| आदिवासियों का खात्मा चाहती है सरकार : गौतम नवलखा ;मानवाधिकार कार्यकर्ताद्ध |
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सी.सी एक पूर्णतः भूमिगत संगठन है जिसकी हिंसक कार्रवाइयां पत्रा-पत्रिाकाओं में चर्चित हुई हैं। संसदीय चुनाव प्रणाली का यह बहिष्कार करता है।
सी. ओ. सी. ;पार्टी यूनिटीद्ध
१९७५ में पार्टी के महादेव मुखर्जी ेक्शन से अलग हुए कुछ लोगों ने १९७९ में पार्टी यूनिटी सी.पी.आई. ;एम. एल.द्ध नामक संगठन बनाया। बाद में यह संगठन एक अन्य ग्रुप के साथ मिलकर यूनिटी आर्गेनाइजेशन, सी.पी.आई. ;एम. एल.द्ध बन गया। १९८१ में इस संगठन ने शर्मा के नेतृत्व वाले सी.ओ.सी. के साथ मिलकर सी.ओ.सी. ;पार्टी यूनिटीद्ध का गठन किया। यह संगठन मुख्यतः बिहार और पश्चिमी बंगाल के हिस्से में सक्रिय है। |
नक्सलियों को विकास विरोधी बताने वाले किस विकास की बात कर रहे हैं? देश में अस्सी प्रतिशत से अधिक आबादी २० रुपए से भी कम पर गुजारा कर रही है। चार लाख बच्चे प्रति वर्ष काल के गाल में समा जाते हैं। ऐसी बात लिखने वाले अनपढ़ संपादक और सरकार हकीकत का सामना नहीं करना चाहते।
लालगढ़ में किशन जी ने पश्चिम बंगाल सरकार को चार दिन का समय दिया है। सरकार यह बताए कि उन्होंने क्या विकास किया है। लालगढ़ में नक्सलियों ने किस विकास को रोका है? दूसरी तरपफ नक्सलियों ने लालगढ़ में जो विकास किया है, उसकी सूची जारी की है। नक्सलियों को विकास विरोधी बताने वाले उसी पूंजीवादी सत्ता के दलाल हैं जो आजादी के बासठ साल बाद आम आदमी को रोटी, कपड़ा भी नहीं दे सकी। तालिबान से तुलना करने वालों की समझ को क्या कहा जाए? क्या उन्हें यह पता है कि पफासिस्ट शक्तियाँ जाति, धर्म को आधार बनाकर हिंसा पफैलाती हैं? पफासिस्ट और क्रांतिकारी हिंसा में बड़ा पफर्क होता है। तालिबान के लिए हर गैर मुसलमान शत्राु है। चाहे वह आम नागरिक हो या सैनिक। क्रांतिकारी किसी की हत्या नहीं करना चाहते हैं।
झारखंड, छत्तीसगढ़ में ६२ सालों में भारत की सरकार ने क्या विकास किया है। तीन सालों के दंडकारण्य में माओवादियों ने विकास कर दिखाया है। सरकार के पास उसका कोई उदाहरण नहीं है। आज पूरा जंगल वन मापिफयाओं से मुक्त है। तेंदू के पत्ते में अब ज्यादा पैसा मिलता है।
हिमांशु कुमार जी गाँधीवादी हैं। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में उनके चार आश्रम को पुलिस ने गिरा दिया। हिमांशु जी ने एक आरटीआई के माध्यम से यह जानना चाहा कि साल भर में नक्सलियों ने कितने स्कूल, अस्पताल और सरकारी इमारत गिराए। सरकार द्वारा दिया गया जवाब शून्य है।
अखबारों के ढेर सारे संपादक और बु(जिीवी व्यवस्था के दलाल हैं। सत्ता के गलियारों में आने-जाने से वह भी सरकारी भाषा बोलने लगते हैं।
नक्सलियों के ऊपर गरीब सिपाहियों की हत्या का आरोप लगाना गलत है। शासक वर्ग गरीब लोगों को पुलिस और सेना में भर्ती कर गरीबों के आंदोलन के खिलापफ खड़ा कर देती है। पुलिस कर्मियों की हत्या का दोषी सरकार है। बासठ साल में सरकार ने क्या विकास किया है किसी से छिपा नहीं है। सरकार इन राज्यों की खनिज संपदा, वन और सस्ते श्रम से जिन पूंजीपतियों का विकास करना चाहती है उस विकास के विरोध में आदिवासी खड़ा हो चुका है। सरकार कुछ लोगों का विकास कर रही है जबकि माओवादी सारी जनता का विकास करना चाहते हैं।
