जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
हाशिए पर हर्फ़
''यथार्थ की छाती पर संवेदना की कील : प्रेम भारद्वाज


मि. आरके गुप्ता मैं तुझे बर्बाद करके छोड़ूँगा। तुझे मेरी माँ के एक-एक दुःख का हिसाब देना होगा।''-पिफल्म 'त्रिाशूल'''मेरे 'पा' बहुत इंपोर्टेंट आदमी हैं। उन्हें क्या कहते हैं, ..हाँ, पॉलिटिशियन हैं। वह एमपी हैं। मेरे साथ वह बहुत अच्छा सलूक करते हैं... जब मैं थक जाता हूँ तो वह मुझे अपनी पीठ पर बिठा लेते हैं।''

-पिफल्म 'पा'
दोनों पिफल्मों के प्रदर्शन में तीस साल का अंतर। नायक अमिताभ ही। 'पा' देखते हुए 'त्रिाशूल' की याद आई। 'पा' में उस अर्थ में अमिताभ होकर भी नहीं है-न दमदार आवाज, न चेहरा, न कद काठी। औरो को देखकर हम केवल कल्पना करते हैं कि यह अमिताभ हैं। त्रिाशूल में उनका पूरा व्यक्तित्व और 'एंग्रीमैन' की छवि उपफान पर थी।

दोनों में कुछ समानताएँ। इनके नायक अमिताभ हैं- माँ है, पिता हैं। तीनों के बीच एक कशमकश भरा रिश्ता। 'त्रिाशूल' में अमिताभ की माँ बनी वहीदा रहमान, संजीव कुमार से प्रेम करती है। विवाह नहीं हो पाता। बच्चा गर्भ में। बिना शादी के वह बच्चे को जन्म देती है। संजीव कुमार बहुत बड़े व्यवसायी बनते हैं। 'पा' में अभिषेक सियासतदां बनने की राह पर हैं। सियासत की राह में संवेदना का क्या काम। वह विद्या बालन से पे्रम तो करते हैं मगर विवाह और बच्चे की जल्दबाजी नहीं। निगाहें लक्ष्य पर टिकी हैं। विद्या बालन अपनी अलग राह पकड़ कर बिना शादी के बच्चे को जन्म देती हैं। ठीक यहीं दोनों पिफल्मों की दिशाएँ परस्पर विरोध में मुड़ जाती हैं। शायद अपने-अपने दौर के कारण। 'त्रिाशूल' का विजय बड़ा होकर आक्रोश से भरा उस पिता से प्रतिशोध लेने निकल पड़ता है, जो उसके और उसकी माँ के साथ नाइंसापफी करता है। उसके जीवन का एक ही मकसद होता है, पिता आरके गुप्ता से बदला लेना। इसके विपरीत 'पा' का अमिताभ औरो प्रोजेरिया जैसी भयानक बीमारी से ग्रस्त १३ साल का ऐसा बच्चा है, जो ८० साल का दिखता है। उसके भीतर आक्रोश तो है

मगर अपने ढंग का है। वह पिता से प्रतिशोध लेना भी नहीं चाहता। यह जानते हुए भी कि उसने उसकी माँ से विवाह नहीं किया और वो नहीं चाहते थे कि वो दुनिया में आए। इन सबके बावजूद औरा पिता को प्रेम करता है। वह माँ को समझाता है। पिता से मिलाता है। इस दलील के साथ कि जो गलती करता है उसे ही ज्यादा आत्मग्लानि होती है, इसलिए गलती करने वाले को मापफ कर देना चाहिए। 'पा' में अमिताभ की नाराजगी पिता से नहीं उस सत्ता से है, जिसको पाने के लिए उसके पिता ने उसकी माँ से विवाह नहीं किया। सियासत की सीढ़ियों में कई लोगों के दुःख-तकलीपफ के पायदान होते हैं। उन्हें रौंदते हुए ही आगे बढ़ा जाता है। वादाखिलापफी और संवेदनहीनता के कई मोड़ आते हैं। विद्या बालन-अभिषेक की वादाखिलापफी पर व्यंग्य भी कसती हैं-'मुझे यकीन है तुम बहुत बड़े पॉलिटिशियन बनोगे।' ऐसा इसलिए कि राजनेता बनने के लिए वादाखिलापफी, संवेदनहीनता और स्वार्थपरकता अनिवार्य गुण हैं। लोहिया कहा करते थे- किसी औरत के साथ बलात्कार और वादाखिलापफी के अलावा हर संबंध जायज है। प्रेम लोहिया के भीतर भी था- मगर वादाखिलापफी नहीं। संवेदना भी लबालब भरी थी। लेकिन आज के जमाने में राजनीति का रंग बदल गया है। राजनीति एक ऐसा बुल्डोजर है जो व्यक्तिगत हित और स्वार्थ की बुलंद इमारत खड़ी करने के लिए कमजोरों की बस्तियाँ उजाड़ने और अरमानों को रौंदने से जरा भी गुरेज नहीं करता- वो बस्ती और अरमान उसकी प्रेमिका की ही क्यों न हो, उसको कोई पफर्क नहीं पड़ता। वह राजनीति ही है जो नैना साहनी को उसका राजनीतिक प्रेमी तंदूर में झोंक देता है- कविता पढ़ने वाली मधुमिता शुक्ला की हत्या की साजिशें रचता है।

