यवस्था मजबूत हुई। लोकतांत्रिाक संस्थाओं पर इन्हीं सामंती ताकतों का कब्जा आज तक बरकरार है। इन राज्यों में उन्हीं का विकास हो रहा है जो कहीं न कहीं सत्ता और तंत्रा से जुड़े हैं। नक्सलवादी ऐसे विकास की बात कर रहे हैं जो सबको लाभ पहुँचाए न कि विकास की सुनहरी किरण कुछ द्घरों तक सीमित रहे।
अभी प्रधानमंत्राी ने इस बात को स्वीकार किया कि नक्सलवाद बढ़ने की मुख्य वजह गरीबी है। गरीबी केवल गरीबी नहीं है। यह विकास के साथ ही पूरी आधुनिक संस्थानों से आपको बाहर कर देता है। इस देश में विकास का मॉडल और प्रक्रिया ऐसी है कि इसमें गरीब और गरीब, अमीर और अमीर बनता जा रहा है। एक बार जो पिछड़ गया उसके आगे आने की उम्मीद करना बेमानी है।
आज देश में जो भी विकास हुआ है और हो रहा है सामंतवादी ताकतों का उससे भला हो रहा है। नक्सली और उनका समर्थन करने वाले इस देश में पूर्ण नागरिक हैं। अपनी ही जनता के खिलापफ सेना लगाकर यु( करना पूरी तरह से गलत है। अगर ऐसा होता है तो गृह यु( छिड़ जाएगा। जनता आपस में ही लड़ेगी।
नक्सलियों की हिंसा प्रतिरोध में उठाया गया कदम होता है। जब-जब सरकार दबाव बढ़ाती है तब-तब नक्सली समूहों की तरपफ से भी उसी तरह की कार्रवाई देखने में आती है। सेना, पुलिस और दमन से इसे रोका नहीं जा सकता है। बातचीत और आपसी समझदारी ही इसका समाधान निकाल सकता है।
विकास की दौड़ में पीछे छूटे लोगों का विकास जब तक नहीं होगा तब तक इसे रोक पाना असंभव है। |
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किस आदर्श को लेकर संद्घर्ष? : राजकिशोर ;वरिष्ठ पत्राकार एवं विचारकद्ध
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नक्सलियों से निपटने के सरकारी तरीकों का लोग विरोध कर रहे हैं। जनता के दमन का विरोध होना लाजिमी है। लेकिन सवाल उठता है कि विरोध करने वालों के पास इस समस्या से निपटने का दूसरा तरीका क्या है? सरकार देश का कोई भाग ऐसे नहीं छोड़ेगी कि वह राज्य के नियंत्राण से बाहर हो जाए। कानून-व्यवस्था का राज्य समाप्त हो जाए।
जिन राज्यों में नक्सल समस्या है वहाँ राज्य विपफल हो चुका है। जब पहला गाँव नक्सलियों के कब्जे में आया, तभी राज्य की विपफलता की द्घंटी बज चुकी थी। इसके बाद नक्सलियों का आधार बढ़ता गया। तालिबानी हिंसा और विकास विरोधी कहना नक्सलियों के साथ ज्यादती होगी। नक्सल समस्या के समाधान के लिए जो उग्रवादी माहौल बनाया जा रहा है वह बिल्कुल गलत है।
देश के नेताओं से नक्सली ज्यादा भक्त लगते हैं। नक्सलियों को विकास विरोधी कहना और यह आरोप लगाना कि वे जहाँ-जहाँ है वहाँ विकास अवरू( है बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है। ये लोग जहाँ नक्सली नहीं हैं वहाँ विकास करके दिखा दें। सरकार पहले जहाँ नक्सली नहीं हैं उन राज्यों और क्षेत्राों का विकास करके लोगों के सामने मॉडल प्रस्तुत करेगी तब नक्सल प्रभावित क्षेत्राों से जनता अपने आप नक्सलियों को भगा देगी। सरकार विकास करना नहीं चाहती है। सरकारी योजनाएँ भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं। दोष नक्सलियों को दिया जाता है। दिल्ली में तो बिजली, पानी दे नहीं सके। सूदूरवर्ती गाँवों की बात कौन कहे। दिल्ली जैसे महानगर में बहू-बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं तब बिहार और उड़ीसा में कैसे सुरक्षित होंगी।
बिहार, उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ का पूरा भाग नक्सल प्रभावित नहीं है। क्या उस भाग में विकास कार्य पूरा हो गया है?
नक्सलियों की हिंसा पुलिस प्रशासन के प्रतिउत्तर में की गई हिंसा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि नक्सली जिस आदर्श को लेकर संद्घर्ष कर रहे हैं क्या उसके समीप पहुँचे हैं। आजादी के समय से ही वे संद्घर्ष कर रहे हैं। राज्य और व्यवस्था से उनकी मांगें हैं। वह सरकार पूरा नहीं कर सकती है। राज्य पर कब्जा करने का उनका सपना भी दूर की कौड़ी नजर आता है। ऐसे में इस समस्या का समाधान क्या है? मैं नहीं बता सकता। सरकार के पास शक्ति है। शक्ति के बल से नक्सलियों को रोका नहीं जा सकता है।
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