पश्चिम बंगाल में माओवादी आंदोलन से तृणमूल कांग्रेस के पफायदे का आरोप लगाने वाले समझें सेना लगाकर सरकार आदिवासियों का कत्ले आम करना चाहती है।
यह आंदोलन तब तक चलता रहेगा जब तक सरकार विस्थापन, सेज और उद्योगों के नाम पर हड़पी गयी जमीन और नव-उदारवादी नीतियों को समाप्त नहीं करती है। माओवादियों के ऊपर से लगा प्रतिबंध हटाना होगा जिससे वे राजनीतिक कार्य कर सकें। |
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| राज्यों में नक्सलवाद का पृथक रूप : धीरूभाई सेठ ;समाजशास्त्राीद्ध |
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नक्सलियों को नियंत्राण में लाने के लिए पूरे देश में एक ही तरह की नीति नहीं लागू की जा सकती है। नक्सलवाद का स्वरूप विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। आन्ध्र प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में चल रही नक्सली गतिविधियों में कापफी विषमताएँ हैं। जब हर जगह की स्थितियाँ अलग हैं तो निपटने का तरीका एक कैसे हो सकता है।
नक्सलवाद कहीं पर आंदोलन के रूप में है तो कहीं पर यह समस्या का रूप अख्तियार कर चुका है। यह बात सही है कि नक्सलवाद विचारधारा है। लेकिन कापफी जगहों पर विचारधारा नेपथ्य में चली गयी है। हिंसा आगे-आगे चल रही है। नक्सली हिंसा से बदलाव लाना चाहते हैं। वे हिंसा की बदौलत राज्यसत्ता पर काबिज होकर गरीबों का कल्याण करने का स्वप्न दिखा रहे हैं।
जब विचारधारा पीछे छूट जाती है तब सत्ता की बात प्रमुख हो जाती है। बंदूक के बल पर सत्ता पाने के लिए हिंसा बढ़ती जा रही है। हिंसा को रोकने के लिए सख्ती जरूरी है। पुलिस और अर्(सैनिक बल को इसके लिए कदम उठाने पड़ते हैं। नक्सलियों को काबू में करने के लिए सेना का उपयोग करना गलत है। यह न तो देश हित में है और सेना का भी इससे हित नहीं होगा।
नक्सलियों की वजह से देश का विकास नहीं हो रहा है, यह पूरी तरह गलत है। जहाँ विकास नहीं है वहाँ नक्सलवाद पनपा है। जहाँ नक्सलवाद है वहाँ विकास नहीं हो पा रहा है।
हिंसा के बल पर राजसत्ता पर कब्जा नहीं किया जा सकता है। पुलिस और सेना के दमन से नक्सलवाद पर काबू नहीं हो सकता है। इसका राजनीतिक हल निकालना चाहिए। नक्सलियों को कई जगह जनता से भारी जनसमर्थन मिल रहा है। कुछ स्थानों पर बिना जनसमर्थन के इन लोगों ने कानून को अपने हाथों में ले लिया है। ऐसे में प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ती है। नक्सलवाद और इससे निपटने के तरीकों दोनों को पूरी तरह काला और सपफेद में नहीं देखा जा सकता है। हमें हिंसा से दूर रहना होगा। |
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| बातचीत से ढूँढ़ेंगे हल : अतुल कुमार अंजान ;राष्ट्रीय सचिव-भाकपाद्ध |