पिता के पॉलिटिशियन होने के बावजूद औरो राजनीति से प्यार नहीं करते। राष्ट्रपति भवन पहुँचकर भी राष्ट्रपति भवन न देखना। वह भी इसलिए कि उसे शिट का प्रेशर था। यह कहीं न कहीं सियासत और पॉवर सेंटर के प्रति उसके भीतर बैठे नपफरत-द्घृणा को व्यक्त करता है। इस पिफल्म में राजनीति और मीडिया के प्रति नाराजगी दिखाई गई है। राजनीति के प्रति नाराजगी की वजह पहले से ही रही है। अब मीडिया भी कई मामलों में राजनीति का पिछलग्गू हो गया है। अगर हम इसे अमिताभ बच्चन के निजी जीवन से जोड़ें तो चीजें सापफ होती हैं। ८० के दशक में मित्रा राजीव गाँधी के अनुरोध पर अमिताभ बच्चन पिफल्मों से राजनीति में आए थे। उसके बाद सियासी चालों और मीडिया ने अमिताभ को जिस तरह से द्घेरना शुरू किया वह सबको पता है। उसने अमिताभ के भीतर नपफरत-नाराजगी को जन्म दिया। वो नपफरत-नाराजगी कलात्मक रूप से 'पा' में अभिव्यक्त हुई है।

राजनेताओं ने अपनी सुरक्षा के नाम पर पुलिस बल को किस तरह रोबोट बना दिया है, इस पर भी 'पा' व्यंग्यात्मक चोट करते हुए मानवीय पहलू को उकेरती है। अपने साथ चल रहे सुरक्षाकर्मियों के भीतर मानवीयता के तत्व को कितने राजनेता टटोलते होंगे। सुरक्षा के इस द्घेरे ने जनप्रतिनिधियों को जन से अलग किया है। सुरक्षा द्घेरे के बावजूद हमारे कई राजनेता, मसलन इंदिरा गाँधी, बेअंत सिंह की हत्या हो चुकी है। अब तो यह सुरक्षा से ज्यादा स्टेटस सिंबल का मामला बन गया है। सुरक्षाकर्मियों के द्घेरे में ठसक भरे अंदाज में रहना हमारे राजनेताओं की एक आदत बन गई है। 'पा' में अमिताभ, सांसद बने अभिषेक बच्चन के सुरक्षाकर्मियों के औचित्य पर बराबर सवाल खड़ा करते हैं।
'पा' में अमिताभ राजनेताओं के सपफेद कपड़े पहनने को नए ढंग से व्याख्यायित करते हैं। औरो सवाल करता है- 'पॉलिटिशियन व्हाइट कपड़े क्यों पहनते हैं?' पिफर वो खुद ही जवाब भी देता है- 'रोने के लिए, कंट्री मर रहा है न, पॉलिटिशियन इसलिए सपफेद कपड़े पहनकर मातम मनाते हैं।' यहाँ पहली बात तो सही है। देश रो रहा है। भूख, बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, बीमारी, सत्ता के छल-बल से। मगर यह सच नहीं है कि देश के पल-पल मरने पर राजनेताओं में किसी किस्म की कोई हलचल होती है। वे दुःखी हो रोते हैं। अलबत्ता वे तो देश के मरने पर जश्न मनाते हैं- हर दिन हर शाम। वर्तमान लोकसभा में ३०९ सांसद करोड़पति हैं। उनके पास शानो-शौकत है। सुविधाओं का रंगमहल है।

जीवन में सब कुछ जगमग-जगमग। दूसरी तरपफ इनकी उपेक्षा से जन्मे औरो की बदरंग दुनिया। बच्चों की बदहाली। भारत में हर साल चार लाख बच्चों की मौत जन्म के २४ द्घण्टों के भीतर हो जाती है। इतनी तादाद में नवजात शिशुओं की मौतें दुनिया के किसी देश में नहीं होतीं। करोड़पति सांसदों के देश में ही हर साल २० लाख बच्चे उम्र का पाँचवा वसंत नहीं देख पाते। कुपोषण का शिकार दुनिया का हर तीसरा बच्चा भारतीय है। नागरिक स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत १७५ देशों की सूची में १७१वें स्थान पर है। इन आंकड़ों के आलोक में देश के बदहाल बचपन का अंदाजा खुद लगाइये। लेकिन दूसरी तरपफ लोकसभा में करोड़पति सांसदों की तादाद बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही है। सांसद दिल्ली में हैं। सत्ता है यहाँ। सत्ता महानगरों के मल्टीप्लेक्स संसार के पार नहीं देखना चाहती, जहाँ गरीबी की बदरंग दुनिया शुरू होती है। इस देश में अभावों का रेगिस्तान है। उसमें विलासिता की ऊँची मीनारें भी हैं। ऊँची मीनारों में रहने वाले अपनी महत्वाकांक्षाओं के अंतहीन आकाश को देखते हैं। उन्हें नींव की ओर देखना गवारा नहीं। नींव में गरीब है, दर्द है, कुपोषण है, बदहाली है।

जो देश अपने बच्चों की जान नहीं बचा सकता, उसकी अर्थव्यवस्था की उपलब्धियों का कोई अर्थ नहीं। लगाता रहे सेंसेक्स छलागें। न ही हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि संसद पहुँचे सांसद गरीबों और बदहाल बच्चों की चर्चा करेंगे। वे पहले अपने कीमती कपड़े से सड़क की गर्द झाड़कर अलग करेंगे। उस 'वीर्य' को भूलेंगे जो उन्होंने किसी के गर्भ में डाला था। 'पा' में अकेलेपन के दर्द को झेलती माँ है, जो सवालों के सलीब पर टंगी है। माँ का हौसला है। बीमार बच्चे को पालने का हौसला। वह जानती है उसका शिशु बीमार है। महज १३ साल की उम्र लिए। मगर उससे निजात पाने के लिए वह बच्चे को नमक नहीं चटाती। वह उसको अभागा नहीं भाग्यशाली बनाती है। रोने-गिड़गिड़ाने या छाती पीटकर विलाप करने की बजाय हालात से मुकाबला करती है। कठोर यथार्थ की छाती पर संवेदना की कील ठोंकर अपने पुत्रा-प्यार के कैलेंडर को टाँगती है। १४ साल का कैलेंडर। दिन बीतते हैं। बेटे के सान्निध्य की अवधि भी सिमटती जाती है। मगर वह पलों को सदियों की तरह जीती है।

औरो एक बीमार बच्चा है। अगर इसे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जोड़कर सोचें तो एक नए नजरिये से भी इस पिफल्म को देखा जा सकता है। क्या राजनीति की राह में औरो जैसे बीमार वजूद का जन्म नहीं होता है? क्या औरो जैसे लोग सियासत की वीर्य से पैदा नहीं होते हैं? जिसे एक संवेदनशील 'गर्भ' को उसे रखना और जन्म देना पड़ता है? सियासत से वादाखिलापफी का दंश झेलने वाली माँ को उस बीमार वजूद को जन्म देने के बाद पालन-पोषण करना होता है। और राजनेता जिसके वीर्य से उत्पन्न होती है यह बीमारी, वह सियासी दाँव पेंच में मशगूल होता है। क्या औरो हमारे देश के उस कमजोर वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करता जो सियासतदानों की क्रूरता, स्वार्थ और उपेक्षा से जन्मा है। यह वो वर्ग है जहाँ बचपन है बुढ़ापे जैसा, जवानी है नहीं, बीमारी है, असमय मौत है। सामाजिक अपमान के नुकीले तीर भी।

इन बीमार हो रहे 'कमजोर लोगों' यानी औरो को अभिषेक जैसे राजनेता नहीं, विद्या बालन जैसी मांओं की संवेदना और हौसला ही बचाते हैं।
पिफल्म में बीमारी है। बीमार बच्चा है। वह नायक भी है। मगर करुणा नहीं। माँ-बेटे की प्रेम कहानी है। भावुकता की हिचकी नहीं। संवेदना का अद्भुत संतुलन। अमिताभ कहते हैं- 'आई हेट इमोशंस'। इमोशन का मतलब उस लिजलिजी भावुकता से है जो व्यक्ति को कमजोर करती है। लेकिन संवेदना बची है। वह जरूरी भी है- इसको परवान चढ़ते हुए हम तब देखते हैं जब माँ-बाप औरो के सात पफेरे लगाते हैं। औरो की वजह से सियासत और संवेदना गठबंधन कर कमजोर और मरते बच्चे को अग्नि मानकर उसके पफेरे लगाते हैं साथ जीवन जीने के लिए। काश, पिफल्मों का सच जीवन और हमारे समय-समाज का भी सच बन पाता।
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चतमउमकपजवत/हउंपसण्बवउ

 
 
 
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