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भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का सापफ मानना है कि नक्सलवादियों या माओवादियों से राजनीतिक रूप से सामना करना पड़ेगा। माओवादी सामाजिक, आर्थिक विषमताओं को उठाकर अपनी बात कहते हैं। इस क्रम में वह विकास से अछूते उस क्षेत्रा को छूते हैं जहाँ विकास की किरण आजादी के बासठ साल बाद भी नहीं पहुँची है। या अपर्याप्त है। सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक असमानताओं का कवच बाँधकर वह जनतांत्रिाक प्रक्रिया के विपरीत देश के द्घोषित विधान और संविधान से हटकर लोगों को उकसाते हैं।
हाशिए पर पड़े अधिकांश बहुसंख्यक लोगों में अतिरिक्त चेतना को पैदा कर राज और समाज व्यवस्था के खिलापफ विद्रोही तेवर पैदा कर जनता को टकराव की स्थिति तक ले जाकर एक स्थिति पैदा करते हैं। नौजवानों में शस्त्राों का आकर्षण पैदा कर उन्हें हथियार ट्रेनिंग देते हैं। हथियारबंद गिरोह बनाते हैं। और पिफर सशस्त्रा संद्घर्ष के नाम पर व्यवस्था की छोटी-छोटी इकाइयों पर हमला कर भय का वातावरण चारों ओर पैदा कर सशक्त क्रांति की धारणा प्रस्तुत करते हैं।
सामाजिक, आर्थिक गैरबराबरी के खिलापफ संद्घर्ष करना लोगों में जागरुकता पैदा करना और उन्हें अधिकार प्राप्ति के लिए लामबंद करना किसी भी लोकतांत्रिाक संगठन का जनतांत्रिाक अधिकार है। भारतीय संविधान में इसकी इजाजत है। अपने सामाजिक, राजनीतिक विचारों को जनता के बीच ले जाने की आजादी होनी ही चाहिए। परंतु एक जनतांत्रिाक देश में किसी समूह द्वारा अपनी मांगों की पूर्ति के लिए प्रशासनिक अधिकारियों या पुलिस के लोगों की हत्या कर देना कहाँ तक तार्किक है? इस तरह की कार्रवाई किस सभ्य समाज का हिस्सा है?
भाकपा देश के नागरिकों, किसानों, मजदूरों, शोषित और आदिवासियों के अधिकारों के संद्घर्ष को आगे बढ़ाती है। जनता के जनवादी अधिकार, किसानों के उत्पादन का लाभकारी मूल्य, मेहनत की उचित मजदूरी दिए जाने के संद्घर्ष को हम चलाते रहे हैं, चलाते रहेंगे। संसद और संसद के बाहर संद्घर्ष करने का हमारा शानदार इतिहास रहा है। जनता की समस्याओं का समाधान लोकतांत्रिाक व्यवस्था में संवाद से ही संभव है। आमने-सामने के संवाद से ही सहमति के द्वार खुलते हैं, योजनाएँ आकार लेती हैं। लोकतांत्रिाक सरकार में हथियारों के बल पर सरकार से संवाद करने की कोई परंपरा नहीं रही है। अपने देश की सरकार से हम लोग बातचीत और बोली से हल ढूँढेंगे। सरकार भी बातचीत और बोली से हर गतिरोध को तोड़े। बोली का स्थान गोली नहीं ले सकती। इसलिए भाकपा का मानना है कि अपने ही लोगों के ऊपर अपनी सेना का प्रयोग अनुचित है। इसलिए हमने भारत सरकार को आगाह किया कि सेना का इस्तेमाल सर्वथा गलत होगा। हम माओवादियों से भी कहना चाहते हैं कि बारूदी सुरंग लगाना, पुलिस के लोगों को बम से उड़ा देने से क्रांति का ऐतिहासिक द्वार नहीं खुलेगा। पुलिस के जवान कारपोरेट द्घरानों से संबंधित नहीं हैं। न ही वे उच्च पदस्थ अधिकारियों के बेटे हैं। वे भी किसान और मजदूरों के बेटे हैं। किसान और मजदूर के बेटों को मार कर क्रांति की संभावनाएँ प्रबल होती हैं यह भावना निर्मूल है। बेगुनाह लोगों की हत्या से क्रांति विरोधी शक्तियों को ताकत मिलती है। इसे हमारे व्यापक समाज में हथियारों के द्वारा अभी के दौर में कुछ लोगों की द्घात लगाकर हत्या कर देने से तथाकथित क्रांति के मशाल की लौ नहीं धधक उठेगी।
प्रस्तुति : प्रदीप सिंह |